गुरुवार, 6 सितंबर 2012

जीवन अंततः किस एकांत की ओर जाता था - अरविन्द


            
                                     अरविन्द 

अरविन्द की कवितायें आप पहले भी 'सिताब दियारा' पर पढ़ चुके हैं | और आप ही की तरह मैं भी इस अत्यंत प्रतिभाशाली युवा कवि को बार-बार 'सिताब दियारा' पर देखना और पढ़ना चाहता हूँ | पच्चीस साल की उम्र में इनके पास 'जीवन अंततः किस एकांत की तरफ जाता है , जानने की ईच्छा भी है' और 'जों लड़कियां सुन्दर नहीं थी , वे कहाँ गयीं , तलाशने की व्याकुलता भी' | 'प्रेम की बारिश में भीगने का हुनर भी है' और 'मृत्यु की आहट को आगे बढ़कर थाम लेने का जज्बा भी' | अनूठे और नितांत मौलिक शिल्प की ये कवितायें किसी भी लेखक के मन में पाठक बने रहने की तीव्र लालसा पैदा कर सकने में सक्षम हैं , जैसा की 'अरविन्द' स्वयं चाहते और जीते हैं | 'अरविन्द इतना कम क्यों लिखते हैं' , यह सवाल जितना सालता है , 'अरविन्द इतना बेहतर लिखते हैं' , यह जबाब उतना ही तसल्ली प्रदान करता है | 

                  प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर प्रतिभाशाली युवा कवि 
                               अरविन्द की छः कवितायें 

 1...    एकांत


हर एक का अपना एकांत था

हर एक
खुद के शोरगुल से भागकर
खुद के एकांत में बैठ जाता था

बुद्ध
खुद के शोरगुल से भागकर खुद के एकांत में बैठ गए थे

कबीर का एकांत करघा था

दीवान-ए-ग़ालिब के एकांत में बैठकर लोग खुद को भुला देते थे

मिलने से पूर्व
एक एकांत तुम्हारा था
और जो मेरा था
कहीं न कहीं वह
तुम्हारे एकांत की तलाश में था

दो एकांत मिलकर एक सघन एकांत रचते थे

एक पेड़
अपने हरेपन के एकांत में डूबा खुश दिखता था

पतझड़ किसी शोरगुल की तरह था

स्वप्न का एकांत नींद
प्रेम का एकांत मौन
नदी का एकांत किनारा
और शब्द का एकांत कविता थी   

फिर जीवन अंततः
घड़ी की टिक-टिक पर बैठ के
किस एकांत की ओर जाता था ..?


2..  पाठक ही


हमेशा एक पाठक की तरह रहा |

कभी कुछ लिखकर भेजा भी तो
एक लेखक की हैसियत से नहीं
एक पाठक की तरह ही पूछताछ किया |

कोई और मैं होगा
जों लिखता होगा
मैं तो बस एक पाठक की तरह रहा |

अचानक छपी
कोई कहीं कभी
भेजकर भूल गई कविता
उसे पहचानने में
कौंध भर इनकार रेंग गयी |

कोई और था
जों मेरे पते पर रहता था
मैं उसे खोजता रहा |

कभी अच्छी लगी कोई कविता
तो अपने पते की तरह कोई पता था
एक पाठक की तरह
उस पर चिट्ठी लिख छोड़ आया |
मिली चिट्ठी को मेरे अंदर छुपा कोई मैं पढता रहा
दूर से आये दूरभाष को कोई मैं सुनता रहा |

दोस्त कहते थे कि
मैं कवि कि तरह कहता हूँ |

अंदर कहीं कवि था
तो इतना कम कि
खोजना असंभव |

एक ज्यादा पाठक उसे
स्थगित करता चला गया |

आजीवन पाठक की तरह रह जाने की ईच्छा इतनी तीव्र थी
कि खुद की कविता को
एक कवि की नहीं
एक पाठक की कविता कहलाना ज्यादा पसंद किया |



3...   आगत मृत्यु


मृत्यु
इतनी अनिश्चित
इतनी आकस्मिक
जैसे दोनों शब्दों का जन्म ही मृत्यु से हुआ हो |

इतनी अनिश्चित कि
मृत्यु का इन्तजार करता हुआ एक आदमी
दस बजे नहीं मरा
और इतनी आकस्मिक कि
अगली सुबह दस बजे मर गया |

जीवन के सृजन की धमक
महीनों पहले सुनायी पड़ती थी |

जैसे कोई बच्चा
जन्म से महीनों पूर्व
सांस लेने का हुनर सीखता था |

अतिथि की पदचाप सुनायी पड़ती थी
दरवाजे पर खड़ा होकर
वह पुकारता था |

मृत्यु थी
कि अचानक आती थी
पदचाप तो दूर
सांस लेने की आवाज तक नहीं आती थी |

इस दुनिया में
कोई न कोई चाहता तो होगा
कि मृत्यु एकदम अतिथि की तरह आये
दरवाजे पर खड़ी होकर पुकारे
और यह भी कि
मृत्यु को अपने बैठके में बैठाया जाए
उसे गरम चाय पिलायी जाए |

हत्या और मृत्यु में फर्क था
मृत्यु एक सम्मानजनक प्रश्न थी
मृत्यु हत्यारी नहीं थी
दुनिया की हर हत्याएं नियोजित थीं
जैसे गोधरा की बोगियां
झज्जर की झोपड़ियाँ
सन ८४ के सिखों की दुनिया

मृत्यु
शोक का विषय नहीं थी
विलाप मृत्यु का धरम नहीं था

बहुतेरे थे
जों दो बरस का जीवन नहीं जी पाए थे
कई थे
जों उम्र पूरी कर भी डर गए थे
अपने दुखी रहने में वे मृत्यु को
शाश्वत बहाने की तरह इस्तेमाल में लेते थे

मेरी आज की उम्र
कुल पच्चीस वर्ष

लगता था कि मेरे जन्म की बात कल की थी
तो यह भी लगता था कि
मरने का दिन भी कल होगा

शोक या दुःख मनाने का अवसर कहाँ था
हर रोज प्रेम में डूब जाने के लिए कई चीजें थीं

मृत्यु
जब भी आओ
तुम्हारा स्वागत है !

मैं तुम्हारे अचानक प्रेम में ऐसे पड़ना चाहूँगा
कि जैसे लोग कहें
किसी युवती की आँखों में डूबकर
वह अपना जीवन तक भूल गया |


4....   बारिश


बारिश होती है
तो बारिश की पूरी दुनिया घूमने का मन करता है
जहाँ से बारिश शुरू होती है से आरम्भ कर
वहाँ तक जहाँ बारिश खत्म होती है ।
     
कभी तो लगता है भीगते हुए
घूमते हुए पूरा जीवन काट दिया जाय
जैसे कोई पेड सारी उम्र भीगता रहता है
और कितना खुश दिखता है !

दूर से
बारिश की धारासार में आपादमस्तक डूबे घर को देखते हुए लगता है कि
जैसे मैं  बारिश के घर का मालिक हूँ ।

छाता लगाकर
मै बादलों की तरह घूमना चाहता हूँ
वहां तक जाना चाहता हूँ
जहाँ कोई बीज बीहड मरूस्थल में सदियों से सोया पडा है
जहाँ किसी स्त्री के आँगन ने नही देखा इन्दधनुष।

बारिश में मैं इतनी तन्मयता और पहचान के साथ घूमना चाहता हूँ कि
कोई मुझे आया देखे तो कहे बारिश हुई
जाते हुए देखे तो कहे बारिश गई ।

बारिश के नाम कोई चिटठी लिखे तो मुझ तक पहुंचे ।

और बारिश बीत जाने पर
अपनी स्मृतियों में मैं पेड की पत्तियों की तरह
बूंदे बचाकर रखना चाहता हूँ  ।
अगर कोई मुझे छूये
तो झर्र से बरस जाना चाहता हूँ  ।


5..... जो खूबसूरत नहीं थीं 


जो खूबसूरत नही थी
वे लडकियां कहाँ गयीं  ?

ढलती हुई सांझ की तरह सांवली
जिनमें किसी ने कोई रंग नही देखा
जिनके लिये नही लिखा गया कोई अभिज्ञानशाकुंतलम
आखिर वे लडकियां कहाँ गयीं  ?

दुनिया में जो
बिना किसी आवाज के जीती रही
जो बुत की तरह निस्पंद रही
जिनकी लिये नही लिखी गयी प्रेम कविताएं
नही रचा गया किसी नायिका का पाठ
वे कहां गयीं  ?

क्या वे धीरे-धीरे
भाप बन के उड गयी बादलों में
क्या वे सन्नाटा बनकर अंधेरो में बस गयी
उनके मन का संगीत जो कभी सुनायी नहीं दिया
क्या वह हवाओं में घुल गया ?
मैं नही जानता

वे जब दिखती है तो
उनकी आंखो की नमी में छिपा धुँधला इन्द्रधनुष दिखता है
कभी नही हंसी गयी एक हंसी दिखती है
उनकी पुतलियों में बसी थकी आत्मा दिखती है ।

बस

और एक दिन अचानक
वे रहस्यमय तरीके से गायब हो जाती हैं ।



6..... रोजनामचा


रोज रोज मरना
और रोज जिन्दा होना ।

रोज-रोज मृत्यु
हर रोज पुनर्जन्म ।

एक ही जन्म में
अमर होने की तरह रहता हूँ
एक ही जन्म में बार-बार मरता हूँ ।

खुद की कब्र खुद में खोदता रहता हूँ
खुद को जन्म देता रहता हूँ बार-बार ।

जीने से पहले कई बार मर जाता हूँ
मरने से पहले कई बार जीता हूँ  मित्रों ।


परिचय 

नाम - अरविन्द
उम्र- 25 वर्ष 
शिक्षा - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर 
सम्प्रति - प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक 
मो.न.  07376844005  
निवास- नौगढ़ , जिला चंदौली , उ.प्र.  
फिल्मों में विशेष रूचि 



33 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्‍छी रचनाएं हैं..

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  2. काशी विवि में कविता की जमीन उर्वर है . अरविन्द की कविताएँ उम्मीद जगाती हैं . खास कर यह उन की कविताओं में समय समाज के साथ अस्तित्व की चिंताएं भी उसी तरह शामिल हैं . आश्चर्य यह देख कर हुआ कि हत्या प्रसंग में कवि को गोधरा की बोगियां याद रही तो उन से जुड़ा हुआ बाद का जनसंहार कैसे छूट गया . यों तो कविता में एक प्रसंग की याद दूसरे प्रसंगों की याद के लिए पाबन्द नहीं करती , लेकिन गोधरा को उस के साथ जुड़े समूचे सघन , जटिल और नितन्तर जीवित राजनीतिक -सन्दर्भों के बिना याद नहीं किया जा सकता . यह नहीं कि इस चूक से कविता में कोई बेहद अधूरापन आ गया , लेकिन एक नए सम्भावनाशील कवि का ध्यान इस और जाना चाहिए .

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  3. बहुत ही उम्दा कवितायेँ हैं .......मैंने अरविन्द की कवितायेँ पहली बार पढ़ी ...... उन्हें ढूढ़ कर और पढना चाहूँगा ......पढ़ते समय कईं जगह तो यह भी लगा कि अरे ये तो मेरे भीतर की बात है ..... एक बात और जो कहना चाहता था वह आशुतोष सर ने पहले ही दर्ज कर दी है ......अरविन्द को बधाई और सिताब दियारा का आभार |

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  4. इस कविता पर अपनी एक पुरानी कविता का हिस्सा याद आ गया....(ये सरासर ग़लत है कि/कवि, शायर या चित्रकार ही/प्यार की बेहतर समझ रखते हैं...दरअसल, जिनके पास..मीठी उपमाएं नहीं होतीं, वो भी कर रहे होते हैं प्यार...चुपके-चुपके...) ... निखिल आनंद गिरी

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  5. बेहद ताजा कवितायें हैं और कवि के नजर डालने का सलीका भी ताजा है ..

    शायक आलोक

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  6. दुनिया में जो
    बिना किसी आवाज के जीती रही
    जो बुत की तरह निस्पंद रही
    जिनके लिये नही लिखी गयी प्रेम कविताएं
    नही रचा गया किसी नायिका का पाठ
    वे कहां गयीं ? Nayab rachana ke liye sadhuvad

    शिवकुमार कौशिकेय

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  7. शानदार कविताएँ .. मनोज कुमार झा

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  8. वाह, ये उम्र और ये कविताएँ.
    शुक्रिया रामजी भाई!!

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  9. अरविन्द की कविताओं में यह जो उनका टटकापन है वह बिलकुल अपनी तरह का है. यह एक ऐसा कवि है जिसका पता बारिस है और जिसकी यही चाहत है कि वह आया दिखे तो लगे कि बारिस हुई जाए तो लगे कि बारिस गयी. बेहतरीन कविताएँ हैं लेकिन जैसा कि आशुतोष जी ने कहा है एक कवि को अपने समय के पूरे सन्दर्भों के साथ कविता में आवाजाही करना चाहिए, अन्यथा उसके कुछ और मायने निकलने-निकालने के खतरे लगातार बने रहते हैं. अरविन्द एक सजग युवा कवि हैं जो अपनी कविता को खुद एक पाठक की तरह पढ़ते हैं इसलिए उनके यहाँ संभावनाएं बहुत हैं. अपने इस प्रिय कवि को शुभकामनाये और रामजी भाई का आभार

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  10. अरविंद कविता के धर्म और स्‍वभाव को अच्‍छी तरह पकड़ रहे हैं ।जो उनको कहना है वो आगे-पीछे करते हुए बतकही में ही कह देते हैं ।

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  11. aagat mritu, baarish aur jo khubsurat nahi thi mujhe bahut achhi lagi........a kavitaye sahitya-samaj hi nahi balki aam aadami ko bhi pasand aayengi. arvind ko dher sari badhayiyan....

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  12. अरविन्द बढ़िया लिख रहे हैं ..सिग्नेचर मार्क है इनके पास.. ध्यान खींचते हैं .. अभी पिछले दिनों इनकी कवितायें पढ़ी जो वाकई पसंद आई..उनकी एक कविता में सम्पूर्णता में चीजों को नहीं देख सकने सम्बन्धी आई एक आपत्ति को मैंने ज्यादा तवज्जो लायक नहीं समझा है.. रचनात्मक विस्फोट होना शेष है अभी इनके अन्दर और इनसे उम्मीद बनी रहेगी..

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  13. बहुत अच्छी कविताएँ अपने साथ एक अलग दुनिया में ले जाती हुई।

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  14. आगे भी इनकी कविताएँ पढ़ने की इच्छा रहेगी।

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  15. mar dala.aise hee aage bhee likhate rahe.

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  16. जटिलता के शिल्प के प्रति पूरे सम्मान के साथ कहना चाहूँगा कि मेरे प्रति रचना की पहली शर्त सहजता है और यहाँ अरविन्द बहुत उम्मीद जगाते हैं. अच्छी कविताओं के लिए धन्यवाद....विमल चन्द्र पाण्डेय

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  17. अरविन्द को जानने वालों में मैं भी एक शामिल हंू। नजदीकियां सीमित पर आत्मीयता पर्याप्त हैं। हर क्षण कविताओं में जीते हैं वे। एकान्त से उनकी जबर्दस्त यारी है। बहुत कुछ यायावरी किस्म की। वे बोलते-बोलते अचानक ढूंढने लगते हैं एकान्त। आपसी बतकही-कहकहे के बीच टटोलने/खोजने लगते हैं एकान्त। ऐसे समय में जब सबकुछ असुरक्षित है; वे बचाए रखना चाहते हैं अपना एकान्त। ताकि वे स्थिर चित्त से पूरे संसार के भरापन और हरापन को महसूस सके। उन विडम्बनाओं, विद्रूपताओं और विसंगतियों की पहचान कर सके जिनकी वजह से इंसान का इंसान बने रहना दूभर है। उनकी यह एकान्त आत्मजीवी न होकर बेहद सजग और चेतस है। उनकी कविताएं शब्दबद्ध या पंक्तिबद्ध न होकर जीवन से सम्बद्ध है। उनकी तलाश में वे चेहरे हैं जो गायब और गुमशुदा हैं; जिनके होने को लेकर नकार/इंकार अधिक हैं स्वीकार के भाव नाममात्र। अरविन्द व्याकुल आत्मा की तरह सिर्फ प्रश्न खड़े नहीं करते हैं बल्कि शिद्दत के साथ सभ्य-समाज के ऊपर ‘एफआईआर’ दर्ज करते दिखाई पड़ते हैं-‘‘जिनकी लिये नही लिखी गयी प्रेम कविताएं/नही रचा गया किसी नायिका का पाठ/वे कहां गयीं?’’। अरविन्द की यह टोह/टटोल इसलिए हमें ठीक लगती है; क्योंकि वे उन लोगों पर अपनी आंख रखते हैं जिनपर हमारी दृष्टि गई ही नहीं है आजतक या कि नज़र फेर लिया है बड़ी होशियारी से। जीवन के अंग-अंग में रंग भरने को आतुर अरविन्द उन संभावनाओं तक को जीवित कर डालते हैं जो सदियों/शताब्दियों/सहस्त्राब्दियों से ओझल हैं-‘‘छाता लगाकर/मै बादलों की तरह घूमना चाहता हूँ/वहां तक जाना चाहता हूँ/जहाँ कोई बीज बीहड मरूस्थल में सदियों से सोया पडा है/जहाँ किसी स्त्री के आँगन ने नही देखा इन्दधनुष।’’। यही नहीं अपने प्रयत्न में वे खुद को होम कर देने को भी अपनी ‘मृत्यु’ की सार्थकता मानते हैं। इसीलिए वे अपनी कविता में बड़ी शाइस्तगी से कहते हैं-‘‘जीने से पहले कई बार मर जाता हंू/मरने से पहले कई बार जीता हूं मित्रो!’’

    अपनी टिप्पणी में आशुतोष जी जो कह रहें हैं वे गैरवाजिब नहीं हैं, लेकिन जिस बारे में कह रहे हैं वे तो महज उदाहरण में प्रयुक्त प्रस्थानक मात्र हैं। बाद की सारी स्थितियां उन्हीं से उपतजी हैं-‘गोधरा’ से लेकर ‘ग्रीनहंट’ तक। पच्चीस की उम्र में अरविन्द जैसा उम्दा लिख रहे हैं; उससे यह उम्मीद तो जगती ही है कि वे कविताई की प्रचलित परिपाटियों से कुछ नया रचेंगे-बुनेंगे। अपने अनुभव को और गहन और संवेदना को गाढ़ा करेंगे। इसी आशा में मुझ जैसे सामान्य लोग टकटकी लगा निहारेंगे सिताब-दियारा का कोना-अतरा। फिलहाल, साधुवाद! अरविन्द और सिताब-दियारा दोनों को साथ-साथ।

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  18. बहुत हि बढ़िया kk meena

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  19. वाह ! बहुत अच्छी, प्रभावशाली कवितायेँ

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  20. सभी कविताएँ एक से बढ़ कर एक हैं . जो खूबसूरत नही थीं एक बेमिशाल रचना हैं ....कवि को हार्दिक बधाई एंव सिताब दियारा का आभार इन्हें प्रस्तुत करने के लिए .
    सादर

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  21. बेहद प्रभावशाली कवितायेँ... बार बार लौट कर पढ़े जाने को आमंत्रित करती हुईं!

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  22. दो एकांत मिलकर एक सघन एकांत रचते थे.
    मैं तुम्हारे अचानक प्रेम में ऐसे पड़ना चाहूँगा..
    यह स्वर अनूठी कविता का स्वर है. अरविन्द की कवितायेँ सहज ही छा जाने वाली कवितायें हैं. दिलो-दिमाग पर . ऐसे विशिष्ट कवि को जितनी बार पढ़ा जाए, अलहदा स्वाद मिलेगा. मनमोहक कविताओं को यहाँ परोसने के लिए सिताब दियारा को बधाइयाँ.

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  23. आकर्षक वस्तुओं की तरफ तो हमारा आकर्षण सहज ही है....परन्तु यही हाल मानवीय समबन्धों को लेकर भी है....जो खूबसूरत नहीं हम उसका तिरस्कार कर देते हैं....यह एक सच है जो अरविन्द की कविता में हैं....जो खुबसूरत नहीं थी वे लडकियाँ कहाँ गयीं...

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  24. Mai arwind ko gahri ummid se dekh raha hoon. Kavita padhwane ka aabhar ram ji. Keshav.tiwari

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  25. बहुत अच्छी कविताएँ हैं गुरु, लेकिन हमउम्र अरविन्द के भीतर आसपास को लेकर इतना संघर्ष और हताशा डरा भी देती हैं.

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  26. kya shandaar kavitayen hai ki padhti rhi jaaye baar baar aur khatam hi naa ho....dil se badhaiii arvind

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  27. एकांत, बारिश और जो खूबसुरत नहीं थी कविताएँ पाठक को एक अलग संसार में ले जाती हैं...इनमें कवी के अंतर्मन के कई परतें खुलती हैं. इनमें संवेदनाओं की इतनी तीक्ष्ण सांद्रता है कि इन्हें पढने के पश्चात् हम अपने आप को एक अलग धरातल पर पाते हैं.

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  28. जहाँ आज कवि बनाने की होड़ लगी है अरविन्द जी पाठक ही बने रहना चाहते है इसी से इनकी विशिष्टता का पता चलता है |अच्छा लगा आपकी कविताएँ पढ़ कर |

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