बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

होलोकास्ट और सिनेमा - रामजी तिवारी


"होलोकास्ट और सिनेमा" को लेकर इधर बीच एक पत्रिका के कुछ लिखा था | सोचा कि इसे सिताब दियारा ब्लॉग के पाठकों के साथ भी सांझा करता चलूँ | 
                                                     रामजी तिवारी                           

                        "होलोकास्ट और सिनेमा"



नाजी आत्याचारों की कहानी दुनिया भर में मनुष्यता के ऊपर एक धब्बे के रूप में विदित है | घृणा और नफरत की एक ऐसी कहानी, जिसने मानव जाति को हमेशा-हमेशा के लिए शर्मसार कर दिया | कहते हैं कि इस नरसंहार में लगभग 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया गया | हिटलर के नेतृत्व में जर्मन राष्ट्रवाद अपने हिंसक रूप में सामने आया | उसने अपने हर एक विरोधी को देश का दुश्मन, जर्मनी की राह में बाधा और इस नाते रास्ते से हटाने योग्य करार दिया | जर्मन लोगों के मन में यह बात बिठा दी गयी कि उनकी प्रगति में सबसे बड़ी बाधा यहूदी लोग ही हैं | यदि जर्मनी को उन्नति के रास्ते पर आगे बढ़ना है तो इस दुनिया से यहूदियों का समूल अंत होना जरुरी है | फिर विश्व युद्ध में जैसे-जैसे जर्मनी का शिकंजा यूरोप की गर्दन पर कसता गया, यहूदी जनता के नरसंहार का सिलसिला भी बढ़ता गया | एक बहुत सुनियोजित तरीके से यह प्रयास किया गया कि दुनिया से यहूदी लोगों का खात्मा कर दिया जाए | नाजी जर्मनी द्वारा यहूदी जनता के इसी नरसंहार को ‘होलाकास्ट’ के रूप में जाना जाता है |

मनुष्यता के ऊपर कहर बनकर बरपी इस त्रासदी को दुनिया भर में याद किया जाता है | अभिव्यक्ति की लगभग सभी विधाओं में इस नरसंहार पर काम हुआ है, इसकी निंदा हुई है | मसलन यदि हम सिनेमा के माध्यम को ही देखते हैं, तब भी हमारे सामने सैकड़ों फ़िल्में तैर जाती हैं, जिसमें होलोकास्ट को चित्रित किया गया है | खासकर यूरोप में तो शायद ही कोई ऐसी फ़िल्मी धारा होगी, जिसने इस विषय पर हाथ नहीं आजमाया हो । और हॉलीवुड में तो इसकी भरमार है ही । ऐसे में एक सामान्य दर्शक के मन में यह सवाल जरुर उठता है कि इस विषय को सिनेमा के माध्यम से समझने के लिए हमें किन फिल्मों का सहारा लेना चाहिए | जाहिर है कि यह चयन बहुत कठिन है | मगर फिर भी इतनी सारी फिल्मों के बीच से कुछ फ़िल्में जरूर ऐसी चिन्हित की जा सकती हैं, जिन्हें देखने की सलाह हर फ़िल्म समीक्षक देता है । मसलन यदि पांच फिल्मों को चुनने की बात हो तो मैं निम्न फिल्मों का जिक्र करना चाहूँगा |
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1 – शिंडलर्स लिस्ट ..... (निर्देशक – स्टीफन स्पीलबर्ग)



नाजी अत्याचारों (होलोकास्ट) पर बनी 'शिंडलर्स लिस्ट' एक ऐसी फ़िल्म है,  जो कई दफा देखने के बावजूद हर दफ़ा हमें देखने के लिए प्रेरित करती है | जिसे देखते हुए हम भीतर से बेचैन हो उठते हैं । यह विश्व सिनेमा में बनी ऐसी बहुत सारी फिल्मों की अग्रणी धावक है, जिसे हम पापकार्न खाते हुए नहीं देख सकते । इसे देखते हुए एक सवाल मन में जरूर आता है कि जब कोई दर्शक इस फ़िल्म को देखते हुए इतना व्यथित और दुखी हो जाता है तो उन लोगों का मन और दिल आखिर किस तरह से निर्मित हुआ होगा, जिन्होंने इन अत्याचारों को संपादित किया ? उनका दिमाग किस तरह से विकसित हुआ होगा, जिन्होंने लाखो-लाख लोगों को मौत के घाट उतारा ? इतनी क्रूरताएं उनके भीतर आखिर किस तरह से पैदा हुयी होंगी..... ?

यह एक बड़े फलक की फिल्म है, जिसमें कई कहानियां एक साथ गुथी हुई हैं | मगर मुख्य कहानी एक जर्मन व्यापारी आस्कर शिंडलर के इर्द-गिर्द घूमती है | वह बर्तन (एनामल) बनाने कारखाना चलाता है | जब यहूदी लोगों को डेथ कैम्प में मारने के लिए ले जाया जाता है तो सबसे पहले उन लोगों की छटनी की जाती है, जो स्वस्थ होते हैं, जो अभी काम लायक होते हैं | इन स्वस्थ लोगों को ऐसे कारखानों में मजदूर के रूप में बेचा जाता है | जब तक वे काम करने के लायक होते हैं, उन्हें इन कारखानों में जीवन दान मिला रहता है | और जब वे अशक्त या बीमार होने लगते हैं तो उन्हें वापस डेथ कैम्प में भेज दिया जाता है, जहाँ मृत्यु उनका इन्तजार कर रही होती है |

आस्कर शिंडलर एक संवेदनशील आदमी रहता है | वह धीरे-धीरे अपने कारखाने में काम करने वाले यहूदियों से प्यार करने लगता है | उसकी कोशिश होती है उसका कोई भी आदमी डेथ कैम्प में वापस नहीं जाए | यहाँ तक कि वह डेथ कैम्प से ऐसे यहूदियों को भी मजदूर के रूप में खरीदता है, जिनकी उसे जरुरत नहीं होती | यहूदी मजदूरों की उसकी सूची लम्बी होती जाती है | बदले में वह अधिकारियों को घूस देता है | यह कहकर कि ये लोग अभी काम लायक है | बेशक कि इस प्रयास में वह दिवालिया हो जाता है लेकिन उसकी सूची के यहूदी लोग जिन्दा बच रहते हैं | इस बीच विश्व युद्ध में जर्मनी की हार हो जाती है | आस्कर शिंडलर अपने कारखाने से विदा लेता है | वहां के मजदूर यहूदी लोग उसे अश्रु पूरित विदाई देते हैं | वह बहुत मार्मिक दृश्य है जिसमें विदा होता हुआ शिंडलर अफ़सोस करता है कि यदि उसके पास कुछ और पैसे होते तो वह कुछ और लोगों की जान बचा सकता था | एक यहूदी मजदूर आगे बढ़कर शिंडलर को थामता है | एक हिब्रू की कहावत के साथ कि “जिसने एक व्यक्ति की जान बचाई, उसने पूरी दुनिया की जान बचाई |”

यह फ़िल्म बताती है कि नफरत के बीज़ से यदि पागलपन की यह क्रूर दास्तान लिखी जा सकती है तो उस नफरत और पागलपन की आंधी में भी प्यार और मानवीयता के कुछ पौधे अवश्य बचे रह जाते हैं । इस फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता भी यही है कि इतनी क्रूरता और अमानवीयता को फिल्माने के बाद भी यह दर्शको को थोड़ा और मानवीय, थोडा और संवेदनशील बनाती है । यह हिंसा का उत्सवीकरण नहीं करती, वरन उसके विपरीत हिंसात्मक दौर में भी मनुष्य का विवेकीकरण करती है । 

2 – लाइफ इज ब्यूटीफुल ... (निर्देशक – राबर्तो बेंजिनी)



'शिंडलर्स लिस्ट' यदि होलोकास्ट पर बनी हुयी भव्य हालीवुडीय प्रस्तुति है तो 'लाइफ़ इज ब्यूटीफुल' उस विषय पर बनने वाली संवेदनशील इटेलियन प्रस्तुति ...। फिल्म निर्देशक राबर्तो बेंजिनी का कमाल पूरी फिल्म में दिखाई देता है, जिसमें उनका नायक सामने से तो हंसता दिखाई देता है मगर उसके पीछे दर्शकों के आंसू नहीं सूखते । शिंडलर्स लिस्ट’ जहां सीधे-सीधे और कई बार तो वीभत्सता के लगभग ठीक बीचोबीच दर्शकों को ले जाकर खड़ी कर देती है, जिसमे उस दौर की यहूदी जनता पिस रही थी । तो ‘लाइफ इज ब्यूटीफुल’ एक सामान्य सी चलती हुयी हँसती-खेलती जिंदगी में ऐसा कंकड़ मारती है कि सामने दिखने वाली हंसी के पीछे की जिंदगी एक भयानक दुःस्वप्न में बदल जाती है । 

इस फिल्म को पहली बार में ही दर्शक पूरा देख पाता है | अन्यथा उसके बाद वह जितनी बार भी फिल्म से गुजरता है, उस अंतिम दृश्य से पहले वाले दृश्य को फारवर्ड करके गुजरता है, जिसमें फ़िल्म का नायक बध के लिए ले जाया जा रहा है | वह लोहे के बक्से में छिपे हुए अपने पांच वर्षीय बेटे के सामने से ऐसे गुजर रहा है, जैसे कि वह कोई शहंशाह हो । क्योंकि वह जानता है कि यदि यह बात उसके बेटे को पता चल जायेगी कि उसे मारने के लिए ले जाया जा रहा है तो उसका बेटा भी उसके मोह में उस बक्से से बाहर निकल आएगा और वह भी मारा जाएगा । 

यह फ़िल्म हिंसा और पागलपन की उस त्रासदी को सीधे-सीधे परदे पर नहीं उतारती, वरन संकेतो में  दर्शकों के भीतर स्वयं उतरती जाती है । फिल्म यह बताती है कि 1939 में जर्मनी द्वारा पोलैंड पर किये गए आक्रमण के बाद कैसे यूरोप की सम्पूर्ण यहूदी आबादी अपने आपको एक कत्लगाह के बीच पाने लगती है । पहले तो वह यह भरोसा नहीं कर पाती कि आखिर उसके साथ यह ज्यादती क्यों हो रही है । और फिर बाद में वह अपनी बारी का इन्तजार करने लगती है । अपनी मृत्यु की बारी का । 

यह जानते हुए कि होलोकास्ट कोई मिथकीय या काल्पनिक घटना नहीं है, वरन पिछली सदी में घटित हुयी क्रूर सच्चाई है, इस फ़िल्म को देखने के बाद दर्शको के भीतर थोड़ा प्रेम, थोड़ी दया, थोड़ी करुणा, थोड़ी क्षमा और थोड़ी संवेदना जरूर बढ़ती है । और कहना न होगा कि उसी अनुपात में उनके भीतर की थोड़ी घृणा, थोड़ी नफरत, थोड़ी हिंसा, थोड़ी पाशविकता और थोड़ी दरिंदगी भी कम जरूर होती है .... । 

3 - द पियानिस्ट ....... (निर्देशक - रोमन पोलांस्की)



‘होलोकास्ट’ पर आप चाहें जिस भी तरह से फिल्मों की रेटिंग बना लें, ‘द पियानिस्ट’ नामक फ़िल्म पहले पांच में जरूर स्थान बनाएगी । पोलिश फ़िल्म निर्देशक 'रोमन पोलांस्की' द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म एक पोलिश यहूदी पियानो वादक की आत्मकथा पर आधारित है । जो एक सामान्य दिन में वारसा के रेडियो स्टेशन में पियानो बजा रहा होता है कि तभी वहां पर बम फटने लगते हैं । बाद में सूचना मिलती है कि जर्मन सेनाओं ने पोलैंड में प्रवेश कर लिया है । या कहें तो पोलैंड पर उनका कब्ज़ा हो गया है । 

फिर यह फ़िल्म अत्यंत बारीक संवेदनशीलता से उस बदलाव को रेखांकित करती है, जो हर अगले क्षण में वहां की यहूदी आबादी महसूस करती है । पहले यहूदियों को चिन्हित करने के लिए और गैर यहूदी जनता से अलगाने के लिए अपनी कमीज या कोट की बांह पर एक नियत चिन्ह को धारण करने का आदेश दिया जाता है । फिर उन्हें उसी शहर के एक कोने में ले जाकर 'घेट्टो' (बंद बस्ती) में बसाया जाता है । और फिर उस शहर से निकालकर यातना कैंपो (मृत्यु कैंपो) की तरफ बढ़ा दिया जाता है । 

धरती को यहूदी रहित करने का वह प्रयास इतनी हिंसा और बर्बरता से भरा हुआ होता है  कि जिसको इतने समय बाद भी दुनिया के किसी हिस्से में बैठकर देखने वाला आदमी दुःख और अवसाद से भर जाता है । वह बार-बार इस चीज को समझना चाहता है कि जो लोग नवजात बच्चों, अपाहिज बूढ़ो और गर्भवती महिलाओं को कतार में खड़ा कराकर गोली मार रहे थे, वे आखिर किस दुनिया के वासी थे । और ऐसा करके वे आखिर अपने बच्चों के लिए कैसी दुनिया सौंपने का इरादा रखते थे । लाख प्रयास के बाद भी कोई संवेदनशील आदमी इस गुत्थी को सुलझा नहीं पाता | उस फ़िल्म को अपने जेहन में लिए वह कई रातों तक बेचैन रहता है । तब तक, जब तक कि समय आकर उसकी यादों पर बैठ नहीं जाता । 

रोमन पोलांस्की चूकि खुद भी उन अत्याचारों के गवाह रहे हैं और उससे बचकर निकल जाने वाले कुछ भाग्यशाली बच्चों में से एक, इसलिए वे इस फ़िल्म को जीवन के एकदम करीब खींचकर ले जाने में सफल हुए हैं । वे इस फ़िल्म को 'शिण्डलर्स लिस्ट' की भव्यता और 'लाइफ इज ब्यूटीफुल' की नाटकीयता से भी बचाने में कामयाब रहे हैं । 'शिण्डलर्स लिस्ट' के दस वर्ष बाद और 'लाइफ इज ब्यूटीफुल' के पांच वर्ष बाद भी यदि वे उसी विषय पर एक पूर्ण मौलिक और मास्टरपीस फ़िल्म बनाने में कामयाब रहे हैं  तो यह अपने आपमें कोई छोटी उपलब्द्धि है । 

कहना न होगा कि यह त्रयी आपको उस विषय की एक जरुरी समझ तो दे ही देती है |

4 - द ब्वायज इन ए स्ट्रिप्ट पाजामा..... ( निर्देशक – मार्क हरमन )



होलोकास्ट को लेकर किसी भी संवेदनशील आदमी के मन में यह सवाल जरुर उठता है कि जो नाजी लोग यहूदी जनता का नरसंहार कर रहे थे, उनके भीतर क्या चल रहा था । उनके परिवार में किस बात पर बहस होती थी । अपने बच्चों से वे क्या कहते थे कि वे आजकल किस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं । मसलन कोई आस्तविज के डेथ कैम्प में काम करने वाला कमांडर अपने बीबी बच्चों के साथ कैसा रिश्ता जी रहा था । जो दिन में सैकड़ों निरपराधों को गैस चैम्बरों में झोंक देता था, वह शाम को अपने घर में लौटकर कैसा व्यवहार करता था । या यदि वह घर से दूर था तो अपने घर पर क्या सन्देश भेजता था । और यह सवाल भी बारहां परेशान करता रहा है कि उसके घर के लोग जब उसकी ज्यादतियों को जान जाते, तब वे उसके साथ कैसा व्यवहार करते ।  क्या वे उसे रोकने का कोई प्रयास करते या वे उसकी सरहाना करते कि उसने आज सैकड़ों यहूदियों को गैस चेंबर में डालकर बहुत अच्छा काम किया है । 

अंग्रेजी फिल्म 'द व्यायज इन द स्ट्रिप्ट पाजामा' इस तरह के प्रश्नों का एक संतोषजनक जबाब देती है । फिल्म बताती है कि अत्याचारी का विरोध उसके घर में भी होता है । बेशक कि वह ताकतवर होता है और उस विरोध को कुचलकर आगे बढ़ जाता है लेकिन उसे अपने घर में भी विरोध का सामना करना पड़ता है । उसे यह अहसास दिलाया जाता है कि वह जो कर रहा है वह सही नहीं है । और भविष्य में इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे । 

यह फिल्म दर्शकों को एक अजीब दुविधा में डाल देती है । एक तरफ वे पीड़ितों के पक्ष में रहते हुए यह सोचने लगते हैं कि जब अत्याचार करने वाले के जीवन में यह पीड़ा आयेगी, तब उसे उसका ज्ञान होगा कि वह कितना गलत कर रहा है । लेकिन एक दिन जब वह स्थिति आ ही आती है कि अत्याचार करने वाले का बेटा ही उस भयावह स्थिति में फंस जाता है तो दर्शक बेचैन हो उठते हैं कि उसके साथ यह अत्याचार न हो । यह बेचैनी इसलिए उठती है कि दर्शक किसी भी निरपराध के साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ होता है । 

'धारीदार पाजामा' वाले लड़के को केंद्र में रखकर बनी यह फिल्म दर्शको के भीतर मनुष्यता को थोड़ी और समृद्ध होती है |

5- सन आफ सोल  (निर्देशक – लास्जो नेमर)



इस कड़ी की पांचवी फिल्म हंगेरियन निर्देशक लास्ज़ो नेमर की 'सन आफ सोल' है | यह उस दौर के सबसे भयावह और संवेदनशील विषय को केंद्र में रखकर बनायी गयी है जिसमें नरसंहार के लिए कुख्यात आस्त्विज कैम्प के भीतर काम करने वाले 'सोंडर कमांडो' की कहानी दर्ज है । 'सोंडर कमांडो' उन यहूदी लोगों को कहा जाता था, जिनसे इन यातना शिविरों में साफ़ सफाई का काम लिया जाता था । जब ये लोग इन मृत्यु कैम्पों में पहुंचते थे तो इन्हें अपने ही साथियों से अलगा दिया जाता था और बन्दूक की नोक पर कहा जाता था कि उन्हें गैस चैम्बरों में मारे गए यहूदी लोगों के शवों को ठिकाने लगाना है । उन्हें फिर से साफ़ सफाई करके दूसरे नव आगंतुक यहूदियों को मारने लायक तैयार करना है । जो लोग इस कार्य के लिए तैयार नहीं होते थे, उन्हें उसी क्षण मार दिया जाता था । ऐसे में कुछ लोग इस आशा में यह कार्य करने लगते थे कि शायद यहां के नाजी कमांडरों को दया आ जाए और वे उन्हें जीवन बख्श दें । या शायद इस तरह उन्हें मृत्यु से कुछ दिनों की मोहलत मिल जाए। हालांकि ऐसा होता नहीं था । इन सोंडर कमांडरों से कुछ समय तक काम लेने के बाद इन्हें भी मौत के घाट उतार देने का ही प्रचलन था । 

यह फिल्म एक ऐसे ही 'सोंडर कमांडर' (गेजा रोरिग) के आसपास बुनी गई है । इसमें हर समय मृत्यु के साए में जीने वाला और लगभग रोबोट बन चुका एक व्यक्ति है, जिसके जीवन की लगभग सारी इन्द्रियाँ सूख चुकी हैं । जिसकी रूह भी लगभग मार दी गयी है । लेकिन इसके बावजूद जब उसके सामने मानव गरिमा का नैतिक सवाल खड़ा होता है तो बिना इस बात की परवाह किये कि इस सवाल की तरफ झुकने की कीमत उसे अपनी जान के रूप में चुकानी पड़ेगी, वह उस मानव गरिमा के साथ खड़ा नजर आता है । बाकि कहानी जानने के बजाय यह जरुरी है कि आप इस फिल्म को देखकर इसकी संवेदनशीलता और मार्मिकता को महसूस करें । यह समझें कि हमारी अपनी दुनिया में आदमी भी बसते हैं और हैवान भी । और यह भी कि हमें कैसी दुनिया चाहिए । 

यह फिल्म अपने छायांकन की विशिष्ट तकनीक के लिए भी ख़ास है । लगभग पूरी फिल्म में कैमरा नायक की पीठ के साथ ही चलता रहता है । यह एक अद्भुत प्रयोग है, जिसमें नेपथ्य की सारी क्रियाएं धुंधली छाया के रूप में दिखाई देती हैं । हालांकि फिल्म में संवादों का बहुत कम इस्तेमाल किया गया है, लेकिन फिल्म बताती है कि भावों को संप्रेषित करने के लिए सबसे सशक्त भाषा भंगिमाओं की ही होती है ।

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अब सवाल यह उठता है कि ‘होलोकास्ट’ जैसी त्रासदी पर सिनेमा देखने का क्या औचित्य है | एक ऐसी त्रासदी, जिसमें मनुष्यता क्षत-विक्षत होती है, जिसमें पाशविकता नंगा नाच करती है | तो जबाब यह है कि किसी भी ऐसे विषय पर कला के विभिन्न रूपों से रूबरू होने का हमें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि हमारे भीतर उस विषय को लेकर एक मुकम्मल समझ बनती है | हम यह जान सकते हैं कि किसी भी दौर में कोई भी त्रासदी कैसे घटित होती है | उसके क्या कारण होते हैं, वह कैसे पनपती है और कैसे बीभत्स रूप को धारण करती है | यह इतिहास से परिचित होने के लिए भी जरुरी है और इतिहास से सबक लेने के लिए भी | सबक इस रूप में कि ऐसी त्रासदी से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए | हम यह जान सकें कि ये त्रासदियाँ कैसे शुरू होती है | कैसे व्यक्ति और समाज के भीतर उनका बीज पड़ता है | और फिर कैसे वह राक्षस बनकर समाज को ही खाने लगता है | इन फिल्मों के जरिये मिला मार्गदर्शन हमारे भीतर मनुष्यता के न्यूनतम गुणों को बरकरार रखने में सहायक होता है, जो इस दौर की सबसे बड़ी जरूरत है |



प्रस्तुतकर्ता
रामजी तिवारी
मो न. 9450546312






रविवार, 23 दिसंबर 2018

यह भी कोई जाने की उम्र थी साथी ..... (मनोज पटेल )


                 
                         मनोज पटेल 



             यह भी कोई जाने की उम्र थी साथी ....



10 अगस्त 2017 की वह मनहूस शाम थी | सर्दी-जुखाम से जकड़े शरीर ने रोज दिन की दिनचर्या के विपरीत उस दिन जल्दी ही मुझे बिस्तर पर भेंज दिया था कि रात नौ बजे के आसपास मित्र सईद अयूब का फोन आया | बहुत साफ़ आवाज के धनी सईद भाई उस दिन फोन पर लड़खड़ा रहे थे | मुझे लगा कि मैं नींद में हूँ इसलिए उनकी आवाज मेरे कानों में ठीक से नहीं पहुँच पा रही है | या कि नेटवर्क में कोई दिक्कत है जिसकी वजह से एक भारी और अस्पष्ट आवाज मेरे कानों में घुमड़ रही है | तीन-चार बार प्रयास करने के बाद उनके शब्द फूटे थे ...

“मनोज पटेल भाई की कोई खबर है क्या आपके पास ....?”

“हां .... उनसे मेरी बात तो है, लेकिन लगभग दस दिन पहले | मगर हुआ क्या सईद भाई ....? किसी अनहोनी की आशंका ने मेरे आसपास जल्दी-जल्दी एक घेरा बुनना शुरू कर दिया था |

“उनके बारे में बहुत दुखद खबर आ रही है भाई | आप जरा अपने संपर्क से पता कीजिये और जैसे ही कुछ पता चले, मुझे भी जरुर बताईये | यह तो अनर्थ हो जाएगा |” कांपती हुई आवाज में सईद ने कहा था |

आशंका वाले घेरे की पकड़ दिल तक चली गयी | लगा कि सामने की दीवार कुछ घूम सी गयी है | मैं उठकर खड़ा होने को हुआ, तब पता चला कि यह दरअसल अपने भीतर की टूट-फूट है, जिसने हमारी दुनिया को उलट-पलट दिया है |

इधर छठी इन्द्रिय में कुछ अनिष्ट होता हुआ महसूस होने लगा था तो उधर मन में यह कामना कुलांचे मार रही थी कि कहीं से सब ठीक-ठाक होने की बात सुनाई दे जाए | उँगलियों ने मोबाइल फोन के की-पैड पर मनोज भाई का नंबर ढूंढ लिया था | टोपी पहने उनका मुस्कुराता हुआ चेहरा स्क्रीन पर उभरा | और फिर तर्जनी ने बिना इस बात का ख्याल किये कि ऐसी सूचनाओं को प्रकारांतर से हासिल करना चाहिए, उस नम्बर को मिला दिया | जाती हुई काल ने थोड़ी उम्मीद भी जगाई | लगा कि उधर से मनोज भाई की उत्साह से लबरेज आवाज सुनने को मिलेगी, जिसमें वे हमेशा ही कहते थे कि “हां ...रामजी भाई ... बोलिए .... कैसे हैं आप...?”

वह एक पल, वह एक क्षण किस उम्मीद और आशंका में गुजर रहा था, कह नहीं सकता | फोन एक भर्रायी आवाज ने उठाया था, यह कहते हुए कि “अनर्थ हो गया सर .... मनोज भाई नहीं रहे |” और फिर उस आवाज ने दो-चार पंक्तियों में यह भी बताया कि मनोज भाई के पार्थिव शरीर को लेकर वे लोग लखनऊ से वापस उनके घर अकबरपुर लौट रहे हैं |

ये उनके दोस्त राजेश कुमार की आवाज थी | इसी पुस्तक मेले में उनसे मेरी मुलाक़ात हुई थी, जब वे मनोज भाई के साथ मेले में पहुंचे थे | उन्होंने मेरी किताब पढ़कर एक लम्बी पाठकीय टिप्पड़ी भी भेंजी थी, सो इस नाते मेरा उनसे ठीक-ठाक परिचय भी हो गया था | मैं वापस कमरे में आया | आंसूओं के साथ पिछले पांच-सात वर्षों की घटनाएं भी भीतर से बाहर की तरफ फूट निकली | यह जानते हुए कि इस दुनिया में आने वाला हर आदमी एक दिन इससे विदा भी होता है, मनोज भाई की असमय विदाई बहुत भारी लग रही थी | अव्वल तो यह जाने की कोई उम्र नहीं थी | और फिर इस उलझे हुए समय में उनके जैसे सुलझे हुए आदमी की दरकार भी बहुत थी |

वर्ष 2011 में सोशल मीडिया से जुड़ने के बाद जिन कुछ लोगों से मेरा पहला परिचय हुआ, उनमें भाई मनोज पटेल भी थे | तब भारत में ब्लागों का जलवा छा रहा था और उसके पीछे फेसबुक भी जवान हो रहा था | अधिकाँश लिखने-पढने वाले युवा ब्लागिंग की तरफ आ रहे थे | तो ऐसे में मेरे मन में भी ब्लॉग बनाने की ईच्छा जगी | अपनी बात को कह सकने की आजादी और सार्वजनिक डोमेन में ले जा सकने की उसकी क्षमता ने मुझे भी आकर्षित किया | लगा कि साहित्य के केन्द्रों से बाहर बैठकर भी अपनी साहित्यिक अभिरुचि पूरी की जा सकती है |

इधर-उधर से हाथ-पाँव मारकर ब्लॉग तो बना लिया, लेकिन उसे कैसे व्यवस्थित किया जाए, यह समझ में नहीं आ रहा था | ऐसे में मनोज भाई मेरे लिए संकटमोचन के रूप में सामने आये | मैंने उनके इनबाक्स में एक सन्देश छोड़ा और कुछ देर बाद आये उनके फ़ोन ने मेरे ब्लॉग ‘सिताब दियारा’ को व्यवस्थित कर दिया | अब मैं ब्लॉगर भी था और उसकी बारीकियों से थोड़ा-बहुत परिचित भी |

इधर इंटरनेट की साहित्यिक दुनिया में कबाड़खाना, सबद, पढ़ते-पढ़ते, नयी बात, जनपक्ष, जानकी पुल, समालोचन, पहली बार, कर्मनाशा और अनुनाद जैसे ब्लॉग फ़िजा को रोशन कर रहे थे | मेरे दिमाग में यह बात कौंधी कि साहित्यिक ब्लागों की दुनिया से पाठकों का एक व्यवस्थित परिचय होना चाहिए | उन्हें पता होना चाहिए कि साहित्य की किस विधा में किस ब्लॉग पर कैसा काम हो रहा है | इन बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने एक लेख लिखा | उस लेख में दस ब्लागों का जिक्र था, जिन्हें मैंने वरीयता सूची के हिसाब से सजाया था | मैंने पोस्ट लगाकर जैसे ही उसे फेसबुक से जोड़ा, दस मिनट के भीतर मनोज भाई का फोन आ गया | उन्होंने कहा कि “आपके उस लेख में एक तथ्यात्मक गलती चली गयी है | उस पोस्ट को हाईड कीजिये, फिर मैं आपसे बात करता हूँ |” मैंने उनकी सलाह को ध्यान में रखते हुए पोस्ट को फेसबुक से हाईड किया और फिर ब्लॉग पर जाकर भी उसे ड्राफ्ट में डालकर सेव किया | इतने में उनका फिर से फोन आया | उन्होंने कहा कि आपका लेख अच्छा है, लेकिन तथ्यों की कुछ गलती चली गयी है | यदि किसी ने देख लिया तो वह उसका स्क्रीन शाट लेकर आपके खिलाफ उपयोग कर सकता है | मैं जानता हूँ कि आपने यह पोस्ट ब्लागों की दुनिया को समझने के लिए ही लगायी है, और इसमें आपकी तरफ से कोई दुर्भावना काम नहीं कर रही है, लेकिन तब भी कोई नकारात्मक व्यक्ति इसको लेकर बात का बतंगड़ तो बना ही सकता है |”

“उन्होंने कहा कि अव्वल तो ब्लागों की दुनिया में ऐसा मानक बनाना ही कठिन है कि कौन ब्लॉग नंबर एक है और कौन नंबर दस | लेकिन यदि आप कोई ऐसी सूची बनाने पर आमादा ही हैं तो शीर्ष पर ‘कबाड़खाना’ को रख लीजिये | और फिर अपनी पसंद से ऊपर-नीचे करते रहिये | क्योंकि हिंदी साहित्यिक ब्लागों की दुनिया में हम सबने कबाड़खाना की ऊँगली पकड़कर ही चलना सीखा है |” उनकी सलाह ने मेरे अति-उत्साह को विवेक की तरफ मोड़ा | मैंने लेख को उनकी सलाह के अनुसार संशोधित किया और फिर प्रकाशित किया | कहना न होगा कि उसने पाठकों का बहुत स्नेह पाया | आज बैठकर लगता है कि यदि मनोज भाई ने उस समय में मेरी गलती पर मुझे टोका नहीं होता, तो प्रशंसा की जगह मेरी झोली आलोचनाओं से भरी हुई होती |

मनोज पटेल ने अपने ब्लाग ‘पढ़ते-पढ़ते’ की शुरुआत वर्ष 2010 में की थी | अगले वर्ष उस ब्लॉग ने थोड़ी गति पकड़ी और फिर उसके आगे तो वह पाठकों के दिलों पर छा गया | वर्ष 2012-2013 में उन्होंने जमकर ब्लागिंग की | लगभग रोज दिन उन्होंने कोई न कोई पोस्ट लगायी | वही दौर ब्लागिंग का सबसे सुनहरा दौर भी था | दसियों ब्लॉग अपने नए कलेवर और कंटेंट के साथ एक दूसरे का मुकबला कर रहे थे | ‘कबाड़खाना’ अपने दसियों कबाड़ियों (सहयोगियों) के जरिये सिरमौर था | प्रभात रंजन का ‘जानकी पुल’ हर नयी हलचल का वाहक था | अनुराग वत्स का ‘सबद’ उत्कृष्ट सामग्री के लिए जाना जाता था | वैचारिक बहसों के लिए अशोक पाण्डेय के ‘जनपक्ष’ का कोई सानी नहीं था | अरुण देव के ‘समालोचन’ ने तय कर लिया था कि गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करना है | शिरीष मौर्य के ‘अनुनाद’ और सिद्धेश्वर सिंह के ‘कर्मनाशा’ की मौजूदगी इस दुनिया को अलग से रोशन कर रही थी | और फिर संतोष चतुर्वेदी के ‘पहली बार’ के पीछे मैं भी ‘सिताब दियारा’ को लेकर निकल ही पड़ा था |

लेकिन इन सबमें मनोज भाई की पहचान अगल से देखी जा सकती थी | कारण कि वे समकालीन विश्व कविता के बेहद मौलिक स्वरों को हिंदी में ला रहे थे | अभी तक आधुनिक विश्व कविता में हिंदी पाठकों की पहुँच पाब्लो नेरुदा, ब्रेख्त, एमिली डिकिन्सन, नाजिम हिकमत, महमूद दरवेश, एर्नेस्तो कार्देनाल, लैंग्स्टन ह्यूज, चेस्लाव मिलोश, निजार कब्बानी, दुन्या मिखाइल और येहूदा आमिखाई जैसे कुछ अन्य नामों तक ही सिमटी हुई थी | अब ‘पढ़ते-पढ़ते के जरिये उसका एक बड़ा लोकतांत्रिक विस्तार हो रहा था | हालाकि हमारी पीढ़ी से पूर्व के अनुवादकों ने दुनिया के बहुत सारे अन्य कवियों से भी हिंदी का परिचय कराया था | लेकिन जहाँ सैकड़ों भाषाओँ में हजारो-हजार लोग कविता रच रहे हों, वहां पर दस-बीस नामों की ऐसी सूची बहुत सीमित मालूम पड़ती थी |

इसका यह कत्तई अर्थ नही है कि मनोज पटेल ने दुनिया के सारे महत्वपूर्ण कवियों को हिंदी में लाकर खड़ा कर दिया | या कि उनके अलावा किसी और ने विश्व कविता से समकालीन कवियों को अनुदित नहीं किया | वरन मनोज पटेल का महत्व इस बात में महसूस किया जाना चाहिए कि उन्होंने समकालीन विश्व कविता के कुछ बेहद मौलिक स्वरों को हिंदी में लाकर विश्व कविता का एक बड़ा दरवाजा खोला | हालाकि इंटरनेट के प्रभाव और सूचना के बढ़ते माध्यमों में यह काम देर-सबेर होना ही था | लेकिन मनोज पटेल के जरिये यह बहुत व्यवस्थित और संयमित तरीके से हुआ | व्यवस्थित इसलिए कि उन्होंने वर्षों की मेहनत लगाकर विश्व कविता के इन समकालीन हस्ताक्षरों को ढूँढा और उन्हें सोशल मीडिया के एक बड़े प्लेटफार्म के जरिये हिंदी पाठकों के सामने रखा | और संयमित इसलिए कि इस मैराथन कार्य को करते हुए भी वे कहीं से भी अति-उत्साही नहीं हुए और न ही उसके श्रेय के लिए कभी हांका लगाया |

उनका प्रयास इसलिए भी मानीखेज माना जाएगा कि उन्होंने विश्व कविता के इतने सारे शेड्स को चुनने में जो असीम ऊर्जा लगाई, वही विवेकशील ऊर्जा उन्होंने उन कविताओं को हिंदी में अनुदित करते हुए भी प्रदर्शित की | उनके अनुवाद में वह ताकत थी कि चिली से लेकर कनाडा तक, दक्षिण अफ्रिका से लेकर मिश्र तक, ईरान से लेकर जापान तक और यूरोप में सुदूर पश्चिम इंग्लैण्ड से लेकर सूदूर पूर्व रूस तक की कवितायेँ हमारी अपनी भाषा और अपने दिल के आसपास की लगती थीं | उन्होंने इस अथाह विस्तार से जिन महत्वूर्ण कवियों और उनकी कविताओं को चुना, उस आधार पर भी उनकी समझ और संवेदना की दाद देनी चाहिए | उन कविताओं के माध्यम से हिंदी के पाठकों ने समकालीन दुनिया के समाज को थोडा और अधिक समझा, थोडा और अधिक जाना | 

मनोज पटेल के ब्लॉग ‘पढ़ते-पढ़ते’ पर हजार से अधिक समकालीन विश्व कवितायें मौजूद हैं | उन्हें पढ़ते हुए हमारे सामने एक नई दुनिया का दरवाजा खुलता है, जिसमें वेरा पावलोवा, मरम अल मसीरी, और नाजिम हिकमत का प्रेम भी है, तो उसी महान हिकमत, महमूद दरवेश और सादी युसूफ का संघर्ष भी | उनके पिटारे में बोस्नियाई कवि इजत सरजेलिक की वे मर्मस्पर्शी कवितायें भी हैं, जो युगोस्लावीयाई विभीषिका की प्रतिनिधि दास्तान हैं, तो मध्य पूर्व में संघर्ष के चटख रंग भी उनकी कविताओं में प्रमुखता से नुमाया हुए हैं | अफ्रीकी लूट और लैटिन अमेरिकी संघर्ष को भी उनके अनुवादों में बहुत प्रमुखता मिली है | युद्ध के विरोध और मनुष्यता के पक्ष उनकी कविताओं का विस्तार जापान से लेकर अर्जेंटीना तक फैला हुआ है | और यदि कहीं उनकी चुनिन्दा कविताओं में युद्ध दिखाई भी देता है, तो इस चेतावनी के साथ कि वह मनुष्य-विरोधी और व्यर्थ है | आततायी से भिड़े हुए हाथ यदि सफल नहीं भी दिखाई देते हैं, तो वे इतनी प्रेरणा जरूर देते हैं कि दुनिया के प्रत्येक हिस्से का मनुष्य दमन और अत्याचार के विरोध में खड़ा है | साम्राज्यवाद और नव-उपनिवेशवाद से कराहती हुई दुनिया में उनकी अनुदित कवितायें उम्मीद और भविष्य की बेहतरी का रास्ता दिखाती हैं |

जितनी सहजता और सफाई के साथ के उन्होंने कविताओं का अनुवाद किया है, वह हमारी नयी पीढ़ी के लिए आदर्श हो सकता है | उनके ब्लॉग ने विश्व कविताओं का जो दरवाजा हिंदी के युवाओं के लिए खोला है, उसमें दो-तीन सकारात्मक परिणाम तो साफ़-साफ़ दिखाई डेते हैं | पहला यह कि इन कविताओं को पढ़ते हुए हमारे अनेकानेक अनुवादकों ने दुनिया के विभिन्न कोनों में कवियों की तलाश शुरू की है | अब समकालीन विश्व कविता के बहुत सारे हस्ताक्षर हिंदी में दिखाई देते हैं | दूसरा यह कि उन्होंने अनुवाद में गुणवत्ता के जिस स्तर को स्थापित किया है, वह काबिलेतारीफ़ है | उन्होंने अनुवादकों के लिए एक ऐसा मानदंड स्थापित किया है, जिससे नीचे उतरना अब संभव नहीं हैं | और फिर मनोज जी का तीसरा काम जो बहुत महत्वपूर्ण है, वह यह है कि कविताओं को अनुदित करते समय कैसे शब्दानुवाद और भावानुवाद का संतुलन कायम किया जाए |

ऐसे में ‘पढ़ते-पढ़ते’ के माध्यम से समकालीन विश्व कविता को हिंदी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने वाले इस मैराथन धावक को बारबार सलाम करने की ईच्छा होती है | और इसलिए भी कि इतने शीर्ष पर पहुंचकर भी वे स्टंटबाजी और अहंकार से सर्वथा दूर रहे | यह बात देखने में भले ही छोटी लगती हो, लेकिन तलाशने में बहुत बड़ी निकलती है |

मनोज भाई को देखकर इस बात की तस्दीक की जा सकती थी कि एक रचनात्मक व्यक्ति को कैसा होना चाहिए | जो व्यक्ति एक रचनात्मक विधा से प्यार करता है, वह अन्य रचनात्मक विधाओं का भी शाहकार होता है | मसलन वे जितने अधिक कविता-प्रेमी थे, उतने ही अधिक सिने-प्रेमी भी | विश्व-सिनेमा की अपनी लाइब्रेरी को समृद्ध करने के लिए वे शहर-दर-शहर भटकते फिरते | जहाँ से भी क्लासिक फिल्मों के मिलने की आहट होती, वे पहुँच जाते | इन यात्राओं के जरिये उन्होंने विश्व-सिनेमा की हजार से अधिक चुनिन्दा फिल्मों को इकठ्ठा किया था | और जब मैं विश्व-सिनेमा की बात कर रहा हूँ तो इसका मतलब हालीवुड समझने की भूल करना बिलकुल भी उचित नहीं होगा | विश्व दृष्टि रखने वाले एक वास्तविक फिल्म समीक्षक की तरह वे भी हालीवुड को फ्रेंच, इटेलियन, ईरानी, चीनी, रशियन, जापानी और कोरियन सिनेमा के साथ ही रखने के हामी थे | इनसे ऊपर नहीं | इसीलिए वे ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ आन्दोलन के बड़े समर्थकों में से एक थे, जो गोरखपुर से आरम्भ होकर पूरे भारत में फ़ैल चुका है |

जब भी दुनिया के स्तर पर कोई अच्छी या चर्चित फिल्म आती, वे उसे ढूँढने में लग जाते | महीने-दो महीने बाद वह फिल्म उनके पास होती | मुझे याद है कि जब हंगेरियन फिल्म “सन आफ सोल” को सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म के लिए आस्कर पुरस्कार दिया गया था, तो उनका एक लंबा व्हाट्सअप सन्देश आया था | उन्होंने उस सन्देश में लिखा था कि इस फिल्म को देखने के बाद वे कैसे हफ़्तों विचलित रहे | उनके पास भारतीय क्लासिक फिल्मों का भी बड़ा संग्रह था और सिनेमा को समझने के लिए विष्णु खरे और प्रहलाद अग्रवाल सिने-समीक्षकों को पढने का मन भी |

वे साहित्य के दुर्लभ और विलक्षण पाठक भी थे | उनके पास अपनी भाषा हिंदी की क्लासिक किताबों का खजाना तो था ही, विश्व क्लासिक को पाने के लिए भी वे सदा प्रयासरत रहते | चुकि उनका अंग्रेजी का ज्ञान बहुत अच्छा था, इसलिए उनका पाठकीय दायरा भी बहुत विस्तृत हो गया था | हालाकि सामान्यतया वे पुस्तकों को अपनी भाषा में तलाशते हुए दिखाई देते | लेकिन जहाँ उनकी हिंदी में उपलब्द्धता नहीं होती, वहां वे अंग्रेजी की तरफ भी हाथ बढ़ाने में नहीं हिचकते |

वर्ष 2012 से 2017 तक के छः विश्व पुस्तक मेले में हमारा और उनका साथ रहा | वे महीने दिन पहले से ही बतौर पाठक मेले की तैयारी शुरू कर देते | हालाकि इंटरनेट के साथ बढ़िया सामन्जस्य के कारण वे नई किताबों की आनलाइन खरीददारी भी करते रहते | लेकिन फिर भी उनके पास मेले को लेकर बहुत सारी योजनायें होतीं | नवम्बर में उनका पहला सन्देश व्हाट्सअप पर चमकता, जिसमें वे मुझसे मेले के लिए खरीदी जाने वाली किताबों की सूची मांगते | मैं थोड़ा आनाकानी करता तो उनका सन्देश मैसेंजर में तैर जाता | फिर सप्ताह बीतते-बीतते उनका फोन आ धमकता, जिसमें एक अनुरोध भी होता कि अब हम लोगों को मेले की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए, और एक चेतावनी भी कि ऐसा नहीं करने से हम लोग महत्वपूर्ण किताबों से वंचित रह जायेंगे | उनकी सलाह के अनुसार हम लोग फेसबुक पर मेले में खरीदी जाने वाली संभावित किताबों की सूची लगाते | वह सूची पाठकों के द्वारा समृद्ध की जाती | दसियों दिन उस पोस्ट पर नई-नई किताबों की आमद होती रहती | और फिर मेले से पहले वह सूची इतनी समृद्ध हो जाती कि उसे कई पुस्तक प्रेमी लोग संरक्षित करके अपने पास रख लेते | मेले के दौरान या उसके बाद भी उपयोग करने के लिए |

मेले के लिए प्रतिवर्ष मनोज भाई बाकायदा बजट तैयार करते | वे कहते कि मध्यवर्गीय लोगों का अपना पैशन तभी पूरा हो सकता है, जब वे उसकी तैयारी करें | अन्यथा उनके आर्थिक दबाव इस तरह के होते हैं कि वे हमेशा ही उसमें दबकर बिखर जायेंगे | जैसे हम अपने बच्चों की पढाई के लिए बजट रखते हैं, बीमारी-ईलाज के लिए व्यवस्था रखते हैं, देशाटन के लिए योजनायें रखते हैं, उसी तरह से हमें किताबों के लिए भी एक बजट रखना चाहिए | यह भी जीवन के अन्य महत्वपूर्ण कार्यों की तरह ही महवपूर्ण कार्य है | यदि हम थोड़ा भी शिथिल हुए तो हमारी कटौती की गाज सबसे पहले हमारे पैशन पर ही पड़ती है | और फिर इस पठन-पाठन विरोधी माहौल में किताबों को उसकी सबसे अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है | उन्होंने किताबों के लिए प्रतिमाह दो हजार रूपये का बजट रखा था | वर्ष भर की आनलाइन खरीददारी में पांच-सात हजार रूपये लग जाते और शेष पंद्रह हजार रूपये से वे विश्व पुस्तक मेले में खरीददारी करते | मैंने भी उनकी सीख के पीछे चलते हुए अपने बजट को हजार रूपये मासिक से आरम्भ किया था, जो आज भी सफलतापूर्वक चल रहा है |  

बाहर से देखने पर वे एक बेहद साधारण मनुष्य की तरह दिखाई देते | लेकिन उनके भीतर की मनुष्यता उन्हें हर हिसाब से असाधारण बनाती | दरअसल वे चर्चा और आत्ममुग्द्धता से इतने दूर थे कि उनके कामों का कभी उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया | यह हिंदी भाषा की बदकिस्मती कही जायेगी कि उसने समय रहते अपने एक बहुमूल्य रत्न को नहीं पहचाना | हमारी भाषा ने उनके अनछूए पहलूओं को तो अनदेखा किया ही, उनके सामने आये कामों की भी उपेक्षा की | अन्यथा क्या वजह थी कि किसी प्रकाशक ने उनके रहते हुए उनकी एक किताब भी छापने में दिलचस्पी नहीं दिखाई | जबकि उनके अनुवाद के खजाने में कम से कम दस किताबों लायक बेहतरीन कवितायें मौजूद थीं | मनोज भाई से जब भी मैं इस बारे में जिक्र करता तो वे बड़ी ही संजीदगी से कहते कि “रामजी भाई ..... मैं अपना काम कर रहा हूँ | और वही काम मैं कर भी सकता हूँ | जो काम प्रकाशकों का है, मैं उसके बारे में क्यों चिंता करूँ |” देखते हैं कि उनके काम को लेकर प्रकाशक कब अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं |

उनको याद करते हुए दिल में एक हूक सी उठती है | पचास से कम की अधेड़ उम्र में उनका ऐसे चले जाना बहुत खलता है | इकलौते पुत्र को खोने की व्यथा सोचकर उनके माँ-बाप के लिए और भी दिल बैठने लगता है | और बेटे-बेटी के लिए भी, जिनके बारे में मनोज भाई हमेशा से कहते थे कि ये और चाहें जो भी बने, मगर आदमी पहले बनें | जिस दौर में एक करके पांच गिना जाता हो, उस दौर में दस करके भी उन्होंने कोई गिनती नहीं लगाई | जिसने एक साधारण जीवन जीते हुए मनुष्यता की सारी शर्ते पूरी की, उसके लिए अलविदा कहना बहुत खलता है |

यह भी कोई जाने की उम्र थी साथी ......... !

                                               प्रस्तुतकर्ता 
                                              रामजी तिवारी 
                          
                             (यह स्मृति लेख 'अनहद' पत्रिका में छपा है )

                 

             मनोज पटेल  द्वारा अनुदित चुनिन्दा कवितायें

                        
                        साभार – “पढ़ते-पढ़ते ब्लाग”

                  1 …. इज़त सरजलिक (बोस्नियाई कवि)

सरायेवो में किस्मत

सबकुछ मुमकिन है
सरायेवो की
1992 की बसंत ऋतु में
       
कि आप खड़े हों एक कतार में
ब्रेड खरीदने के लिए
और पहुँच जाएं किसी इमरजेंसी वार्ड में
अपनी टाँगे कटवाए हुए

और तब भी कह सकें
कि किस्मतवाले रहे आप ..... |


   हमारी जिंदगियों में युद्ध

दो बाल्कन और दो विश्व युद्धों को
देखा है मार्को बसिक ने अपनी जिंदगी में
यह पांचवां है उसका

मेरी और मेरी संतान के लिए दूसरा

और जहाँ तक ब्लादिमीर की बात है
अट्ठारह महीने की उसकी उम्र को देखते हुए
फिलहाल यह कहा जा सकता है
कि अपनी आधी जिंदगी
वह गुज़ार चुका है युद्ध में ...|
                 
                        2 …..       यूसफ़ अल साइघ (ईराक़ी कवि)


एक ईराक़ी शाम

एक ईराक़ी शाम में
युद्ध भूमि के कुछ दृश्य :
एक अमनपसंद घर
दो लड़के अपना होमवर्क करते हुए
एक छोटी बच्ची
रद्दी काग़ज पर
अनमनेपन से कुछ अजीब तस्वीरें बनाते हुए
 -- ताजा ख़बरें थोड़ी देर में
पूरा घर कान बन जाता है
दस ईराक़ी आँखें चिपक जाती हैं
टेलीविजन के परदे से एक दहशतजदा खामोशी से
अलग-अलग तरह की गंध मिलने लगती है आपस में
युद्ध की गंध
और गंध ताज़ी सिंकी रोटी की
माँ की निगाहें उठती हैं
दीवार पर लटकी एक तस्वीर की तरफ
वह बुदबुदाती है
-- ख़ुदा हिफ़ाजत करे तुम्हारी
और खाना बनाना शुरू करती है
चुपचाप
उसके दिमाग में सावधानी से चुने गए
युद्धभूमि से परे के दृश्य चलने लगते हैं
उम्मीद के पक्ष में |






                    3….    एर्नेस्तो कार्देनाल  (निकारागुआ के कवि)

हम दोनों ही हार गए जब मैंने खो दिया तुम्हें
मैं इसलिए हारा क्योंकि तुम ही थी
जिसे मैं ज्यादा अधिक प्यार करता था
और तुम इसलिए हारी क्योंकि मैं ही था
तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार करने वाला
मगर हम दोनों में से तुमने मुझसे ज्यादा खोया है
क्योंकि मैं किसी और को वैसे ही प्यार कर सकता हूँ
जिस तरह तुम्हें किया करता था
मगर तुम्हें उस तरह कोई प्यार नहीं करेगा
जिस तरह मैं किया करता था
.....................................
....................................
यही प्रतिशोध होगा मेरा
कि एक दिन तुम्हारे हाथों में होगा
एक प्रसिद्द कवि का कविता-संग्रह
और तुम पढ़ोगी इन पंक्तियों को
जिन्हें कवि ने तुम्हारे लिए लिखा था
और तुम इसे जान भी नही पाओगी ....|  




                               4 …..     सर्गोन बोउलुस (ईराक़ी कवि)

चिट्ठी मिली ....

तुमने बताया
कि तुम्हारे लिखते समय
बम बरस रहे हैं,
छतों के इतिहास
और मकानों के नामोनिशान मिटाते हुए

तुमने कहा :
मैं तुम्हें यह चिठ्ठी लिख रहा हूँ
जबकि उन्हें खुदा ने इजाज़त दे रखी है
मेरी तकदीर लिखने की
इसी बात पर मुझे शंका होती है
उसके खुदा होने में

तुमने लिखा :
मेरे शब्द, गोलियों की बरसात में डराए जा रहे प्राणी हैं
इनके बिना मैं जिन्दा नहीं रह पाऊंगा

“उनके” चले जाने के बाद, मैं उन्हें फिर से पा लूँगा
उनकी सारी पवित्रता के साथ जैसे मेरी सफ़ेद पलंग
वहशियों की अँधेरी रात में

हर रात, मैं चौकस रहता हूँ अपनी कविता में सुबह तलक

फिर तुमने कहा :
मुझे एक पहाड़ की जरुरत है, एक शरणस्थल की
मुझे दूसरे इंसानों की जरुरत है

और तुमने चिट्ठी भेंज दिया ...| 




                  5 …. ताहा मुहम्मद अली .... (फिलिस्तीनी कवि)

बदला ....

कभी-कभी कामना करता हूँ
कि किसी द्वंद्व युद्ध में मिल पाता मैं
उस शख्स से जिसने मारा था मेरे पिता को
और बर्बाद कर दिया था घर हमारा
मुझे निर्वासित करते हुए
एक संकरे से देश में
और अगर वह मार देता है मुझे
तो मुझे चैन मिलेगा आखिरकार
और अगर तैयार हुआ मैं
तो बदला ले लूँगा अपना |

किन्तु मेरे प्रतिद्वंद्वी के नजर आने पर
यदि यह पता चला
कि उसकी माँ है
उसका इन्तजार करती हुई
या एक पिता
जो अपना दाहिना हाथ
रख लेते हैं अपने सीने पर दिल की जगह से ऊपर
मुलाकात के तयशुदा वक्त से
आधे घंटे की देरी पर भी –
तो मैं उसे नहीं मारूंगा
भले ही मौक़ा रहे मेरे पास |

इसी तरह .... मैं
तब भी क़त्ल नहीं करूंगा उसका
यदि समय रहते पता चल गया
कि उसका एक भाई है और बहनें
जो प्रेम करते हैं उससे और हमेशा
उसे देखने की हसरत रहती है उनके दिल में
या एक बीबी है उसकी
उसका स्वागत करने के लिए
और बच्चे, जो सह नहीं सकते उसकी जुदाई
और जिन्हें रोमांचित कर देते हैं उसके तोहफे ...

या फिर, उसके यार-दोस्त हैं
उसके परिचित पडोसी
कैदखाने या अस्पताल के कमरे के उसके साथी
या स्कूल के उसके सहपाठी
उसे पूछने वाले
या सम्मान देने वाले

मगर यदि
कोई न निकला उसके आगे-पीछे –
पेड़ से कटी किसी डाली की तरह –
बिना माँ-बाप के
न भाई, न बहन
बिना बीबी-बच्चों के
किसी रिश्तेदार, पड़ोसी या दोस्त
संगी-सहकर्मी के बिना,
तो उसके कष्ट में कोई इजाफ़ा नहीं करूँगा
कुछ नहीं जोडूंगा उसके अकेलेपन में
न तो मृत्यु का संताप
न ही गुजर जाने का गम
बल्कि संयत रहूँगा
उसे नजरअंदाज करते हुए
जब उसकी बगल से गुजरूँगा सड़क पर ---
क्योंकि समझा लिया है मैंने खुद को
कि उसकी तरफ ध्यान न देना
एक तरह का बदला ही है अपने आप से .... |
                       
                    

               6 ..... अन्ना स्विर   .... (पोलिश कवि)


वे तीसरी मंजिल से नहीं कूदे

दूसरा विश्व युद्ध
वारसा
आज रात उन्होंने बम गिराए
थियेटर चौराहे पर

थियेटर चौराहे पर
वर्कशाप थी मेरे पिता की
सारी पेंटिंग, मेहनत
चालीस सालों की

अगली सुबह पिताजी गए
थियेटर चौराहे की ओर
उन्होंने देखा

छत नहीं है उनके वर्कशाप की
नहीं हैं दीवारें
फर्श भी नहीं

पिताजी कूदे नहीं
तीसरी मंजिल से
उन्होंने फिर से शुरू किया
बिलकुल शुरुआत से  ...... |



                                    7...... बिली कालिंस  ..  (अमेरिकी कवि)

भागमभाग

सुबह-सुबह काम पर जाने की भागमभाग में
हार्न बजाता तेज रफ़्तार में निकलता हूँ
कब्रिस्तान के बगल से
जहाँ अगल-बगल दफ़न हैं मेरे माता-पिता
ग्रेनाईट की एक चिकनी पटिया के नीचे

और फिर पूरे दिन लगता है
जैसे उठ रहे हों वे
नापसंदगी का इजहार करने वाली
उन्हीं निगाहों से मुझे देखने के लिए
जबकि माँ शांति से उन्हें समझाती है
फिर से लेट जाने को ... |


                                8 ….  रॉक डाल्टन .... (अल-सल्वाडोर के कवि)


चोर बाजार में जनता की संपत्ति का बंटवारा

उन्होंने हमें बताया कि पहली शक्ति है
कार्यपालिका शक्ति
और विधायी शक्ति दूसरी शक्ति है
जिसे ठगों के गिरोह ने
‘सत्ता पक्ष’ और ‘विपक्ष’ में बाँट रखा है
और चरित्र भ्रष्ट हो चुका (फिर भी माननीय) सुप्रीम कोर्ट
तीसरी शक्ति है ..

अखबारों, रेडियो और टी.वी. ने खुद को
चौथी शक्ति का दर्जा दे रखा है और वाकई
वे तीनों शक्तियों के हाथ में हाथ डाले चलते हैं

अब वे हमें यह भी बता रहे हैं कि
नई लहर वाले युवा पांचवीं शक्ति हैं

और वे हमें यह भी भरोसा दिलाते हैं
कि सभी चीजों और शक्तियों के ऊपर
ईश्वर की महान शक्ति है

“और अब चुकि सभी शक्तियों का बंटवारा हो चुका है
-- वे निष्कर्ष के रूप में हमें बताते हैं –-
किसी और के लिए कोई शक्ति नहीं बची है
और अगर कोई कुछ और सोचता है
तो उसके लिए फ़ौज और नेशनल गार्ड हैं”

शिक्षाएं ....

1 – पूंजीवाद शक्तियों की एक बड़ी मंडी है
जहाँ केवल चोर अपना धंधा करते हैं
और सच्ची शक्ति की वास्तविक मालिक
यानि आम जनता की बात करना जानलेवा हो सकता है |

2 – शक्ति के वास्तविक मालिक को उसका
हक़ दिलाने के लिए यह जरुरी होगा
कि चोरों को व्यापार के मंदिरों से लतिया कर
केवल बाहर ही न कर दिया जाए
क्योंकि वे बाहर जाकर फिर संगठित हो जायेंगे
बल्कि बाजार को
व्यापारियों के सर तक ले जाना होगा  ... |



                                         9...... लैंग्स्टन ह्यूज़ .... (अमेरिकी कवि)


थक चुका हूँ

मैं तो थक चुका हूँ इन्तजार करते-करते,
क्या तुम नहीं थके इस इन्तजार में
कि एक दिन हो जायेगी यह दुनिया
खुबसूरत, बेहतर और मेहरबान ?
आओ एक चाकू उठाकर
दो टुकड़ों में काट दे यह दुनिया –-
और देखें कि कौन से कीड़े
खाए जा रहे हैं इसे ..... |


अश्वेत मजदूर

बहुत मेहनत करती हैं मधुमक्खियाँ
उनसे छीन लिया जाता है
उनकी मेहनत का फल
हम भी हैं मधुमक्खियों की ही तरह –
मगर ऐसे ही नहीं चलेगा
हमेशा .... |



                            10 ...  जैक एग्यूरो  ... (प्युर्टोरिको के कवि)


खुली खिड़कियों और बादलों के लिए प्रार्थना

प्रभु,
मेरे लिए एक जगह बचा रखना
स्वर्ग में किसी बादल पर
इन्डियन, अश्वेत, यहूदी
आयरिश और इटली के लोगों के साथ
पुर्तगाली और तमाम एशियाई
स्पेनी, अरबी लोगों के साथ

प्रभु,
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर
वे जोर-जोर से बजाते हैं अपने संगीत,
या खुली छोड़ देते हैं अपनी खिड़कियाँ --
मुझे तो पसंद है तरह-तरह के भोजन की खुशबू

मगर प्रभु,
यदि स्वर्ग एकीकृत न हो,
और नस्लवादी हो कोई फ़रिश्ता,
जान लीजिये, मैं तो आने से रहा
क्योंकि प्रभु,
नरक तो पहले ही देख चुका हूँ मैं ..... |


                 11 ....  नाओमी शिहाब न्ये    ....(फिलिस्तीनी कवि)


मशहूर ....

मछली के मशहूर होती है नदी
तेज आवाज मशहूर होती है ख़ामोशी के लिए
जिसे पता है कि वह ही वारिश होगी धरती की
इससे पहले कि कोई ऐसा सोचे भी

चहारदीवारी पर बैठी बिल्ली
मशहूर होती है चिड़ियों के लिए
जो देखा करती हैं उसे घोसले से

आंसू मशहूर होते हैं गालों के लिए

तसव्वुर जिसे आप लगाए फिरते हैं अपने सीने से
मशहूर होते हैं आपके सीने के लिए

जूते मशहूर होते हैं धरती के लिए
ज्यादातर मशहूर बनिस्बत भड़कीले जूतों के,
जो मशहूर होते हैं फकत फर्श के

उसी के लिए मशहूर होती है
वह मुड़ी-तुड़ी तस्वीर
जो उसे लिए फिरता है अपने साथ
उसके लिए तो तनिक भी नहीं
जो है उस तस्वीर में

मैं मशहूर होना चाहती हूँ
घिसटते चलते लोगों के लिए
मुस्कुराते हैं जो सड़क पार करते,
सौदा-सुलुफ के लिए पसीने से लथपथ
कतार में लगे बच्चों के लिए,
जबाब में मुस्कुराने वाली शख्श के रूप में

मैं मशहूर होना चाहती हूँ वैसे ही
जैसे मशहूर होती है गरारी,
या एक काज बटन का,
इसलिए नहीं कि इन्होने कर दिया कोई बड़ा काम
बल्कि इसलिए कि वे कभी नहीं चूके उससे
जो वे कर सकते थे .... |


                               12 .....   दुन्या मिखाईल ..... (इराकी कवि)


दुनिया का आकार

अगर चपटी होती दुनिया
किसी जादुई कालीन की तरह,
तो हमारे दुःख का कोई आदि होता और कोई अंत

अगर चौकोर होती दुनिया,
तो किसी कोने में छिप जाते हम
जब “लुका-छुपी” खेलती जंग

अगर गोल होती दुनिया,
तो चर्खी झूले पर चक्कर लगाते हमारे ख़्वाब,
और एक बराबर होते हम ... |


                             13 ..... नाज़िम हिकमत .....   (तुर्की के कवि)


हिरोशिमा की बच्ची

मैं आती हूँ और खड़ी हो जाती हूँ हर दरवाजे पर
मगर कोई नहीं सुन पाता
मेरे कदमों की खामोश आवाज
दस्तक देती हूँ मगर फिर भी रहती हूँ अनदेखी
क्योंकि मैं मर चुकी हूँ, मर चुकी हूँ मैं

सिर्फ सात साल की हूँ
भले ही मृत्यु हो गई थी मेरी
बहुत पहले हिरोशिमा में,
अब भी हूँ सात साल की ही, जितनी की तब थी
मरने के बाद बड़े नहीं होते बच्चे

झुलस गए थे मेरे बाल आग की लपलपाती लपटों में
धुंधला गई मेरी आँखें, अंधी हो गईं वे
मौत आई और राख में बदल गईं मेरी हड्डियां
और फिर उसे बिखेर दिया था हवा ने

कोई फल नहीं चाहिए मुझे, कोई चावल भी नहीं
मिठाई नहीं, रोटी नहीं
अपने लिए कुछ भी नहीं मांगती
क्योंकि मैं मर चुकी हूँ, मर चुकी हूँ मैं

बस इतना चाहती हूँ कि अमन के लिए
तुम लड़ो आज, आज लड़ो तुम
ताकि बड़े हो सकें, हंस-खेल सकें
बच्चे इस दुनिया के .... 

                    14 ..... पीटर चर्चेस .... (अमेरिकी कवि)


अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाओ

अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाओ, वह बोली
मैंने अपना दाहिना हाथ ऊपर उठा लिया
अपना बायाँ हाथ ऊपर उठाओ, वह बोली
मैंने अपना बायाँ हाथ ऊपर उठा लिया,
मेरे दोनों हाथ ऊपर हो गए
अपना दाहिना हाथ नीचे कर लो, वह बोली
मैंने उसे नीचे कर लिया
बायाँ हाथ नीचे कर लो, उसने कहा
मैंने ऐसा ही किया
दाहिना हाथ ऊपर उठाओ, वह बोली
मैंने उसका कहा माना
नीचे कर लो अपना दाहिना हाथ
मैंने कर लिया
अपना बायाँ हाथ उठाओ
मैंने उठा लिया
नीचे कर लो बायाँ हाथ
मैंने कर लिया

खामोशी छा गई
मैं दोनों हाथ नीचे किए
उसके अगले हुक्म का इन्तजार करता रहा
थोड़ी देर बाद बेचैन होकर मैंने कहा
अब क्या करना है
अब तुम्हारी बारी है हुक्म देने की, वह बोली
ठीक है, मैंने कहा
मुझसे दाहिना हाथ ऊपर उठाने के लिए कहो .... | 



चयन और प्रस्तुति

रामजी तिवारी
बलिया, उ.प्र.
मो.न. 9450546312