बुधवार, 26 सितंबर 2012

इस लोकतंत्र पर थूक गया -- अजय कुमार पाण्डेय


                               अजय कुमार पाण्डेय 

युवा कविता अपनी सम्मोहन वाली भाषा और टटके चमकदार बिम्बों के अलावा वहाँ भी बसती है , जहाँ बोलचाल की भाषा और देशज मुहावरे इस्तेमाल किये जाते हैं | इसमें कथ्य के सहारे भाषा और शिल्प को चुनौती दी जाती है , और इस प्रचलित धारणा का प्रतिसंसार रचा जाता है , कि सिर्फ भाषा और शिल्प के सहारे ही पाठक के मन-मस्तिष्क पर असरकारी प्रभाव पैदा किया जा सकता है | अजय कुमार पाण्डेय इस बात के लिए भी प्रशंशा  के हकदार हैं , कि वे इस धारणा को भी तोड़ते हैं , कि लिखने और छपने के बाद भी किसी कवि को अपनी कविताओं के लिए कुछ कहना और बोलना चाहिए  | 

         तो प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर युवा कवि अजय कुमार पाण्डेय की सात कविताएँ 

1... विडंबना


अगर यह सच है कि अंगुठियाँ 
बुरे दिनों से
मुक्ति देती और सँवारती हैं ,
तो फिर
हर बार वे अंगुलियाँ ही क्यों
हथौड़ी और निहाई की
सम्मिलित शरारत का शिकार होती हैं ?
जो उन्हें आकार देती हैं |
              


2... राजनीति में युवाओं की भागीदारी


उन्हें लोकतंत्र की
मजबूती की चिंता है ,
इसके लिए राजनीति में
युवाओं की दरकार है
और
चुनाव के मद्देनजर
‘एक बूथ – चार यूथ’ की तैयारी है |
राजनीति में युवाओं की
बस इतनी – सी भागीदारी है |


3...  लोकतंत्र पर थूक गया


जिस पर कई संगीन मामलों के इल्जाम थे
चर्चा सरेआम थी , रखे गए इनाम थे , 
पुलिस के खौफ से सालों भागता रहा ,
पुलिस हांफती रही ,
चुनाव की घोषणा हुई –
समर्पण किया ,जेल गया ,
चुनाव लड़ा और जीत गया ---
इस लोकतंत्र पर वह थूक गया |



4 ... बच्चे का खेल


बच्चा शरारती हो गया है
माँ उसे शैतान कहती है
उसका कहा नहीं मानता
वह उसके करीने से रखे सामानों को
बेतरतीब करता है ,फेंकता है |
पीने के पानी में हाथ डुबोता है
अपनी चप्पलें उसमें भिगोता है
न जाने और कितनी शरारतें करता है |
माँ झल्लाती है / समझाती है
अच्छे बच्चे ऐसा नहीं करते
तंग आकर डाँटती है / मारती है
बच्चा रोता है और लोर बहाता है ...फिर
फिर दोनों बाहों को
चूजों के डैनों सा फैलाकर
चिल्लाता है , माँ को बुलाता है
पर बात नहीं मानता ,
माँ उसे गोद में लेकर
उसकी आँखों का लोर पोछती है
उसके गालों पर उग आये
अपनी उँगलियों के निशान को
बेबस – सी निहारती है
अपने गुस्से और झल्लाहट पर
मन ही मन पछताती है
माँ और बच्चे के बीच
यह सदियों से जारी है
बच्चा बार-बार वही खेल खेलता है
और माँ के थपेड़ों में
मुलायमियत को तौलता है |




5 ... नक्शा बेचने वाला लड़का


मेरे कचहरी परिसर में एक लड़का
भारत का नक्शा बेचता है |
कोई बुलाकर उससे दाम पूछता है
और नक्शा खरीदता है
कोई सिर्फ दाम पूछता है
और दाम सुनकर अनमना-सा
दूसरी तरफ देखता है |
लड़का बिन कुछ कहे आगे की राह लेता है ,
वह रोज-रोज के मोलभाव करने और
नक्शा लेने या न लेने की 
लोगों की मंशा से पूरी तरफ वाकिफ है
क्योंकि ,लोगों के मनोभावों को
समझने के लिए
उनके मुँह की मुद्राएँ ही 
उसके लिए काफी हैं
खैर,
कोई नक्शा खरीदे या न खरीदे
मेरा भला क्या वास्ता !
मेरा तो अंतर्मन सिर्फ आपसे
इतना भर पूछने को कहता है –
भारत के नक़्शे में
कश्मीर से कन्याकुमारी के बीच
वह लड़का कहाँ रहता है ?



6 ... बड़ा होना


तेज रफ़्तार से चल रही गाड़ी के डिब्बे में
एक बच्चा सबकी निगाहों में बसा है
और सबका खिलौना बना है |
उसके माँ की चौकस निगाहें
उसकी कर रही हैं चौकीदारी
और वह उसे चुपचाप बैठने को
कर रही है हिदायत
लेकिन वह बेपरवाह – सा
अपने नन्हें पैरों पर ठुमक-ठुमक कर
एक के यहाँ से दूसरे के यहाँ तक जा रहा है
और यात्रियों की उम्र के लिहाज से
उनके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ रहा है |
यात्रियों में बैठे एक दाढ़ी वाले को दादा
और एक चोटी वाले को नाना कह रहा है |
बच्चा दाढ़ी और चोटी के बीच के
भेद को नहीं जानता
इसके लिए उसका बड़ा होना जरुरी है |



7 ...  अच्छी औरतें


अच्छी औरतें कम बोलती हैं
अपना मुँह भरसक नहीं खोलती हैं |
अच्छी औरतें खिड़की पर खड़ी नहीं होतीं ,
घर की मर्यादा होती हैं |
अच्छी औरतें छत पर नहीं जाती हैं ,
कम और गम खाती हैं |
अच्छी औरतें दूसरों से हँस-हँस
बातें नहीं करतीं |
अच्छी औरतें किसी का जबाब नहीं देतीं ,
कोई सवाल नहीं करतीं |
अच्छी औरतें आईने के सामने
खड़ी हो मुस्कुराती नहीं ,
न ही एकांत में बैठी गुनगुनाती हैं |
अच्छी औरतें शालीन कपडे पहनती हैं ,
राह चलते आँचल को
हवा से बचाए चलती हैं |
पति के पद-चिन्हों पर पाँव रखती हैं |
अच्छी औरतें अकेली कहीं नहीं जाती हैं ,
पति के बाद खाती हैं |
अच्छी औरतें हर मामले में
अनुशासित होती हैं
यानि आदमी होने की
शर्तों से निर्वासित होती हैं |



परिचय 
                                                                       
अजय कुमार पाण्डेय 

पेशे से अधिवक्ता 
दीवानी कचहरी , बलिया 
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख और कविताएँ प्रकाशित 
जन - संगठनों में सक्रिय भागीदारी 



8 टिप्‍पणियां:

  1. Pandey ji ki behtreen Rachnao se parichay karane ke liye aabhar ............
    sabhi rachaye bahut umda

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  2. पाण्डेय जी की छोटी कविताएं वाकई बहुत धारदार हैं. यह एक सवाल तो है ही कि भारत महान के इस नक़्शे में एक आम आदमी की जगह कहाँ बची है. अच्छी औरतें भी एक बेहतर कविता है. अगर मनुष्यता से निर्वासित होना ही अच्छी होने की निशानी है तो इस अच्छेपन का क्या मतलब? अजय पांडे की कविताएं पढ़ाने के लिए आपका आभार

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  3. विसंगतियों पर गहरी चोट करती हैं ये कवितायें ...अजय जी को बधाई और सिताब दियारा का आभार ....केशव तिवारी

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  4. कविताएँ बेहद पसंद आई ...हमेशा की तरह अजय पाण्डेय जी इस बार भी प्रभावी हैं ....अरविन्द

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  5. अजय जी की कवितायें पहले भी पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी हैं. आपने ठीक ही टिप्पणी की है कि ये भी गौर से सुने जाने वाले स्वर हैं, जिनके पास चमकदार भाषा और चमत्कारी बिम्ब नहीं किन्तु कहने के लिए बहुत ज़रूरी बातें हैं और उन्हें सहजता से पूरी तल्खी के साथ कह देने का हुनर. शुरूआती कवितायें तीखा व्यंग्य करती हैं, बस मुझे लगा कि वे और लिरिकल होकर थोड़ा और मारक हो सकती थीं...

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  6. निःसंदेह अच्छी कवितायेँ हैं......बधाई.

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  7. क्या बात हे मजा आ गया

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