रविवार, 20 मई 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय का संस्मरण ..तीसरी किश्त



                              विमल चन्द्र पाण्डेय 



पिछली किश्त में आपने पढ़ा कि दिल्ली गए विमल को एक समाचार एजेंसी में नौकरी तो मिल जाती है , लेकिन परिस्थितियां उन्हें इलाहाबाद में ला पटकती हैं | इस बीच उनकी कहानी 'नया ज्ञानोदय' के विशेषांक में छपती है,जो काफी चर्चित हो जाती है | किसी भी नवलेखक की तरह विमल उसमे डूबते उतराने लगते हैं. कि तभी उनका सामना इलाहाबादी तेवर वाले एक मित्र से होती है , जो चुटकियों में उन्हें जमीन पर ला पटकता है | लेकिन यही तेवर विमल के लिए वरदान साबित होता है | ...और फिर आगे  ...?

                    
                      प्रस्तुत है विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
             शहरों से प्यार वाया इलाहाबाद-मेरी जिंदगी के सबसे उपजाऊ साल 
                                की तीसरी किश्त 

                                     3...


मुझे इलाहाबाद पहुंच कर यूएनआई में दो अप्रैल से ड्यूटी ज्वाइन करनी थी। दिल्ली से मैं बोरिया बिस्तर समेट कर पहले अपने घर यानि बनारस पहुंचा था। दिल्ली से बहुत जल्दी-जल्दी निकलना था और इस जल्दबाज़ी में मैं अपनी सारी किताबें नहीं ला पाया था। मैंने दो कार्टन्स में अपनी ढेर सारी किताबें और साहित्यिक पत्रिकाएं रख दीं और उसे पांडव नगर के बी-32 में (जहां मेरी कहानी `एक शून्य शाश्वत´ का शाश्वत रहता था और वास्तव में वह शशि शेखर (चौथी दुनिया वाया इंडिया न्यूज और ईटीवी) और आनंद पाण्डेय (आईबीएन 7 वाया ईटीवी) का डेरा था) रख दी। विभव ने भी तब तक अलग फ्लैट नहीं लिया था और मेरी किताबों की देखभाल करने के लिये सबसे विश्वसनीय शख्स था। मैंने कहा कि मैं अगली बार जब दिल्ली आउंगा तो अपनी किताबें ले जाउंगा। खैर, थोड़ी लापरवाही मेरी भी हो गयी कि मैं उसके बाद कई बार दिल्ली गया और वहां से कार्टन को बिना लिये आ गया। इसके पीछे वजह यह थी कि मन ही मन मैं जल्दी ही मुंबई निकलने की योजना बना रहा था और चाहता था कि किताबें दिल्ली से सीधा मुंबई ले जाउंगा इसलिये उन्हें एक बार बनारस और फिर वहां से मुंबई ले जाने की जद्दोजहद मुझे बेकार लगी। ताज़ा ख़बर ये है कि वे दोनों कार्टन अपनी जगह पर मौजूद नहीं हैं और मुझे बार-बार पूछने पर बताया गया है कि आदरणीय शशि शेखर गरीबी के दिनों में कभी वे किताबें बेचकर अपने पौवे का इंतज़ाम कर चुके हैं। हालांकि शशि जी ने इस आरोप का पुरज़ोर खंडन किया है लेकिन किताबों की बाबत वे भी अनभिज्ञता व्यक्त करते हैं।


बहरहाल, 2 अप्रैल को ज्वाइन करने से पहले मैंने बनारस से ही 1 अप्रैल को इलाहाबाद में यूएनआई के कांटैक्ट परसन श्री जियालाल को फोन किया और बताया कि मैं कल से आपके साथ ऑफिस ज्वाइन करने आ रहा हूं। उन्होंने मेरी बात को इस भाव से सुना गोया मैं फ्रेंच में बोल रहा हूं और उन्हें ये भाषा कतई नहीं पसंद। मैं समझ नहीं पाया कि मामला क्या है और निश्चिन्त होकर अपने कॉलेज के दिनों का एक गाना सोचते हुये सो गया।
``जब नौकरी मिलेगी तो क्या होगा
जिसम पे सूट होगा, पांव में बूट होगा
 हाथों में गोरी का हाथ होगा।´´
दसियों नौकरियां करने छोड़ने के बाद आखिरकार ये ऐसी नौकरी थी जिसमें पढ़ना लिखना था और भागदौड़ बहुत कम थी।


जब मैं 2 अप्रैल को सिविल लाइंस बस अड्डे पर बस से उतरा तो मैंने पहले सैलून में जाकर दाढ़ी बनवायी। यह वही शहर था जिसमें मैं कई बार कई प्रतियोगिता परीक्षाएं देने के बहाने से घूमने आ चुका था, जहां मेरे चाचा का घर था और जहां सिर्फ तीन महीने पहले मैं अपनी चचेरी बहन की शादी में गया था। लेकिन आज इस शहर में मैं एक राष्ट्रीय एजेंसी के पत्रकार की हैसियत से जा रहा था। मेरी कल्पना में एक ऑफिस आया जिसमें मुझे एक छोटा सा केबिन मिले और सहयोगी स्टाफ हों। चूंकि मैं एक कल्पनाशील लेखक हूं इसलिये मैं ये मान कर चल रहा था कि मेरे सहकर्मियों में ज़रूर कोई सुंदर लड़की भी होगी जिसे कहानियां कविताएं और फिल्मों वग़ैरह में रुचि होगी। कल्पनाएं ढेर सारी थीं और समय बहुत आशावादी थी। मौसम में गर्मी थी और सिविल लाइंस के गिरजाघर से थोड़ा आगे मैंने रिक्शा रुकवाया तो सामने एक बड़ा सा बोर्ड था जिस पर लिखा था `यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया´। मेरी धड़कनें बढ़ गयीं। थोड़ी दूरी पर अमर उजाला का बड़ा सा बोर्ड टंगा था और वहां लाइन से चाय की दुकानें थीं। आगे जाकर जहां से नज़र वापस लौट आती थी, वहां ढेर सारे लोग काले कोट में खड़े चाय पी रहे थे। मैंने अपने कदम अपनी मंज़िल की ओर बढ़ा दिये।


लेकिन वहां एक दूसरा आश्चर्य मेरा इंतज़ार कर रहा था। कांटैक्ट परसन श्री जियालाल जी ने कहा कि उन्हें ऐसी कोई सूचना नहीं मिली कि यहां कोई पत्रकार ज्वाइन करने आ रहा है। मैंने उन्हें कल बनारस से किये फोन की याद दिलायी तो उनका मासूम सा जवाब था कि उन्हें लगा कि कोई उन्हें `अप्रैल फूल´ बना रहा है। वे तीन कमरों के एक फ्लैट में अपने छोटे मगर दुखी परिवार के साथ रह रहे थे और मुझे पता चला कि यही यूएनआई/यूनीवार्ता का दफ्तर है और एकमात्र वही वहां के स्टाफ। उन्होंने मुझे ज्वाइन कराने से इंकार कर दिया और दिल्ली फोन मिला कर प्रबंधन से बातें करने लगे। मैं भी फिक्र को धुंएं में उड़ाने के लिये बाहर चला आया और बाहर आकर मां को फोन करके स्थिति बतायी। वह दुखी हो गयीं और मेरा पुराना इतिहास बताने लगीं कि मेरा कोई भी काम आसानी से नहीं होता और हर काम कगार पर आकर रुक जाता है, अब वक्त आ गया है कि जिस रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय जाप को मैं कई सालों से टालता आ रहा हूं उसे करा लूं। मुझे मेरी गलती का एहसास हुआ और मैंने फोन काट दिया। फिर मैंने आनंद को फोन लगा कर पूरी बात बतायी तो उसने कहा कि मैं वहां से बिना ज्वाइन किये न हटूं और वह आदमी अगर ज्वाइन न कराये तो उसे यह लिखवा कर ले लूं। लिखवा कर लेने वाली सलाह ने मेरे कदमों में फुर्ती भर दी और मैं वापस उनके घर यानि अपने ऑफिस पहुंचा। मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं हुयी। उन्हें दिल्ली से वांछित आदेश मिल चुके थे। उन्होंने कहा कि मैं कल से आ जाउं और यहीं यानि उनके फ्लैट के बाहरी कमरे जो ड्राइंगरुम होने के साथ-साथ यूएनआई का दफ्तर भी था, बैठकर उनसे पत्रकारिता के गुर सीखूं। मैंने ठंडी सांस ली और कल आने के लिये कह कर अपनी अटैची उठायी और चाचा के घर की तरफ यानि सुलेम सराय के लिये चल पड़ा।


                                      4....                                                




चाचा के घर में मेरा बहुत स्वागत हुआ और मैं भी अपने चचेरे भाई बहनों से मिल कर काफी खुश हुआ। खास तौर पर मेरे छोटे भाई बेटू यानि प्रशांत से मेरी अच्छी बनने लगी थी लेकिन घर से निकलने का अर्थ मैं आज़ादी मानता था और एक घर से निकल कर फिर से दूसरे घर में रह कर अपनी आज़ादी को दांव पर लगाने के पक्ष में नहीं था। दिल्ली में इतने सालों तक रहकर अकेले रहने की आदत पड़ गयी थी और रवैया बदल चुका था। जैसे दिल्ली के शुरुआती दिनों में जब कभी छोटी मोटी चोट लग जाती थी तो ये सोच कर मन रो उठता था कि कोई पूछने वाला नहीं है कि क्या हुआ कैसे हुआ और बाद के सालों में ऐसा होने पर ये संतोष होता था कि कोई हल्ला मचाने वाला नहीं है कि ये लगाओ वो लगाओ। दूसरी खटकने वाली बात थी कि चाचा जी के घर में वह घर के मुखिया थे और इस बात को खासा सीरियसली लेते थे। मेरे घर में मेरे पिताजी ठीकठाक लोकतांत्रिक आदमी हैं और अख़बार आने पर उनसे कोई भी संपादकीय पृष्ठ मांग सकता था जब वह मुखपृष्ठ पढ़ रहे हों। चाचाजी के कब्ज़े से अखबार तब तक नहीं पाया जा सकता था जब तक वह पूरा पढ़ न चुके हों। खैर मैंने चाची से कहा कि मैं अलग कमरा लेना चाहता हूं तो वह दुखी हुयीं। उनका कहना अपनी जगह दुरुस्त था कि जब इसी शहर में अपना घर है तो फिर कमरा लेने की क्या जरूरत है। मैंने बहाना बनाया कि मेरा काम कुछ ऐसा है कि मेरे कमरे पर हमेशा लोगों का जमावड़ा रहेगा और इसलिये मैं अलग कमरा चाहता हूं। चाची से बहाना बनाते हुये मुझे नहीं मालूम था कि इलाहाबाद जल्दी ही मुझे ऐसे दोस्तों से नवाज़ने वाला है कि मेरी ये बात एकदम सच साबित होगी। बेटू मेरे साथ कमरे के लिये बहुत दौड़ा और उसने एक कमरा दिलवाया भी जो लड़कों के लॉज में था और वहां प्रतियोगी परीक्षाओं का माहौल था। गर्मी के मौसम में कमरे के टॉप फ्लोर पर होने से ज्यादा दबाव वहां के प्रतियोगी परीक्षाओं के माहौल का था जिससे एडवांस देने के बावजूद मैंने वहां कदम रखने की हिम्मत नहीं की। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले बिल्कुल युवा और युवतर लोग जो विषय से प्यार करने की बजाय उससे लड़ते रहते हैं, मेरे मन में कई कारणों से डर पैदा करते हैं।


इलाहाबाद में जितने अखबार मैंने पढ़े थे या उनके बारे में जानता था उससे कई गुना अखबार वहां से छपा करते थे (यह बात लगभग हर छोटे शहर पर लागू होती है), ये बात मुझे वहां के प्रेस कॉन्फ्रेंसेज में पता चलती थी। ज्यादातर प्रेस कांफ्रेस जेड गर्दन रेस्टोरेंट, मिलन होटल, कान्हा श्याम होटल, येल चिको रेस्टोरेंट और प्रेस क्लब आदि जगहों पर हुआ करती थी। विधानसभा चुनावों के दिन थे और हर रोज़ दो तीन बड़ी प्रेस कांफ्रेंस या जनसभाएं हुआ करती थीं। मेरा शेड्यूल बड़ा अजीब सा था। दो-तीन दिन जियालाल जी के कमरे से खबरें भेजने के बाद मुझे उनके घर, जिसे वह बड़े गर्व से ऑफिस कहते थे, जाकर उस कंप्यूटर से खबरें भेजने में मुझे बड़ा संकोच सा होने लगा जिसे उन्होंने पता नहीं किस सभ्यता से बचा कर रखा था। उसमें कृतिदेव जैसा ही न जाने कौन सा फांट था कि डी दबाने से तो क ही आता था लेकिन फ के लिये  शिफ्ट के साथ क्यू नहीं दबाना होता था बल्कि तीन चार बटन एक के बाद एक दबाने पड़ते थे। मैं उस कंप्यूटर के चक्कर में खुद का सीखा हुआ फांट न भूल जाउं और हर रोज़ मेहमान की तरह उनके घर जाकर खबर भेजने से पहले उनकी चाय नमकीन का दुश्मन न बनूं, इसके लिये निर्णय लिया कि मैं साइबर कैफे से खबरें भेजा करुंगा। हालांकि उनका कहना था कि मैं उनके साथ भेजूं तो मेरी ग्रामर और न्यूज राइटिंग उनके मार्गदर्शन में अच्छी होगी। मुझे उनकी बात पर शक होता क्योंकि हिंदी में खबरें भेजते हुये वह टाइप करते, ``आज इलाहबाद हाई कोट ने....´´ मैं कहता, ``सर इलाहाबाद की जगह इलहबाद और कोर्ट की जगह कोट हो गया´´ तो वह मुस्करा कर कहते, ``अरे कुछ लखनउ वालों को भी करने दो।´´ यह कहते हुये उनके चेहरे पर बदला लेने की संतुष्टि आ जाती और वह कुर्सी की पुश्त पर पीठ टिकाकर लंबी सांस लेते। मुझे खुद से ही गलतियां करके सीखने का विकल्प ज्यादा अच्छा लगा। अब हर देर शाम या रात मैं जियालाल जी को फोन करता और पूछता, ``कैसे हैं सर ?´´
``ठीक हूं। क्या चल रहा है ?´´
``ठीक हूं सर। कल का क्या है ?´´
``कल जेड गार्डन में सुबह ग्यारह बजे प्रेस कांफ्रेंस है मुख्तार अब्बास नकवी की और तीन बजे सभा है मुलायम सिंह यादव की।´´
``ठीक है सर। मैं प्रेस कांफ्रेंस अटेण्ड कर लूं ?´´
``नहीं वो मैं कर लूंगा। तुम जनसभा देख लेना मुलायम की।´´
``ओके सर। मैं देख कर भेज दूंगा इंगलिश में।´´
``अब तुम्हीं जाओगे तो हिंदी में भी भेज ही देना।´´
``अम्मम ठीक है सर।´´


अब जनसभा हो और मुलायम, मायावती या सोनियां गांधी जैसे बड़े चेहरों की हो तो फिर आपका पूरा दिन खराब होना स्वाभाविक है। तीन बजे की जनसभा में लोग बारह बजे से ही इकट्ठा होना शुरू हो जाते। दूर के गांवों से ट्रकों में एक टाइम के खाने पानी के एवज में भर कर लाये गये लोगों का काफिला आकर दो बजे तक के पी ग्राउंड के आधे हिस्से को भर देता। फिर तीन बजते, चार बजते और इसके बाद पांच बजते। स्थानीय नेताओं को अपने हथियारों को धार लगाने के खूब मौके मिलते। घटिया शेरो शायरी के बीच न्यूज चैनल के दोस्त आगे जाकर अपने कैमरे फिट कर देते और इंतज़ार की घड़ियां गिनने लगते। जो समय के कम गैरपाबंद नेता होते वे तीन के शेड्यूल में पांच साढ़े पांच बजते हाज़िर हो जाते। इधर लखनउ से मेरे पास फोन आना शुरू हो जाते। ``विमल, खबर भेजो यार।´´ ``अरे सर अभी तो आये हैं मुलायम। खत्म होते ही भेजता हूं।´´


खैर, जब तक जनसभा खत्म होती, शाम का अंधेरा घिर आता। मैं तुरंत बाहर निकल कर किसी साइबर कैफै में जाता और खबर बनाना शुरू करता। ``मुलायम अपील्स यूथ टु चूज अ रिस्पांसिबल गवर्नमेंट´´ ये हेडिंग लगाकर मैं किसी से पूछ नहीं सकता था कि कोई बढ़िया हेडिंग क्या लगायी जा सकती है। कैफे से खबर भेजने भर में जोनल ऑफिस लखनऊ से दो-तीन बार और फोन आ जाता। ``यार कितना टाइम लगाते हो, जल्दी भेजो।´´ मैं भेज कर खाली होता फिर जियालाल जी को अपनी खबर के बिंदु बताता लेकिन अक्सर वह खबर टीवी पर देखकर पहले ही बना चुके होते थे।
दुर्गेश से मेरा परिचय जियालाल जी ने ही प्रेस क्लब में एक कांफ्रेंस में कराया था। ``इनसे मिल लो, ये भी ऐजेंसी के आदमी हैं।´´ उनके शब्दों का मान रखने के लिये नहीं बल्कि इलाहाबाद की अजनबियत से बचने के लिये मैंने उससे दोस्ती कर ली। लेकिन दरअसल मेरा स्वार्थ यह था कि मेरे पास कोई वाहन नहीं था और उसकी हीरो पुक पर बैठने से ऑटो रिक्शे के किराये में बहुत बचत हो जाती थी। एक दिन मैं उसके हीरोपुक पर बैठा सिविल लाइंस की ओर जा रहा था कि बैरहना से आगे बढ़ते ही उसने एक गली की ओर अपना वाहन मोड़ दिया। ``आओ विमल भाई तुमका आपन एक दोस्त से मिलाई।´´ मैं कुछ प्रतिवाद करता तब तक गाड़ी गलियों में सरपट दौड़ती, पतली गलियों को पार करती एक दरवाज़े के सामने खड़ी हो चुकी थी। वह विवेक का घर था जिसके बारे में मेरा खयाल था कि दुर्गेश का दोस्त है तो दुर्गेश जैसा ही बड़बोला और आत्ममुग्ध होगा। मेरे बारे में कुछ ऐसे ही खयाल विवेक के मन में भी आये जब दुर्गेश ने मेरा परिचय करवाया, ``ई विमल भाई हैं, यूयनाई में हैं, जनत्यो कि नै यूयनाई ?  कहानियो लिखत हैं, कानसेप्टै नै ना किलयर एनकै।´´ दो तरह के लोगों से मुझे बहुत कोफ्त होती है। एक आत्ममुग्ध और दूसरे बड़बोले। दुर्गेश का मेरे बारे में कहना है कि मेरा कांसेप्टै क्लियर नहीं है क्योंकि मैं पत्रकारिता भी करता हूं, सिनेमा पर भी लिखता हूं, कहानियां भी लिखता हूं और इधर उसका ये विश्वास और बढ़ गया है जब से उसने पाया है कि मैं कविताएं भी लिखने लगा हूं। वह मेरे बारे में जितनी बातें करता है, उनमें से मैं सिर्फ़ इसी एक बात पर उससे मुतमइन हो पाता हूं।

                                                   क्रमशः ......
                                                
                                           (प्रत्येक रविवार को नयी किश्त)


संपर्क ..
विमल चन्द्र पाण्डेय 
प्लाट न. 130-131
मिसिरपुरा , लहरतारा 
वाराणसी , उ.प्र.., 221002

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गुरुवार, 17 मई 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय का संस्मरण ....दूसरी किश्त





                                                   विमल चन्द्र पाण्डेय 


                                                     पिछली किश्त में आपने पढ़ा कि दिल्ली में बेरोजगारी के भीषण दिन गुजारने के बाद एक चमत्कार होता है और विमल को एक समाचार एजेंसी में नौकरी मिल जाती है | इस बीच अपने दोस्तों के साथ मिलकर वे एक प्रोडक्शन हॉउस भी खोल चुके होते है ...| लेकिन कुल मिलाकर परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि उन्हें दिल्ली छोड़कर इलाहाबाद आना पड़ता है |  और फिर क्या होता है इस शहर में , आईये इस कड़ी में पढ़ते हैं              
            


                                       प्रस्तुत है विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                       शहरों से प्यार वाया इलाहाबाद -मेरी जिंदगी के सबसे उपजाऊ साल 
                                                     की दूसरी किश्त 




इलाहाबाद में नौकरी ज्वाइन करने के दो महीने बाद ही ´नया ज्ञानोदय´ के युवा पीढ़ी विशेशांक में मेरी कहानी ´पिता तुम कायर थे´ छपी थी और मैं उन दिनों दिन में चार से पांच कॉल के औसत से अपनी कहानी की तारीफ़ देश के कोने-कोने से सुनता था। लोग उस कहानी को पढ़ कर रोते सुबकते हुये फोन करते। कई ने मुझे यकीन दिलाया कि मैंने इस कहानी के रूप में हिंदी साहित्य को एक नायाब तोहफ़ा दिया है। मैं धीरे-धीरे उनकी बातों और इस जैसी कुछ और बातों पर यकी़न कर चला था कि मेरी मुलाकात मुरलीधर जी से हुयी। उसके पहले कुछ और बातों का ज़िक्र लाज़िमी है। इलाहाबाद में जो मेरा पहला दोस्त या साथी बना उसका नाम दुर्गेश मिश्रा था। वह भी मेरी तरह एक समाचार एजेंसी में पत्रकार था जिसका नाम पूछने पर लोग कहते थे, ´´अच्छा अच्छा, वह अखबार ?´´
वह तुरंत सफ़ाई देता, ´´नहीं नहीं अखबार सरा है, यह भारत की पहली न्यूज़ एजेंसी है।´´ इस पर कई बड़े अख़बारों के पत्रकार पूछ बैठते, ´´अच्छा यह शुरू हो गयी क्या ? कब ? मुझे भी दुर्गेश से ही पता चला कि यह भारत की पहली न्यूज़ एजेंसी है क्योंकि जिस दिन क्लास में यह पाठ पढ़ाया गया हो शायद मैं कैंटीन में बैठा चाय सुड़क रहा होउं। दुर्गेश पूरी तरह एक आकिस्मक व्यक्ति था जो कभी कुछ भी कर सकता था। वह अपनी बाईक पर जब मुझे पीछे बैठा कर चालीस की स्पीड में चला रहा होता था और उसे अचानक याद आता था कि उसने गाड़ी में तेल नहीं डलवाया तो वह चालीस की स्पीड पर चल रही गाड़ी को ज़ोर-ज़ोर से हिला कर पेट्रोल चेक करने लगता था। कभी भी कुछ भी बोल सकने की अपनी योग्यता के कारण यह कई लोगों से गाली और एकाध से बहुत तगड़ी मार खा चुका था। उसके आराध्य देव शंकर भगवान और मुरली मनोहर जोशी थे और मेरे सामने वह मार्क्सवाद और मार्क्सवादियों को गाली देने से यथासंभव बचता था जबकि मैंने कभी उससे मार्क्सवाद के पक्ष या विपक्ष में कुछ भी नहीं कहा था। मेरे रोज न नहाने, दस पंद्रह दिनों पर दाढ़ी बनवाने की क्रिया और संघियों को कोसने वाले किसी बयान को मिला कर वह पता नहीं किस प्रक्रिया से इस नतीजे पर पहुंचा था कि मैं मार्क्सवादी हूं और उसका दूसरा उप-निष्कर्ष था कि मार्क्सवादी सफाई पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। जब तक इलाहाबाद की चर्चा जारी रहेगी, दुर्गेश की चर्चा होती रहेगी।
मुझे नहीं पता था कि इलाहाबाद में साहित्य की किताबें कहां मिलती हैं या थियेटर कहां होते हैं। मैंने अपने मित्र और युवा कथाकार चंदन पाण्डेय को फोन किया जिसके बारे में मेरा मानना है कि मैं ग्लोब के किसी भी हिस्से में रहूं, अच्छी किताबें और फिल्में कहां मिलेंगी, जानने के लिये उससे अच्छा आदमी कोई नहीं है। उसने मेरी मदद की और मुझे दो लोगों के नंबर दिये जो काफी समय से इलाहाबाद में थे और साहित्य के अध्येता थे। पहला नंबर स्विच ऑफ निकला जिसका आज मुझे नाम भी याद नहीं और दूसरा नंबर शेशनाथ का निकला जिसने इलाहाबाद में रहने का मेरा आनंद कई गुना कर दिया। इस बीच मेरी मुलाकात रणविजय सिंह सत्यकेतु से हुयी जिन्हें मैं उनकी दो कहानियों ´फांक´ और ´कर्फ्यू´ से जानता था। वह गंभीर और बिल्कुल सौम्य टाइप के आदमी लगे। उन्होंने मुझे मुरलीधर से मिलवाने को कहा और साथ में यह भी हम लोगों को मिल कर इलाहाबाद में कोई साहित्यिक गोश्ठी शुरू करनी चाहिये। आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिशासी डॉ. मुरलीधर जी से मेरी पहली मुलाक़ात पता नहीं उन्हें याद है या नहीं, लेकिन मेरे लिये यह आंख खोलने वाली रही। न सिर्फ़ वह मुलाक़ात बल्कि उसके बाद भी उन्हें देख कर उनके बिना सिखाये उनके आचरण से ज़िंदगी के बारे में बहुत कुछ सीखा। मैं सत्यकेतु के साथ अशोक नगर स्थित उनके घर पहुंचा तो वह नीचे ही मिल गये। अपने साथ हमें वह उपर चौथी या पांचवी मंज़िल स्थित अपने फ्लैट में ले गये जहां तक पहुंचते मेरी सांस फूल जाती थी और हर बार मैं सिगरेट छोड़ने की सोचता था। हमें पानी देने के बाद उन्होंने मेरी ओर मुख़ातिब होकर कहा, ´´आपकी कहानी पढ़ी इस बार नया ज्ञानोदय में´´। मैं आदतवश और अपने आशावादी स्वभाव के कारण अब प्रतीक्षा करने लगा कि अब वह किन शब्दों में इस कहानी की तारीफ़ करते हैं। मेरे चेहरे पर वह मुस्कराहट आ गयी जो मुख्य अतिथि के चेहरे पर मंच से नीचे देखते वक़्त होती है। वह मेरी बगल में सोफ़े पर बैठ गये और अपनी गहरी और साफ़ स्पश्ट उच्चारण वाली आवाज़ में बोले, ´´आपने क्या सोच के ऐसे विशय पर कहानी लिखी जिस पर पचासों कहानियां लिखी जा चुकी हैं और सैकड़ों फि़ल्में बन चुकी हैं ?´´ मैं हक्का बक्का था लेकिन हारा नहीं था। अपने बिखरे कांफिडेंस को ज़मीन पर से उठा कर मैंने अपने चेहरे पर लगाया और विशय के बारे में मज़बूत शब्दों और कमज़ोर आवाज़ में कोई दलील दी जो अब मुझे याद नहीं है। ज़ाहिर है वह याद किये जाने लायक थी भी नहीं। ´´उस पर उसका अंत इतना टाइप्ड और सतही है कि वहां तक पहुंचते-पहुंचते कहानी बिल्कुल खराब और अझेल हो जाती है।´´ उनका निष्कर्ष था। मैं बहुत अजीब स्थिति में था। अपनी कहानी तो दूर, मैंने ऐसे शब्द किसी खराब कहानीकार के लिये भी कभी उसके सामने प्रयोग नहीं किये थे (ज़ाहिर है मैं खुद को अच्छाकहानीकार मानता हूँ). कम से कम मैं रचनाकार के सामने उसकी रचना की तारीफ़ किये जाने का नियम जानता था। यह वही इलाहाबाद था और यह वही इलाहाबादी तेवर था जिसकी तारीफ में जितना कहा जाय, कम है। इस मुलाक़ात के बाद ´मुखातिब´ को शुरू किये जाने की योजनाएं बनने लगी थीं।


                                                                                        क्रमशः ........


                                                                                  (प्रत्येक रविवार को नयी किश्त )


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विमल चन्द्र पाण्डेय 
प्लाट न. - 130, 131 
मिसिरपूरा , लहरतारा 
वाराणसी , उ.प्र.   221002


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मंगलवार, 15 मई 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय का संस्मरण ----पहली किश्त





                                                                    विमल चन्द्र पाण्डेय 


विमल चन्द्र पाण्डेय  युवा कथाकारों की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं , जिन्होंने पिछले एक दशक में हिंदी साहित्य जगत पर गहरी छाप छोड़ी है | इन्होने कथा जगत में सार्थक हस्तक्षेप करने के साथ ही साथ  , अन्य रचनात्मक विधाओं में भी काफी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान दिया  है | विमल का उदाहरण हमारे सामने है | पत्रकारिता और सिनेमा की उनकी समझ और उस पर किया गया कार्य इस तथ्य की गवाही देता है , कि उनका रचनात्मक दायरा कितना विस्तृत है | 'डर' कहानी संग्रह पर उन्हें ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार भी मिल चुका है | वे जब कुछ नया लिखते या करते हैं , वह जरुर चर्चित होता है ..| पिछले दिनों लिखी गयी उनकी कवितायेँ इतनी मारक और बेहतरीन रही  हैं , कि सहसा यह विश्वाश नहीं होता की यह शख्श कविता  के अलावा किसी दूसरी विधा में भी लिखता होगा ..| 

यहाँ विमल फिर से एक नए प्रयोग के साथ हमारे सामने हैं | पढ़ाई के बाद अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उन्होंने 'संस्मरण' विधा में हाथ आजमाया है | " शहरों से प्यार वाया इलाहाबाद - मेरी जिंदगी के सबसे उपजाऊ साल '" नामक यह संस्मरण हमारी आपकी कहानी जैसा ही चलता दिखाई देता है |  भाषा की यह रवानी और अपने को निर्ममता  पूर्वक जांच पाने की यह कोशिश देखने लायक है | जब भी हम अपने आपको इस तरह से खंगालते हैं , कुछ स्थान , कुछ लोग और उनसे जुडी कुछ स्मृतियाँ हमारे सामने खड़ी हो जाती हैं | ...ऐसी स्मृतियाँ , जिन्होंने हमारे निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान किया है ...| 

                                          तो प्रस्तुत है विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                     ' शहरों से प्यार वाया इलाहाबाद - मेरी जिंदगी के सबसे उपजाऊ साल' 
                                                             की पहली किश्त |  







दिल्ली में भीषण बेरोज़गारी के दिन गुज़ारने के दौरान, जब ज़िंदगी के दिये का तेल खत्म होता ही लग रहा 
था, कि यूएनआई में नौकरी लग गयी। नौकरी क्या थी, एक चमत्कार था। यूएनआई का लिखित और 
साक्षात्कार निकालने से पहले इसी एजेंसी में नौकरी के लिये दो बार पहले भी परीक्षा में बैठ चुका था 
लेकिन हिंदी सेवा यूनिवार्ता के लिये। कमाल यह कि दोनों ही बार हिंदी सेवा से नौकरी में चयनित न हो 
पाने के कारण तीसरी बार जब अंग्रेज़ी में प्रयास किया तो पहली बार में ही चयन हो जाने पर इस नश्वर 
दुनिया के बारे में दो बातें समझ में आयीं। पहली यह कि इस दुनिया में कभी भी कुछ भी हो सकता है, 
खासतौर पर अगर आप नगर निगम, लोक निर्माण विभाग या मीडिया में से किसी दुनिया की बात कर रहे 
हैं। दूसरी यह कि मेरी अंग्रेज़ी अच्छी है (कई भ्रमों की तरह यह भ्रम भी मेरा काफी बाद में टूटा जब एजेंसी 
की रुटीन पत्रकारिता के अलावा अलग से कुछ लिखने का मौका मिला, खैर प्रयास जारी है) और भविष्य में 
मैं हिंदी में लिखने के अलावा कभी अंग्रेज़ी में भी लिखने में हाथ ज़रूर साफ़ करूंगा। बहरहाल, पहली 
पोस्टिंग इलाहाबाद थी और लाख गुरबतों के बावजूद मैं उस समय दिल्ली छोड़ने को मानसिक रूप से तैयार 
नहीं था। हर अखबार और चैनल में नाक रगड़ कर वापस आ चुकने के बाद कोई काम न मिलने के एवज़ 
में मैंने शशि और मुरारी के साथ एक प्रोडक्शन हाउस शुरू कर दिया था जिसका नाम स्ट्रांग विज़न मीडिया 
(इन शॉर्ट एसवीएम प्रोडक्शन यानि शिश विमल मुरारी था जो कि नाम से ही पिटा हुआ था) था और जिसे 
जल्दी ही खूब सारी अच्छी और सारगर्भित डॉक्यूमेंट्रीज बनानी थीं और दुनिया पर छा जाना था। हमें अपना 
पहला असाइनमेण्ट कांग्रेस के एक प्रत्याशी के लिये नो प्रॉफिट नो लॉस पर मिला था जिसके गम को मैं 
शशि के साथ ´´अबे हम प्रोफेशनल्स हैं और हमारे लिये कांग्रेस और भाजपा में कोई अंतर नहीं। ग्राहक ही 
हमारा भगवान है´´ टाइप की चीज़ें बोलकर ग़लत किया था और काम पूरा किया था। यह 2007 के मार्च 
महीने का अंतिम हफ्ता था जब 9, रफी मार्ग पर एक बंद कमरे में एक बड़ी मेज़ के पीछे बैठे दो तीन 
पत्रकार कम और व्यवसायी अधिक दिखते लोगों ने मुझसे पूछा था, ´´आर यू कम्फर्टेबल टु वर्क 
आउटसाइड डेलही ?´´
´´आय´म ओपन टु वर्क एनिव्हेयर इन इंडिया।´´ इस उत्तर से उन्हें मेरी काम के प्रति निष्ठा का पता चला 
न कि मेरी खराब माली हालत का।
´´एण्ड इफ वी सेण्ड यू टु अलाहाबाद, वुड यू लाइक टु वर्क देयर ? यू नो, द पालिटिक्स ऑफ स्मॉल 
सिटीज़ मैटर अ....।´´´´अलाहाबाद हैज ऑलवेज़ बीन अ सेकेण्ड होम टु मी। माय अंकल लिव्स देयर एण्ड आय´म वेरी मच 
फेमिलियर विद द ज्योग्राफी...।´´ मैंने अकुताहट में उनकी बात काट दी। वे मुस्कराये और मुझे परिणाम 
के बारे में बाद में बताने को कह कर जाने को कहा। मैंने बाहर निकलते ही आनंद को बताया कि इस बार 
लगता है नौकरी मिल जायेगी। नौकरी का कॉल लेटर आया तो विभव ने जाने को मना किया और मुझ 
हमारे वादे की या दिलायी जिसमें हमने एसवीएम प्रोडक्शन के दुनिया पर छा जाने की बात कही थी। मैंने 
इस बात को भूल जाना ही बेहतर समझा।   






                                                                                                                 क्रमशः .......
                                                                                                   ( प्रत्येक रविवार को नयी किश्त )





संपर्क 

विमल चन्द्र पाण्डेय 
प्लाट न. 130 - 131  
मिसिरपुरा , लहरतारा 
वाराणसी . उ.प्र. 221002 

फोन न. 09820813904
            09451887246  

फिल्मो में विशेष रूचि 


शनिवार, 12 मई 2012

अरविन्द की कवितायें






                 
                                                    अरविन्द 



युवा रचनाकारों पर हमारी पुरानी पीढ़ी के कई  आरोप  है | एक तो यही की "युवा रचनाकार अपनी पुरानी पीढ़ी को तो नजरंदाज करते ही हैं , अपने समकालीनो को भी ठीक से नहीं पढ़ते | वे सिर्फ लिखना जानते हैं , भले ही उनके जीवन अनुभव बेहद सीमित और एकांगी हैं | यह आरोप उस समय और तीखा हो जाता  है , जब यह कहा जाता है की वे जितना पढ़ते हैं , उससे अधिक लिखते हैं और उससे भी अधिक प्रसिद्द होना चाहते हैं | और वह भी रातों रात |" युवा कवि अरविन्द  इस आरोप को बिलकुल झुठलाते हैं | बल्कि यह कहना उचित होगा की इस आरोप का प्रति - संसार रचते हैं | जब भी उनसे बात होती है वे अपनी पढ़ाई में मशगूल रहते हैं | अपनी पुरानी पीढ़ी के साथ- साथ अपने समकालीनों के बारे में भी वे ठीक- ठीक बता सकते हैं , किसकी कौन सी कविता या  कहानी , किस पत्रिका में और कब प्रकाशित हुयी थी ..| लगे हाथ वे उस रचना की व्याख्या भी कर देते हैं | लिखना उनके यहाँ हमेशा स्थगित  ही रहता है | और देश की कई बड़ी पत्रिकाओं में छपने के बाद भी शायद ही अपनी रचनाओं को उन्होंने कभी प्रचारित किया हो  | अरविन्द  युवा कविता के उस चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं , जिसके पास न सिर्फ अपना मौलिक शिल्प विधान है , वरन चमकदार बिम्बों की एक ऐसी श्रृंखला है , जिसे देखकर कभी- कभी तो ऐसा लगता है की हम विश्व क्लैसिक से किया हुआ कोई अनुवाद पढ़ रहे हैं ..| यदि उनकी कविताओं से थोडा सा कच्चापन हटा दिया जाए , तो सहसा यह विश्वास नहीं होता की ये कवितायेँ एक २२ - २४ साला युवक द्वारा लिखी गयी हैं |  उनके कथ्यों के रेंज का विस्तार भी हमें एक बार पुनः चमत्कृत कर जाता है ..| इतने प्रतिभाशाली युवा कवि से आपका परिचय कराते हुए 'सिताब दियारा' ब्लाग स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा है , और साथ ही साथ 'इस टटके बिम्बों वाले युवा कवि' से यह आशा भी की उनके स्थगित लेखन की जकड़ने टूटती जाएँ ....|

                  प्रस्तुत है 'सिताब दियारा' ब्लाग पर युवा कवि अरविन्द की चार कवितायेँ .....









1...                       धोखा भी एक हत्या है




डिब्बे में पानी को बंद कर प्यास को बंद कर दिया गया था |

नदी डिब्बे में नहीं आ सकती थी
इसलिए डिब्बे के उपर नदी का नाम लिखकर
नदी को डिब्बे में बंद कर दिया गया था |

समय के कई नाम थे
दिन के कई नाम थे
दो वर्ष के समय की लम्बाई का पता लग सकता था
दो दिन की भूख की लम्बाई का पता नहीं लग सकता था
एक नवजात की भूख के बारे में सोचते हुए
दो चम्मच दूध का ख्याल आता था
दो चम्मच दूध भर की कीमत का पता लगाना मुश्किल था
दो चम्मच की भूख को एक डिब्बे में बंद कर उस पर कीमत लिख दी गयी |

दूर तक खेत थे
आकाश भर खेत रहा होगा
आकाश भर फसल रही होगी
खेत के बीज भर आकाश में पानी रहा होगा
आकाश भर पानी बहा होगा
आकाश भर उम्मीद रही होगी

आकाश भर उम्मीद को डिब्बे में बंद कर
एक किसान को धूल भर कर दिया गया होगा |

एक पत्थर मतलब
मील है
तो पहाड़ का अर्थ क्या होगा

एक पहाड़ की ऊँचाई डिब्बे में बंद कर कीमत लगा दी गयी |

प्रेम की कोई परिभाषा है कबीर ..?
प्रेम करने के तरीकों की कोई किताब है ग़ालिब ..?
प्रेम में बना कोई महल या कोई उड़नखटोला उपहार का
क्या प्रेम का मापक हो सकता है ?
प्रेम को भी डिब्बे में बंद कर कीमत तय हुई
क्या खरीदोगे मेरे कबीर 
मेरे ग़ालिब  ?

चमक का नाम हंसी होना चाहिए
रेत का नाम उदासी
आँख का एक नाम आवाज होना चाहिए
साथ रहने का नाम घर भी होना चाहिए

डिब्बे पर लिखे नामों का एक नाम तय करो
मेरे लोगों |




2...                 आश्चर्य



ताजमहल आश्चर्यजनक है
लोगों ने कहा
बात संसार के इतिहास में
सभी भाषाओं में एक साथ स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हुई
ताजमहल के कामगार आश्चर्यजनक हैं
बहुतों ने कहा
और माना गया |

न गिनी जाने वाली संख्याओं में थे वे
अपनी पूरी ताकत खोकर
लगातार मरते जा रहे थे कि
न ताजमहल , न चीन की दीवार
न ही कोई लटकता बागान
भूख एयर रोटी है
सबसे बड़ा आश्चर्य |


उस न गिनी जा सकने वाली मरणासन्न संख्याओं की भाषा
देश के समझदार समझ ही न सके
और उनकी बात कहीं नहीं दर्ज हुई |


मेरे समय के समझदारों को
गिनती तक नहीं आती थी
वे मरी हुई संख्याओं को नहीं गिन सके
वे बस एक से सात तक गिनती जानते थे
जबकि मरी हुई संख्याओं की संख्या बढती जा रही है |




3...                       रिश्तों का ब्रह्मांड



हर चीज की एक सीमा थी |

पृथ्वी की सीमा
कक्षा और गति निर्धारित थी |

घर के पड़ोस में घर जाने पहचाने थे
पड़ोस से सटे पड़ोस के पड़ोस से
सटे
कई पड़ोस का विस्तार कस्बा था |

पृथ्वी के पड़ोस जाने पहचाने थे
पृथ्वी के पड़ोस का विस्तार
ब्रह्मांड था |

असीमित को ब्रह्मांड कह कर
एक शब्द में बांध दिया गया था |

घर में पिता के दूर के नाना आये थे
रिश्तों के पड़ोस के ब्रह्मांड से उठकर जैसे कोई बुझा ग्रह आया था |

पिता के नाना से मेरा सटीक रिश्ता अपरिभाषित था |

मैंने पिता के नाना को
नाना कह कर
रिश्तों के ब्रह्मांड को सीमित कर दिया |

पिता के नाना की आँखे चमक उठी थीं |

जैसे एक बुझा ग्रह पृथ्वी के पड़ोस में आया हो
और सूरज के रिश्तों में चमक उठा हो |





4...                   दंगों में मारे गए थे जो बच्चे



दंगों में जो सबसे ज्यादा मारे गए
वे बच्चे थे
वे इतने कोमल और मासूम थे कि
अगर वे दंगों के दिन नहीं होते
तो किसी भी संप्रदाय के लोग
उनको चूमने
प्यार करने की असीम ईच्छा रखते |

जो बच्चे मारे गए
अधिकतर वे या तो माँ की गोद में थे
या माँ के पेट में |

दुनिया को वे नहीं जानते थे
वे ईश्वर धर्म मंदिर मस्जिद कुरान
गीता वेद को नहीं जानते थे |

वे अपने घर में भी किसी को नहीं जानते थे
वे अधिक से अधिक
केवल स्पर्श से अपनी माँ को जान सकते थे
वे केवल दूध पी सकते थे |

दुनिया में वे इतने नए थे कि
उनका नाम भी नहीं रखा गया था |

जो मारे गए थे दंगों में मासूम बच्चे
वे दुनिया के किसी भी ईश्वर से ज्यादा
खूबसूरत थे |

ईश्वर या खुदा
इतना कमजोर निकला कि
वह दंगों में कोई पारलौकिक चमत्कार नहीं
कर पाया
वह केवल दंगे करवा सकता था
रुकवा नहीं सकता था
वह इतना कमजोर था कि
खुद का उसका अस्तित्व हमेशा संकट में
दिखता था |

दंगों में मारे गए थे बच्चे
वे कई कई हजार ईश्वर या खुदा के
बराबर थे
वे हजारों-लाखों मंदिरों से कहीं अधिक
पवित्र थे |

कई बच्चे जिन्दा जला दिए गए
कई बच्चे बीचो-बीच चीर दिए गए तलवारों से
कई बच्चों का गला घोंट दिया गया
कई बच्चों को ऊँचाई से
सिर के बल पटका गया |

पेट फाड़कर निकाले गए कई
पक रहे कच्चे बच्चे
और आग में फेंक दिए गए |

दंगों में मारे गए बच्चे
‘हत्या’ , ‘हत्यारों’ शब्द से इतने अपरिचित थे
कि मरने के पूर्व उनकी आँखों में कोई डर
नहीं देखा गया था |

दंगों में मारे गए जो बच्चे
वे दोनों ओर के थे
ईश्वर के जितने लोग पागल थे
खुदा के उतने ही लोग पागल थे |

दो पागलों के बीच की इस क्रूरतम लड़ाई में
मारे गए थे मासूम बच्चे
वे मासूम बच्चे इतने समझदार थे
कि जब वे मारे जा रहे थे
तो खुदा या ईश्वर को पुकारने के बजाय
अपनी माँ को पुकारते थे |







नाम - अरविन्द
उम्र- 25 वर्ष 
शिक्षा - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर 
सम्प्रति - प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक 
मो.न.  09565011824  
निवास- नौगढ़ , जिला चंदौली , उ.प्र.  
फिल्मों में विशेष रूचि 



रविवार, 6 मई 2012

अपने समय का कठफोड़वा मैं ----केशव तिवारी





                                  केशव तिवारी 


केशव तिवारी की कविताओं से गुजरते हुए ऐसा लगता है मानो मध्य युग या भक्ति काल का कोई कवि अपने संवेदनो के साथ आधुनिक भाषा शिल्प का संसार रचता इक्कीसवीं सदी में आकर अपनी कविता सुना रना रहा है | यह कवि अपने मूल चरित्र में श्रुति परम्परा का कवि है जिसकी कविता का आधार स्वानुभव और अपने समय को लोक से साझा करने की सहज व्यग्रता है | यहाँ कवि को अपनी कविता को अलंकृत करने की चिंता नहीं है | उसके लिये कविता की भाषा एक खरखराता स्वर है , जिसमे मनुष्य के सारे दुखों को बयान किया जा सके | उसके कविता दुनिया की तमाम चिकनी-चुपड़ी , चमकती कृत्रिमताओं के विरुद्ध एक खुरदरा ही सही , लेकिन नैसर्गिक संसार है , जिसमे कोई भी मनुष्यता अपना अक्स देख सकती है | इस सजग कवि को अपने यथार्थ को व्यक्त करने की जितनी व्यग्रता है , उतनी ही बारीक समझ भी , जिसमे वह देख पा रहा है कि यथार्थ इतनी बलि देने के बाद भी बदल नहीं रहा है | वह कविता के सामाजिक सरोकारों को समकालीन कविता की प्रचलित भाषा के ‘फैशन’ से मुक्त कर कवि के निजी ‘पैशन’ से जोड़ देता है , कि यदि केवल सुनाने के लिए ही कविता करना है तो ‘फिर काहे का मैं ?’ केशव तिवारी की कविता हमें यह भी सिखाती है कि जब अनुभवजन्य संवेदनो का दबाव असहनीय होता है , तो किसी कवि-प्रतिभा को भाषा और क्राफ्ट की तलाश नहीं करनी पड़ती | तब वह एक स्वस्फूर्त रचना-प्रक्रिया में तब्दील हो जाती है | क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि कविता के उपादानों से , उसकी समूची रचना-प्रक्रिया की औपचारिक मगजमारी से मुक्त यह कवि अपने समय-समाज-परिवेश के प्रति कितना जागरूक और अद्यतन है !

                                                        - निरंजन श्रोत्रिय
                                                    (समावर्तन पत्रिका से साभार )

            प्रस्तुत हैं ‘सिताब दियारा’ ब्लाग पर ‘केशव तिवारी’ की सात कवितायें              







1...               तो काहे का मैं

किसी बेईमान की आँखों में
न खटकूँ तो काहे का मैं
मित्रों को गाढ़े में याद न आऊँ 
तो काहे का मैं
कोई मोहब्बत से देखे और मैं उसके
सीधे सीने में न उतर जाऊँ
तो काहे का मैं
अगर ये सब कविता में तुम्हें
सिर्फ सुनाने के लिए सुनाऊँ
तो फिर काहे का मैं    |


2...                      डर



डर कहीं और था
मै कहीं और डर रहा था
डर इस जर्जर खड़े
पेड़ की छांव में था
और मैं धूप से डर रहा था ।
दुनिया भर की पवित्र किताबें
भय और आतंक से भरी पड़ी थी
और मैं अपने
सबसे डरे क्षणों में
उन्हीं को पढ़ रहा था  |



3...                      कठफोड़वा


जैसे मूस लिया गया हो
किसी गरीब का घर
आंधी में भहरा कर गिर पडा़ हो
आमों से लदा पेड़
अपने समय का कठफोड़वा मैं
गोद रहा हूं काठ
तुम याद भी आयी तो किस वक्त
मै मुस्करा तक नही सकता।

(मूसना - सेंध काटना)




4...                    किले होते महल होते
              


रावण हत्था बजाता यह भोपा
क्या गा रहा है
ठीक – ठीक कुछ भी समझ नहीं आ रहा

इस मरुभूमि के निपट वीराने में
इसका स्वर
और इसकी रंग-बिरंगी पगड़ी
बता रही है
एक बूढ़े भोपा ने यहाँ
मुहिम छेड़ रखी है
वीरानगी के खिलाफ

लोहा लेना तो यहाँ के पानी में है
एक स्त्री ने भी लिया था लोहा
राना जी के खिलाफ
और ढोल बजा-बजा
कर कर दी थी मुनादी
मैंने लीनो गोविन्द मोल

तराजू के एक पलड़े पर था गोविन्द
दूसरे पर राना का साम्राज्य

यह सुरों में डूबा भोपा
एक तारा लेकर महल त्याग चुकी वह स्त्री
ऊंट गाड़ी में पानी की तलाश में
निकले लोग
रेवडो के पीछे मस्त गडरिये
इनके बिना यह प्रदेश
सामंती अवशेषों के सिवाय क्या होता

जहाँ किले होते महल होते
पर अपने समय को
ललकारने वाले लोग न होते |




5...                      तुम्हारा रूप




तुम्हारा रूप जैसे पूस की सुबह
केन पर चमकती हुयी धूप
तुम्हारा नाम जैसे होठों पर
रच रच जाये देसी महोबिया पान
इस आंधी में हमारा प्यार
जैसे लफ लफ जाये
आरर जामुन की डार।

(आरर - कमजोर, केन - बांदा की नदी)




6...                   बेरोजगारी में इश्क
          


जो दिन हमारी घोर दरिद्रता के थे
वही हमारे प्रेम भी करने के थे
एक खाली जेब आशिक का दर्द
हमारी ही बिरादरी के कुछ आशिक
बखूबी समझते थे
हमारी आपस में एक अव्यक्त
संवेदना स्थापित हो गयी थी
हम जम कर गरियाते उनको
अमीर थे जिनके बाप
वे दिन न खुलेआम वादा करने के थे
न ही निभाने के
कुछ खुली अधखुली थी दुनिया
इतना भी न रहता कि
कुछ दे पाते उसे मनपसंद
एक समय के बाद तो
कुछ देने का वादा करने पर भी
आने लगी शर्म
दस रू0 में तो मामू की चाय की दुकान पर
जम कर चलती कट चाय
लकड़ी के पटरे पर बैठे फूँकते सिगरेट
और सामने इंडियन काफी हाउस
की भीड़ भाड़ देख कुढ़ते
चाचा मजनू की फटेहाली से
जोड़ते खुद को
और कभी कभी तो उनके मुकाबिल का
आशिक भी मानते
धीरे धीरे मां बाप हमारी तरफ से
निराश हो रहे थे
और पडोसी सशंकित
दुनिया की नजर मे हम भले ही
फुरसतिया थे पर हम
प्रेम की एक उदात्त अनुभूति को
जी रहे थे
फिर भी
बेरोजगारी में इश्क था ये दोस्त
खाली जेब उससे मिलते और
भरे मन वापस लौट आते



7...                दीवट का दिया



मै तुम्हारी कोठरी के
दीवट पर रखा हुआ दिया हूँ
तुम मेरे पास आओ
लटियाये बालो को सुलझाओ
पाटी पारो
माथे पर लगाओ
लाल रंग वाली बडी टिपली
मांग भर सेंदुर ऐड़ी भर महावर रचाओ
और मै
तुम्हारी मद्धिम रोशनी में
झिलमिलाऊं जैसे
छरहर नींम की छांव में
झिलमिलाता है चांद






             
नाम               - केशव तिवारी
शिक्षा              -  बी0काम0 एम0बी00
जन्म              -   अवध के एक ग्राम जोखू का पुरवा में
प्रकाशन            -    दो कविता संग्रह प्रकाशित  1... “इस मिट्टी से बना”
                                                     2... “आसान नहीं विदा कहना”
सम्प्रति                  -     हिंदुस्तान यू0नी0 लीवर लि0 में कार्यरत्

                  -     कविता के लिये सूत्र सम्मान:      
                  -    सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित |
                  -   कुछ कविताओं का मलयालम, बंगला, मराठी, अंग्रेजी में अनुवाद
संपर्क              -  द्वारा – पाण्डेय जनरल स्टोर , कचहरी चौक , बांदा (उ.प्र.)
मोबाइल न.         – 09918128631