शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

इन दरख्तों से खूँ टपकता है --- अनघ शर्मा की कहानी

अनघ शर्मा  


प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर अनघ शर्मा की यह कहानी
                                           
इन दरख्तों से ख़ूँ टपकता है!!!

1
ऎ मुहब्बत वालियों, उठो देखो किले की बुर्जियों में सौदाई फरिश्तों के आँसुओं का सैलाब उमडा पड़ा है।  बीबी,बेगम मुमताज़ का इंतकाल हो गया। मुहब्बत वालियों देखो सफेद संग को तराश कर शाहजहां ने ताज बनवाया है। उसकी सफेद मीनारों से सरक कर कोहरा नीचे उतर रहा है। जमुना कि ऊदी रेत पर ओस पड़ रही है या पाला है कुछ समझ नहीं आता। वो देखो किले की बुर्जी की तरफ कोई बढ़ा जा रहा है। वहाँ जहाँ शाहजहां कैद है।  सोने की सुनहरी थाली में,गोटे लगे किमख्वाब से कुछ ढका हुआ है। क्या है ये ? शाहजहां ने खींच कर कपडा हटा दिया। कटा हुआ सिर। किसकापद्मा का सिर, किसने काटा? सिर छूट कर शाहजहां के हाथों से गिर पड़ा। चौंक कर इमराना जाग पड़ी। खिड़की के नीचे भीगा हुआ मोतिया महक रहा था। उसने पलट कर घड़ी देखी सुबह के चार बज रहे थे। पिछली पूरी रात रह-रह कर पानी बरसता रहा था। उसने उठ कर कूलर बंद किया और पंखे की गति धीमी कर दी। पिछले साल इसी सावन में पंडित ने शुक्ला जी से कहा था।
"आने वाला अगला साल बहुत अच्छा होगा दिव्य के लिए शुक्ला जी। अगले साल सावन में स्वाति नक्षत्र बड़ा शुभ है लड़के के लिए। पर हाँ एक बार रुद्री पाठ करवा दें इसके नाम से, फिर देखिये कैसे आपके नाम और विरासत को आगे बढ़ाता है दिव्य। और सवा आठ रत्ती का लहसुनिया पहनवा दीजिए चांदी में।
इमराना ने एक जम्हाई लेते हुए खुद से कहा, सो जाओ इमराना बीबी अभी तो सात बजने में बहुत वक़्त है, और जब से आगरा आई हो जी भर नींद नसीब नहीं हुई। उसने लाहौल पढ़ा, वैसे भी पिछले कई दिनों से ऐसे डरावने सपने बहुत आने लगे थे उसे।
किसका सिर काट भेजा औरंगज़ेब ने??
दारा का !!!
ये सियासत है शाहजहां ने सोचा और वहीं गश खा कर गिर गया। ये सिर पद्मा का तो हो ही नहीं सकता, उसने सोचा। वो तो अभी गुज़री है साढ़े तीन महीने पहले और दारा तीन सौ साल ……। हाँ वो वही होगा।
सियासत या राजनीति का ताना-बाना इतना घना होता है कि माइक्रोस्कोप के साथ भी कुछ  देखना मुमकिन नहीं। पत्तियों के तंतुजाल से भी ज्य़ादा घना और दुरूह। ऐसा ही घना और जटिल दिमाग था रेवती चरण शुक्ला का।  कैसे-कैसे माइग्रेट्स वहाँ आ कर शरण पाते थे। इमराना भी उन्ही में से एक थी।
चाय कि प्यालियों खट-पट ने उसे वक़्त से कुछ पहले ही उठा दिया।
क्या कर रहे हो दीपक?” उसने नौकर से पूछा।
भैया जी के लिए चाय बनाई थी तो प्याले साफ़ कर रहे हैं।
कुछ बता कर गए हैं? कहाँ जा रहे हैं?
हाँ , सुधीर भाई साहब के साथ एक हफ्ते के लिए लखनऊ।
और हम यहाँ पागलों की तरह इस कोठी की साफ़-सफ़ाई करवाते फिरें, इमराना ने बड़बड़ाते हुए कहा। हमारी चाय हमारे कमरे में ही पहुँचवा देना, थोड़ी देर और आराम कर लूँ मैं।

2

सारा दिन बागीचे की साफ़-सफाई कराने में गुज़र गया। इतनी बड़ी कोठी थी पर बसावट कम और पेड़-पौधे ज्यादा। हर तरफ लम्बी-लम्बी घास खड़ी थी जिसे उसने रोलर चलवा कर कटवाया, पेड़ों की टहनियाँ छटवायीं और फिर जा कर दिव्या का कमरा साफ़ किया। कमरे में एक तरफ रॉट आयरन का मॉडर्न डिज़ाइन में पलंग पड़ा था। एक कोने में रोज़वुड की मेज़ रखी थी, जिस पर उसका अधखुला लैपटॉप, चाय का प्याला और आधा खाया टोस्ट पड़ा था। उधर पलंग पर एक सफ़ेद कुर्ता पड़ा था,जिसे शायद वो सुबह जाते वक़्त पहनने वाला था, पर छोड़ गया। उसे तह करते हुए उसने सोचा। ये आस्तीनें कितनों के खून के छीटों से भीगी हुई हैं। यार-दोस्तों के, ग़ैरों के, अपनों के छीटों से।
धाँय, गोली चली, पद्मा के सीने को पार कर गयी।  वो चौंक कर चैतन्य हुई। ये पॉलिटिक्स उसकी समझ में नहीं आती। इन कोठियों में पता नहीं क्या-क्या होता है। जब वो अपने कमरे में पहुंची तो शाम ढल चुकी थी। इक्का-दुक्का बादलों को चीर कर चाँदनी नीचे उतर कर चमक रही थी। उसने खिड़की खोली ,ठीक सामने टिकोमेर्जेंटीना का पेड़ खड़ा था।, जो उसे बिलकुल पसंद नहीं था। दो कौड़ी का पेड़ न शक्ल न सूरत, उसने खिड़की बंद कर दी। उसने दूसरी खिड़की खोली , सामने चन्द्रमा साफ़ दीख रहा था ,एक तांबई रंग के गोले के अंदर।
"ये गोला कैसा है अम्मा '?
दो पंद्रह-सोलह साल की लडकियां एक बुढ़िया के पेट में हाथ डाले ये बात पूछ रही थीं। इनमे से एक पद्मा थी दूसरी इमराना।
"जब ऐसा घेरा पड़ता है तो इन्दर भगवान् सभा करते हैं देवताओं की
"ऐं अम्मा, जैसे छोटे चाचा करते हैं? पद्मा ने पूछा"
हाँ वैसे ही, उन्होंने हंस कर कहा।
पर किसे पता था कि आने वाले कल की एकांकी में ऐसी सभाओं की सूत्रधार पद्मा होगी। वक़्त की कुंडली में बड़े-बड़े सूत्रधारों का भविष्य सिर छिपाये सोता है। आज के शेर, जंगल के मालिक,दरियाओं का रुख मोड़ने वाले कल सिर्फ हवाले में इस्तेमाल होंगे।  शुक्ला जी को रह-रह कर ये ही डर खाये जा  रहा था।  वो अभी-अभी एक बड़ी पार्टी से अलग  हुए थे। अपने चौंतीस साला राजनैतिक अनुभव के बल पर उन्होंने अलग पार्टी तो बना ली, पर ऐसा तारणहार जोड़ने में असमर्थ रहे जो उनके बाद इस विरासत को आगे बढ़ा सके। इसलिए अब उनकी सारी आशाऐं अपनी भतीजी पद्मा पर टिकी थीं। उनका दिमाग हज़ारों दांव-पेंच से भरा था। इन दांव-पेंचों को परवान चढाने के लिए उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो महत्वाकांक्षी हो और साथ-साथ नये सपने देखने का आदी भी। इस कसौटी पर सिर्फ़ पद्मा खरी उतरती थी। उनकी दूसरी निकटस्थ थी इमराना, जिसका काम सिर्फ़ इतना था कि सज-धज के उनकी दी हुई इफ्तार पार्टियों में घूमना या साल में कभी-कभार अल्पसंख्यक आयोग की किसी मीटिंग में साथ चले जाना। इसलिए उनकी नैया का सारा दारोमदार अब पद्मा पर था।
3
एक गुणा एक बराबर ग्यारह, एक गुणा एक बराबर ग्यारह वो बार-बार दोहराये जा रहा था।
ऐ क्या पढ़ रहा है यह?? पद्मा ने दिव्य को झिड़का, किसने सिखाया ये??
नाना जी ने, उसने एक नज़र शुक्ला जी को देख कर कहा।
क्या चाचा जी आप भी पद्मा ने कहा।
अरे हम इसे राजनीति का गणित सिखा रहे हैं।  कैसे गठजोड़ से विधायकों को खरीदा जाता है ? कैसे निर्दलियों को अपने पक्ष में किया जाता है? ये किताबी गणित तो कोई भी मास्टर पढ़ा देगा इसे। उन्होंने हॅसते हुए कहा, तुम्हें कितनी मुश्किल से सिखाया था राजनीति का ककहरा हमने। इसके मामले में हम कोई रिस्क नहीं लेंगे, इसे तो बहुत आगे जाना है अभी, वो भी कम समय में। तुम तो अभी भी कितना स्लो हो।
पर वो नहीं जानते थे कि एक दिन ये स्लो-लर्नर तुरुप का इक्का साबित होगी। जो गूढ़ ज्ञान पद्मा को लिंकन, गाँधी, नेहरू और बाबू जगजीवन राम का दर्शन नहीं दे पाया। वो उनकी संगति में धीरे-धीरे फल-फूल कर छतनार पेड़ बन गया।
"याद रखो पद्मा गाँधी, नेहरू का दृष्टिकोण लोकल पॉलिटिक्स समझने में कभी कोई हैल्प नहीं देगा"। उसके लिये तुम्हें लोकल आदमी की स्टडी करनी पड़ेगी। उसके फोड़े-फुंसी से लेकर बवासीर तक का हिसाब रखना पड़ेगा। नेशनल लेवल पर जाने के लिए पहले ज़िला स्तर पर दो-चार होना पड़ेगा।
ये छोटी-छोटी सीखें काँच चढ़े माँझे की तरह उसके रास्ते की हर पतंग को काटती गयीं।
                                                        
…………………
मन क्या है चाचा जी ?
मन क्या है? कुछ नहीं, एक आला दर्ज़े का हैट-रैक है पद्मा। जिसपे लोग टोपियाँ उतार-उतार कर टांग देते हैं। या ख़ालिस शब्दों में ये सिर्फ़ एक खूँटी है, जिस पर हज़ारों तरीके के मुखौटे टंगे रहते हैं, अपनी सुविधा से जो भी चाहो उतार कर पहन लो। इस खूँटी पर तुम्हें शतकोटि कृष्ण टंगे मिलेंगे, अर्जुन, नकुल-सहदेव से ले कर दुर्योधन,शकुनि से लेकर शिखंडी तक एक-दूसरे में गुथे हुए मिलेंगे। अलग- अलग मौकों पर इस खूँटी के हिज्जे-हिसाब बदलते रहते हैं यानि दिशा-दशा परिवर्तन। जिससे भी तकलीफ़ हो उस मुखौटे को तुरंत उतार दो पद्मा।
कुछ ही सालों बाद पद्मा शुक्ला विधवा हो गयीं, और खूँटी से रंजन नाम का मुखौटा उतर गया।
                                                  
……………………
शाम का धुँधलका अभी धुँधला ही था, अंधेरे में नहीं बदला था। अँगीठी के अध् बुझे कोयले सा, न पूरा सुलगा हुआ न ही बुझा हुआ। हल्का-हल्का लाल रंग में लपलपाता हुआ। सेलम की रुई सा गुनगुना। मुहब्बत के लिए एकदम माफ़िक वक़्त।
रंजन पिल्लै ने सदर बाज़ार के ओर-छोर एक नज़र उठा कर नापे पर पद्मा का दूर-दूर तक कोई पता नहीं था। वो दोनों हाथ पैंट की जेब में डाले इधर-उधर टहलता रहा पर वो नहीं आई।
वो इसी साल कर्नाटक से आगरा आया था। इतिहास से एम. था और मुग़ल कालीन भारत पर रिसर्च कर रहा था। और आगरा से बेहतर क्या जगह हो सकती थी। वो दोनों कभी क़िले में मिलते, कभी फतेहपुर सीकरी, कभी ताजमहल में तो कभी राजा मंडी मार्केट में। उसे इतिहास से प्रेम था और उसे राजनीति से। वो अकबर का दर्शन समझता था और वो युद्धनीति। वो शाहजहां के स्थापत्य से चकित था तो वो उस दौर के षड्यंत्रों को सूंघती फिरती थी। वो खंडहरों में हँसी सुनता था तो वो तलवारों कि आवाज़।
                                                
…………………
ये शाम के उदास चेहरे मुझे बहुत लुभाते हैं। ये उदासियाँ मुझे बहुत पसंद हैं। मेरी अपनी ज़ाती हैं, निजी हैं, व्यक्तिगत हैं। मेरी पर्सनेलिटी का एक बड़ा हिस्सा अँधेरा, उदास है। किसी का दिया हुआ नहीं, मेरा अपना छांटा हुआ। ज़िंदगी के अलग-अलग हिस्सों से थोडा-थोडा चुरा कर मैंने ये फ्रेम तैयार किया है। नदी किनारे का गीला सूनापन, आधा चन्द्रमा, क्रिसेंट मून तुम नहीं समझोगे। हज़ार-हज़ार सालों तक कोई नहीं समझेगा इस महकते हुए डिप्रेशन को। उसने वॉटर-वर्क्स चौराहे पर खड़े हुए रंजन से कहा। पीछे यमुना उदास दम तोड़ती लहरों में बह रही थी। हर साल इसका पानी कम हो जाता है। यहाँ बाढ़ क्यों नहीं आती ? आये तो रिलीफ फंड इकठ्ठा किया जाये। थोड़ा पॉलिटिकल फुटेज तो मिलेगा, उसने सोचा।
चलें, उसने रंजन से पूछा।
हाँ, तो सवाल ये है पद्मा कि तुम पॉलिटिक्स में क्यों हो?
रंजन और भी बहुत कुछ कहता रहा, पर वो दूसरी तरफ बहती हुई यमुना को देखती रही। नदी के छोटे-छोटे भँवर में गेंदे के फूलों की माला एक थैली में बंधी धीमी गति से बह रही थी।  हम सबका जीवन ऐसा ही है।  इन लहरों के सहारे बहता, डूबता, टूटता हुआ और किसी एक मोड़ पर ओझल। आधे चन्द्रमा की परछाईं लहरों के साथ बहते-बहते कभी टूट जाती थी, तो कभी नए सिरे से बन जाती थी। बादलों के रुई जैसे टुकड़ों ने आकाश को अपने अंदर समेट लिया। वो दोनों पुल के फुटपाथ से उतर कर सड़क पर आ गये। उसने कुछ कहा वो सुन नहीं पाई। एक बस तेजी से दोनों को पीछे छोड़ती हुई आगे निकल गयी , और उसकी बात हॉर्न के शोर में डूब गयी।


4
तो सवाल ये है कि मैं पॉलिटिक्स में क्यों हूँ चाचा जी?
आजकल बहुत सवाल पूछने लगी हो तुम। यहाँ बैठो, शुक्ला जी ने एक कुर्सी खींच दी उसके आगे। इनसे मिलो ये है प्रभात अग्रवाल, हमारी पार्टी के बिहार और बंगाल के नये प्रभारी। मैं चाहता हूँ कि तुम इनके साथ बिहार में पार्टी प्रचार पर ध्यान केंद्रित करो। अभी तुम्हारी मेहनत पार्टी की स्थिति मजबूत कर सकती है और लौट कर यू.पी पर ध्यान लगाओ। तुम्हारा उत्तर समय आने पर। वो एक झटके से उठे और बाहर निकल गए।
छः महीने के लम्बे अंतराल ने उसके अंदर ठहराव पैदा कर दिया था। कहाँ-कहाँ नहीं घूमी थी वो। मोतिहारी,पटना ,पूर्णिया, भागलपुर और भी न जाने कहाँ कहाँ, लगभग आधा बिहार। इस यात्रा ने उसके अंदर आकलन करने की एक नयी क्षमता को जन्म दिया था। अब उसके अंदर उमड़ते-घुमड़ते  प्रश्नो के बादल कम बरसते थे।
तुम पार्टी क्यों नहीं ज्वाइन कर लेती? एक एक्टिव वर्कर बन जाओ। वैसे भी तुम इफ्तार पार्टीज़ और अल्प संख्यक आयोग की मीटिंग्स तो अटेंड करती हो। तुम्हारे पार्टी को फ्रंट लेवल पर ज्वाइन करने से एक ख़ास कम्युनिटी को हमसे जुड़ने में आसानी होगी , पद्मा ने इमराना से कहा।
चाय के प्याले में चीनी घोलते-घोलते इमराना रुक गयी। आजकल तुम्हारे दिमाग में छोटे चाचा की तरह हज़ारों खुरपेंच चलती रहतीं हैं। क्यूँ ,है न पद्मा ?? मैं ज़मीनी स्तर पर रही हूँ हमेशा और वैसे ही रहना चाहती हूँ। यूँ भी मुझे ये सब चीज़ें कम समझ में आती हैं।
फिर भी .............
फिर भी क्या पद्मा? महुआ के शहद से ज्यादा मीठे हैं छोट चाचा और महुआ की ताड़ी से ज्यादा ज़हरीले। बड़े घाघ हैं ये। इमराना ने खिड़की खोलते हुए कहा। खुली खिड़की में से साफ़ धुला आकाश दीख रहा था और आधा चन्द्रमा चमक रहा था। हल्की-हल्की चाँदनी चारों ओर फैलने लगी थी। सामने के पेड़ पे किसी घोंसले में परिंदे ने पंख फड़फड़ा के करवट बदली। कंपन से शाखें काँपी। दो मुरझाये लाल फूल शाख़ से टूट कर ज़मीन पर गिरे तो उसने खिड़की बंद कर दी।
                                               
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इन लाल गुलाबों के अंदर ऐसी तेज गंध होती है जो आदमी का सिर चकरा दे। इनकी पत्तियों के साथ कांटे होते हैं। चन्दन के पेड़ पर साँप लहराते फिरते हैं। यही साँप अपराजिता और रात की रानी की तरफ़ भी आकर्षित होते हैं। भंवरे चम्पा के फूलों की तरफ़ झांकते भी नहीं। हज़ार-हज़ार रात चम्पा यूँ ही नंगे आसमान के नीचे खुले सिर भंवरों के इंतज़ार में खड़ी रहती है। यहाँ प्रेम जैसा कुछ नहीं होता रंजन। वक़्ती रस्में हैं ये सब और वक़्त के साथ इनका रूप बदल जाता है। मेरा-तुम्हारा या किसी का किसी से भी सम्बंध निश्छल नहीं है। इस आँचल के किनारे में ये जो रेशमी धागे से फूल कढ़ा है। इसके लिए भी इसे हज़ारियों बार सुई से छलनी होना पड़ा है। व्यक्ति का सिवाय अपने आप के किसी और से निश्छल प्रेम नहीं हो सकता। इसीलिए प्रेम बड़ा पीड़ा दायक है।
"पर जहाँ मन मिल जाते हैं वहाँ प्रेम पीड़ा दायक नहीं होता। "
"मन तो एक खूँटी है रंजन,जिसपे हज़ारों मुखौटे टंगे रहते हैं। ",कल को कोई भी मुखौटा फिसल सकता है।
"ये रहस्य,रोमांच,गंध,रंग,सूर्य की चमक,लहरों के प्रसार में डूबते किनारे,मिस्त्र की प्रेम कहानियों में ही नील के किनारे अच्छे लगते हैं।,और नील इस देश में बहती नहीं रंजन।
"इस देश में गंगा और शांतनु का प्रेम तो है पद्मा। "
"गंगा इस शहर में नहीं। "
"इस शहर में यमुना तो है,यहाँ से ताजमहल दीखता है पद्मा। "
पर शुक्ला जी जानते थे, नदी कोई सी भी हो जब उफ़ान पर आती है तो बुलंद इमारतों की भी नींव हिल जाती है। पद्मा की भावनाऐं उनकी इच्छाओं की नींव हिलाती उससे पहले ही पद्मा का जीवन रंजन के साथ बांध दिया उन्होंने।

5
शाम ने अपने नन्हे-नन्हे पंख फैला कर ज़मीन पर उतरना शुरू कर दिया था। सड़क के दोनों ओर बकाइन और कनेर के पेड़ शाम के टिमटिमाते उजाले में चुपचाप खड़े थे। यही पिछले बरस तक पौधों की श्रेणी में आते थे। शाम अब पंख समेटे कैक्टस के गमले के पास बैठी थी। गमले में बहुत सारे छोट-छोटे हल्के गुलाबी रंग के फूल खिले थे। रात के आने में अभी बहुत समय था। शाम ने वहीं से बैठे-बैठे दरवाज़े की दरार में से झांक कर देखा। पद्मा के कमरे में रात का अँधेरा पसरा पड़ा था। वो घबड़ा के उठ खड़ी हुई। बाहर किसी शाख़ से कनेर का फूल टूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा। इमराना ने दरवाज़ा खोल कर कमरे की बत्ती जलाई। सामने की मेज़पर पद्मा कि तस्वीर रखी थी,जिस पर सुबह के चढ़े फूल सूख चुके थे। हवा के साथ कामिनी के फूलों की गंध कमरे में घुलने लगी। उसने तस्वीर के सामने दिया जलाया और ताजे फूल चढ़ा दिये। मेज़ के एक कोने पर अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की जीवनी रखी हुई थी। इमराना ने हंस कर सोचा जो पद्मा जय प्रकाश नारायण,और गांधी की जीवनियां पढ़ कर राजनीति की सीढ़ियां चढ़ती थी। आज उसका बेटा विदेशी राजनेताओं का हाथ थामे कूटनीति पढ़ रहा है। वो आराम कुर्सी पर बैठ गयी।
रात अब अपने पूरे चरम पर थी। पहर के आखिर में उसने देखा बाहर अँधेरा सागवान के चौड़े-चौड़े पत्तों से उतर कर नीचे खिली नागचम्पा पर फैलने लगा था। यहाँ से आगे बढ़ कर ये यमुना के मटमैले पानी की सतह पर लेट कर और गहरा हो जायेगा। हाथी घाट तिराहे पर हाथी और उनके पैर जकड़े मगर भी इस अँधेरे की गहरी पकड़ से बच नहीं सकते। वहाँ से आगे बढ़ कर ये सड़क किनारे दोनों तरफ पत्थर की अधबनी मूर्तियों पर छा जायेगा। उसके बाद ये मनकामेश्वर के शांत,चुप,आधी नींद में डूबे मंदिर को अपने अंदर लपेटता हुआ आगे बढ़ जाएगा।फिर ताजमहल की ऊंची सफ़ेद मीनारों के गले पर लिपट कर उनका दम घोंटने लगेगा। और फिर दिया बुझते ही इस कमरे में पसर जाएगा। उसने कांपती ऊँगली से नाइट बल्ब जला दिया और कमरा बंद करके बाहर चली   गयी।
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अपने कमरे में बैठा हुआ दिव्य अपनी सीधी कलाई निहार रहा था। इसी कलाई पर लगभग छः महीने पहले पुलिस ने हथकड़ी पहनायी थी। खींचतान में अंगूठे के पास का एक बड़ा हिस्सा कील में फंस कर फट गया था। वो ज़ख्म तो अब भर गया था, पर एक पीली लकीर रह गयी थी उस जगह। उसे पता ही नहीं चला कब पीछे से सौम्या आ गयी। जब उसने झुक कर उसका कन्धा चूमा तो वो चौंक गया।
"तुम कब आयीं?"
"बस अभी आई, क्या सोच रहे थे?"
"कुछ नहीं ऐसे ही लखनऊ वाली मीटिंग का प्लान बना रहा था,कल जाना है ना। नीचे कौन-कौन बैठा है?"
"दयाल अंकल और नानाजी,कल कैसे जाओगे?"
"क्यों?"
"नानाजी कह रहे थे कि कल तुम्हें दीवानी जाना है। "
हम्म्म …… एक मिनट चुप रह कर उसने कहा। लखनऊ तो रात को जाना है और दीवानी सुबह,बारह बजे तक फ्री भी हो जाऊँगा।
"भाई जी को बोलूँ साथ जाने के लिए। "
"शैलेश को क्यों तंग कर रही हो ?,आई विल मैनेज माइसेल्फ "
"ठीक है ", बाद में मुझे अबुलला की मज़ार तक ड्रॉप कर दोगे?
"क्यों?"
"इम्मो मौसी पद्मा आंटी के लिए चादर चढ़ायेंगी,साथ चलने को बोला था उनने।"
"रहने दो,क्या करोगी जा कर ?", उसने सौम्य को घूरा।
जैसे उसने कोई न कहने लायक भेद भरी भीड़ में खोल दिया हो।
"फॉरगेट ऑल सच स्ट्युपिडिटी। "
"तुम आंटी का ज़िक्र आते ही बात क्यों टालने लगते हो ?"
"क्योंकि मुझे उस विषय में बात करना पसंद नहीं। "
दिव्य बाहर निकलो इस गिल्ट से। तमाम दुनिया जानती है वो एक हादसा था बस। ट्राई टू बी हैप्पी। इतना परेशान क्यों रहने लगे हो आजकल ?
क्योंकि मैं जानता हूँ वो गोली ………वो गोली।
श्श्श्श्श .......... सौम्या ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। ख़बरदार जो कुछ भी कहा। चुप बिलकुल चुप।
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद दिव्य ने पूछा।
"तुम्हें आज से पहले ऐसे रिएक्ट करते नहीं देखा सौम्या।"
"क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती। "
"जीवन एक झरने की तरह है दिव्य,हर वक़्त बहता हुआ। निरंतर आगे को बहता हुआ। कभी पलट कर नहीं लौटता, जो गया सो गया। मत बाँध कर रखो कुछ,उलीच दो दोनों हाथों से। सब बहा दो, कुछ मत रखो दिव्य।"
"बहुत कुछ उबलता रहता है अंदर ही अंदर। "
"दिव्य दुनिया की कोई आग किसी समन्दर, किसी झरने को सुखा नहीं सकती। समन्दर की सतह में लगातार फूटने वाले ज्वालामुखी भी कभी उसे सुख नहीं पाते। किसी के भी भीतर सूरज जितना ताप नहीं होता जो सब जला कर ख़त्म कर दे। अंदर आग पालने वालों की आँखों में भी आँसुओं का सोता छिपा होता है। "
सौम्य ने उठ कर खिड़की खोल दी। धूप की एक किरण तिरछी हो कर उसके माथे से फिसलती हुई कंधे पे जा कर खत्म हो गयी। वहाँ देखो दिव्य, सौम्या ने बाहर खिले हुए एक सदाबहार की तरफ इशारा किया।
"ये पौधा दो बार मेरी गाड़ी के नीचे आ गया था।", फिर भी अपनी जिजीविषा से पनप रहा है। फूल भी खिल रहे हैं। बरसातों के मौसम में भी कई मोर पंख फैला कर नहीं नाचते। अनार की डालियों की छतनार छाँव सब को नहीं मिलती। तुम्हें मिली है तो उपयोग करो।"

6
खटाखट-खटाखट कैमरे के फ़्लैश ने उन सब पर रौशनी बिखेरनी शुरू कर दी। एकाएक भीड़ में ऎसी हस्तियों को देख कर हाटवालियों ने अपने-अपने सामान समेटने शुरू कर दिए। किसी ने सिल -बट्टा पीछे सरकाया, किसी ने चीनी मिट्टी के प्याले खिसकाए। किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ और उनके लिए रास्ता बना दिया।
"ये सब क्या है सौम्या ?",उसने पूछा।
कुछ नहीं अबुलला का उर्स है आजकल।
"और ये अखबार वाले?"
"दैनिक जागरण वाले हैं। मैंने ही बुलाया है इन्हें। कार में बैठ कर बस पांच मिनट का इंटरव्यू दे देना। चलो अब अंदर चलें चादर चढ़ाने का वक़्त हो रहा है। "
वो मुड़ी कि एक गिरगिट पास से सरक कर सड़क किनारे के गड्डे में कूद पड़ा। कुछ छीटें उसकी साड़ी पर गिर पड़ीं। उसने घूम के देखा, एक छोटे से गड्डे में उसका सिर्फ़ सिर चमक रहा था। ये सरीसृप होते ही ऐसे हैं हर बनते काम पर मिट्टी उड़ेलने वाले। पर मिट्टी उड़ेलने वाले सिर्फ ये ही नहीं होते। उस ईश्वर के चौसर पर और भी बहुत प्यादे खड़े रहते हैं राजा कि मुंडी काटने को। एक ऐसा ही प्यादा कहीं अनंत भविष्य के गर्भ में सांस ले रहा था।
गुलाब था या केवड़ा जिसकी खुश्बू दिव्य को सराबोर कर गयी। उसने चारों तरफ नज़र घुमा के देखा एक सोलह-सत्रह साल की उठे बदन की लड़की एक कोने में खडी सौम्या को निहार रही थी। बारबार अपने दुपट्टे को ऊँगली से बांधती और खोलती, फिर बांधती और खोल देती। अचानक उसने दिव्य को अपनी तरफ देखते पाया तो झेंप कर आँखें झुका लीं।
"नाम क्या है तुम्हारा?' दिव्य ने पूछा।
"परवीन "
"कहाँ रहती है?"
"यहीं, बाग़ फ़रज़ाना, टीन के गिरज़े के पास। "
"तो यहाँ क्यों?"
"अम्मी को चादर चढ़ानी थी। "
"ओह !"
इतने में सामने से सौम्या आ गयी।
"क्या कर रहे हो ?,चलो भी। "
"बस कुछ नहीं , ऐसे ही इस लड़की से बात कर रहा था। "
"अच्छा दो मिनट ठहरो यहीं। एक फ़ोटो ऐसा भी खींचवा लो इसके साथ। टैग लाइन मैं सजेस्ट कर दूँगी। "
"मिनिस्टर आम जनता के बीच ,या फिर राज्य का भावी कर्णधार, खेवैया अपनी रिआया के साथ या फिर। "
"अच्छा बस करो ",दिव्य बोला।
                                       
…………………
नब्बे का दशक अपने उतार पर था और दुनिया भर की राजनीति अपने चरम पे थी। तमाम देश मंडल आयोग की सिफारिशों से झुलस रहा था। जिधर देखिये उधर ही आग की लपटें धूँ-धूँ कर के उठ रहीं थी। सिर्फ पद्मा के कमरे में ख़ामोशी करवटें बदल-बदल के सो रही थी। रंजन की तस्वीर पर चढ़े फूल सुबह से शाम तक चढ़े-चढ़े सूखने लगे थे। शुक्ला जी ने कमरे में झाँक कर देखा। पद्मा एक फाइल में सिर गढ़ाये पड़ी थी।
"ये विदेशों के झंझट छोडो और ये फ़ाइल पढ़ लो। "
"क्या है इसमें चाचा जी?"
"मंडल आयोग ने जिन-जिन पॉइंट्स की सिफारिश की है, और जिसकी वजह से ये बवाल मचा है। उसी की सूची है ये। सरकार ने बैठे-बिठाये ये मौका हाथ में दे दिया है तो पद्मा इसे कैश करा लो। थोड़ी मुख़ालफ़त थोड़ी हिमायत करके हित साध लो। "
"दो परस्पर विरोधी नीतियां कैसे चल सकती हैं चाचा जी? "
"यही तो राजनीति है बेटा, न बुरे बनो न भले। उदारवादिता दिखानी जरुरी है पद्मा इस समय। ऐसे ही छोटे-बड़े अवसर भाग्य तय करते हैं, इस वक़्त पार्टी का भाग्य तुम्हारे दारोमदार पे टिका है। "
"अगले महीने लखनऊ में तुम्हारी एक मीटिंग फिक्स की है यादव जी के साथ। "
"कुछ दिन प्रभात के साथ बैठ कर मीटिंग का मसौदा तैयार कर लो। पूरी तैयारी बिना कोई हल नहीं निकलेगा। केंद्र की सरकार गिरी नहीं कि प्रदेश में एक नया समीकरण बनेगा और यादव जी की सरकार तैयार। और फिर तुम्हारा यहाँ से जीतना लगभग तय है। अगर तुम नहीं भी जीतीं तो भी तुम्हारी कैबिनेट की राह का समाधान है हमारे पास। "
"क्या?"
"हम पार्टी का विलय उनके साथ कर रहे हैं, और सी.एम यादव जी ही बन रहे हैं। बस मीटिंग में अपने पक्ष पर अड़ी रहना। हम चाहते हैं की तुम ऊर्जा या महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की डिमांड करो। "
"और अगर शर्त नहीं मानी गयी तो ?"
"तो भी अड़ी रहना। यादव जी ने हमें भरोसा दिलाया है तोड़ेंगे नहीं। "
"आपको इतना यकीन कैसे है चाचा जी ?"
"क्योंकि वो शेर हैं, दहाड़ ही काफ़ी है उनकी। "
"शेर मारे भी जाते हैं। "
"याद रख लड़की शेर जंगलों में विचरते हैं, और खुले सिर में घुमने वाले जुएं होते हैं, जिन्हें नाखूनों से रगड़ दिया जाता है। शेरों को मारने के लिए मचान बाँधनी पड़ती है। "
पर समय ने पद्मा को नाखून के हल्के दाब भर से रगड़ दिया। ये उसका पहला पड़ाव था राजनीति के लम्बे अनथक सफ़र में। जब एक बार उसके हाथ सत्ता की चाबी आई तो उससे बड़े-बड़े ताले खोलने का हुनर, सिल्वर फिश की तरह हर परिस्थिति में मुसीबतों को दांत से काटने का हौसला उसमें स्वतः ही आ गया। वह अब प्रदेश की राजनीति का उभरता हुआ सितारा थी पर तेजी से कृष्णबिंदु की ओर अग्रसर।
सन 92 में जनता दल टूटने के बाद जब यादव जी की अपनी पार्टी की सरकार बनी तो पद्मा के भाग्य की पतंग अनंत आकाश की परिक्रमा के लिए उड़ चली।

7
"जिसका विद्रोह होता है,उसका वर्चस्व होता है, और जिसका वर्चस्व होता है वो राजा होता है। मुझे राजा बनना है इसलिए वर्चस्व चाहिए।" समझीं सौम्या ,दिव्य ने कहा।
"और राजा का ही पतन होता है। ", याद रखना दिव्य सौम्या ने एक फीकी हँसी हँस कर कहा।
बरसात की बूंदों ने जहाँ जीवन की सामान्य परिपाटी को ढर्रे से उतारा वहीं जून की आग उगलती गर्मी से राहत भी दी। कोठी के कोने में लगा बॉटलब्रश अपने पूरे शबाब पर था,अमलतास के नन्हे पीले फूलों ने पेड़ों को पूरी तरह ढंक रखा था। इतनी बहार के बाद भी इमराना के अंदर कहीं एक अजब सी हड़बड़ाहट थी। एक संशय की डोर हृदय के इस कोने को छूती दूसरे कोने की तरफ़ बढ़ जाती थी। भय, संशय,गोपन की बिजली रगों की तरफ बार-बार लपलपा जाती थी। चिंता के बादल पल-पल उमड़ते-घुमड़ते रहते थे पर बरसते नहीं थे। वो जितनी बार आँखें बंद करती उतनी ही बार कितनी ही सूरतें हँसते हुए गुज़र जाती थीं। कभी रंजन की,कभी पद्मा की,कभी सौम्या, कभी शुक्ला जी,कभी दिव्य और कभी.………………। अचकचा कर उसने अपनी आँखें खोल दीं। कैसी सूरत थी उसकी। स्याह रंग, मर्दाना गठन, लड़कों की छंट में कटे बाल, हथेलियों के बीचों-बीच मेहँदी का धब्बा।  बार-बार हथेली फैला कर बात करने का लहजा। पैर इतने मोटे जैसे सूज गए हों, उन पर फँसी पाज़ेब। ऊपर से काहिया रंग के छींटदार कपडे। उसकी बातें इमराना का दम ऐसे घोंटे जा रही थीं जैसे साँप की गिरफ्त में मरता हुआ चूहा।
"देखिये बहन जी बिन बाप की लड़की मुहल्ले भर की नज़र में चढ़ जाती है। उस पर ऐसी दिया-बत्ती सी हँसी है हमाई लड़की की कि धप-धप पूरा घर चमक-चमक जाये। सुरमे की लकीर सी पतली हमाई मौड़ी अँगुरियन के पोरों सी होने लगी है। वा पै दिन-दिन खटिया पर पड़ी रहती है। मुहल्ले भर की औरतें मुँह फेर-फेर के हँसे हैं हमाए दरबज्जे पै। अभी उमर ही क्या है उसकी ? सतरा बरस। उस पर सफाई भी करवानी है अभी। "
"क्या नाम है लड़की का?"
"परवीन"
कुछ देर बाद इमराना ने उसके हाथ में हज़ार-हज़ार के तीन नोट थमा दिये। जाओ सफाई करवा देना। नज़र रख अपनी लड़की पर वर्ना मिट्टी में खोद कर गढ़वा दूँगी। ढूंढे नहीं मिलेगी तुझे।
उसके जाने के बाद उसने सारी खिड़कियाँ खोल दीं। देर तक घुटी-घुटी फ़िज़ा में बाहर से आते गीली हवा के झोंके उसे बड़े भले लगे। वो फिर जा कर पलंग पर बैठ गयी। ऐसी दिये-बाती सी हँसी तो सौम्या की भी है। पूरा घर जगमगाने लगता है फिर दिव्य को बाहरी उजाले की जरुरत क्यूँ पड़ी ?, ऐसे अजदहे दूर ही से प्यार की चिरैया को फाँस कर मार देते हैं। पर अजदहे ने फंदा ही नहीं कसा बल्कि ज़हरीली साँसें भी हवा में घोल दीं। ऐसे ही तीन हज़ार रुपये सौम्या से भी वसूल कर के ले गयी वो सफ़ाई करवाने के लिए।

8
धाँय गोली चली,धमाके से पूरी कोठी काँप उठी। साथ चलते कूलर की तेज आवाज़ भी उस धमाके में घड़ी भर को डूब गयी। वो दौड़ कर ऊपर भागी। पद्मा का खून में लथपथ शरीर आधा कमरे में और आधा चौखट के बाहर पड़ा था। इमराना के पीछे-पीछे शुक्ला जी भी वहाँ पहुँच गए। कमरे के एक कोने दिव्य खड़ा था और पाँव के पास पिस्तौल पड़ी थी। दोनों चीज़ें एक साथ पहुँची शुक्ला जी के घर,एंबुलैंस और पुलिस की जीप। वो तीन दिन अस्पताल में भर्ती रही। आगरा मेडिकल कॉलेज में शायाद ही कभी इतनी भीड़ जुटी हो जितनी इन तीन दिनों में। सुबह से शाम तक मिलने वालों का ताँता आई.सी.यू.के बाहर लगा रहता था। लोग बारी-बारी दरवाज़े से झांक भर लेते थे। इन तीन दिनों में शुक्ला जी कभी अस्पताल में तो कभी जेल में चक्कर काटते पाये जाते थे। ऑपरेशन के बाद भी पद्मा की स्थिति ख़तरे के बाहर नहीं थी। बचने की उम्मीद धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। तीन दिन की अथक मेहनत के बाद हर कोशिश थम गयी। बागबाँ के हाथों से उड़ कर ख़ुश्बू हवाओं में मिल गयी और शाख़ से फूल टूट गया।
पद्मा की मृत्यु ने शुक्ला जी के राजनैतिक मानचित्र में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया था। इस शून्य को सिर्फ़ दिव्य भर सकता था। इसलिए उसे साफ़-सुथरी इमेज के साथ इस केस से बाहर निकालना उनका एक मात्र ध्येय था। चाहे इसके लिए उन्हें साम-दाम-दंड-भेद किसी का भी इस्तेमाल करना पड़े। पाँच महीने की लगातार दौड़-धूप के बाद फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट से वो दिव्य को बरी करा पाये। कोर्ट में पुलिस ने जो दस्तावेज़ जमा किये थे,उनमें साफ़ लिखा था कि पिस्तौल साफ़ करते समय गोली गलती से छूट गयी और ऐन मौके पर पद्मा सामने पड़ गयी। दोनों वाकये अचानक हुए,ये मात्र एक दुर्घटना थी।
............................
झंझा,आँधी,अंधड़ सौम्या के मन को एक कोने से उठा कर दूसरे कोने में पटक देते थे,और फिर कहीं दूसरी जगह पटक देते। निर्वात के एक धक्के से अनंत अंतरिक्ष में आकाशगंगा टूट कर बिखर गयी थी। ऐसा ही हाल आजकल सौम्या का हो रखा था। कौन था ऐसा ??जो सौम्या के इस उठते अंधड़ को झेल पाता।
दिन ढले भी हवा में उमस और गर्मी थी। धड़धड़ाती ट्रेन की आवाज़ हवा में दूर से तैरती आ रही थी। एक रेल की पटरी रावली के शिव मंदिर की दीवार से सट कर गुज़री थी। जिसकी वजह से हर बार गुज़रती ट्रेन की धमक मंदिर को कंपा जाती थी। रावली के शिव पर सौम्या की बड़ी आस्था थी। पर इन दिनों हर आस दीमक लगी भुरभुरी मिट्टी के ढेलों की तरह हाथ लगते ही टूट रही थी। एकाएक गुज़रती रेल ने उसका ध्यान तोड़ दिया। ज़रा सा फ़र्श काँपा तो उसने सोचा जो शिव हर आती-जाती गाड़ी से काँप जाते हैं,वो उसके काँपते मन को क्या साध पायेंगे। कोई मजबूत हाथ ही इस समय इस भटकते मन को साध सकते हैं,और ऐसे हाथ सिर्फ़ इमराना के थे। उसने हाथ जोड़े और बाहर निकल आई।
शाम का सुरमई अंधेरा जब काजल की तरह चारों तरफ़ फैल गया तब वो शुक्ला जी के घर पहुँची।
"दिव्य कहाँ है ?" उसने घुसते ही पूछा।
"लखनऊ गए हैं।" इमराना ने कहा।
"और नाना जी ?"
"साथ गए हैं। "
"आप अकेली हैं घर में ?"
"हाँ", चाय पियेगी ?
"नहीं मौसी।", वो आयी थी ??
एक बार को तो इमराना सकपका गयी।
सच बताना इम्मो मौसी।
"क्या ?'
"जब कोई उँगलियों के पोर सा हो जाता है तब क्या पुराना रिश्ता टूट जाता है ?"
एक चुप्पी ...................
"बताओ न?"
दुबारा चुप्पी ............................,बहुत देर बाद इमराना ने कहा। जानती है बेटा।
"कुछ लोग इस क़दर खुशफ़हम होते हैं कि ख़ुद का क़द इतना ऊँचा समझते हैं जैसे यूकेलिप्टस के पेड़। जिनकी जड़ें जमीन के पार का सारा पानी सोख लेती हैं। ये ख़ुशक़ामत न ही किसी सदाबहार के सब्ज़े को खिलने पनपने देते हैं,न ही किसी को छाँव। ये खुद को इतना कद्दावर समझते हैं कि कोई नॉर्मल इंसान इनके पास नहीं जा सकता। इनके गाल सिर्फ़ जिराफ़ या गुज़रे ज़माने के डायनासॉर ही सहला सकते हैं। कई बार जी चाहता कि ऐसों के आँगन में एक सागवान रोप दिया जाये, जो अपनी ख़ुशक़ामती से इन्हें ऊँचाई का अहसास दिला सकें। बहुतों के लिए ठीक बैठती है ये बात। क्यूँ है न? दिव्य भी इन्हीं में से एक है। "
"कौन रोप सकता है इनके आँगन में सागवान मौसी ?"
"क्यूँ, तुम रोप सकती हो। अपनी ऊँचाई से इन्हें बौना बना सकती हो। एक सलाह देती हूँ। वैसे तो दिव्य को देनी चाहिए थी, पर तेरे लिए ज्यादा कारगर साबित होगी। "
"क्या?"
"इस गुस्से को टोन्ड डाउन कर, पॉलिश कर, नरिश कर, जज़्ब कर के रख। ख़ामोश दरिया हमेशा बड़ा तूफ़ान लाते हैं। "
"मैं समझाऊँ उसे मौसी ?"
"कोई फ़ायदा नहीं। "
"क्यों?"
"क्यूँकि ब्यानहार गैया और खुले नाड़े के आदमी की बैचैनी तब तक नहीं ख़त्म हो सकती जब तक कि वो फ़ारिग न हो जाये।"
"आप इतनी ऐंटी दिव्य क्यों हो?"
"क्यूँकि पद्मा मुझे बहन जितनी प्यारी थी।
"तुम तो पार्टी ज्वाइन करने वाली थीं। '
"कांग्रेस।"
'यू.पी. में कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं है। तुम्हें बसपा या सपा इनमें से कोई करनी चाहिए। "
हवा में रात की रानी और बेले की मिली जुली गंध घुलने लगी थी।
"चलूँ मौसी ?", सौम्या ने पूछा।
"अच्छा, आराम से जाना। "
"ठीक है,एक बात और मौसी। "
"क्या बेटा? "
"इनकी पैदाइश में कोई खोट ?"
"नहीं, ऐसा क्यूँ लगा ?"
"मैंने सुना था कि इनकी पैदाइश का कुछ सम्बन्ध प्रभात बाबू से था।
 जिसके शक़ के चलते पद्मा आंटी को……………… "
"नहीं,हर्गिज़ नहीं,बिलकुल नहीं। ऐसा कुछ नहीं था।पद्मा का करैक्टर असॅसीनेट मत करो। "
"तो फिर ऐसा क्यों?"
"इसलिए कि आज के दौर में प्यार का एटीट्यूड और फ़िजिकल डिजायर अलग तरीके का है। हीर-रांझे अब इश्क़ के सन्दर्भ में भी इस्तेमाल नहीं होते। सौम्या हर आदमी के मन में एक बाँबी होती है। जो आदिम से आजतक और आज से अनंत तक हज़ारों तरह के साँपों की पनाहगाह रहेगी।और औरत की बाँबी में एक से एक ख़तरनाक अजदहे पलते रहते हैं ,जो वक़्त आने पर बड़े-बड़े सूरमाओं को मसल देते हैं। "

9
कॉफ़ी हाउस में वो दोनों नहीं आमने-सामने जैसे चुप्पी बैठी थी। नकली फूलों पर प्लास्टिक की ओस से जमे हुए। फिर सौम्या ने ही कॉफ़ी का प्याला सरकाते हुए कहा।
प्यार दो तरीके का होता है। एक जैसा तुमने किया और दूसरा जैसे मैंने।
मैं जानती थी मेरा प्यार तुम्हारे ऐसे था।
"जैसे बटन होल में लगा फूल.……………पहले दिन महकेगा,दूसरे दिन थोड़ा कुम्लहायेगा और तीसरे दिन जब मुरझा जायेगा तब इसे हाथ से झटक दोगे। "
और तुम्हारा प्यार मेरे जीवन में दो चीज़ें लेकर आया।
"पहला-मन के सुदूर कोनों में नख्लिस्तान "
"दूसरा-मन के कोने-कोने में रेगिस्तान "
"दोनों ही सूरतों में नुकसान तो मेरा ही हुआ। और हाँ मैंने दयाल अंकल की पार्टी ज्वाइन कर ली है। "
शीशे में आया हुआ बाल पहली बार साफ़-साफ़ दीखा दिव्य को।

धमाके की तरह एक शाम शुक्ला जी दिव्य के जीवन में धमाका कर के ख़ामोश हो गये। मार्गदर्शन की बीच राह में ही वो दिव्य को अंधड़ झेलने के लिए अकेला छोड़ गये।
वो दोनों अब ज़िंदगी के हाथों में शटल कॉक की तरह थे। जिधर चाहती उधर उछाल देती।
मौसम बदले, ग्लेशियर जमे, पिघले, नदियों में उफान आया, गाँव-शहर डूबे,पानी चढ़ा, फिर उतर गया। मौसम बार-बार बदलते रहे। हर बदलते मौसम के साथ थोड़ा-थोड़ा वो दोनों भी बदलते रहे।

प्रेम और प्रेम के बाद की घृणा को उन दोनों ने Political Mandate (राजनैतिक अधिकार-पत्र) की तरह ग्रहण किया। घड़ियाँ बदलीं और छोटे-छोटे वक़्फ़े सालों में बदल गए। जीवन की परिधि दस बरस आगे खिसक गयी। दस सालों में दोनों ने अपने-अपने मापदंडों में बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया।

दिव्य ने इमराना की ममता खोई तो परवीन की बेलौस मुहब्बत पाई। हाँलाकि ये मुहब्बत हमेशा उसके गले में फाँस सी चुभती रही। तो उधर सौम्या ने दिव्य को खोया और इमराना जैसा सारथी पाया, जिसके साथ अनायास ही पद्मा और शुक्ला जी का गूढ़ ज्ञानानुभव और नीतियाँ स्वतः ही उसके रथ पर कर बैठ गयीं।
दाँव-पेंच आगरा की गलियों से निकल कर सालों से लखनऊ की फ़िज़ाओं में खेले जाने लगे थे। दोनों तरफ़ की चालें, घातें उनके जीवन में कशीदाकारी का काम कर रहीं थीं। कभी बनती बात बिगड़ती, कभी बिगड़ा काम इफ्तार पार्टीयों में बनता।

...............................
"मौसी।"
"हूँ "
"हमें यादव जी की पार्टी ज्वाइन करने का ऑफर मिला है। "
"जानती हो दिव्य डिप्टी सी.एम. बनने लायक औकात रखता है उस पार्टी में। "
"जानते हैं ,पर औरत की मन की बाँबी में बड़े ख़तरनाक अजदहे पलते रहते हैं।"
"मतलब?"
"मतलब ये की परवीन कौन है उनकी ?,मॉरल पुलिस का काम करेगी पब्लिक और मीडिया। हमारी पार्टी का उनमें विलय ऊर्जा मंत्री का पद दिलायेगा हमें। वक़्त की नज़ाकत को देख कर झुकने वाली घास ज्यादा वक़्त तक तूफ़ान में टिक पाती है। और देखिये डिप्टी सी.एम. तो नहीं बनने देंगे हम उन्हें, ना ही कोई ढंग का मंत्रालय जाने देंगे उनके पास। "
"तुमको यकीन है?”
"पक्का, एक दम पक्का। चुनाव तो आने दो बस एक बार।"

जैसे-जैसे चुनाव पास आते गये वैसे-वैसे मीडिया ने दिव्य और परवीन के सम्बन्ध की पैनी जाँच-पड़ताल शुरू कर दी। दिव्य की परेशानी का सबसे बड़ा सबब था मीडिया का लगातार बढ़ता दबाब,जिसकी वज़ह से परवीन का टिकट पाना बहुत मुश्किल हो गया था।  फिर भी जुगत भिड़ा कर उसने परवीन को औरैया से टिकट दिला दी।

दो वाक़यों ने चुनाव की सूरत बदल दी थी। चुनाव से पांच दिन पहले दिव्य ने परवीन का नाम प्रवीन बदल कर सिविल मैरिज करके मीडिया की तमाम अटकलों और रस्साकशी को थाम दिया था। और अगले दिन पार्टी विलय के बाद जिस गाड़ी से सौम्या और दिव्य वापस जा रहे थे वो हाई-वे पर धुंध के कारण बस से टकरा गयी। ड्राईवर सही-सलामत निकाल लिया गया था। दिव्य का बायाँ पैर चोटिल था और डॉक्टर ने कहा था कि कम से कम छः महीने तक व्हील चेयर का इस्तेमाल करना पड़ेगा। बस एक सौम्या को हादसे के बाद बचाया नहीं जा सका। दूसरे दिन सुबह वेंटिलेटर पर दम तोड़ दिया उसने। फ़ाख्ता इस मुंडेर से हमेशा के लिए उड़ चुकी थी। बस एक इमराना समझ रही थी हादसे की हक़ीक़त को।

चुनाव हुए, नतीजे आये। यादव जी को बड़ी जीत मिली थी। जगह-जगह नामी हस्तियों को शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने का न्योता भेजा जाने लगा था। ऐसा ही एक न्योता दिव्य ने भेजा था इमराना के पास समारोह में शामिल होने के लिए।

टी.वी. चल रहा था, न्यूज़ पर थोड़ी-थोड़ी देर बाद समारोह की झलक दिखायी जा रही थी। हल्की नारंगी रंग की साड़ी में लिपटी परवीन दिव्य की व्हील चेयर को मंच की तरफ़ ले जा रही थी। न्यूज़ रीडर बार-बार ये बता रही थी कि ज्यादा घायल होने के कारण दिव्य शुक्ला अपनी पत्नी प्रवीन शुक्ला के साथ उनके तुरंत बाद अपने पद की शपथ लेंगे। प्रवीण शुक्ला प्रदेश की ऊर्जा मंत्री की रूप में शपथ ले रही हैं और दिव्य शुक्ला ……
न्यूज़ रीडर आगे कुछ और बोलती उससे पहले ही इमराना ने टीवी बंद कर दिया। खुली खिड़की से ठंडी हवा का झोंका अंदर आया तो उसने मुड़ कर देखा। एकाएक घने कोहरे की चादर हर जगह पसर गयी। गुड़हल और अनार की पत्तियों से सरक-सरक के कोहरा बूँद-बूँद ज़मीन पर गिर रहा था।
उसे सामने कभी पद्मा दीखती, कभी सौम्या तो कभी हँसता हुआ दिव्य।
अचानक उसे हर जगह लाल रंग का कोहरा नज़र आने लगा। गुड़हल और अनार की पत्तियों से उसे सुर्ख़ रंग की बूँदें टपकती दीखने लगीं। उसने डर कर तुरंत खिड़की बंद कर दी और पास पड़ी कुर्सी पर धम्म से बैठ गयी।
नीम बेहोशी में डूबने से पहले उसने इतना ही कहा।
"या अल्लाह! इन दरख्तों से ख़ूँ टपकता है। "


परिचय और संपर्क

अनघ शर्मा

आर -6/230, सेन्ट्रल पार्क के पास
सेक्टर -6, राजनगर
गाजियाबाद - 201001
मो.न. 08447159927   

कथादेश पत्रिका से साभार 


           

2 टिप्‍पणियां:

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  2. इस कहानी में राजनीति की जोड़तोड़ को यथार्थवादी ढंग से दर्शाया गया है.सभी पात्र जीवंत और सशक्त हैं.प्रवाहपूर्ण शैली और विषय की मौलिकता इसे दिलचस्प और पठनीय बना देती है.

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