रविवार, 16 सितंबर 2012

'तभी तो एक दिन सब ठीक होगा साथी' - उमाशंकर चौधरी

                                                                उमाशंकर चौधरी

उमाशंकर चौधरी युवा पीढ़ी के उन रचनाकारों में से  हैं , जिन्होंने कविता और कहानी दोनों ही विधाओं में समान रूप से ख्याति अर्जित की है और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है | उनकी कहानियां और कविताएँ इस दौर के चमकते भारत और उसके पीछे घिसटते भारत के बीच की खाई को जिस संजीदगी से उजागर और बेपर्दा करती हैं , वह देखने लायक है  | सरल सामान्य भाषा और शिल्प के सहारे अपने समय के इस जटिल यथार्थ को भेदने वाली उमाशंकर चौधरी की यह दृष्टि एक तरफ समकालीनों के बीच उनकी अलग पहचान को स्थापित करती है , वहीँ दूसरी ओर साहित्यिक समय के स्केल पर हमारे दौर को चमकदार भी बनाती है | 'सिताब-दियारा' ब्लाग यह उम्मीद करता है , कि उनका यह प्रतिबद्ध लेखन आगे और ऊँचाई को प्राप्त करेगा | उन्हें हमारी हार्दिक शुभकामनाएं |

                           तो प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर उमाशंकर चौधरी की तीन कविताएँ 



1 ...    राहुल गांधी की बंडी की जेब


राहुल गांधी की बंडी की जेब को देखकर
अक्सर सोचता हूं कि क्या इसमें भी होती होंगी
स्टेट बैंक का एटीएम कार्ड
दिल्ली मेट्रो का स्मार्ट कार्ड या फिर
दिल्ली से गाजियाबाद या फिर फरीदाबाद जाने वाली
लोकल ट्रेन का मासिक पास- एमएसटी
क्या राहुल गांधी भी घर से निकलते हुए सोचते होंगे कि
आज नहीं हैं जेब में छुट्टे पैसे और आज फिर ब्लू लाइन बस पर
पांच रुपये की टिकट के लिए करनी होगी
हील हुज्जत
क्या राहुल गांधी की जेब में भी होती होगी
महीने के राशन की लिस्ट

कितना अजीब लग सकता है जब
राहुल गांधी रुकवा दें किसी परचून की दुकान पर अपनी गाड़ी
और खरीदने लगें मसूर की दाल
एक किलो चना, धनिया का पाउडर, हल्दी
और गुजारिश कर दें दुकानदार से कि
28 वाला चावल 26 का लगा दो
यह तो बहुत हो गया अजीब तो इतने से भी लग सकता है
जब परचून की दुकान पर पहुंचने से ठीक पहले
स्टेट बैंक के किसी एटीएम पर अपनी गाड़ी रुकवा कर राहुल गांधी
निकालने लगें दो हजार रुपये

सोचता हूं क्या राहुल गांधी भी करते होंगे जमा
डाकघर में जाकर आवर्ती जमा की मासिक किस्त
क्या उन्होंने भी पूछा होगा किसी डाकघर में कि
इस पासबुक से उनको
कितने दिनों में कितनी मिल सकती है राशि
क्या उन्होंने भी कभी सोचा होगा कि
अभी होम लोन थोड़ा सस्ता हो गया है और
इस साल द्वारका से. 23 में लेकर छोड़ दूं पचास गज ज़मीन
क्या उनके भी सपने में आता होगा उस पचास गज जमीन पर
भविष्य में बनने वाला दो कमरों का घर
और उस घर की सजावट

जो राहुल गांधी के करीब हैं वे जानते हैं
जो उनके करीब नहीं हैं वे भी जानते हैं कि
कुछ नहीं होता है राहुल गांधी की जेब में 
एकदम खाली है उनकी जेब
न ही होता है उसमें एटीएम कार्ड
न ही स्मार्ट कार्ड
न ही एमएसटी
और न ही राशन की लिस्ट
राहुल गांधी को न ही जाना पड़ा है आजतक
कभी राशन की दुकान पर
और न ही डाकघर
और न ही सस्ते लोन की तलाश में कोई बैंक
उन्होंने नहीं देखा है अभी तक किसी प्रापर्टी डीलर का दरवाजा
एकदम खाली है राहुल गांधी की बंडी की जेब

कितना अजीब लगता है कि
एकदम खाली है राहुल गांधी की बंडी की जेब
उसमें नहीं है भविष्य की आशंका
उसमें नहीं है वर्तमान को जीने और
भविष्य को सुरक्षित रख ले जाने की कोई तरकीब
लेकिन राहुल गांधी खुश हैं
और राहुल गांधी ही क्यों ऐसे बहुत से लोग हैं
जिनकी जेबों में नहीं है कुछ और वे खुश हैं
यह विरोधभास बहुत अजीब है कि जेबें खाली हैं और लोग खुश हैं

लेकिन किसी भ्रम में न पड़ जाएँ  
यह विरोधभास सिर्फ चंद लोगों के लिए है वरना
खाली जेबों वाले लोग तो
पटपटा कर मर रहे हैं 

          
 2 ...   प्रधानमंत्री लेते हैं निर्णय और हम डर जाते हैं


जब वे कहते हैं कि विकास प्रक्रिया धीमी पड़ चुकी है
और कम हो चुके हैं देश में पैसे
तब मैं जब तक में उनकी बातों को पतिआउं
उससे पहले भागता हूं
अपनी बेटी की गुल्लक को झकझोऱ कर देखने
कि आखिर आज कितने रुपये निकाल लिए इस बहुरूपिये ने उस गुल्लक से
और मैं ही क्या आप-वह, ये, वो
सुदूर जंगल में बैठा घटाटोप हस्तसाल भी टटोलने लगता है अपना बटुआ
अपनी जेबें और अपने सपने
मेरी मां धोरखा पर डिबरी के नीचे रखे पैसों की देखती है सलामती

हमारे देश का मुखिया चिंता करता है
गिरती विकास दर की
और हम सपना देखना छोड़ देते हैं
मैदान की तरफ खेलने जाते बच्चों के हाथ को पकड़कर
उन्हें लौटाकर हम कर लेते हैं घर में कैद
अपने खपरैल के छप्पर पर बैठी चिड़िया को
उड़ा देते हैं कर्कश आवाज के साथ
मिट्टी से उठने वाली खुशबू पर बुरक देते हैं
चूल्हे की राख
हम चिंतित होते हैं, खीजते हैं और बैठ जाते हैं मौन


वह आदमी जो इस पैंतालिस डिग्री की चिलचिलाती धूप में
खींच रहा है रिक्शा
सुनकर यह खबर अचानक से लगाता है ब्रेक
और घिस्स की आवाज के साथ
रगड़ खाकर रुक जाता है वहीं उसका रिक्शा
दौनी करते किसान की मशीन में फसल डालते हाथ
थर-थर कांपने लगते हैं
और अचानक से कम हो जाती है
फसल से निकलने वाले अन्न के दानों की मात्रा
किसान दौड़ता है खेत की तरफ
देखता है जो बीज उसने बोये थे सब बांझ हो गए
नहीं फूटा एक भी दाना

खेत के बीज मर जाते हैं
गायें बिसक जाती हैं
कुत्ता रोने लगता है
हम बस एकटक देखते रह जाते हैं

सरकार लेती है निर्णय
और हम कांप जाते हैं
सरकार का मुस्कराता चेहरा हमें डराता है

प्रधानमंत्री देश में कम हो रहे पैसों की चिंता कर रहे हैं
एक लोकतंत्र में इससे अच्छी खबर और क्या हो सकती थी
क्या हो सकती थी इससे अच्छी खबर
कि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाये
और भूख पर काबू पा लिया जाए
क्या हो सकती है इससे अच्छी खबर
कि प्रधानमंत्री कहें कि हमने अभी हार नहीं मानी है
हम अपनी योजनाओं की अभी समीक्षा करेंगे
और ढेर सारे पैसे जमीन से उगा देंगे

परन्तु इस देश में अब
सच एक फैंटेसी की तरह है
और इस देश का हर एक आदमी
जिसके पेट में भले ही न हो अन्न का एक दाना
बूझ गया है भेदना इस फैंटेसी को बहुत ही तथ्यपरक होकर

सरकार लेती है निर्णय
प्रधानमंत्री देते हैं खबर
सच बदलता है फैंटेसी में
देश का हर अदना सा आदमी
स्तब्ध होकर सुनता है इस फैंटेसी को
और डीकोड कर लेता है इसको
आम आदमी डीकोड करता है इस फैंटेसी को
और भागने लगता है
भागने लगता है अपनी जिन्दगी से
अपनी खुशियों से
और सबसे ज्यादा अपने सपनों से

प्रधानमंत्री कहते हैं कि कम हो गए हैं पैसे
तब हम-आप सचेत हो जाते हैं और सहेजने लगते हैं
अपनी-अपनी जेबों, मोखे-दरवाजों
लदिया, कोठी में रखी चवन्नी-अठन्नी
क्योंकि यह हम सब जानते हैं कि
जिनके पास कम हो गई हैं पैसों के अथाह सागर में से
एक-दो बूंदें
उनका घर प्रधानमंत्री इन्हीं चवन्नी-अठन्नी से ही तो भरेंगे

यही कारण है कि देश में कम हो गए पैसे
इस वाक्य को अब सच के रूप में नहीं
एक छल-प्रपंच के रूप में ही समझा जा सकता है

इसलिए प्रधानमंत्री लेते हैं निर्णय
तब हम कांप जाते हैं
क्योंकि हम जान गए हैं कि प्रधानमंत्री जो लेते हैं निर्णय
उसमें हम नहीं होते हैं
हम कहीं नहीं होते हैं।



3...  तभी तो एक दिन सब ठीक होगा साथी


मन करता है कि इस सरकार के रहते कोई कविता नहीं लिखूं
न ही लिखूं कोई शब्द
न लिखूं कोई सच
न कोई नग्न यथार्थ
न कोई ख्वाब या फिर न कोई अर्जी
न लिखूं यह कि उस मां के आंसू में कितना है नमक
जिसने महज उनतालीस रुपये में बेच दी अपनी बेटी
न ही लिखूं यह सच कि अभी कितनी ही माएं हैं कतार में
न ही लिखूं उस मां की व्यथा
जिसके सीने से चू रही हैं दूध की बूंदें
और उसका छः महीने का बच्चा गोद में बेहोश
मांग रहा है लालबत्ती पर भीख

क्यों लिखूं, क्यों लिखूं, क्यों लिखूं
कौन सुनता है मेरी बात, कौन जानना चाहता है यह सच
कि कैसे गायब होती ही चली जा रही है जेबों में सिक्कों की खनक
क्यों लिखूं कि कैसे हमने गाड़ दिये हैं अपने सपने
जमीन के नीचे, बहुत नीचे।

मैं कविता लिखता हूं
और सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता
सरकार मनमौजी हो गई है
सरकार कहती है पांच साल बाद भी कुछ नहीं बदलेगा
तुम किसके खिलाफ लिखोगे
तुम किसको कहोगे अच्छा
किसी एक का पक्ष लने के लिए होगे तुम मजबूर
कुछ फर्क नहीं पड़ता कि कौन है कुर्सी पर और कौन है बाहर
कौन सुनता है तुम्हारी आवाज
इस चुंधियाये समाज में किसके पास है इतनी फुरसत
कौन चाहता है अपने मस्तिष्क की नसों को तड़काना
क्यों बर्बाद करना चाहते हो तुम अपना वक्त

सरकार का नुमाइंदा आता है और कहता है
क्यों नाराज हो तुम
क्यों चाहते हो तुम कि सब हो जाएं दुखी
कुछ खुशी के गीत लिखो
लिखना ही है तो हमारी तरक्की पर लिखो
हमारी चमक पर लिखो
सफल हो रही हमारी योजनाओं पर लिखो
लिखना ही है तो उन मुस्कराते चेहरों की इबारत लिखो
ठहाके का अट्ठहास लिखो
लिखना ही है तो बड़े-बड़े माल्स के भीतर की सरगर्मी को लिखो
इस अंधी दौड़ में छूट गए हैं जो पीछे
क्यों लिखना चाहते हो तुम उनका पछतावा
उनकी पराजय, उनकी उदासी
क्यों चाहते हो तुम लिखना उनके काले पड़ चुके चेहरे का रंग
लिखना ही है तो तुम कविता को बांसुरी के मधुर संगीत की तरह लिखो
तुम क्यों लिखना चाहते हो अपनी कविता को
क्रांति की तरह

मन बहुत दुखी है
भीतर बहुत गुस्सा भर गया है
टेलीविजन पर देखता हूं कि रात की जिस पार्टी में
जो एक राजनीतिक दल सरकार के साथ जश्न मना रहा था
वही कल सड़क पर मंहगाई के खिलाफ धरना दे रहा है
सच क्या है अब इसको समझना इतना आसान नहीं है
सच यह धरना नहीं है
सच यह भी नहीं है कि मंहगाई को बेइंतहा बढाकर
उसे थोड़ा कम करने से मंहगाई कम हो जाती है
सच कुछ भी नहीं है
सच कहीं भी नहीं है
अब सिर्फ षडयंत्र है
यहां है षड्यंत्र, वहां है षड्यंत्र
हम मोबाइल पर बात करते हैं यह भी एक षड्यंत्र है
फेसबुक पर आभासी दुनिया का समाज एक षड्यंत्र है

मैं जाता हूं मोबाइल की दुकान पर और दुकानदार कहता है
दस के रिचार्ज में पंद्रह मिलेंगे
अगर साठ का ऊपर से डलवा दें तो पूरी रात रंगीन बातें मुफ्त
आप चाहते हैं एसएमएस से अपनी प्रेमिका को दुलार करना
तो बस आपको डालना होगा अपने मोबाइल में
पैंतीस रुपये का एक और कूपन
और अगर बनना चाहते हैं आप नया ग्राहक
तो उसका कोई चार्ज नहीं
उलटे हम आयेंगे आपके घर लेकर सौगात

बगल का आदमी कहता है
इस सरकार ने कितना आसान कर दिया है जीवन
आप साठ रुपये के एक कूपन से घुसे रह सकते हैं
पूरी रात अपनी प्रेमिका के बिस्तर में
जीवन में कभी इतनी मस्ती भी होगी हमने सोचा नहीं था
जीवन के बारे में ज्यादा सोचकर क्या करना
जो मर रहा है मर जाने दो
जो बिलख रहा है, बिलखने दो
दुख क्या है उसका कोई रंग नहीं होता है
न ही होता है उसका कोई स्वरूप
दुख का क्या है उसका क्या कभी अंत हुआ है

मैं भागता हूं और सोचता हूं
क्यों लिखूं, क्यों लिखूं, क्यों लिखूं
कौन सुनता है मेरी बात, कौन जानना चाहता है सच

लेकिन फिर सोचता हूं
क्या इतना सब कुछ होने के बाद भी
छोड़ दिया गंगाराम ने बैलों के पीछे दौड़ना
क्या छोड़ दिया उसने पानी की बूंदों के लिए आसमान की ओर ताकना
क्या बन्द हो गई रिक्शे के पहिये से निकलने वाली
रुनझुन की आवाज
या बन्द हो गई बैलों के गले में बजने वाली घण्टी की टुन-टुन
क्या बब्बोई हसदा ने छोड़ दिया ताड़ के पेड़ों से ताड़ी उतारना
क्या छोड़ दिया अलना हस्तसाल और फलना मुर्मू ने
नारियल की रस्सी बनाना

जब कुछ नहीं रुका, कुछ नहीं थमा
तब निश्चय है कि एक दिन सब अच्छा भी होगा
मैं कविता लिखूं-न-लिखूं कोई फर्क नहीं पड़ता
कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन सी सरकार हो गई है कितनी मनमौजी
कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस सरकार के निर्णय हो गए हैं कितने उच्छृंखल
लेकिन बैलों के गले में जब बज रही है घण्टी
तब सब ठीक होगा साथी
जब तक रिक्शे के पहिये से निकल रही है रुनझुन की आवाज
तब एक दिन सब ठीक होगा साथी
हमारी आंखों में जब ख्वाब रहेंगे तभी तो एक दिन सब ठीक होगा साथी


 परिचय



उमाशंकर चौधरी  

एक मार्च उन्नीस सौ अठहत्तर को खगड़िया बिहार में जन्म।
कविता और कहानी लेखन में समान रूप से सक्रिय।
पहला कविता संग्रह कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे’(2009) भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित।
इसी कविता संग्रह पर साहित्य अकादमी का पहला युवा सम्मान (2011)
इसके अतिरिक्त कविता के लिए अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार’ (2007) |
भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार’(2008)
कहानी के लिए रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’(2008)
पहला कहानी संग्रह अयोध्या बाबू सनक गए हैं(2011) भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित।
पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित श्रेष्ठ हिन्दी कहानियां(2000-2010) में कहानी संकलित। हापर्स कालिन्स की हिन्दी की कालजयी कहानियांसीरिज में कहानी संकलित।
कहानी अयोध्या बाबू सनक गए हैंपर प्रसिद्ध रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर द्वारा एनएसडी सहित देश की विभिन्न जगहों पर पच्चीस से अधिक नाट्य प्रस्तुति।
कुछ कहानियों और कविताओं का मराठी, बंग्ला, पंजाबी और उर्दू में अनुवाद।
पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस द्वारा पुस्तक श्रेष्ठ हिन्दी कहानियां(1990-2000) का संपादन।
इनके अलावा आलोचना की दो किताबें प्रकाशित।
आधार प्रकाशन पंचकूला से आलोचना की दो पुस्तकें- ‘विमर्श में कबीर’ और दलित विमर्शः ‘कुछ मुद्दे कुछ सवाल’ प्रकाशित।
अनामिका पब्लिशर्स दिल्ली से दलित विमर्श से सम्बन्धित दो सम्पादित पुस्तकें प्रकाशित- ‘हाशिये की वैचारिकी’ और हिस्सेदारी के प्रश्न-प्रतिप्रश्न।

संपर्कः- - उमाशंकर चौधरी
द्वारा - ज्योति चावला, स्कूल आफ ट्रांसलेशन
15 सी, न्यू एकेडमिक बिल्डिंग,
इग्नू, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-110068 मो.- 9810229111
umshankarchd@gmail.com                      


4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत संतोषी नेता हैं राहुल जी |सिर्फ दलितों के घर खाकर ही देश की किस्मत बदल देंगे , सोचते हैं |द्वापर युग जो है ...हा.हा.हा. | --अरविन्द कुमार

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  2. बिलकुल सही लिखा है उमा भाई ने 'यह विरोधाभास सिर्फ चंद लोगो के लिए है , वरना / खाली जेबों वाले लोग तो/ पटपटा कर मर रहे हैं. उमाशंकर जी की ये कविताएँ बेजोड़ हैं. उन्हें बधाई..सन्तोष चतुर्वेदी

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  3. उमाशंकर जी को पहले मैं कहानीकार मानता हूँ |उनकी कविताओं में डिटेल भी खूब मिलते हैं , और जों गहरा असर करते हैं |ये कविताएँ सं सामयिकता की वजह से भी ध्यान खींचती हैं |सत्ता प्रतिरोध की सीधा सीधा यह स्वर विरल है |उमाशंकर जी के लिए साधुवाद और सिताब दियारा के लिए शुभकामनाये ----- अरविन्द , वाराणसी

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  4. बहुत अच्छी कविताएँ हैं | उमा जी का यह तेवर बना रहे , हमारी कामना है | --- अजय पाण्डेय , बलिया

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