बुधवार, 19 सितंबर 2012

भगवान हर जनम में पत्थर ही रहे होंगे - निखिल आनंद गिरि

निखिल आनंद गिरि 



युवा कविता में निखिल आनंद गिरि  का यह स्वर जितना विविध है , उतना ही आश्वस्तिकारक भी  | भाषा , शिल्प , प्रयोग , कथ्य और पक्षधरता को एक साथ पिरोने का जो काम निखिल अपनी कविताओं में करते हैं , वह मोहक और चमत्कृत करने वाला होता है | उनकी कविताओं में उनकी जड़ें तो आती ही हैं , उन आधुनिक बदलावों की झलक भी मिलती है , जिसने हमारे समय और समाज को गहरे अर्थों में प्रभावित किया है | नेट की दुनिया में चर्चित यह युवा चेहरा प्रिंट की दुनिया में अभी इतना अलक्षित क्यों है , यह एक बड़ा सवाल है | उम्मीद की जानी चाहिए , कि थकी  हुई कविताओं से भरे हुए पत्रिकाओं के पन्ने , ताज़ी बयार को बहाने वाले ऐसे समर्थ युवा कवियों को उनका वास्तविक स्थान प्रदान करेंगी  | 

                    प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर निखिल आनंद गिरि की कविताएँ 


1...   भगवान हर जनम में पत्थर ही रहे होंगे ...


पिता हमारे लिए नाख़ून की तरह थे,
मुंह में चबाने जैसी बुरी आदत जैसे..
बात-बात में काटे जाने लायक जितना ज़रूरी,

प्यास लगने पर पानी जितना ज़रूरी नहीं...

मां झड़ते बालों की तरह कीमती थी,
कमज़ोर आंखों के लिए चश्मे जितनी..
दमे की बीमारी में लंबी सांस जितनी...

गुज़रते दिनों के साथ घटी नहीं क़ीमत...

प्रेमिकाएं जवानी के दिनों में सब कुछ थीं..
प्यार, समाज, शरीर और सदाबहार मुस्कान....
पत्नी बुढ़ापे के लिए सामाजिक  जुगाड़...

शादी दो रिश्तों में एक पुल की तरह...

सब हुआ जैसा समाज ने तय किया,
उम्र की क़ीमत पर हो गए अमीर..
बड़ा होना बचपने से भी मज़ाकिया..

हार जाने में जीतने जैसा उत्सव था...

एक वीरान कमरे में सिमट गई दिल्ली...
चार चूल्हों की लड़ाईयों में सारा गांव...
और शरीर की हद में  ही सारा प्यार...


यूं चली मौत की दहलीज़ तक ज़िंदगी..

हम उस जन्म में भी रहे होंगे आम आदमी
प्रेमिकाएं उस जन्म में रही होंगी पागल...
पिछले जन्म में ज़मींदार रहे होंगे पिता...

भगवान हर जनम में पत्थर ही रहे होंगे....




2...  हमारी रातों में सपने हैं , नींद नहीं


तुम्हारे बाद भी भूख लगती है पेट को,
और आंखों को आंसू आते हैं...
देश में कहीं कोई हड़ताल भी नहीं हुई,
और आप कहते हैं बेवफाई बड़ी चीज़ है...


जहां राजनीति नहीं, वहां सिर्फ प्यार  है..
और प्यार से कवि बना जा सकता है
लेखक बना जा सकता है...
बहुत हुआ तो वैज्ञानिक भी,
मगर एक ऐसा आदमी नहीं,
जिसे गणमान्य समझा जाए।


मेरे पिता से पूछिए,
उन्हें गणमान्य आदमी कितने पसंद हैं..
वो चाहते रहे हमें एक ख़ास आदमी बनाना...
लाल बत्ती न सही, गाड़ी ही कम से कम...
और हम पैदल चलते रहे सड़कों पर,
पांच रूपये की मूंगफली और हथेली थामे...


हम दोनों एक ही अखबार पढ़ते हैं...
अलग-अलग शहरों में....
पिता का समाज और है,
हमारा समाज कुछ और...
फिर भी हम एक परिवार के सदस्य तो हैं....
जहां मां जोड़ती है दोनों को..
और बालों का ख़ालीपन भी...


उन्हें नींद नहीं आती हमारी फिक्र में ...
हमें नहीं आती कि हमारे पास सपने हैं...
जो पूरे नहीं होंगे कभी...
और देखिए किसी सरकारी दफ्तर की तरह,
हर तरफ रातें हैं,
मगर किसी काम की नहीं....


वो सुबह का वक्त था
कि एक दिन पटरियों के दोनों ओर,
पांव फैलाकर चल रहे थे हम
और तुम्हारी हथेली थी मेरी आंखों पर..
मैंने पहली बार एक सपने की आवाज़ सुनी थी...


देखना एक दिन हम भी अमीर हो जाएंगे
और हमारे बच्चे आवारा....
उन्हें मालूम होगा सिर्फ ख़ून का रंग
और फिर भी शरीफ कहे जाएंगे
उस सपने को चुराकर बनेगी फिल्म
तो नाम क्या रखा जाएगा ?




3 ... कल सपने में पुलिस आई थी


इधर कुछ दिनों से..
डरावनी हो गईं है मेरी सुबहें...
कल सपने में आई थी पुलिस...
कल सपने में अचानक बज उठा सायरन,
और मैंने देखा सुबह मेरे घर पुलिस आई थी
मुझे ठीक तरह से याद नहीं
कितनी ज़मानत देकर छूटा था मैं सपने में...


वो बरसों पुराना लिफाफा था कोई,
जिन्हें कभी पहुंचना नहीं था मेरे पास
एक डाकिया आया था कल रात सपने में
सपने में ही आते हैं ख़त आजकल...


कल सपने मे मुझे डांटने का मन हुआ
बूढ़े होते पिता को...
और मैं सुबह से सोचता रहा
मुझे मौत कब आएगी..


अचानक सपने में कोई मर रहा था प्यास से
और मैंने उसे दिखाए समंदर
जिनका रंग ख़ून की तरह लाल था...
मगर फिर भी वो प्यास बुझाकर खुश था...


हां, एक सपना भूख की शक्ल का भी था
जब तुमने इत्मीनान से पकाई थी खिचड़ी
और आधा ही खाकर आ गई मुझे नींद...
मैं भूख से इतना खुश पहले कभी नहीं हुआ,


मैं सच कहता हूं, एकदम सच...
मुझे रात भर नींद नहीं आती आजकल
मगर सपने आते हैं बेहिसाब
सपनों में रोज़ आती है पुलिस
रोज़ आते हैं पिता
और रोज़ आती है प्यास
जिसका रंग लाल है...


वो दफ्तर जहां मेरे पिता जाते हैं हर साल
ये साबित करने कि वो ज़िंदा हैं..
सुना किसी अफसर से लड़ गया था कोई आम आदमी
तब से हर किसी की तलाशी लेता है बेचारा गार्ड


यहां कवियों की भी तलाशी ली जाती है
और इसी बात पर मन करता है
कि अगर नहीं छूटती मुल्क से गुलामी
तो क्यों ने छोड़ दिया जाए मुल्क ही
और उड़ कर भाग जाएं सिंगापुर...
जब जेब में हों इत्ते भर पैसे...
कि भागकर लौटा न जा सके...   |

4 ... सच भी सुनिए कभी...
 इस शहर की सब आबोहवा,
धूल-मिट्टी और ख़ून के रंग का पसीना
सब आपकी देन है, सब कुछ....

हमें कोई ऐतराज़ नहीं इस बात पर
कि बच्चों के स्कूल में आप ही आए
हर बार सम्मानित अतिथि बनकर..
मासूम तालियों के सब तिलिस्म आपके...
और हमारे लिए सब सूनापन,
अथाह शोर और घमासान के बीच...

हमें तेल की पहचान तो है,
मगर मालिश करने का तरीका नहीं मालूम
इसीलिए फिसल जाता है नसीब...

लोकतंत्र किसी बंदूक की नली पर जमी धूल की तरह है...
हमारे रहनुमाओं की कोठियों के आगे बड़े-बड़े दरवाज़े
लोहे की मज़बूत दीवारें ऊंची-ऊंची..
जैसे सबसे ज़्यादा डर आम आदमी से हो....
कभी जाइए उन्हें देखने की हसरत लिए
हाथ में पिस्तौल लेकर संतरी करेंगे स्वागत

घर-गली के तमाम चेहरे...
अख़बार वाले का नाम और गांव का पिन कोड
भूल जाना सब कुछ
नियम है शहर का..
जिन पेड़ों को आपने रोपे हैं अपने गमले में
वो सिर्फ छुईमुई हैं अफसोस...
जो पेड़ बच गए हैं शहर की सांस के वास्ते...
उनके नाम तक नहीं पता किसी को...
और सुनिए, जब आपको नागरिक सम्मान देने के लिए
पुकारा गया था नाम ज़ोर-ज़ोर से...
तब आप भी टीवी देखने में व्यस्त थे
और ये ख़बर आई थी कि...
छह महीने भूख और दुख से बेहाल...
एक कमरे में मर गईं दो अकेली बहनें

सच कहिए वो आपका मोहल्ला नहीं था?


5 ...  इस कविता में प्रेमिका भी आनी थी

वहां हम छोड़ आए थे चिकनी परतें गालों की
वहीं कहीं ड्रेसिंग टेबल के आसपास
एक कंघी, एक ठुड्डी, एक मां...
गौर से ढूंढने पर मिल भी सकते हैं...
एक कटोरी हुआ करती थी,
जो कभी खत्म नहीं होती....
पीछे लिखा था लाल रंग का कोई नाम...
रंग मिट गया, साबुत रही कटोरी...

कूड़ेदानों पर कभी नहीं लिखी गई कविता
जिन्होंने कई बार समेटी मेरी उतरन
ये अपराधबोध नहीं, सहज होना है...

एक डलिया जिसमें हम बटोरते थे चोरी के फूल,
अड़हुल, कनैल और चमेली भी...
दीदी गूंथती थी बिना मुंह धोए..
और पिता चढ़ाते थे मूर्तियों पर....
और हमें आंखे मूंदे खड़े होना पड़ा....
भगवान होने में कितना बचपना था...

एक छत हुआ करती थी,
जहां से दिखते थे,
हरे-उजले रंग में पुते,
चारा घोटाले वाले मकान...

जहां घाम में बालों से
दीदी निकालती थी ढील....
जूं नहीं ढील,
धूप नहीं घाम....
और सूखता था कोने में पड़ा...
अचार का बोइयाम...

एक उम्र जिसे हम छोड़ आए,
जिल्द वाली किताबों में...
मुरझाए फूल की तरह सूख चुकी होगी...
और ट्रेन में चढ़ गए लेकर दूसरी उम्र....
छोड़कर कंघी, छोड़कर ठुड्डी, छोड़कर खुशबू,
छोड़कर मां और बूढ़े होते पिता...

आगे की कविता कही नहीं जा सकती.....
वो शहर की बेचैनी में भुला दी गई
और उसका रंग भी काला है...
इस कविता में प्रेमिका भी आनी थी,
मगर पिता बूढ़े होने लगें,
तो प्रेमिकाओं को जाना होता है....

6 ...  मेरा गला घोंट दो मां

किसी धर्मग्रंथ या शोध में लिखा तो नहीं,
मगर सच है...
प्यार जितनी बार किया जाए,
चांद, तितली और प्रेमिकाओं का मुंह टेढ़ा कर देता है..
एक दर्शन हर बार बेवकूफी पर जाकर खत्म होता है...
आप पाव भर हरी सब्ज़ी खरीदते हैं
और सोचते हैं सारी दुनिया हरी है....
चार किताबें खरीदकर कूड़ा भरते हैं दिमाग में,
और बुद्धिजीवियों में गिनती चाहते हैं...
आपको आसपास तक देखने का शऊर नहीं,
और देखिए, ये कोहरे की गलती नहीं...
ये गहरी साज़िशों का युग है जनाब...
आप जिन मैकडोनाल्डों में खा रहे होते हैं....
प्रेमिकाओं के साथ चपड़-चपड़....
उसी का स्टाफ कल भागकर आया है गांव से,
उसके पिता को पुलिस ने गोली मार दी,
और मां को उठाकर ले गए..
आप हालचाल नहीं, कॉफी के दाम पूछते हैं उससे...

आप वास्तु या वर्ग के हिसाब से,
बंगले और कार बुक करते हैं...
और समझते हैं ज़िंदगी हनीमून है..
दरअसल, हम यातना शिविरों में जी रहे हैं,
जहां नियति में सिर्फ मौत लिखी है..
या थूक चाटने वाली ज़िंदगी.....
आप विचारधारा की बात करते हैं....
हमें संस्कारों और सरकारों ने ऐसे टी-प्वाइंट पर छोड़ दिया है,
कि हम शर्तिया या तो बायें खेमे की तरफ मुड़ेंगे,
या तो मजबूरी में दाएं की तरफ..
पीछे मुड़ना या सीधे चलना सबसे बड़ा अपराध है...
जब युद्ध होगा, तब सबसे सुरक्षित होंगे पागल यानी कवि...
मां, तुम मेरा गला घोंट देना
अगर प्यास से मरने लगूं
और पानी कहीं न हो...


7 ... लिपटकर रोने की सख्त मनाही है


रात में सियारों की हुंआ-हुंआ की तरह
सुनाई देती है मेट्रो की हल्की आवाज़
ठूंठ पेड़ों की तरह दिखते हैं
दूर-दूर तक वीरान मकान...
शिकार के लिए ढूंढने नहीं पड़ते शिकार
बाइज्ज़त होम डिलीवरी की भी व्यवस्था है...
और मुझे ये सच कहने पर चालान मत कीजिए
कि हम एक जंगल को शहर समझने लगे हैं....
ऐसा नहीं कि पहली बार लिखा गया हो ये सब
मगर ये हर भाषा में बार-बार बताया जाना ज़रूरी है

जैसे बार-बार बनाई जानी होती है दाढ़ी
याद किए जाने होते हैं आखिरी विलाप
छूने होते हैं पांव, बेमन से....
घर लौटना होता है नियम और शर्तों के बिना
बीमार होने पर वही कड़वी दवाईयां बार-बार
जैसे बार-बार बदलते बेटों के लिए
नहीं बदलते मां के व्रत
और सुनिए इस शहर के चरित्र के खिलाफ
आपको दुर्लभ दिखने के लिए रोना हो बार-बार...
तो ठूंठ पेड़ बचाकर रखिए दो-चार...
किसी से लिपटकर रोने की सख्त मनाही है...

इस शहर में छपने वाले अमीर अखबारों के मुताबिक
निहायती ग़रीब, गंदे और बेरोज़गार गांवों से...
वेटिंग की टिकट लेने से पहले मुसाफिरों को...
ख़रीदने होते हैं शहर के सम्मान में
अंग्रेज़ी के उपन्यास...
गोरा होने की क्रीम..
सूटकेस में तह लगे कपड़े...
और मीडियम साइज़ के जॉकी....
हालांकि लंगोट के खिलाफ नहीं है ये शहर..
और सभ्य साबित करने के लिए
अभी शुरु नहीं हुआ भीतर तक झांकने का चलन...

यहां हर दुकान में सौ रुपये की किताब मिलती है
जिसमें लिखे हैं सभ्य दिखने के सौ तरीके
जैसे सभ्य लोग सीटियां नहीं बजाते
या फिर उनके घरों में बुझ जाती हैं लाइट
दस बजते-बजते...
या जैसे मोहल्ले की पुरानी औरतें कहती हैं
अच्छे या सभ्य नहीं होते 47 वाले पंजाबी..

बात-बात पर आंदोलन के मूड में आ जाता है जो शहर...
हमारे उसी शहर में थूकने की आज़ादी है कहीं भी...
गालियां बकना नाश्ते से भी ज़रूरी है हर रोज़...
और लड़कियों के लिए यहां भी दुपट्टा डालना ज़रूरी है..
जहां न बिजली जाती है कभी और न डर।

जिनकी राजधानी होगी वो जानें..
किसी दिन तुम इस शहर आओ
और कह दो कि मुझे सफाई पसंद है..
तो पूरे होशोहवास में सच कहता हूं,
डाल आऊंगा...कूड़ेदान में सारा शहर...

8 ... मांएं डरने के लिए जीती हैं

हमारा बचपन ऐसा नहीं कि
गाया जा सके उदास रातों में...
हमारे नसीब में नहीं थे सितारे
जिन्हें तोड़कर टांक सकें स्याह रातों में
उम्र बढ़नी थी, कोई रास्ता नहीं था....
वरना उस एक मोड़ पर रोक लेते खुद को,
कि जहां से ज़िंदगी सबसे उबाऊ और मजबूर रास्ते लेती है..
पूछो अपनी मांओं से,
पूछो पिताओं से....
कि जब कोई रास्ता नहीं रहा होगा....
तो मजबूरी में करनी पड़ी होगी शादी...
और फिर शाकाहारी पत्नियां मांजती रही होंगी बर्तन,
और परोसती रही होंगी मांस अपने पतियों को...
और फिर बेटे हुए होंगे,
बंटी होंगी मिलावटी मिठाईयां..
और बेटियां होने पर सास ने बकी होगी गालियां...
पत्नियां खून का घूंट पीकर रह जाती होंगी...
और पति चश्मा इधर-उधर करते हुए...
पतिव्रता पत्नियां फ़रेब के किस्सों से ज़्यादा कुछ भी नहीं...
बड़े होते बेटों से रहती होगी उम्मीद,
कि उनकी एक हुंकार से सिहर उठेगी दुनिया,
जबकि असल में वो इतना डरपोक थे कि
कूकर की सीटी से भी लगता रहा डर,
कहीं फट न पड़े टाइम बम की तरह...
दीवार पर छिपकली आने भर से..
मूत देते थे सुकुमार लाडले...
और समझिए ऐसे दोगले समय में,
गूंथी हुई चोटियां हथेली में लेकर,
कैसे किया होगा हमने प्यार...
और समझो कितनी सारी हिम्मत जुटानी पड़ी होगी,
ये कहने के लिए, बिन पिए...
कि तुम्हारी नंगी पीठ पर एक बार फिराकर उंगलियां....
लिखना चाहता हूं अपना नाम 

हालांकि एक मर्द है मेरे भीतर,                                                              
जो कर सकता है हर किसी से नफरत..
गुस्से में मां को भी माफ नहीं करता
हालांकि ये भी सच है कि...
मांएं डरने के लिए ही जीती हैं,
पहले मजबूर पिताओं से
फिर मर्द होते बेटों से....





परिचय--

निखिल आनंद गिरि  

समस्तीपुर , बिहार के रहने वाले , 
इस समय नयी दिल्ली में रहते हैं ,  
पत्रकारिता में कैरियर, 
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ - कहानियाँ प्रकाशित |
मो.न. - 09711074170
http://bura-bhala.blogspot.in/  नाम का ब्लाग भी संचालित करते हैं 


7 टिप्‍पणियां:

  1. निखिल जी को साधुवाद! कविताएं मन को मोहती नहीं, सचाई है। लेकिन आपके शब्द-दर-शब्द, वाक्य-दर-वाक्य मन को मथते हैं भीतर तक। सचाई में ताकत ही कुछ ऐसी होती है।

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  2. निखिल आनंद गिरि4:37 pm, सितंबर 25, 2012

    रामजी,

    आपकी टिप्पणी अच्छी लगी..हम नेट के कवि होकर रह गए तब भी इसे अफसोस की तरह मत देखिए...नेट पर जोड़-जुगाड़-पुरस्कार के तिकड़म अभी कम हैं..हिंदी में जितनी किताबें छपती हैं, उनके पाठकों की संख्या मिला भी दी जाए तो नेट के पाठकों के आगे कम पड़ेंगी..
    हालांकि, मैं पत्रिकाओं में भी अपना लिखा भेजता हूं, और बिना किसी 'सोर्स' के एकाध जगह छपा भी हूं..आगे भी कोशिश करता रहूंगा..वैसे ज़्यादा ज़रूरी है कि लिखने पर ध्यान दूं...

    धन्यवाद..

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  3. निखिल जी आपकी कविताएं बहुत अ्चछी लगी । मेरी मुबारकबाद कबूल करें।

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  4. Best of luck for Nikhil Bhai's Future.thanks to Sitaab Diyara

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  5. Nikhil ko padhna sukoon deta hai, ye kavitayen bhi achhi hain

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