बुधवार, 8 अगस्त 2012

मैंने पहन लिया है नया सवेरा ...... शैलजा पाठक



शैलजा पाठक 
                       
शैलजा पाठक अपनी कविताओं को बहुत सहजता और धीरे से हमारे सामने रखती हैं | इतनी सहजता और धीरे से , कि कभी-कभी पाठक को उनका होना तलाशना पड़ता है | एक ऐसे दौर में , जब लोग मनोभावों को भी व्यक्त करने के लिए चिल्लानें का सहारा लेते हैं , यह विस्मयकारी लग सकता है | लेकिन एक बार जब आप इन कविताओं से जुड़ जाते हैं , तब आपको लगता है कि यह जुड़ाव मनोभावों जैसा ही पक्का और स्थाई है | अच्छी बात यह है , कि शैलजा ने अपने 'कहन' का विस्तार समाज के बड़े हिस्से तक भी किया है | ......
सिताब दियारा ब्लाग ऐसी हर संभावना का स्वागत करता है ...  

                         प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर 
                         "कुछ रंग जिंदगी के" शीर्षक से 
                         शैलजा पाठक की सात कवितायें 


कुछ रंग जिंदगी के

  
1...  बूँद और रिश्ते 


कल बारिश में भींगते हुए
कितनी ही बूंदों को
मैंने झटक दिया

सब गिर कर टूट गई

आज गालों को हाथ लगाया
कुछ सहमीं सी गर्म बूंदें मिलीं

कैसे कैसे रूप बदल कर चली आती है
बूंद बारिश रिश्ते और ख्याल

टूटते हैं पर हमसे छूटते नहीं ....

 


2...  कल फिर 


डोरियों से उतार लाई मैं 
आज की थकान
अब मोड़तोड़ कर रखने होंगे कपड़े

कल फिर इन पर
सूखने टंग जायेगी
एक और सुबह ......

       

  3...  भींगना 


आज एक बच्चे ने भगवान को
भींगने से बचाया
और उनके नाम पर कमाया पांच रुपया
अपनी जेब में छुपाया

अपनी फटी बनियान के अंदर
डाल ली भगवान की फोटो

और तेज बारिश में
भीगता रहा नन्हां फरिश्ता
भगवान उसकी छाती में
महफूज सिसकता रहा

आज दोनों ही भीगे
किसी ने किसी को नही बचाया .....

       

  

 4... मेरे दुलार पाने के आखिरी दिन 

तुमने सारे रिवाज निभा दिए
और कर दिया मुझे अपनी जिंदगी से
दूर और दूर ....
तुम्हें याद है ना भाई ?

जब मंडप को घर के बड़ों ने छवाया
और मेरे जीवन में एक पुख्ता
छत की नींव डाली
तुम वहीँ मेरे पास बैठे देख रहे थे सब 
जब अम्मा ने अपने भाई से ली थी
इमली घोटाई की साड़ी
और जीवन में साथ का भरोसा..
तुम सामने से देख रहे थे
या खोये थे कही और ?

कन्यादान की रस्म में
जब औरतें गा रही थी वो गीत
(
अरे अरे भैया हमार भैया हों धरिया जनी तोड़ी ह हो )
तुम जानते थे भाई
कलश का पानी खतम होते ही
मैं किसी और की हों जाउंगी
तुम कितनी देर-देर तक
बचा-बचा कर गिरा रहे थे पानी
पर नही बचा पाए ना मुझे पराया होने से

तुम अपनी समर्थता में भी
कितने निरीह लगे थे मुझे

और आखिर में तुमने निभा दी वह रस्म भी
जब विदा के वक्त तुमने अपनी अंजलि से
पिलाया था मुझे पानी
जिसमे मिले थे मेरे तुम्हारे आंसू
मुझे रीतियों ने बताया
वो था मेरे दुलार पाने का आखिरी दिन

तुम तो समृद्ध थे ना
पर कितने लाचार लगे

पीछे मुड के देखा था मैंने
कैसे रो रहे थे तुम
ढेर पड़े पिताजी को पकड कर

मैं ओझल हूं
पर मुझे पता हैं
मेरे बाद अम्मा ने बटोरा होगा
अपने आँचल में घर भराई का चावल
और तुम मेरी मेज पर सजा रहे होगे मेरी ही किताब
फ्रेम में लगी मेरी फोटो मुस्करा रही होगी
और तुम भाई ????

        
 5... तुम्हारी बेसुधी 

आती है तुम्हारे होने की गंध
रात के तीसरे पहर में

मेरी देह पर
उगते हैं तुम्हारे नाख़ून

टीसते जख्म को सुलाती हूं
पलकों के किवाड जोर से लगाती हूं

रौदें सपनों को
सहला जाती है भोर की ओस

मैंने पहन लिया है नया सवेरा ......

तुम रोज जैसे बेसुध हो अबतक ....


 6...    चलो ....

चलो , सोने से पहले जागते हैं
चाँद के चरखे पर
मुहब्बत का सूत कातते हैं ....

मुह उठाये पहाड़ों को
पहना आते हैं बरफ की सफ़ेद टोपी
नदियों की शोखी को
किनारों से बाँध आते हैं

हवा में बिखेर देते हैं
तमाम सवाल मलाल
सडकों को तेज दौड़ाते हैं

रोजी रोटी कपडे की
फिक्र को उघने देते है

कुछ देर अपने मन को भी
जीने देते हैं .....

उधड़े सपनों को
सीने देते हैं .....


 7...  मेरा होना 

मैं साथ हूं उसके
मुझे होना ही चाहिए 
ये तय किया सबने मिलकर

मैंने सहा
जो मुझे नही लगा भला कभी
पर उसका हक था
मैं हासिल थी

रातों की देह पर जमने लगी
सावली परतों को उधेडती
उजालों की नज्म को
अपने अंदर बेसुरा होते सुनती

घर को संभालना था
अपने डगमगाते इरादों से
वो भी किया

उसके लिजलिजे इरादों की बली चढ़ी
व्रत उपवास करती हैं सुहागिने
मैंने भी किया

थोपने को रिवाज बना लिया
जो ना करवाना था
वो भी करवा लिया
पाप पुण्य के चक्र में
इस जनम उस जनम के खौफ ने

मैंने बेंच दिया अपना होना
तुमने खरीद लिया .......




परिचय ...

शैलजा पाठक

बनारस से पढ़ाई लिखाई संपन्न हुई
आजकल मुंबई में रहती हैं
लिखने के साथ गाने का भी शौक है
कई पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित
    


रविवार, 5 अगस्त 2012

विमलचंद्र पाण्डेय का संस्मरण - चौदहवीं किश्त

विमलचन्द्र पाण्डेय 



पिछली किश्त में आपने पढ़ा कि यू.एन.आई. की नौकरी को निबाहते हुए विमलचन्द्र पाण्डेय अपने भीतर की दोनों मुख्य इच्छाओं को भी पूरा करने का समय निकाल लेते हैं | एक साहित्य और दूसरा फिल्म | साहित्य से जुड़े रहने के लिए 'मुखातिब' की गोष्ठियां हैं , जबकि फिल्मों के शौक को पूरा करने के लिए गाहे-बगाहे आयोजित होने वाले फिल्म समारोह | लेकिन पिछली किश्त में आपने यह भी पढ़ा कि इन दोनों से जुड़ी उनकी यादें कुल मिलाकर कष्ट ही देने वाली साबित होती हैं | वे जान लेते हैं , कि इन विधाओं से प्रेम करने के लिए अपने भीतर की आग ही काम आ सकती है , क्योंकि बाहर की दुनिया तो उसे बुझाने का कोई भी अवसर नहीं छोडती | और फिर आगे.....             

            तो प्रस्तुत है 'सिताब दियारा' ब्लाग पर विमलचन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                              ई इलाहब्बाद है भईया की 
                                  चौदहवीं किश्त 
                        
                                                  23.

दुर्गेश धीरे-धीरे अपनी एजेंसी की कम तनख्वाह और इलाहाबाद के खराब वर्क कल्चर से तंग आ गया था और उसका कहना था कि उसके अन्दर पत्रकारिता की जो आग है, उस हिसाब से उसे दिल्ली निकल जाना चाहिए. दिल्ली में ही असली पत्रकारिता होती है और प्रतिभा की असली क़द्र भी . मैं अपना घर छोड़ कर सबसे पहले दिल्ली ही गया था और वहाँ की पत्रकारिता से लेकर बाकी चीज़ों की क़द्र से बहुत अच्छी तरह परिचित था. मैंने उसे समझाने की कोशिश की वह जो ढोल बजा रहा है वो सिर्फ़ और सिर्फ़ इसीलिए सुहावने लग रहे हैं कि वो दूर के हैं. समझाने की कोशिश के बावजूद मैं जानता था कि किसी के समझाने और दूसरी की गलतियों से अगर लोग सीखने लगते तो दुनिया में गलतियाँ बहुत कम होतीं. यहाँ ज़िंदगी में इतना मज़ा इसीलिए है कि हर इंसान बार-बार वही गलतियाँ करेगा और वही पुराने घिसे-पिटे सबक सीख कर सामने वाले को ऐसे राज़खोलू अंदाज़ में बताएगा जैसे उसने कोई बहुत बड़ा और अनूठा सबक सीखा है. मैंने भी सारी गलतियाँ खुद कीं और सबक सीखे या कम से कम ऐसा मुझे लगता तो है ही कि मैंने कुछ सबक सीखे हैं.

एक पुरानी घटना का ज़िक्र लाजिमी सा लगता है क्योंकि उसका सम्बन्ध दिल्ली से ही है. दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग में हमारे साक्षात्कार हो रहे थे और हम कुछ लड़के लड़कियां ‘रिटेन’ (लिखित) निकल चुकने के बाद सहमे से अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. हमारे सीनियरों ने आकर बताया कि जो पूछा जाए उसका जवाब एकदम बिंदास होकर देना है. मुझे भी मेरे सीनियर संजीव जी, जो सबकी बहुत मदद करने के लिए कुख्यात थे, ने आकर कहा कि जो मेरे मन में आये मैं वही बोलूँ. मैंने मासूमियत से उन्हें विश्वास दिलाया कि मैं वही बोलता ही हूँ. एक सवाल उस समय बहुत पूछा जा रहा था कि क्या अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए. वह सवाल पिछले साल यानि उनके इंटरव्यू में भी पूछा गया था. वह माथे पर लाल टीका लगा कर अन्दर गए थे और इस सवाल का वही जवाब उन्होंने दिया था जो उनके मन में आया, “राम मंदिर अयोध्या में नहीं तो क्या मक्का मदीना में बनेगा ?” साक्षात्कार लेने वाले हडक गए होंगे और उन्हें प्रवेश मिल गया होगा. कुल मिलाकर उन्होंने बताया कि अन्दर बैठे ज़्यादातर लोग वामपंथी हैं लेकिन उन्हें कन्विंस करने के लिए झूठ बोलने कि ज़रूरत नहीं. बोलो वही जो तुम्हारा विचार हो. मुझसे भीतर जाने पर पूछा गया कि क्या शादी में दहेज लेना चाहिए. मैंने कहा ये तो डिपेंड करता है कि शादी किस परिस्थिति में हो रही है. साक्षात्कार लेने वाले चौकन्ने होकर मेरी ओर झुक आये. “मतलब ?” मैंने आराम से जवाब दिया, “अगर लड़का बेरोजगार हो तो थोड़ा बहुत दहेज ले लेना चाहिए और उसीसे कुछ बिजनेस वगैरह करना चाहिए और अगर नौकरी में हो तो फिर दहेज लेना गलत बात है.” मेरे तर्क से वे लोग कुछ प्रभावित हुए फिर मुझसे पूछा, “आप अपनी शादी में दहेज लेंगे या नहीं ?” मैंने जवाब दिया, “नहीं क्योंकि मैं तब तक शादी ही नहीं करूँगा जब तक नौकरी नहीं लग जाती.” मेरे जवाबों से वे कितने इम्प्रेस हुए ये तो नहीं पता लेकिन मेरा एडमिशन वहाँ हो गया जिससे मैंने सीखा कि हमेशा अपनी बात कही जाए चाहे वो गलत हो या सही, क्योंकि आपने पास सबसे अच्छे तर्क अपनी ही बातों के होते हैं.

दुर्गेश को मैंने दिल्ली के लिए न पगलाने के तर्क दिए तो उसने मुझे दिल्ली के लिए दीवाना होने के तर्क देकर मेरे तर्कों को काटने की कोशिश की. इलाहाबाद के विज्ञापन लाने वाले और गिफ्ट की ताक में प्रेस कांफ्रेंस में जाने वाले पत्रकारों को वह दिन भर गरियाता और गणेश शंकर विद्यार्थी या कम से कम प्रभाष जोशी बनने की इच्छा व्यक्त करता. संघ से उसका मोहभंग हो चला था और मैं इसमें अपना कोई क्रेडिट नहीं लेना चाहता कि मेरे कोसने और अक्सर संघ विरोधी बहसें करने से ऐसा हुआ था. अचानक एक दिन पता चला कि वह दिल्ली जा रहा है. विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय (?) अध्यक्ष अशोक सिंघल के करीबी रहे मनीष मंजुल ने विहिप छोड़ कर एक ट्रस्ट बनाया था और दुर्गेश उसका कुछ बनाया गया था ,जिसके लिए कुछ दिन इलाहाबाद से काम कर चुकने के बाद वह दिल्ली जा रहा था. बाद में उसने मुझे बताया कि वह अपनी एजेंसी में ही ट्रांसफर लेकर दिल्ली जा रहा है. दिल्ली जाकर उसने ट्रस्ट ज्वाइन किया या फिर ज्वाइन करके वहाँ से गया, ये मुझे साफ़ याद नहीं है.

मेरा कोई ऑफिस न होने की वजह से मैं दुर्गेश के ऑफिस में ही बैठता था और अब मुझे ये डर सताने लगा था कि अब मैं कहाँ बैठ कर अड्डेबाजी करूँगा. शुक्र है उसके जाने के बाद नीरेन जी वहाँ के इंचार्ज बने जो और लिबरल और अड्डेबाजी के मामले में आदर्श टाइप के आदमी थे.
दुर्गेश का कहना था कि मैं काम का आदमी नहीं हूँ और यूएनआई जैसी एजेंसी में होकर भी उसका भला तो नहीं ही करवा रहा, उसकी दाढ़ी मूँछो के बाबत भी चुप्पी साधे हुए हूँ. दुर्गेश की उम्र मुझे कुछ साल कम थी लेकिन वह दाढ़ी और मूंछों के मामले में ज़रा दुर्भाग्यशाली था. मूँछो की जगह पर सिर्फ़ कुछ रोयें थे और दाढ़ी की जगह सिर्फ़ कुछ उम्मीदें. मैं जानता हूँ , इस भाषा में बात करना किसी व्यक्ति की उन कमियों का उपहास करना है जो उसके बस में ही नहीं लेकिन यकीन मानिये दुर्गेश यही चाहता था. वह चाहता था कि उसकी चर्चा हो, चाहे सकारात्मक तरीके से या फिर नकारात्मक तरीके से और इसके लिए वह कुछ भी करता था. मैंने उसे किसी की सुनी सुनाई बात बोल दी कि कोई क्रीम आती है जिसे लगाने से दाढ़ी मूंछे आ जाती हैं और उसने मुझसे कहा कि इस बार मैं बनारस जाऊं तो वह क्रीम ज़रूर ले आऊँ. मैंने उसे कई बार झूठ बोलकर झांसा दिया कि मैं खोज रहा हूँ और मुझे पूरा यकीन है कि जल्दी ही मिल जायेगा. मैंने खोजने की कुछ ही कोशिशों के बाद जान लिया था कि ऐसी कोई क्रीम नहीं होती, लेकिन फिर भी मैं दुर्गेश से मजे लेने के उस लालच को छोड़ नहीं पाया. इन पंक्तियों के ज़रिये मैं दुर्गेश से अपनी इस घटिया हरकत के लिए माफ़ी मांगना चाहूँगा. कई बार हम अपनी कुछ हरकतों से अपनी नज़रों में बहुत छोटे हो जाते हैं. ज़िंदगी बजाप्ते बहुत छोटी है और मैं चाहता हूँ कि मेरी पूरी ज़िंदगी का ये हासिल हो कि , जाने अनजाने मैंने किसी ऐसे इंसान का दिल कभी न दुखाया हो जिसके दिल में मासूमियत किसी भी रूप में हो.

नीरेन जी दुर्गेश की तरह कच्चे संघी नहीं थे जो किसी लल्लू पंजू के समझाने और उसकी बहसों से उसका मन बदल जाता. वह जीवन भर शादी न करने वाले और पूरे नियम से शाखा जाने वाले जवान थे, जो अब संघ की इस समाचार एजेंसी में बतौर संवाददाता आ गए थे, जिसके बारे में दुर्गेश हमेशा कहता रहता था, “बिमल भाई एके संघ से कौनो मतलब नै न, उ अलग चीज़ है और इ अलग.” दुर्गेश की स्पष्टवादिता को हम सब बहुत मिस कर रहे थे. अब कोई नहीं था जो समोसे की दुकान पर समोसा खाते हुए हलवाई की तरफ ऊँगली उठा कर कहें, “सड़ा आलू डालत है इ समोसा में तब्बे तो एकर दुकान नै चलत.” या किसी कांफ्रेस के बाद पत्रकारों के बीच नाश्ता करता हुआ कहें, “हम्म ई लोकल चैनल वाले तो खाली खाए आवत हैं हियाँ.”

नीरेन जी नियमों के मामले में वह बहुत पक्के थे और उनका चेहरा देख कर उनका इतना सम्मान करने का मन होता था कि मैं सम्मान करना सीखने का कोई कोर्स ज्वाइन करना चाहता था. वह बाहर का पानी नहीं पीते थे और न चाय के अलावा कुछ बाहर खाते थे. पैदल वह इतना चलते थे कि अगर ओलम्पिक में पैदल चलने की प्रतियोगिता होती तो वह निसंदेह स्वर्ण पदक ले आते. उनके मित्र संतोष और वह दोनों लोग नियम से मृत्युंजय महादेव का दर्शन करते और दुनिया से खुश रहते. संतोष इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बतौर अधिवक्ता प्रेक्टिस करते थे और गाजीपुर के निवासी थे. गाजीपुर बलिया के मूल और खांटी निवासियों की तरह संतोष जी भी हिंदी के फॉण्ट पर बहुत अभ्यस्त नहीं थे. हिंदी फॉण्ट में बोलते-बोलते अचानक उनका फॉण्ट बदल जाता और वह बलियाटिक भोजपुरी में आ जाते. दो से तीन पंक्तियाँ अगर उन्हें लगातार हिंदी में बोलनी होतीं तो वह ज़्यादा से ज़्यादा दूसरी पंक्ति के बाद अपना फॉण्ट चेंज कर देते. हम अचानक बदलने वाले फोंट्स का कारण नहीं समझ पाते. मैं भी मूल रूप से बलिया का हूँ और अपने दोस्तों और घर के बाहर भले बनारसी भोजपुरी बोलूँ, घर में माँ और पापा से आज भी बलियाटिक भोजपुरी में बात करता हूँ . संतोष जी के फॉण्ट बदलने पर मैं भी फॉण्ट बदल लेता और हम जिस फॉण्ट में बात करते, वह विवेक के सिस्टम में इंस्टाल नहीं था , जिसके कारण वह नाराज़ हो जाता और उसने संतोष का नाम ही फॉण्ट रख दिया था , जिस नाम से उन्हें आज भी पुकारा जाता है. संतोष और नीरेन दोनों मित्र अक्सर साथ साथ रहते और खाने को लेकर ढेरों संस्मरण सुनाया करते. जैसे संतोष के गांव में कोई था जो पानी से पूड़ी छान देता था और नीरेन जी के गांव में एक आदमी था जो डेढ़ सौ पूड़ियाँ खा जाया करता था.

“बै मरदे, एतने ? हमरी गांव में एगोड़ा बा जवन एक बेर में दु सौ पूड़ी आ बीस किलो दही खा जाला.”

मैं समझ नहीं पाता कि आखिर इन लोगों में ऐसी बातें करने के लिए कौन सी भावना काम करती है. भोजन शब्द उनकी बातचीत में हर बीस मिनट के बाद आता ,लेकिन इसका कतई ये मतलब नहीं कि वे बहुत खाते थे.  


                                                                                                                  क्रमशः .....

                                                                                               प्रत्येक रविवार को नयी किश्त ...


संपर्क - 

विमल चन्द्र पाण्डेय 
प्लाट न. 130 - 131 
मिसिरपुरा , लहरतारा 
वाराणसी , उ.प्र. 221002

फोन न. - 09820813904
         09451887246


फिल्मो में विशेष रूचि 
 

बुधवार, 1 अगस्त 2012

आखिर वे उनके बच्चे हैं --- मनोज पाण्डेय

मनोज पाण्डेय 

                          
                    प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर युवा साहित्यकार
                       'मनोज पाण्डेय' का यह विचारोत्तेजक लेख 

                  आखिर वे उनके बच्चे हैं....

                जिन पाठकों ने रुसी उपन्यासों को पढ रखा है , उनको अच्छी तरह याद होगा कि जिन उपन्यासों में रुसी सामंती समाज का चित्रण हुआ है, उनमें रुस के सामंती परिवारों की भाषा से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण विषमता सामने आती है । रुस के सामंती परिवारों में रुसी भाषा का चलन घरों से बाहर की बातचीत तक ही जुडा हुआ था । उनके खेतों ,घरों और बागीचों में काम करने वालों से बातचीत करते समय ही उन मालिकों को जाहिलो- गवारों की भाषा की जरुरत पडती थी। मालिक और उनका परिवार तो यूरोप की फ्रेन्च जैसी सबसे आभिजात्य भाषा का ही व्यवहार सुबह से शाम तक अपनी सामंती ठसक के साथ करता था।
                भारत में भी तत्कालीन समाज के ताकतवर वर्ग की भाषा को ‘देवभाषा' के उच्चतम स्थान पर स्थापित कर दिया गया , जो आज भी आमजन की भाषा परिधि में दूर दूर तक नजर नहीं आ पाती है। यद्यपि एकाध गॉंवों में प्रचलन का उदाहरण देते हुए देवभाषा प्रेमियों का सीना जरुर चौडा हो जाता है। संस्कृत आमजन की भाषा से किस तरह देवभाषा' तक पहुँची ,  यह हमें संस्कृत में ही लिखे नाटकों से पता चलता है। इन नाटकों की संवाद योजना में भाषा वर्गों का स्पष्ट निर्धारण है। राजकुल के पुरुष,ब्राह्मण और उच्च कुलोत्पन्न पात्र ही संस्कृत भाषा में संवाद बोल सकते थे। स्त्री, सेवक और निम्न कुलोत्पन्न पात्रों की भाषा प्राकृत या अपभ्रन्श होती थी। आगे चलकर इसकी छाप हमें हिन्दी फिल्मों में रामू काका या घर के खानदानी सेवक के लिए तय की भाषा में भी दिखाई देती है।
              यहॉं हम जिस रुसी या भारतीय समाज और उसकी भाषा की चर्चा कर रहे है,वह समाज पूरी तरह सांमती और वर्णवादी रहा। किसी भी तरह का बॅंटवारा तत्कालीन समाज के राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों के अनिवार्य परिणाम के तौर ही हमारे सामने आता है।जबकि आज दुनिया भर में लोकतान्त्रिक व्यवस्था का डंका पीटा जा रहा है , इसके बाद भी , जब किसी भी स्तर पर असमान व्यवहार या उसकी मानसिकता या उसके लिए स्वीकृति की स्थिति दिखाई देती है, तब उसके बारे में गंभीरता से सोचना जरुरी हो जाता है। असमान व्यवहार की एक बडी घटना हमारे देश के भीतर ही भाषायी स्तर पर उच्च वर्ग द्वारा घटित हो रही है।
              दिल्ली के उच्च वर्गीय इलाकों यानि पाश कालोनियों' के ‘संवेदनशील अभिभावक' अपनी अगली पीढ़ी को हिन्दी या उसके जैसी किसी भी देशज भाषा से पूरी तरह अलगा देने की कोशिश कर रहे है।आपको लग सकता है कि इसमें कौन सी नयी बात है। उनके बच्चे ही नही एक सामान्य आय वाले  अभिभावक के बच्चे भी हैसियत के स्तर के पब्लिक स्कूलों में अंग्रेजी ही पढ़ने जा रहे है। आगे बढ़ने और बने रहने के लिए देशी भाषाओं से काम नहीं चलने वाली मानसिकता का निर्माण करने का काम इसी वर्ग ने किया है। इन अभिभावकों ने अपने बच्चों के खेलने और मजे करने की स्थितियों को भी भाषा के स्तर पर नियन्त्रित करना शुरु कर दिया है। इसको ऐसे भी कहा जा सकता है कि इस बात का पता हमें अब चला है कि वे हमारी भाषा से किस कदर घृणा करते है।
             ऐसे अभिभावकों ने अपने बच्चों के साथ पार्कों में खेलने के लिए निम्न-मध्य मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों को सांस्थानिक रुप से ''हायर करना शुरु किया है। इन बच्चों को बाकायदे हर विजिट' के लिए तयशुदा रकम दी जाती है। मध्यवर्गीय स्कूलों से ऐसे प्रतिभासम्पन्न' बच्चों को व्यवस्थित ढंग से ‘हंट’ किया जा रहा है। स्कूल भी अपने प्रतिभाशाली होनहारों के लिए इस तरह के ‘हंट' को बेहतरीन अवसर के रुप मे मानते हुए अपनी उपलब्धियों के खातों में चुने गये बच्चों का नाम जोडने में मगन हो रहे हैं। मनपसन्द बच्चों का समूह बन जाने के बाद नामी गिरामी संस्थाओं के व्यक्तिव प्रशिक्षण कक्षाओं मे एटीट्‌यूड और ऐटीकेट्‌स' का पाठ पढाया जाता है , जिससे रही सही कमी पूरी हो जाये। बच्चों को चुने जाने की प्राथमिक शर्त अंग्रेजी से जुडी हुयी है। इस भाषा पर पकड है तो मध्यवर्गीय परिवार के बच्चे के चुने जाने की शतप्रतिशत सम्भावना होती है।बाकी चीजें तो हायर' करने वाला अभिभावक वर्ग खुद विकसित करवा लेता है।निम्न मध्यवर्गीय परिवार का अभिभावक इस बात में खुश हो जाता है कि उसका बच्चा खेल के भी कमा रहा है।
             संविधान में अपनी भाषा के विकास के लिए अवसर देने का जिक्र है | मान भी लिया जाये कि हमारी भाषा उनकी भाषा नही बन पायी है या इससे आगे बढकर कभी बन भी नहीं पायेगी ,  तो भी क्या हम इस तरह की बनते समाज को जायज ठहरा सकते है ..? एक ही समय में दो बच्चों की मानसिकता के विकास की दिशाए किस ओर होती होंगी ..?  इसी तरह के तमाम प्रश्न आज हमारे सामने आ खडे हुए है , जिनका जबाव लिया जाना जरुरी है।


                                                      मनोज पाण्डेय 

  परिचय .....                      

-- लेखक पेशे से शिक्षक है
--- कवितायें लिखते हैं  
--- दिल्ली में रहते है 
     और 
--- साहित्यिक - सांस्कृतिक गतिविधियों में गहरी दिलचस्पी रखते है