महेश चंद्र पुनेठा
लोक और
जनपदीय कवियों की युवा पीढ़ी में महेश पुनेठा का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया
जाता है | उनकी कविताओं के सन्दर्भ बिलकुल उनके पड़ोस से आते हैं | महेश की कवितायेँ अपने परिवेश के साथ साथ अपने रचयिता
कवि की भी सूचना देती हैं | और फिर यही देशज सन्दर्भ क्षेत्रीय , राष्ट्रीय और
वैश्विक संदर्भो से जुड़ जाता हैं | “ बिना स्थानीय हुए आप अन्तराष्ट्रीय नहीं हो
सकते ” के सूत्र वाक्य को साधने की कोशिश महेश की कविताओं को विशिष्टता प्रदान
करती हैं | ऊपर से नरम , कोमल और सुन्दर दिखने वाली ये कवितायें मूल अर्थ में
प्रतिरोध और संघर्ष का आह्वान करती हैं | इनमे हमारे समय का भयावह अक्स तो उभरता
ही है , साथ ही साथ उसे कैसे बेहतर बनाया जाए , इसका चिंता भी दिखाई देती है |
तो पढ़िए “सिताब दियारा”
ब्लाग पर ‘महेश चंद्र पुनेठा’ की छः कवितायें .......
रामजी तिवारी
1...
खिनुवा
खिनुवा का पेड़ हूँ मैं
तुम कहाँ पहचानोगे मुझे
मैं नहीं दे सकता हूँ तुम्हें
सरस-स्वादिष्ट फल
नहीं बन सकता हूँ तुम्हारी हवेली की
दरवाजे-खिड़कियों की चौकठ
मेरे पास नहीं हैं
चित्ताकर्षक और सुगंधित फूल
जिन्हें सजा सको तुम अपने फूलदानों में
तुम्हारे व्यवहार पर
मुझे न आश्चर्य है और न अफसोस
मैं अच्छी तरह पहचानता हूँ तुम्हें
तपती दुपहरी बिच
बीहड़ में भटकते को
मैं दे सकता हूँ गझिन छाया
ठंड में ठिठुरते की रात को
गरमा सकता हूँ
लौकी-ककड़ी-तोरई की बेलों के लिए
बन सकता हूँ माकूल ठाड.रा ।
काट कर फेंक दो मुझे
तमाम उपेक्षाओं के बावजूद
जरा सी मिट्टी और नमी पाकर
फिर से खड़ा हो सकता हूँ
फैला सकता हूँ अपनी भुजाएं
खुशी है मुझे
शामिल हो सकता हूँ
पक्षियों के मुक्ति समूहगान में
दूर आसमान की उड़ान में ।
तुम नहीं पहचानोगे मुझे
मैं खिनुवा का पेड़ हूँ।
2.. धौल
नहीं पता मुझे इसका वैज्ञानिक नाम
क्या कहते हैं इसको मानक हिंदी में
यह भी नहीं पता
कहीं धौल कहीं धुँइयाँ
पुकारते हैं इसे ग्वाले-घस्यारियाँ-लकड़हारिनें
पूछो इसके बारे में तो
धूप-धूप हो आता है उनका चेहरा
शहद उतर आता है बोली में
बताते हैं-
मौ भौत होता है इसके भीतर
मौन खूब आते हैं इसके पास
इसके झुरमुटों में बैठे-बैठे
रस चूसते हुए
भौत मजा आता है
घस्यारियाँ कहती हैं -
बकरियाँ खाती हैं इसकी पत्तियों को
बड़े चाव से
बड़ा गरम होता है सौत्तर भी इसका
इसकी लकड़ी में आग होती है भरपूर
बताती हैं लकड़हारिनें
बुरूँश के पड़ोस में ही खिला है धुँइयाँ
ऊपर-ऊपर बुरूँश नीचे धुँइयाँ
धौलिमा फैली है पूरी घाटी में
उतर आया हो जैसे
गोधूलि का आसमान
बुरूँश जितने बड़े व रक्ताभ न सही
पर कम नहीं सौंदर्य इनका भी
खिलते हैं जब अपने पूरे समूह के साथ।
पता नहीं क्यों
किसी कविता में खिल न पाया
किसी चित्र में ढल न पाया
किसी ने किया नहीं कैद अपने कैमरे में इसे।
3...
खतड़वा संकराँद
बच्चों-किशोरों का झुंड
उल्लास से भरा
इकट्ठा करने में जुटा है केड़-पात
मक्के के ठूँठ , सूखे झील-झंखाड़
ढूँढ-ढूँढकर लाए जा रहे हैं
गाँव भर से
सबसे ऊँची टिकड़ी में गाँव की
बनाया जा रहा है ढेर ।
घसियारिनें लगी हैं
घास के पूले के पूले काटने में
भर पेट खिलाना जो है आज के दिन
इतना कि
गाएँ उसी का सोत्तर बनाकर सो जाएँ ।
शाम होने को आई
लौट रही हैं घसियारिनें
घास का लूटा सा ही पीठ में लादे
इसी घास से बनाए जाएंगे बुड़ि के पुतले
डाले जाएंगे -
गोशाला की छत पर
गोबर के खात पर
लौकी-कद्दू-ककड़ी -तोरई के बेलों में
एक साथ ले जाई जाएगी
टिकड़ी में बने ढेर में जलाने ।
अब सारी तैयारी पूरी हो चुकी है
जल उठी है मशालें
सिन्ने के ढाँक साथ बुड़ि का पुलता
पकड़कर
भीतर से लेकर गोठ के ओने-कोने से
झाड़-पोछकर
बाहर भगाया जा रहा है बुड़ि को।
हाँक लगाकर -
‘भ्यार निकल बुड़ि ,भ्यार निकल ’।
दौड़ पड़े हैं सभी टिकड़ी की ओर
मशालें लहराते
समवेत स्वर में चीखते-चिल्लाते
सार गाँव गूँज उठा है
ऐसे में भला बुड़ि कहाँ छुपी रह सकती है
कितना सुदंर लग रहा है गाँव
अंधकार दुबक रहा है जान बचाकर ।
एक इशारा पाते ही
धू-धू जल उठा है केड़-पात का ढेर
झोंक दी गईं हैं उसमें सारे के सारे पुतले
फैल गईं हैं आसमान में असंख्य चिनगारियाँ
हर पहाड़ी ने
थाम ली हो जैसे एक-एक मशाल
और समवेत स्वर चक्र बन घूमने लगे हों घाटी में ।
पता नहीं कब से
हर साल
बुड़ि को खदेड़कर सुपुर्द-ए-खाक करते
आ रहे हैं ये लोग
पर बुड़ि है कि फिर -फिर लौट चले आती है।
4.... संक्रमण
वे केवल हमारी जेबें ही खाली नहीं करते
जेब के रास्ते दिल-दिमाग तक भी पहुँच जाते हैं
खाली कर उन्हें
अपने मतलब का
साफ्टवेयर लोड कर देते हैं वहाँ
सूखे काठ में बदल देते हैं हमारी आत्मा को
एक औचित्य प्रदान करते हैं वे
अपने हर काम को
जैसे वही हों सबसे जरूरी
और
सबसे लोक कल्याणकारी ।
वे जोकों से भी खतरनाक होते हैं
केवल खून ही नहीं चूसते
खतरनाक वायरस भी छोड़ जाते हैं हमारे भीतर
जिसके खिलाफ
कारगर नहीं होता है कोई भी एंटी वायरस
रीढ़ और घुटने तक नहीं बच पाते साबूत
पता तक नहीं चलता
कि
कब सरीसृप में बदल गए हम
कब संवेदनाओं की धार कुंद हो गयी।
गरियाते रहें उन्हें दिन-रात भले
मौका मिलते ही
खुद भी चूसने में पीछे नहीं रहते हैं हम
और
फिर हम भी
उसे औचित्य प्रदान करने में लग जाते हैं।
5...
खड़ी चट्टान पर घसियारिनों को देखकर
एक-दो ने अंतरिक्ष में
कर ली हो चहलकदमी
दो-चार ने एवरेस्ट में
फहरा दिया हो अपना परचम
कुछ राजनीति के बीहड़ को लाँघ कर
खड़ी हो गई हों उस पार
कुछ और इसी तरह किसी अन्य वर्जित प्रदेश में
कर गई हों प्रवेश
दृष्टांत के रूप में
उद्धरित किए जाने लगे उनके नाम
मील के पत्थर ही हैं वो
इधर तो बहुत सारी
टँकी हुई-सी हैं अभी भी
सदियों से इसी तरह
ओस की बूँद सी
अब गिरी कि तब गिरी ।
कैसे करूँ संतोष
नहीं मिल जाता जब तक इन्हें
जीवन का कोई मैदान
बेखौफ होकर खड़ी हो सकें जहाँ ये।
6... सावधान
वे लिखेंगे
कविता-कहानी-उपन्यास
जनता के
शोषण-उत्पीड़न पर
मानवाधिकारों
के हनन पर
वे पत्रिका
निकालेंगे
जनता की
आवाज को स्वर देने के नाम पर
छापेंगे
उसमंे
देश-दुनिया
के क्रांतिकारी रचनाकारों को भी
वे संस्थान
भी स्थापित करेंगे
जनपक्षधर
रचनाकारों के नाम पर
गोष्ठियाँ
आयोजित की जाएंगी जहाँ
जनता से
जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर
जयंतियाँ
भी मनाई जाएंगी
जनकवियों
की याद में
देवता
की तरह याद किया जाएगा उन्हें
वे पुरस्कारों
से भी नवाजेंगे
युव से
युवतर साहित्यिकों को
वे सब
कुछ करेंगे
ताकि आपको
विश्वास होने लगे
नहीं है
कोई उनसे बड़ा जनपक्षधर
पर सावधान!
जब अपने
हक-हकूक के लिए
या शोषण-उत्पीड़न
के खिलाफ
जनता होगी
संघर्षरत
तब वे
सबसे आगे होंगे
उन्हें
बर्बर-जंगली और असभ्य साबित करने में।
