रविवार, 23 सितंबर 2012

महान अफ़सानानिगार - सआदत हसन मंटो

                                                                   सआदत हसन मंटो

                 
ट्रेड यूनियन की अपनी पत्रिका 'श्रमिक आवाज' के लिए इस साल के आरम्भ से ही एक नियमित कालम लिख रहा हूँ | महान साहित्यकारों पर परिचयात्मक उस कालम में इस बार मैंने 'सआदत हसन मंटो' पर लिखा है | शब्द सीमा और पाठकीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए , इस लेख की अपनी सीमाएं हो सकती हैं , और इसे इसी रूप में पढ़ा भी जाना चाहिए | 

                महान अफ़सानानिगार – सआदत हसन मंटो 

                                यह उर्दू के महान अफ़सानानिगार सआदत हसन मंटो का जन्म शताब्दी वर्ष है | उनका जन्म 11 मई 1912 को पंजाब के लुधियाना जिले में हुआ था | मंटो के पूर्वज वैसे तो कश्मीर के रहने वाले थे , लेकिन कालांतर में वे लोग अमृतसर में बस गए , और इस तरह मंटो की आरंभिक शिक्षा दीक्षा भी अमृतसर में ही हुई | बाद में मंटो पढ़ने के लिए अलीगढ़ गए और औपचारिक स्कूली शिक्षा के तौर पर उन्होंने इंटरमीडिएट किया | वहाँ से वे दिल्ली चले गए और आल इण्डिया रेडियो में बतौर स्क्रिप्ट राइटर कार्य करते रहे | लेकिन मंटो एक जगह कहाँ ठहरने वाले थे | वे मुंबई में फिल्मो की कहानिया लिखने के लिए गए , और वहाँ उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब , अपनी नगरिया, नौजवान , आगोश और किसान कन्या जैसी कई और फिल्मो की पटकथाएं लिखी | लेकिन यहाँ भी मंटो अधिक दिन तक टिक नहीं पाए | इस बीच देश का विभाजन हुआ और मंटो लाहौर पाकिस्तान चले गए | वहाँ इन्हें गंभीर आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ा | घरेलू  और आर्थिक परेशानियों में जकड़ते मंटो का सहारा शराब बनी , और इसी शराब ने 42 वर्ष की अल्पायु में इस महान अफ़सानानिगार को सन 1955 में हमसे सदा- सदा के लिए छीन लिया |

                                  मंटो इस महाद्वीप के निराले कथाकार थे | वैसे तो उन्होंने अपना सारा लेखन उर्दू में ही किया , लेकिन हिंदी में भी वे खूब लोकप्रिय रहे | वे विश्व के उन चंद अफसानानिगारों में शुमार किये जाते हैं , जिन्होंने केवल कहानी विधा के दम पर ही साहित्य में इतना बड़ा मुकाम हासिल किया | इस दृष्टि से वे चेखव , मोपांसा और ओ हेनरी की कतार में शामिल किये जा सकते हैं | ध्यान रहे कि इससे पहले कहानी को साहित्य में द्वितीय कोटि की विधा माना जाता था , मगर इन दिग्गज रचनाकारों ने इस विधा को साहित्य में सम्मानजनक दर्जा हासिल कराया | हिंदी में मंटो आज भी उसी चाव और सम्मान के साथ पढ़े जाते हैं , और हिंदी में उनकी रचनाओं की सम्पूर्ण रचनावली भी उपलब्द्ध है , लेकिन यह एक बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है , कि अब तक मंटो की उन कहानियों की चर्चा ही अधिक हुई है , जिन्हें अज्ञानतावश अश्लील करार दिया गया अथवा जिन पर मुकदमे चले | जबकि ऐसी अन्य तमाम कहानियां भी मंटो की प्रथम कोटि की रचनाएँ हैं ,जो अपने समय का दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत करती हैं | मगर इस उत्साह में उनकी उन कालजयी कहानियों पर कम तवज्जो दी गयी |

                                      मंटो की यह विशेषता है , कि वे अपनी कहानियों में , अपने निजी दृष्टिकोण और विचारधारा के साथ , दखलंदाजी की हद तक पूरे के पूरे मौजूद रहते हैं | अपने पात्रो की खुशियों के साथ , वे उनकी तकलीफें और दुःख भी सहते चलते हैं | यही वजह है कि उनकी कहानियों में संस्मरण का हल्का सा रंग हमेशा झलकता है – किस्सागोई का वह स्पर्श , जो किसी बयान को यादगार बनाने के लिए बहुत जरुरी है | लेकिन यह किस्सागोई , महज दिलचस्पी पैदा करने के लिए और साहित्य प्रेमियों का मनोरंजन पैदा करने के लिए ही नहीं है | वरन किस्सागोई का यह अंदाज एक ओर तो आम पाठक को इस बात का एहसास कराता है कि मंटो उसके साथ है , उसके बीच है , वे सारे दुःख-सुख महसूस कर रहा है , जो आम आदमी की नियति है और दूसरी ओर यह भी बताता है कि ये कहानिया मंटों ने इसलिए लिखी हैं कि पाठक यह जानें कि उनकी नियति ऐसी क्यों है और इस तरह वह अपनी इस नियति को बदलने के लिए मुनासिब कार्यवाई भी कर सके |

                                     मंटो की अधिकाँश कहानियों की प्रेरणा या उत्स उसका यह प्रामाणिक और सच्चा एहसास है कि सारे निजाम में कहीं कुछ बहुत गलत है – आधारभूत रूप से गलत और नाकाबिले- बरदाश्त | वे अपनी सारी शक्ति के साथ दुःख-दर्द और तकलीफ के सही मुकाम पर उंगली रखते हैं और कुल मिलाकर यही उनके लेखन का उद्देश्य भी है | मंटो की यह भावना एक गहरे नैतिक उत्तरदायित्व के एहसास से उपजती है , इसलिए मंटों अपने लेखन में बार बार उन आधारभूत मसलों की तरफ मुड़ते हैं , जो सहज जिंदगी के रास्ते में रुकावट बन खड़े हैं | जैसे कि फरेबी राजनीति , साम्प्रदायिकता , झूठ , स्वार्थ , भ्रष्टाचार और शोषण | अपने इसी नैतिक उत्तरदायित्व को महसूस करते हुए,  मंटो  हर तरह की साम्प्रदायिकता और फिरकेवाराना प्रवृत्ति से ऊपर उठकर उस ‘गलती’ पर पूरे जोर से आघात करते हैं , और वह उस प्रतिगामी दौर में भी प्रगतिशीलता की मशाल को पूरी ताकत से थामे आगे बढते हैं |

                                 मंटो की तलाश , दरअसल, लुप्त होती इंसानियत की तलाश है | यही वजह है , कि जो चीज भी इंसान की प्राकृतिक और स्वाभाविक अच्छाई पर आघात करती है , मंटो उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े होते हैं | यहाँ मंटो की कहानियों का जिक्र करना प्रासंगिक होगा | अपनी प्रसिद्द कहानी ‘नंगी आवाजे’ में मंटों ने पाकिस्तान में शरणार्थियों की छोटी सी कालोनी का चित्र खींचा है , कि कैसे मजबूरी में आदमी पशुओं के स्तर पर जीने लगता है , और स्थितियों को कबूल कर लेता है , और जो नहीं कबूल कर पाता वह उस कहानी के पात्र ‘भोला’ की तरह अंततः पागल हो जाता है | मंटो की एक चर्चित कहानी है ‘ नया क़ानून’ | इस कहानी में उसने एक अनपढ़ तांगे वाले ‘मंगू कोचवान’ को जनता के ऐसे प्रतिनिधि के रूप में पेश किया है , जो यह समझता है कि कानून बदल जाने से स्थितियां भी बदल जायेंगी | उन हजारों लाखो सुराजियों की उस समझ पर यह कहानी प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है , कि आजादी के बाद सारी स्थितियां अपने आप ही बदल जायेंगी , और कहना न होगा कि आज के हालात को देखते हुए , अनेक अर्थों में यह कहानी अभी भी प्रासंगिक है |

                                 ‘हतक’ कहानी में मंटों के दृष्टिकोण की लगभग सभी विशेषताए दिखाई देती हैं | आक्रोश , दर्द और अपार मानवीयता | वेश्यावृत्ति की जलालत का ऐसा अपूर्व चित्र मंटों ने इस कहानी में खीचा है , कि हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं | सेठ द्वारा सुन्गंधी नामक वेश्या को नापसंद कर दिए जाने के बाद पाठक अनायास ही सुगंधी के दिल की कुढन और उसके फूट पड़ते आक्रोश के सहभागी बन जाते हैं |कहानी में स्पष्ट रूप से दो वर्गों का चित्रण है | एक – जो शोषक है , जो खरीदार है , जिसके पास पैसा है और जो इस नाते अपनी पसंदगी और नापसंदगी को व्यक्त कर सकता है | और दूसरा वर्ग सुगंधी का है , जो इस शोषण का शिकार बनने-बिकने के लिए मजबूर है | ‘हतक’ कहानी के समानांतर ही मंटो की एक दूसरी कहानी ‘नारा’ को भी रखा जा सकता है , जिसमे एक मूंगफली बेचने वाले के बेबसी भरे आक्रोश को मंटों ने स्वर दिया है |

                                      इन सब कालजयी कहानियों के होते हुए भी मंटो की वास्तविक पहचान बटवारे और उससे उपजे साम्प्रदायिक दंगो पर उसके द्वारा लिखी गयी अविस्मरणीय कहानियों के कारण है | ‘टोबा-टेक सिंह’ , ‘टेटवाल का कुत्ता’ , ‘यजीद’ , ‘गुरुमुख सिंह की वसीयत’ , ‘खोल दो’ और ‘शरीफन’ जैसी कहानियों को पढ़ने के बाद यह एहसास होता है , कि मंटो की जिंदगी में बंटवारा किस हादसे के रूप में टूटा था | ‘टोबा टेक सिंह’ और ‘टेटवाल का कुत्ता’ ऐसी कहानियां हैं , जिसने लाखों लोगों की नियति पर गंभीर प्रभाव डाला | ऐसी कहानिया शायद ही किसी दूसरे भारतीय लेखक ने लिखी हो | ‘टोबा टेक सिंह’ का पागल सिख, जो हिन्दुस्तान और पकिस्तान के बंटवारे को अप्राकृतिक बंटवारा मानता है , और उसे तसलीम नहीं करता , दरअसल मंटों का ही वह रूप है , जिसने इस बंटवारे को तसलीम नहीं किया , या जब किया तो अपनी जिंदगी की कीमत चुकाकर | मंटो की नजर में ‘टोबा टेक सिंह’ कहानी के नायक ‘बिशन सिंह’ और ‘टेटवाल का कुत्ता’ कहानी के उस कुत्ते में कोई फर्क नहीं है , जो टेटवाल के मोर्चे पर हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी सेना के वहशीपन का शिकार होता है | बिशन सिंह और टेटवाल का वह कुता , दोनों जनता के प्रतीक हैं , जो इस अर्थहीन राजनीति की वजह से शहीद और कुर्बान हुए |

                                    ‘यजीद’ मंटो की पकिस्तान जाने के बाद लिखी गयी एक अविस्मरणीय कहानी है | मंटो की यह मान्यता कि बंटवारे के कारण दोनों तरफ की जनता उपरी तौर पर भले ही दो हिस्सों में बंट गयी हो , लेकिन वह मूल रूप में एक ही है , खुलकर इस कहानी में अभिव्यक्त हुई है | ‘शरीफन’ कहानी एक जीता –जागता दुहस्वप्न मालूम होती है , जिसे पढकर यह पता चलता है कि मंटों , जो दो लड़कियों का बाप भी था , इन फसादों के दौरान किस तकलीफ से गुजरा होगा | ‘मंत्र’ , ‘मैडम डीकास्टा’, ‘प्रगतिशील’, ‘ब्लाउज’, ‘बू’ , ‘खुशियाँ’ और ‘बाबू गोपीनाथ’ जैसी अनेक कालजयी कहानिया मंटो के खाते में हैं | इन कहानियों में मंटो की सबसे बड़ी खूबी उसकी स्पष्टता है , क्योकि उसे यकीन है कि उसे कभी भी अपने बयान को बदलने की जरुरत नहीं पड़ेगी ...|

                                 सआदत हसन मंटो अपने वक्त से आगे के अफ़सानानिगार थे | इतना आगे कि उनकी मौत के आधी सदी गुजर जाने के बाद भी, उनकी वास्तविक पहचान नहीं हो पायी है | यह हमारे साहित्य की बदनसीबी ही कही जायेगी , कि मंटो जैसे लेखक की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की कहानियों , (जैसे – टोबा टेक सिंह , खोल दो, टेटवाल का कुत्ता , काली सलवार और बू –आदि ) को कस्बाई रेलवे स्टेशनों के सस्ते स्टालों में ‘मंटो की बदनाम कहानियां’ शीर्षक से लुगुदी साहित्य के रूप में बेचा और पढ़ा जाता है | जबकि मंटो हिंदी-उर्दू के तत्कालीन परिदृश्य के सारे पाखंड को छिन्न-भिन्न कर समाज के उस बदरंग चेहरे को दिखाने वाले रचनाकार थे , जिसकी अन्यत्र मिसाल नहीं मिलती | बंटवारे के वक्त जब चारों ओर साम्प्रदायिकता का दैत्य अट्टाहास कर रहा था , तब मंटो उन गिने-चुने कहानीकारो में से थे , जो धर्म के नाम पर किये जा रहे इस खून खराबे के असली चेहरे को देख पा रहे थे | स्त्री – विमर्श के हालिया शोर शराबे से बहुत पहले ही उन्होंने यह देख लिया था , कि यह खेल किस तरह से सबसे पहले स्त्री-देह पर ही खेला जाता है |

                                    42 साल की उम्र में उनका दुनिया से चले जाना दक्षिण एशियाई ही नहीं, वरन दुनिया भर के साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति थी | फिर भी अपने बीस साल के लेखन काल में उन्होंने जितना कुछ किया और लिखा , वह हमारे लिए एक अमूल्य धरोहर है , जिसके आईने में इतिहास और वर्तमान के कई सफ़े बहुत साफ़ साफ पढ़े जा सकते हैं | जन्म-शताब्दी के इस वर्ष में यदि हम यह जरुरी काम कर सके , तो यह मंटो के साथ- साथ हमारी अदबी विरासत के लिए भी एक बड़ा न्याय होगा | इस महान क्रान्तिकारी अफ़सानानिगार को हमारा क्रातिकारी लाल सलाम ...........|

                                                            रामजी तिवारी 

                                                  

                                                
                                               

2 टिप्‍पणियां:

  1. मात्र कहने को परिचयात्मक है. वास्तव में मंटो का मूल्यांकन है यहाँ. आपने सही कहा कि मंटो की लोकप्रिय कहानियों को लुगदी छाप बना कर पेश किया जाता है अथवा अश्लील कह कर. इस साल शताब्दी वर्ष में भी इस ओर कोशिश होते नहीं दिखी कि इस धारणा को बदला जाए. मुझे यह साजिश जैसा प्रतीत होता है! कहानी को महत्त्वपूर्ण विधा से वंचित करने की साजिश !!
    शेष आलेखों से भी परिचित कराइए...

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  2. साहित्य का काम ही होता है अपने समय की विकृतियों को बेबाकी से उजागर करना. सआदत हसन मंटो ने यह काम जिस अंदाज में किया वह उन्हें न केवल इस महाद्वीप का बल्कि इस दुनिया का महान अफसानानिगार बनाता है. आपने इस संक्षिप्त से आलेख में मंटो के बारे में जो जानकारियाँ दी हैं वह केवल परिचयात्मक न हो कर मूल्यांकनपरक बन गया है. श्रमिक आवाज के लिए ऐसे विभूतियों पर आलेख लिख कर आप एक महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं. बधाई.

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