रविवार, 9 सितंबर 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय का संस्मरण -- अंतिम किश्त



विमल चन्द्र पाण्डेय 


सिताब दियारा ब्लाग पर आज विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण की उन्नीसवीं और अंतिम किश्त लग रही है |   इस अवसर पर जितने भावुक विमल हैं , उसी अनुपात में यह ब्लाग भी है | यह सफर विमल जी और पाठकों के लिए कैसा रहा , ये तो वही लोग बता सकते हैं , लेकिन एक ब्लॉगर के रूप में इस संस्मरण ने मुझे इस काम को न सिर्फ गंभीरता से करने की प्रेरणा प्रदान की , वरन 'सिताब दियारा' ब्लाग को पाठकों के मध्य एक विश्वसनीय पहचान भी दिलाई | रविवार का दिन वैसे तो हमारे जैसे नौकरी-पेशा लोगों के लिए हमेशा से ही खास रहता है , लेकिन इस संस्मरण ने इस दिन को उत्सव सरीखा बना दिया | मेरे लिए प्रत्येक नयी पोस्ट के पहले पाठक होने का एहसास किसी रोमांच से कम नहीं था | इसे पढ़ते-पढ़ते कभी मैं हँसने लगता, तो कभी मेरी पलकें भीग जाया करती | इसकी आदत इस तरह से मेरी दिनचर्या में शामिल हो चली थी , कि आज से दो-तीन सप्ताह पूर्व पहली बार , जब विमल भाई ने इसके समापन की ओर इशारा किया , तब जाकर यह एहसास भी हुआ , कि जीवन की तरह इसका भी एक न एक दिन अंत हो ही जाएगा | खैर .... 

उम्मीद करता हूँ , कि यह संस्मरण, कभी न कभी किताब  के रूप में भी हमारे सामने अवश्य आएगा , और साहित्यिक जगत में यथायोग्य सम्मान भी अर्जित करेगा | विमल द्वारा जिया गया इलाहाबाद की वह जीवन उनके लिए तो खास है ही , उसे पढकर हम सब भी अपने संघर्ष के दिनों की स्मृतियों में भटकने को प्रेरित हुए , साथ ही साथ इसने आगे आने वाले युवा साथियों के लिए भी एक प्रेरणास्पद रास्ता दिखाने का काम किया | इस अवसर पर मैं प्रत्येक युवा साहित्यकार साथियों से कहना चाहूँगा , कि उन्हें भी अपने अनुभवों को कलमबद्ध करना चाहिए , और उसे सामने लाने का प्रयास भी करना चाहिए | 

तो शुक्रिया दोस्तों , इस सफर में शामिल होने के लिए और विमल भाई आपका विशेष तौर पर आभार , जो आपने अपने इस बेहतरीन , रोचक और प्रेरणास्पद संस्मरण के लिए 'सिताब-दियारा' को चुना | 


                         तो प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                                                      ई इलाहाब्बाद है भईया की 
                                                                 अंतिम किश्त 

                                                                      31-

गोरखपुर में लड़की देखने की घटिया प्रथा निभाई जानी थी और मैं शादी के लिए मानसिक रूप से खुद को तैयार कर चुका था. लड़की गणित से एम.एससी. पास थी हमेशा फर्स्ट आने वालों में से थी. मैं बचपन से गणित से भागने और पापा के दबाव में गणित से द्वितीय श्रेणी में बीएससी करने वाला लड़का था जिसे और कुछ पता हो या न हो, ये ज़रूर पता था कि उसे एक साल के भीतर मुंबई जाना है, कैसे ? पता नहीं लेकिन चाहे जैसे भी. फोटो देख कर लड़की सबको पसंद आई और माँ के साथ मुझे उसे देखने गोरखपुर जाना था. हम सुबह ही इंटरसिटी से निकले और दोपहर तक गोरखधाम मंदिर पहुंचे. लड़की जिसका नाम बायोडाटा में स्नेहलता पाण्डेय था और घर में जिसे रेणु के नाम से पुकारते थे, अपने पापा, मम्मी, भाई और बहनों के साथ आई. मैं उस समय एक अजीब सी मनःस्थिति में रहता था. मैं शादी करना नहीं चाहता था और मैंने शादी के लिए खुद को कन्विंस भी कर लिया था. माँ ने एक बार रोते हुए कहा था कि अपनी तीन संतानों में से वह कम से कम एक की शादी तो अपने तरीके से कर सकें. मैं बड़ा बेटा था और मुझसे उन्हें उम्मीद थी कि मैं अपने छोटे भाई और उससे छोटी बहन के प्रेम संबंधों को ज़बरदस्ती खत्म करने में उनका सहयोग दूँगा. मगर जब मैं बारी-बारी दोनों की शादियों के लिए उनके और पापा के खिलाफ खड़ा हो गया तो उनका परम्परावादी माँ का दिल टूट गया था जिसमें वह सब कुछ धूमधाम से पूरी दुनिया को बता के करना चाहती थीं. मुझमें और उनमें एक अलिखित शर्त काफ़ी पहले तय हो चुकी थी कि वह अगर मेरी बात मानेंगी और मुझसे दोनों छोटों की उनकी मर्ज़ी से शादी के लिए हाँ कर देंगी तो मुझे उनसे पहले शादी करनी होगी. उसके शादी से इनकार कर देने के बाद अब मेरे पास ज़्यादा वक्त नहीं बचा था.

मुझे ये नहीं देखना था कि वह देखने में कैसी लगती है, मुझे उससे सिर्फ़ ये पूछना था कि वो अपने होने वाले पति से क्या उम्मीदें रखती है. मैं जानना चाहता था कि मैं वो उम्मीदें पूरा कर सकूंगा या नहीं. इधर उधर की भूमिका वाली बातों के बाद हमें अकेला छोड़ा गया और इसके कुछ देर बाद उसकी छोटी बहन यानि मेरी होने वाली साली ने भी मंच छोड़कर कमान हमें दे दी. मैं मंदिर के पास वाले तालाब के पास एक पेड़ के पास खड़ा पानी में चल रही नावों को देख रहा था और वह मुझे देख रही थी. हम इधर उधर की बातें कर रहे थे जैसे उसके पसंदीदा रंग, हीरो हिरोइन, टाइमपास, उसकी सहेलियां, मेरे दोस्त आदि. हमें नाव में जाने को कहा गया और एक चक्कर अपनी होने वाली साली के साथ लगाने के बाद हम दोनों नाव पर बचे. मैंने हल्की सी भूमिका बनाकर अपना सवाल पूछा. मैं इतना तो समझ ही जाता था कि कौन सी बात स्क्रिप्ट लिख के याद की गयी है और कौन सी स्पोंटेनियस निकल रही है. उसने कहा कि उसे अपने होने वाले पति से सिर्फ़ इतनी उम्मीद है कि वह दूसरों की भावनाओं को समझने वाला हो, पैसों को संबंधो के ऊपर न रखे और अपनी पत्नी का सम्मान करे. वह सच कह रही थी. उसकी आँखों की सच्चाई ने मुझसे कहा कि मैं पूरी तरह से खत्म अनुभव करने के बावजूद अब भी बच सकता हूँ. मैंने यह कहते हुए हाँ कह दी कि मैं कभी बहुत पैसे नहीं कमा सकता लेकिन मेरा साथ उसे अच्छा लगेगा, मैं कहानियाँ लिखता हूँ, किताबें पढ़ता हूँ, फ़िल्में देखता हूँ, मुझे जो ठीक लगता है वही करता हूँ और रिश्तों और सभी चीज़ों को लेकर ठीक ठाक ईमानदार हूँ. मैं जिंदगी से बहुत ज़्यादा नहीं चाहता और मेरी ज़रूरतें काफ़ी कम हैं. मैं हो सकता है उसकी बड़ी ज़रूरतें कभी पूरी न कर पाऊँ लेकिन मैं इस रिश्ते के प्रति ईमानदार रहूँगा और उससे कभी कुछ नहीं छिपाऊंगा. उसने कहा कि उसे कहानियाँ पढ़ना बहुत पसंद है और उसकी ज़रूरतें भी और लड़कियों की तरह कुछ ख़ास बड़ी नहीं है. उसकी बातों में सच्चाई साफ दिख रही थी. वह खुद की नुमाइश कराने वाली रस्म में बिना किसी भी तरह के मेकअप के बिलकुल साधारण ड्रेस में आई थी जिसके बारे में उसकी बहन ने सफाई दी थी, “दीदी को मैंने कहा कि कोई दूसरा ड्रेस पहन लो लेकिन वह मानी ही नहीं.” माँ ने फैसला मुझपर छोड़ा था. जब हम लौट कर वापस आये तो माँ ने धीरे से मुझसे पूछा, “पसंद बा?”
मैंने सिर हिलाकर सहमति दी. वह फिर फुसफुसायीं, “आगे के एगो दंतवा बड़ बा.”

मैंने मुस्कराकर धीरे से कहा, “घबड़ा मत, उ साकाहारी ह.”

माँ ने मेरी सहमति पर ढेर सारा संतोष व्यक्त किया. इस दिन के लिए वह मेरे पीछे पिछले सात आठ सालों से पड़ी थीं. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था. अभी इसके पिछले साल तक वह मेरे शादी से इनकार किये जाने के कष्ट को कुछ इस तरह व्यक्त करती थीं, “उ दुन्नो अपने मन से बियाह करिहें स आ तुं बड भाई हव, कहाँ ले समझइब त उन्हनियें के पक्ष ले तार. त कम से कम तुं त हं कहि दे हमरी पसंद के लईकी से बियाह करेके.” उनकी पसंद से पहले मैंने उसे पसंद कर लिया. उसने मुझे पसंद किया या नहीं, ये जानने की सहूलियत उपलब्ध नहीं थी और मैं ये पूछ कर कुछ ख़ास कर भी नहीं सकता था क्योंकि उसके घर का माहौल पसंदगी नापसंदगी के स्वामित्व के बारे में काफ़ी कुछ कह रहा था.

हामी भरी गयी. सब वहाँ से हँसी खुशी विदा हुए. अगले दिन उसने फ़ोन करके मुझसे पूछा कि आखिर मैंने उसे क्या देख कर पसंद कर लिया था. मैंने उसे कहा कि ये वह नहीं समझ पायेगी. उसने कहा कि वह आगे पढ़ना चाहती है. मैंने कहा कि वह जैसे चाहे जितना चाहे पढ़ सकती है और मैं हमेशा उसके फैसलों में उसके साथ हूँ. अब मैं कभी-कभी फ़ोन पर रेणु से बातें करने लगा था. मैंने अपनी किताब उसे पढ़ने को भेजी थी. सारी कहानियाँ पढ़ने के बाद उसने एक शाम फोन किया और कहानियों के बारे में बोलते-बोलते अचानक पूछा कि क्या मैं भी अपने किरदारों की तरह शराब और सिगरेट पीता हूँ. मैं धर्म संकट में पड़ गया और मैंने झूठ बोल दिया कि मैं नहीं पीता और यह सब तो किरदारों की मांग है. यह सुन कर मुझे लगा कि वह संतुष्ट हो गयी और फ़ोन काट दिया. मैंने झूठ बोल तो दिया लेकिन रात भर सो नहीं पाया. मुझे लगने लगा कि मैंने अगर शुरुआत ही झूठ से की तो फिर अपराधबोध की वजह से कभी सहज नहीं हो पाउँगा. मैं खुद को रात भर दुत्कारता रहा और सुबह मेरी दोस्त बेदिका का फ़ोन आया तो मैंने उसे ये सब बता दिया. उसने मुझसे ज़्यादा मुझे दुत्कारा और कोसा. मैंने रेणु को फ़ोन किया और कहा कि मैं इन सबका सेवन करता तो हूँ लेकिन जल्दी ही छोड़ने वाला हूँ. वह मुस्कराई और उसने कहा कि उसे सौ प्रतिशत विश्वास था कि मैंने झूठ बोला है. वह शराब से सख्त नफरत करती है लेकिन मेरी ईमानदारी ने उसे प्रभावित किया है और वह चाहेगी कि मैं शादी के बाद एकदम छोड़ दूं. मैंने वादा नहीं किया पर कोशिश करने की बात कही.

वादे से मुझे उस की याद आ जाती थी जो मेरा सबसे बड़ा दर्द थी, ऐसा ही वादा मुझसे उसने भी लिया था और मैंने उससे वादा लिया था कि वह जिंदगी भर मेरे साथ रहेगी. जब मैंने शादी के लिए उसे प्रपोज किया था तो उसने जो तर्क दिए थे वह इतने लचर थे कि मैं अपनी पूरी क्षमता के बाद नहीं समझ पाया. उसने कहा था कि वह मुझे प्यार तो करती है लेकिन किसी लेखक से शादी के पक्ष में नहीं है क्योंकि लेखक अक्सर क्रूर पति साबित होते हैं. उसने गुलज़ार और राखी का उदाहरण दिया और इस महान उदाहरण के बाद उसने मुझे जिंदगी में कभी शराब को हाथ न लगाने की कसम दी. मैंने भी उसकी कसम का पालन किया और अपनी जिंदगी में सबसे लंबे समय तक किसी भी तरह के नशे से दूर रहा. लेकिन बाद में एक बार फिर उसने एक कारण यह भी बताया कि उसके माता पिता ने उसकी शादी बहुत पहले किसी लड़के से तय कर दी थी और उसका कोई प्रिय व्यक्ति था जो चाहता था यह शादी हो और वह दुनिया में नहीं रहा. वह उस दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए चाहती है कि वह उसी से शादी करे. मैंने उसे बार-बार अपनी आत्मा का वास्ता दिया लेकिन उसका कहना था कि वह मजबूर है, इसके बाद उसने मुझे फिर से अपने सर की कसम दी कि मैं कभी किसी नशे को हाथ न लगाऊँ. मैंने पूरी कोशिश की क्योंकि मैं उस पर कोई इलज़ाम नहीं लगा सकता था. लेकिन दुनिया में कोशिशों की नहीं परिणाम की क़द्र होती है और उसके आधार पर ही किसी का भी मूल्यांकन किया जाता है. खैर, अब किसी भी तरह का मूल्यांकन या किसी की नज़र में अपनी छवि की चिंता वह अपने साथ ही लेती गयी. 

उसने मुझे फोन पर बोलकर उत्तपम बनाना सिखाया था और मैं एक दिन उससे बीच बीच में पूछ कर उत्तपम बना रहा था कि कूरियर से एक पत्र आया. यूएनआई का लिफाफा था और ऐसे लिफाफे हर दूसरे दिन आया करते थे जिसमें मुझे संबोधित करके कहा जाता था कि मैं उनके सब्स्क्राईबरों  यानि आज और अमृत प्रभात से जाकर बकाया पैसों की मांग करूँ. पहले मैं ऐसे लिफाफे पाकर घबरा जाया करता था लेकिन बाद में जियालाल जी ने मुझे बताया था कि ये लिफाफे रिसीव करके रख देने के लिए है, टेंशन लेने के लिए नहीं. मैंने ऐसा ही कोई समझकर लिफाफा खोला और मुझे पता चला कि इलाहाबाद से मेरा दाना पानी उठ गया है. मेरा ट्रांसफर बंगलौर कर दिया गया था और मुझे दस दिन बाद वहाँ ज्वाइन करना था. अभी मुझे बड़ा रूम सेट लिए करीब तीन ही महीने बीते थे, मैंने एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का प्लान बनाया था, कुछ ही दिनों से मैंने घर पर भी कुछ कच्चा पक्का खाने को बनाना शुरू किया था, लेकिन अब सब कुछ यहीं छूट जाने वाला था. मुझे अब अपना प्यारा शहर इलाहाबाद छोड़ देना था और फिर से एक बार रोज़ी रोटी के लिए समय की हवा में उड़ कर वह जहाँ ले जाए पहुँच जाना था. काश ये चिट्ठी मुझे मुंबई ट्रांसफर करने की बात कहती तो मैं बहुत खुश हो गया होता. मैंने सबसे पहले उसे फोन किया और वह दुखी हुई. फिर मैंने रेणु को बताया, उसने भी मुझे कुछ किताबी बातें कहीं जिनसे मेरा गम हल्का नहीं हुआ और मैंने विवेक को फ़ोन करके बताया. विवेक ने यह बात राजेश जी को बता दी और दोनों लोग मेरे रूम पर आकर मुझे इस तरह सांत्वना देने लगे जैसे मैं रात भर जाग कर तैयारी करने के बावजूद किसी परीक्षा में फेल हो गया होऊं. मैं भी टेंशन में था और समझ में नहीं आ रहा था कि नौकरी छोड़ दूं या बंगलोर जाने की तैयारी करूँ. दोनों ही बातें उस समय मेरे लिए बहुत कठिन थीं. मैंने नरेन्द्र जी को लखनऊ यूएनआई में फ़ोन किया जो संजय जी के हड़काने के बाद अक्सर बेटा कहकर मुझे समझाते थे और मेरे ज़ख्मों पर मरहम रखते थे. उस समय तक मुझे मालूम नहीं था कि यह रणनीति क्या है. उन्होंने मुझे आईडिया दिया कि मैं संजय जी को फ़ोन करूँ और उनसे रिक्वेस्ट करूँ. क्या रिक्वेस्ट करना है ये उन्होंने बताया ही नहीं लेकिन मैं उस समय रिक्वेस्ट करने के इतने मूड में था कि मैंने तुरंत फ़ोन लगा दिया. संजय जी को मैंने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने किसी मसीहा की तरह मेरी समस्या सुनी और कहा कि वो ज़रूर मेरी समस्या का समाधान करेंगे. मैं एक आवेदन यूएनआई के जीएम के नाम लिखूं कि मैं बनारस से दूर नहीं जा सकता क्योंकि मैं घर का बड़ा लड़का हूँ और इसलिए मेरा ट्रांसफर यहीं कहीं आसपास मसलन लखनऊ कर दिया जाए. मैं उनकी सलाह से बहुत मुदित हुआ और मैंने आनन फानन में आवेदन लिख कर कूरियर कर दिया.

अब मुझे इलाहाबाद छोड़ना था. मैंने विवेक के साथ मिलकर एक टाटा ४०७ जिसे छोटा हाथी कहा जाता था, तय किया. तीन दिन बाद मुझे इलाहाबाद छोड़ कर सारा सामान घर ले जाना था. उसी दिन शोभित आया और उसने बताया कि उसकी माताजी ने मुझे और अश्विनी को खाने पर बुलाया है. मैंने मना किया कि मैं उन्हें जानता नहीं और इस निमंत्रण का मतलब भी नहीं समझ पा रहा हूँ और वहाँ जाने का बिलकुल इच्छुक नहीं हूँ तो अश्विनी ने मुझे समझाया, “सर, शोभित की मम्मी अकेली रहती हैं और शोभित बड़ा लड़का है जिसकी हालत आप देख ही रहे हैं. उन्हें ज़रूर कोई बड़ी समस्या है जिसे वह आपके साथ डिस्कस करना चाहती हैं इसलिए खाने पर इत्मीनान से रात को बुलाया है.”

ये सच था कि दिन में कई बार उनके घर बुलाने के आमन्त्रण को मैंने कई बहाने बनाते हुए मना कर दिया था. लेकिन इस बार मुझे लगा कि अब तो इलाहाबाद छोड़ कर जाना ही है, एक बार चले चलते हैं, देख लेते हैं क्या समस्या है. मैंने विवेक को भी बुला लिया. वह अपनी गणितज्ञ छवि के अनुरूप एकाध एकाध घिसे-पिटे बहाने बनाने के बाद राज़ी हो गया.

शोभित हमें लेने मेरे कमरे पर ही आ गया. विवेक पहले से आया हुआ था. अश्विनी भी तैयार था और मैंने राय दी कि चारों लोग मेरी मोटरसाईकिल पर ही चले चलें लेकिन विवेक ने मेरे दुस्साहस को दरकिनार करते हुए ऑटो से चलने का प्रस्ताव रखा. हम चारों जब वहाँ से निकाल कर हाई कोर्ट के पास तक आये तो शोभित इधर उधर की बातें कर रहा था. अश्विनी ने कहा, “सर, आपके जाने के बाद यहाँ बहुत सूना-सूना लगेगा.” मैं मुस्कराया और तभी मुझे अपने कमरों का डरावना सूनापन याद आया. मैं विवेक के साथ वही बातें कर भी रहा था. मैंने अश्विनी से कहा, “लेकिन गुरु अश्विनी, ऊपर वाले कमरे में कुछ गडबड है.” उसकी आंखें चौड़ी हो गयीं, “क्या बात कर रहे हैं विमल सर? ऊपर वाले कमरे में भी गडबड है?” मैं और विवेक उसका वाक्य सुन कर रुक गए. उसका वाक्य हमें उस समय दुनिया का सबसे डरावना वाक्य लगा. विवेक की आंखें भी भय से गोल हो गयीं और हम इस बात को सोच कर भीतर से बुरी तरह कांप उठे थे कि वह अगली लाइन क्या कहेगा. मैंने सहमी आवाज़ में पूछा, “ऊपर वाले कमरे में भी.....मतलब?”

“नहीं नीचे जिसमें मैं रहता हूँ, उसमें तो कुछ गडबड है ही.” वह काफ़ी शांत सा दिख रहा था. मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं उससे आगे कुछ पूछ सकूं. विवेक ने पहल की, “क्या गडबड...?”

“पता नहीं, मेरी बीवी पानी बाल्टी में भरती है और आके देखती है तो पानी गायब. टीवी अपने आप बंद हो जाता है. मैकेनिक को भी दिखाए बोला एकदम सही है. दरवाज़े पर खटखट होती है और जाकर देखते हैं तो कोई नहीं. कभी कभी हम लोग रात को सो रहे होते हैं तो अचानक बाथरूम में जोर से पानी गिरने की आवाज़ आने लगती है, जाके देखते हैं तो फर्श सूखा होता है. मेरी पत्नी तो छह बजे के बाद बच्चों को लेकर तब तक बाहर खटिये पर बैठी रहती है जब तक मैं ऑफिस से वापस नहीं आ जाता. मैं जल्दी ही यह घर छोडूंगा. मेरी बेटी की तबियत नहीं देखते हमेशा खराब रहती है?”

“मुझसे पहले ये शिकायत किसी ने नहीं की?” मैंने पूछा.

“नहीं, क्योंकि आपके पहले इसमें बड़े परिवार वाले ही लोग रहे हैं. शायद इसलिए....” वह कहना क्या चाहता था, हम समझ नहीं पा रहे थे. 

“ऐसा होता क्यों है, कभी पता लगने की कोशिश नहीं किये ?” विवेक ने पूछा.

“पता क्या लगाना है, जो इस बंगले के मलिक हैं उनके छोटे भाई बाथरूम में गीजर में करेंट लगने से मर गए थे.” इसके बाद की कोई बात उसने नहीं कही और फिर पूरे रास्ते सन्नाटा छाया रहा. शोभित ने किसी ज़मीन की बात कर टॉपिक बदलना चाह लेकिन किसी को उस पर बात करने का कोई उत्साह नहीं आया.

उसकी माँ चाहती थीं कि मैंने अपने प्रयासों से शोभित की कहीं नौकरी लगवा दूं और उनका ज़मीन वाला मामला कह सुन कर ठीक करा दूं. वह यूएनआई को अभी उसी पुराने जलवे में देख रही थीं जिसे उन्होंने अपने पति के ज़माने में देखा होगा. मैंने दोनों कामों के लिए उन्हें आश्वासन दिया और जब हम वहाँ से खा-पीकर निकले तो काफ़ी रात हो चुकी थी. मैंने विवेक को अपने ही कमरे पर रुकने का ऑफर दिया लेकिन वह इसके पक्ष में बिलकुल नहीं था.

“पागल हो का? तुमहूँ चलो हमरे रूम पर सो जाना.”

“नहीं यार, परसों जाना है और सब पैकिंग करना बचा है. दिन में खबरों के चक्कर में टाइम मिलेगा नहीं.” मैंने दिल कड़ा करके मना किया. विवेक ने फिर भी कई बार मुझे अपने घर ले चलने के लिए जोर दिया लेकिन अब मैं अपने अनदेखे दुशमन से आरपार की लड़ाई के मूड में आ चुका था. इस बात में कोई शक नहीं कि ९९ प्रतिशत मुझ पर डर ही हावी रहता था लेकिन मेरे भीतर के कथाकार को १ प्रतिशत ही सही इसमें रोमांच आने लगा था और मेरे भीतर बैठा एक ठीकठाक तार्किक व्यक्ति ऐसा कुछ भी मानने को तैयार नहीं था. मैं क्या सोच रहा हूँ ? सिर्फ़ कुछ थापों और खटखट को मैं क्या किसी भूत प्रेत का चक्कर मान लूँ और आज की रात न जाऊं ? इसके बाद मैं खुद को क्या मुँह दिखाऊंगा ? इतना डर क्यों ? विवेक से बहस हो रही थी और उसने तंज में कहा, “डर बहुत बड़ी चीज होत है बाबा, डर नाम से खाली कहानी लिखे से बात नै बनत सम्झ्यो ? चलो हमरे रूम.”

मुझे लगने लगा था कि ये मेरा भ्रम हो या जो भी हो, इससे अगर मुझे अब तक कोई नुकसान नहीं हुआ तो आगे भी नुकसान होना मुश्किल है. मैं मन ही मन शुरू से सब कुछ सोच रहा था, मानसिक स्थिति तो मेरी वाकई खराब थी और दबाव भी हमेशा से ज़्यादा थे जैसा मुरलीधर जी ने बताया था. प्रेम में अधूरापन, नौकरी का फ्रस्ट्रेशन, रचनात्मक कुछ ख़ास न कर पाने का दबाव, फिल्में बनाने की उत्कट आकांक्षा....क्या इतने दबावों के बीच मैं सचमुच ओवररिएक्ट करने लगा हूँ ? मैं जिस विचारधारा का आदमी खुद को मानता आया था, इस बात से डर जाने का मतलब उस सोच से भी पीछे हट जाना था और मैं ऐसा हो जाने की स्थिति में आगे की जिंदगी भर रहने वाली शर्मिंदगी के बारे में सोच कर सिहर उठता था. खैर, मैंने अकेले कमरे में जाने का निश्चय किया. खाना खा ही चुका हूँ, अब सीधे जाकर सो ही तो जाना है, ये दिलासा खुद को देकर मैं कमरे में घुसा, टीवी पर एकाध तेज़ नाच वाले गाने देखे, कपड़े बदले और सोने की तैयारी करने लगा. कमरा और उसका सुनसान अकेलापन मुझे डरा तो बहुत रहा था लेकिन मैं इधर उधर की बातें सोचता रहा और उससे बातें करता रहा. फिर बत्ती जलती छोड़ कर बिस्तर पर आ गया और टीवी की आवाज़ कम करके उसे चलता छोड़ कर सो गया.

करीब दो बजे दरवाज़े पर खटखट से मेरी नींद खुली. खटखट स्पष्ट थी.

“कौन है?” मैंने चिल्ला कर पूछा. खटखट बंद हो गयी. मैं फिर से आंखें बंद किये चादर में दुबका था कि खटखटाहट फिर से हुई. इस बार गति तेज़ थी. “कौन है हरामखोर? दम है तो अन्दर आओ.” ये लाइन मैंने बोल तो दी लेकिन बोलते ही एक सिहरता डर मेरे ऊपर हावी होने लगा. मैंने टीवी की आवाज़ तेज़ की लेकिन खटखटाहट की आवाज़ फिर भी आती रही. मैंने हाथ में बैडमिंटन का रैकेट पकड़ा और दिल को कड़ा कर दरवाज़े तक गया और खटखट का इंतजार करने लगा. मैंने सारी बत्तियाँ जला दी थीं ताकि जो हो उसका चेहरा स्पष्ट दिखे. क्या पता अँधेरे में मुझे सामान्य चेहरा भी डरावना दिखे. जैसे ही दरवाज़े पर खटखट हुई, मैंने लपक कर दरवाज़ा खोल दिया, “कौन है साला?”

लेकिन बाहर सिर्फ़ सनसनाती हवा थी. पूरी छत खाली थी और सामने नीम का बड़ा सा पेड़ उस तेज़ हवा में मतवाला हुआ जा रहा था. खुशी से झूमने की उसकी आवाज़ मुझे खासी डरावनी लगी और मैं आकर बिस्तर पर बैठ गया. उस रात मैं सुबह साढ़े चार बजे तक टीवी पर बार-बार दोहराए जाने वाले एक जैसे दीखते फ़िल्मी गाने सुनता रहा और जब मेरी खिड़की से सूरज की लाली दिखाई देने लगी तब मैं आराम से दस बजे तक के लिए सो गया.

                        ३२-         

मुखातिब की दो दिवसीय गोष्ठी के लिए कई मीटिंग्स हो चुकी थीं लेकिन कुछ फाईनल नहीं हो प रहा था. सत्यकेतु जी का कहना था कि प्रियम्वद को बुलाया ही जाए क्योंकि उन्ही के नाम के प्रस्ताव के साथ इस योजना की रूपरेखा बनानी शुरू हुई है और हिमांशु जी का कहना था कि अगर प्रियम्वद को बुलाया जाए तो उनसे कहानी पढवाई जाए. अगर १८५७ पर बुलवाना है तो सिर्फ़ उन्हें बुलवाना ठीक नहीं होगा. १८५७ पर बोलने के लिए उनसे भी अधिकारी लोग हैं, या फिर उनके साथ प्रणय कृष्ण, लाल बहादुर वर्मा, असद जैदी और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह को भी आमंत्रित किया जाए. हर बार मीटिंग्स होती थीं और ऐसी ही बातों के साथ बिना किसी नतीजे पर पहुंचे खत्म हो जाती थीं. सत्यकेतु जी बाकी लोगों से नाराज़ चलने लगे थे और कटने लगे थे. बाकी लोग सत्यकेतु जी से खफ़ा होने लगे थे और उनका कहना था कि सत्यकेतु जी प्रियम्वद के मित्र हैं इसलिए अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए वे मुखातिब का प्रयोग करना चाहते हैं. सत्यकेतु का कहना था कि मुखातिब अब लोकतान्त्रिक संस्था नहीं रह गयी है और वहाँ कुछ लोगों का एकाधिकार रह गया है जो अपनी बातें सब पर थोपना चाहते हैं. खैर, वह गोष्ठी कभी नहीं हो पाई और इस विवाद के साथ ही इलाहाबाद में मुखातिब का पूरे शानो शौकत के साथ चल रहा सफर शिथिल पड़ने लगा था. लोग दबी ज़बान से कहने लगे थे कि मुखातिब वालों में फूट पड़ गयी है और कई गोष्ठियों में तो बाकायदा एकाध ने पूछ भी लिया, “सत्यकेतु जी आजकल गोष्ठी में नहीं आ रहे. उनसे आप लोगों का झगड़ा हो गया है क्या?” हममें से कोई बात संभालता, “अरे नहीं झगड़ा क्यों होगा. वो थोड़े व्यस्त हैं.” सत्यकेतु जी मुखातिब कि अंतिम कई गोष्ठियों में नहीं आये थे. बात बनाने की मैंने कुछ कोशिशें की थीं लेकिन तब तक मेरा इलाहाबाद प्रवास खत्म होने का समय आ पहुंचा था. शायद इसी खुन्नस में सत्यकेतु जी ने मुखातिब के स्वामित्व को लेकर तब सवाल उठाये थे जब मैंने मुंबई में युवा कथाकार दुर्गेश सिंह का कहानी पाठ करवाया और इसकी रिपोर्ट फेसबुक पर दी. मेरे इलाहाबाद छोड़ने के बाद मुखातिब की कुछ और गोष्ठियां तब हुईं जब मैं बीच-बीच में इलाहाबाद गया. इनमें एक बार मेरी कहानी और उपन्यास अंश सुना गया तो एक बार मुरलीधर जी के घर पर उनकी कहानी का पाठ हुआ. मुझे यह कहने में खुशी महसूस होती है कि मुंबई में भी इसके कई आयोजन हो चुके हैं और यहाँ भी साहित्यकार इसे पहचानने लगे हैं. अब शायद सत्यकेतु जी भी उन बातों को लेकर नाराज़ न हों.

राजेश जी मेरे ट्रांसफर से बहुत दुखी थे और अन्य दुखी लोगों में कैलाश जी भी शामिल थे. विवेक मेरे ट्रांसफर से दुखी तो था लेकिन सन्तुष्ट भी था.

“अच्छा हुआ बाबाजी, तुम्हार ट्रांसफर होए गवा. अब हम लोग सिर्फ़ टाइम बर्बाद कर रहे हैं. अलाली की आदत पड़ गयी है तुमहूँ को और हमको भी, शायद शहर छोड़ने से लाइफ में कुछ पॉजिटिव बदलाव आये.”

अगले दिन मुझे सूचना मिली कि मेरा आवेदन मान लिया गया है और मुझे लखनऊ ट्रांसफर किया जा रहा है ताकि मैं वहाँ प्रखर पत्रकारों के बीच बैठ कर पत्रकारिता के गुण सीख सकूं. यह बात मैंने जियालाल जी से भी बताई और उन्होंने हँसते हुए कहा था, “साले पहले ट्रांसफर दूर कर देते हैं कि तुम खुद अप्लिकेशन देकर नजदीक की मांग करो और उन्हें टीएडीए न देना पड़े.”

अगले दिन मैंने यथासंभव पैकिंग की और पूरा दिन कैलाश जी, राजेश जी और विवेक के सानिध्य में गुज़ारा. शाम होते ही फिर वही सवाल उठ खड़ा हुआ. राजेश जी ने मुझे अपनी कसम देने के साथ मुझे कई और कसमें दीं और विवेक ने भी अपने कमरे पर चलने की जिद की लेकिन आज वहाँ मेरी अंतिम रात थी और मैं इसे अपने कमरे में बिताना चाहता था. इसके अलावा आज की ही रात बची थी कि मैं सारी पैकिंग कंप्लीट कर लूँ ताकि सुबह सुबह जल्दी निकल सकूं.

उस रात जब एक डेढ़ के आसपास मैं उससे फोन पर बात कर रहा था कि दरवाज़े पर खटखट फिर शुरू हुई. मैंने उसे बताया और उससे बातें करता रहा. उसने कहा कि मैं चुपचाप बैठा रहूँ और उससे बातें करता रहूँ. हम बातें करते रहे और थोड़ी देर बाद खटखट बंद हो गयी. मैं बहुत खुश हुआ और मुझे भीतर से विजेता जैसा महसूस हुआ. मैंने उसे बताया तो वह भी खुश हुई. मैं अपने बिस्तर पर बैठा उससे बातें कर रहा था जिसके एकदम पास एक खिड़की थी. खिड़की चूँकि पहली मंजिल पर थी, दूसरी तरफ से वहाँ आने का कोई साधन नहीं बनाया गया था. न उसके ऊपर कोई छाजन थी और न ही नीचे कोई आधार था. मैं इस घटना के बाद से खिड़की बंद करके सोने लगा था जो सीधे सुबह ही खुलती थी. उस समय भी खिड़की बंद ही थी. मैं अपनी जीत में खुश था कि अचानक खिड़की से वही खटखटाने की आवाज़ आई. मेरे रोयें खड़े हो गए. वह उधर से कुछ पूछ रही थी और मैं मुँह बाए खिड़की को देखर आहा था जो मुझसे सिर्फ़ एक हाथ की दूरी पर थी. “कहाँ से आ रही है आवाज़?” उसने पूछा.

मैंने हकलाती हुई आवाज़ में जवाब दिया, “खिड़की से आवाज़ आ रही है.” मेरी आवाज़ में बहुत डर रहा होगा तभी उसने मुझे अपनी कसम देते हुए कहा कि मैं वहाँ से उठ जाऊं, कपड़े पहनूं और तुरंत बाईक की चाभी लेकर बाहर निकाल जाऊं. मेरे मन से सारी बहादुरी निकल चुकी थी. वहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ भय का साम्राज्य था, कंपकंपी थी और मेरी ज़बान लड़खड़ा रही थी. मैंने अब तक अपने दिल को बहुत मज़बूत करने की कोशिश की थी लेकिन आज अंतिम रात थी और आज ये पहली बार हो रहा था. मैं उससे फ़ोन पर बातें कर रहा था, कपड़े पहन रहा था और मेरे मन में बचपन के ढेरों दृश्य चल रहे थे. मैं बचपन में अँधेरे और अकेलेपन से बहुत डरता था और माँ एक गाना सिखाया करती थी जिसके गाने से अँधेरे और अकेले में डर नहीं लगता था. बचपन एक भूत की तरह कहीं न कहीं आपके भीतर हमेशा छिपा होता है. मैं चाभी लेकर लड़खड़ाते क़दमों से बाहर निकला और एक बार भी पीछे मुड कर नहीं देखा. मैंने दरवाज़े में ताला भी नहीं लगाया.

बाईक स्टार्ट कर मैं ऐसे भागा जैसे मेरे पीछे सचमुच के भूत लगे हों. मैं जंक्शन पहुंचा और वहाँ बैठ कर सुबह तक चाय और सिगरेटें पीता रहा. वह लगातार मेरे साथ फ़ोन पर बनी रही. मैंने कैलाश जी या विवेक किसी को फ़ोन नहीं किया. जब सुबह के चार बज गए और शहर जागने के लिए अंगड़ाइयां लेने लगा, तब मैं वहाँ से उठा और कमरे की ओर चल दिया. वहाँ सब कुछ वैसे का वैसा ही था. मेरा डर खत्म हो चुका था और अब मुझे पछतावा होने लगा था कि मैंने एक बार उसी समय खिड़की को खोल कर क्यों नहीं देख लिया.

जब तक मैं नहा धोकर तैयार हुआ, विवेक आ गया. मैंने उसे रात की घटना सुनाई. उसने मुझे डांटा कि मैंने उसे फ़ोन क्यों नहीं किया. मैं मुस्करा दिया. मैंने उससे कहा कि मेरे ऊपर दबाव काफ़ी बढ़ने लगा था और ये सब असुरक्षाएं इसी का नतीजा थीं. मैंने उसे यह कह कर चुप करा दिया था कि हम डर के समय विवेक और धैर्य जल्दी खो बैठते हैं, वह मेरी बात से थोड़ा सहमत हुआ लेकिन उसने कहा कि ये अगर वह सिर्फ़ मेरा वहां था तो उसे भी खटपट कैसे सुनाई दी. मैंने क्या तर्क दिया था ये ठीक से याद तो नहीं लेकिन मैंने कुछ ऐसा ही कहा होगा कि दरवाज़े पर खटखट होना एक क्रिया है, डरना दूसरी क्रिया है और खटखट के कारणों का पता किये बिना उससे डरना एक तीसरी अजीब सी अतार्किक क्रिया है.

मुझे अब लग रहा था कि मुझे एकाध रातें और यहाँ बिताने को मिलती तो शायद अपना डर जीत कर मैं पता लगाने की कोशिश करता कि ये आवाज़ कैसी आती थी. लेकिन ये जिंदगी है और हर समस्या यहाँ सुलझ ही थोड़ी जाती है और फिर सब कुछ सुलझाने के लिए वक्त ही किसके पास है. सारा सामान पैक हो चुका था. मिनी ट्रक आने ही वाला था. मैं और विवेक सामान को नीचे उतारने लगे तब तक राजेश जी भी आ गए. सारा सामान एक बार बनारस पहुंचा कर मुझे अगले दिन फिर से इलाहाबाद दो दिन के लिए आना था ताकि कैलाश जी के साथ बाकायदा विदाई समारोह मनाया जा सके. मैंने अपना लैपटॉप वाला बैग विवेक के पास ही रख दिया था.

ट्रक में सामान लदवाने में अश्विनी ने भी मदद की. सारा सामान लाद दिया गया तो मुझे याद आया कि राजेश जी अपने कूलर के लिए स्टैंड लेने की बात कह रहे थे.

“मेरा स्टैंड ले लीजिए राजेश जी.” मैंने उन्हें प्रस्ताव दिया जिसे थोड़े ना नुकुर के बाद वह मान गए. उनके लिए विवेक रिक्शा ले आया. मेरा सारा सामान ट्रक में लादा जा चुका था. विवेक और राजेश जी रिक्शे पर बैठ गए क्योंकि कूलर स्टैंड भारी था. मैं ट्रक में बैठने जाने वाला ही था कि राजेश जी ने मुझे आवाज़ देकर बुलाया, “अरे महाराज, एक फोटो हो जाए. आप इलाहाबाद और हम लोगों को छोड़ कर जा रहे हैं.”

मैंने उन दोनों की और फिर हम सबकी तस्वीरें अपने मोबाइल से खींचीं.

“जाकर मेल कर दीजियेगा दोनों लोगों को ये सब फोटो.” राजेश जी ने कहा. मैंने हामी भरी. हम सब हँस मुस्करा रहे थे.

विवेक ने कहा कि विमल ने फोटो इसलिए ली है कि कभी भी दिखा के कहेगा कि ये उसका कूलर स्टैंड है और आपको देना पड़ेगा. इस मज़ाक पर किसी को हँसी तो नहीं आई लेकिन राजेश जी ने मुस्कराकर कहा, “अरे विमल जी ऐसा थोड़े करेंगे.” अब विवेक को मौका मिल गया. उसने ऊँची आवाज़ में कहा, “ई इलाहाब्बाद है भईया, इहाँ कुच्छो होय सकत है.” मैं हँस दिया. राजेश जी भी हँसे. अश्विनी भी पूरी बात न समझने के बावजूद हँस पड़ा.

“चलिए फिर मिलते हैं कल.” मैंने कहा.

“चलिए अच्छा है आप कल एक दिन के लिए आ रहे हैं....नहीं तो अब इलाहाबाद तो छोड़ ही दिया आपने..” राजेश जी ने भरी आवाज़ में कहा.

“इलाहाबाद छोड़ भी देंगे तो इलाहाबाद आपको नहीं छोड़ता जल्दी...” अश्विनी ने कम शब्दों में सबसे सही और सच्ची बात कही.

मैं ट्रक पर ड्राईवर की सीट के बगल में बैठा तो मेरा मन भारी सा हो रहा था. सब कुछ बहुत अचानक हुआ था और सबसे मिलने का वक्त ही नहीं मिल पाया था. उन दोनों के साथ अश्विनी भी मुझे देखकर हाथ हिला रहा था. राजेश जी कुछ कह रहे थे और मैंने उनकी बात सुनने के लिए सिर आगे झुकाया ही था कि ट्रक वाले ने ट्रक चला दिया. पता नहीं उसे क्या जल्दी थी.

मैं नहीं सुन पाया कि वह क्या कह रहे थे. बाद में उनसे पूछा भी लेकिन उन्हें याद नहीं आया. यही होते हैं न कुछ छूटे हुए पल जिनमें आप चाहकर भी प्रवेश नहीं कर सकते. इलाहाबाद मेरा वही छूटा हुआ पल हो गया है जिसे पकड़ने के लिए जब भी बनारस जाता हूँ, वहाँ ज़रूर जाता हूँ लेकिन नहीं पकड़ पाता. हाथ बहुत छोटे होते हैं और उम्र बहुत बिखरी हुई है जिसे समेटने और सहेजने में ही सारा वक्त निकल जाता है. वहाँ मेरा स्वागत सब उसी तरह करते हैं लेकिन मेरी कोई अपनी जगह नहीं बची इसलिए वहाँ से लौट आना होता है.

मैंने इलाहाबाद छूटने के साथ ही सोच लिया था कि अब और भी कई सारी चीज़ें छोड़ देनी हैं.

सोचना हमेशा कोई सार्थक क्रिया ही नहीं होती.  | 

                                

                                   समाप्त 



सिताब दियारा की तरफ से विमल भाई और आप सबका आभार 


संपर्क -

विमल चन्द्र पाण्डेय 
प्लाट न. 130 - 131 
मिसिरपुरा , लहरतारा 
वाराणसी , उ.प्र. 221002

फोन न. - 09820813904
         09451887246


फिल्मो में विशेष रूचि 
 




15 टिप्‍पणियां:

  1. sundar !
    ram ji , maine padha tha sitab diyara bihar ke saran (chhapra ) jile me hai , aur j.p. bhi khud bihari batate the . isi aadhar par patna air port ka nam unke nam par hi hai .

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  2. कल ही सूचना मिल गयी थी कि आज आखिरी किश्त आ रही है.
    मन उदास हो आया था और आज सुबह से उत्सुकता थी कि कब आता है. देर से आया पर दुरुस्त आया.
    एक मंजे हुए कथाकार की तरह विमलजी ने भूत वाला मामला निपटाया. कल आशुतोष सर की टिप्पणी के बाद ध्यान उधर अनायास था.
    इलाहाबाद विमलजी से छूटा नहीं है. अब तो उनका आना-जाना लगा ही रहता है.
    रेणुजी से प्रथम परिचय वाला प्रसंग पसंद आया और माताजी को दिया गया जवाब भी...

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  3. इस अंतिम किश्त के साथ यह सूचना कि विमल का यह संस्मरण दखल प्रकाशन से पुस्तकाकार प्रकाशित होगा.

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  4. मुकेश जी ...सिताब दियारा बलिया, उ.प्र. में ही है ..बलिया तीन तरफ से बिहार से घिरा हुआ है ..उत्तर , पूरब और दक्षिण | बलिया के धूर पूरबी और थोडा सा दक्षिणी हिस्से की तरफ सिताब दियारा गाँव है , इसे जयप्रकाश नगर भी कहा जाता है | यहाँ बलिया और बिहार की सीमा को अलगाने वाली नदी गंगा बहती है | चुकि इसमें गंगा अपनी धारा के साथ आवाजाही करती रहती हैं , इसलिए यहाँ सीमा का विभाजन बहुत स्पष्ट नहीं हो सकता है | उम्मीद है आप संतुष्ट हो गए होंगे ..|

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  5. Ek sans me padhi gain sari kishten..pathak ko bandh lene me mahir hai vimal ki kalam..bahut shukriya ram ji or vimal ka...par bhoot ka kya hua .. :)

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  6. विमल का यह संस्मरण मेरे इतवार का जरूरी हिस्सा बन गया था. इस अंतिम किश्त को थोड़ा भारी मन से पढ़ा. विमल और सिताब दियारा का आभार. पुस्तकाकार प्रकाशन की चटपट घोषणा के लिए अशोक भाई और दखल का भी.

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  7. Dakhal prakashan ki is rachna ka intezaar rahega..Bahut hi achhi adat ab chhot jayegi...Aisa kuch hamesha chalte rahna chahiye jaise bachpan ke program aur ad jo Doordarshan pe aate the

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  8. भारी मन से विदा .इन संस्मरणों पर शशांक की टीप सटीक रही -Vimal Dada - The way you quote the emotions with a layer of humour is amazing!
    इस संस्मरण इस विधा की दो आम कमजोरियां नहीं हैं --चरित्र- हनन और आत्म -प्रक्षेपण .इलाहाबाद का एक दौर साफ़ साफ़ उभर कर आया .भले ही उस दौर की कुछ महत्वपूर्ण साहित्यिक उपलब्धियां , किताबें , बहसें , घटनाएँ नहीं हैं , न सारी सामाजिक राजनीतिक हलचलें . लेकिन यह संस्मरण है , इतिहास नहीं .इसे निजी इतिहास भर होना चाहिए था , और वह है. सम्वेदनशील पाठक को यहाँ कविता भी मिलेगी , कहानी भी , और औपन्यासिकता भी .भूत -प्रसंग जागरूक समकालीन पाठक को एक झटका देता है , लेकिन संस्मरण को एक आख्यानात्मक गहराई भी .आखिर लेखक और पाठक ही सारी कहानियां नहीं लिखते , कुछ कहानियाँ प्रेत -लेखक की तरह समय भी लिखता है .यह एक ऐसी ही कहानी है . है न ?

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. नेट पर बहुत कम पढता हूँ लेकिन विमल भाई की लेखनी पूरे समय रोक लेती है .नई यात्रा ,नई विधा में लेखन का इंतज़ार है .

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  11. प्रतिक्रिया न देने की बेईमानी न करते हुए- यह वृतान्त आज की लिखी जा रही उन कहानियों पर बहुत बड़ा प्रहार है, जिन्हें पढ़ कर कहानी की पूरी जात से ही उदासीनता हो जाती है. इस वृतान्त में वह सब कुछ है जो इस लेखन को 'कहानी' बना दे. बहुत खुशी की बात है कि तरस रहे 'पाठक' को यह आगे उपन्यास रूप में उपलब्ध होने जा रहा है. यदि विमलजी अपनी ट्रेडमार्क स्टाईल पर हल्का सा रन्दा मार लें तो साहित्य को एक बहुत ही शानदार कथा-शिल्पी मिल जाएगा (एक उम्दा कलम तो है ही).

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  12. बहुत ही खूबसूरत सफर रहा यह... हर रविवार इंतजार रहता था... इस रविवार घर से दूर था और बाद में तबियत खराब रही, इसलिये पढ़ने में भी और टिप्‍पणी करने में भी देरी हुई। इतनी जल्‍दी समाप्‍त होने की तो उम्‍मीद नहीं थी... खैर, हर किस्‍से की तरह इसका भी कहीं तो समापन होना ही था.. विमल के इस संस्‍मरण को पढ़कर बहुत कुछ याद आता रहा है... सच कहूं तो यह टिप्‍पणी लिखते वक्‍त आंखें नम हैं... कम ही पढ़ने को मिलते हैं ऐसे जीवंत संस्‍मरण... बधाई विमल...ऐसे ही लिखते रहो भाई।

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