बुधवार, 8 जनवरी 2014

मृदुला शुक्ला की कवितायें

                                    मृदुला शुक्ला 





मृदुला शुक्ला की कवितायें पहली बार सिताब दियारा ब्लॉग पर छप रही हैं | इस युवा कवयित्री के 

पास संवेदनशील विषयों की बहुलता तो है ही, उसे कविता में पिरोने का हुनर भी है | उम्मीद 

करता हूँ कि उनकी ये कवितायें आप सबको भी जरुर प्रभावित करेंगी |   

            
              प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर मृदुला शुक्ला की कवितायें


एक ....

मरा हुआ आदमी

मैं एक मरा हुआ आदमी हूँ

मरे हुए आदमी की दुनिया

हमेशा बेहतर होती है जिन्दा लोगों की दुनिया से


एक मेरे मौत की खबर भर ,मुझे रिहा कर देती है

तमाम झूठे सच्चे इल्जामात से

हर दुनियावी अदालत से



तमाम यार दोस्त जो कभी सवाल करते थे

मेरे सही जवाबों पर

आज मिल बैठ जवाब ढूंढते है

मेरे हर गलत सवाल का


प्रेयसियां जो प्रगल्भा थी

मध्या नहीं, अब तो

मुग्धा सी फिरती हैं ,बावरी सी


उनकी कभी ना आने वाली

चिट्ठियों के इंतज़ार में

तमाम सब्जीवाले ,फेरी वाले

या यूँ कहो ,मेरे दरवाजे से गुजरने वाला हर मुसाफिर

मुझे डाकिये सा लगा पूरी उम्र


सुना है ! आज कल वो हर रोज

डाक खाने में डाल आती हैं एक ख़त

बेनाम ,पते का


वो तमाम लोग जो नज़रअंदाज करते थे

मेरा जीता जागता वजूद

वो झिंझोड़ कर जगा जाते हैं मुझे

मेरी कब्र में भी


मेरी बीवी मेरे होने पर

नहीं रही सधवा कभी भी

आज काबिज है मेरी बेवा के हक़ पर

पूरे रसूख से


मैं खुद को देखना चाहता था

अपने पिता की

बच्चों की चमकती आँखों में ,जीते जी

आज हूँ मैं वहां ,गालों पर


लुढकता सा, बहता सा


तो सुनो !ऐ जिंदा लोगों की दुनिया के

तमाम मरे हुए लोगों

ये दुनिया बदलती नहीं कविता लिखने से

धरने से प्रदर्शन से किसी भी वाद से ,


अगर तुम्हे चाहिए बेहतर दुनिया

तुम्ही जीना है सचमुच ,

तो ये झूठी मौत छोड़कर तुम्हे सचमुच का मरना होगा


दो ...

मृत्यु


"जीवन की क्षण भंगुरता को देखते हुए

जीने की इच्छा रखना

सबसे बड़ा आश्चर्य है

यक्ष के इस यक्ष प्रश्न का उत्तर दे "

युधिष्ठिर अपने एक और भाई के

जीवन की कामना में लग गए


मृत्यु जलती मोमबत्ती का वह सिरा है

जहाँ मोम के चुक जाने पर

धागा भर रहता है शेष


मील का वह पत्थर

जहाँ ठसाठस भरी बस से

चुपचाप उतर जाता है

एक मुसाफिर

छोड़ कर

अपने तमाम असबाब


बस ठिठकती है पल भर

मुसाफिरों में कुछ देर तक कानाफूसी

छूट गए सामान को लेकर

कोई धीरे से सरका देता है उसे सीट के नीचे...।

यात्रा जारी रहती है उसी रफ़्तार से

अगले मील के पत्थर की तरफ



मृत्यु

जीवन के सलोने

मुख पर प्रकृति का

लगाया ढिठौना भर है


तीन ....

सनद रहे   


तुम कह सकते हो अपनी बात

अगर शर्त न रखो

सुने जाने की


ये बात दीगर है!

तुम बढ़ाते

जाओ अपनी आवाज

ध्वनि की अधिकतम तीव्रता तक

याद करते हुए भगत सिंह को

बस सुने जाने की शर्त न शामिल हो

कहे जाने में


मौन कायरता ही नहीं,

कुंद हुए हथियारों को डाल देना है

सीले गोदामों में जंग लगने के लिए


सनद रहे! संवाद की डोर का

कम से कम एक सिरा तो

हमेशा ही होता है आपके हाथ में


चार ...   

उड़ते पंछियों का शिकारी    


न दिनों वो चला करती थी

ज़मीन पर

पंजो को सीधा रखते हुए

सधी चाल,


एक दिन किसी ने

अचानक चुपके से,

उसके कान में आकर कहा..


कर्ण के कवच की भाँति

तुममे शरीरी पंख हैं

जन्मजात


उसे भ्रम होने लगा उड़ने का,

नींदों में अक्सर दूर देश चली जाती थी

अपने परों पर उड़ कर


हर दिन

वो उठ जाती थी ज़मीन से

थोडा ऊपर

एक दिन वो आ गयी

ज़मीन से ऊपर बहुत ऊपर

लगभग

आसमान के पास


ठीक उसी दिन उसे पता चला

वो जो चुपके से थमा गया था उसे पंख

वो दरअसल शिकारी था,

उड़ते पंक्षियों का.........



पांच  ...

उकताहटें हावी हैं प्रतिबद्धताओं पर  

                     

मेरे सपने नहीं रहते अब

मेरी आँखों में

वो प्रायः होते हैं

क्रूर गाडीवान की भूमिका में

हाथ में चाबुक लिए ,

नाक के कसे नकेल,

गाड़ी में जुते दोनों बैलों की भूमिका में

अकेली होती हूँ मैं


कभी वो कूद कर सवार हो जाते हैं

मेरे कंधो पर

अटपटे रास्तों पर सुनाते हैं कहानियां

अंत में कहानी को रूपांतरित कर एक प्रश्न में,

चस्पा कर एक प्रश्नवाचक चिह्न

उगते सूरज के मुहं पर

वे फिर से जा बैठते हैं

बूढ़े बरगद पर ,बेताल की तरह


वो मुझे प्रायः मिल जाते हैं

प्रकाश से सराबोर रास्तो पर

चुपचाप चलते

हाथों में उठाये जलती मोमबत्तियां

मशाल की तरह


अब जबकि,उकताहटें हावी है

प्रतिबद्धताओं पर

छद्म मौलिकता के इस विषम दौर में

मैं रोज भरती हूँ उनमे

समुद्री हरा ,आसमानी नीला

और गौरैया के पंखों का धूसर सलेटी रंग ,

चौराहों पर लगी हाइड्रोजन लैम्पों के

नीचे से गुजरते

वो खो देते हैं अपनी पहचान

और घर लौट आते हैं ,मुहं लटकाए

गिरह कट गए मुसाफिर से


मैं खुद को पाती हूँ

रंगमंच पर ठठा कर हँसते हुए विदूषक सा

जो आंसू पोछने के लिए

प्रतीक्षा करता है

यवनिकापात की


छः  ...

स्कूल बैग

            


असीम विस्तार है तुम्हारा

समा लेते हो खुद में

अखिल ब्रह्माण्ड

पत्थरों से हिरोशिमा तक

गणितीय जोड़/घटाना/गुणा/ भाग

दुनियावी जोड़ तोड़

चक्के से गॉड पार्टिकल

दुनिया भर के इल्मों अदब...


तुम भार ढोते हो

कुचली इच्छाएं,

दबी महत्वाकांक्षाये,

छूटी हुई रेस,

अधूरे सपने,

हारी हुई लड़ाई,

माता पिता की लिप्सा....


सुनो,

बहुत भारी हो तुम

बहुत मासूम हैं उसके कंधे

बहुत भोली है उसकी पीठ


देखो,

वो भाग नहीं पा रहा

तितलियों के पीछे

थकी आँखें सो जाती हैं

तारों/जुगनुओं के

जागने से पहले

वो कहाँ भर पता है

उछल कर

अपनी सतरंगी हंसी

आसमानी कैनवास पर



रुको,

ठहरो,

कहाँ जा रहे हो?

उसकी पनीली आँखों के सपनों

को ज़रूरत है तुम्हारी

बस तुम तब आना


जब,

थोड़े चालाक हो जाएँ उसके कंधे

थोड़ी समझदार हो जाए उसकी पीठ |


सात  

ज़िन्दगी  


कभी धुप सी

कभी छाँव सी ज़िन्दगी

कभी बेगाना शहर

तो कभी नानी के गाँव सी ज़िन्दगी


कभी तपती रेत पे

नंगे पाँव चलती ज़िन्दगी

तो कभी मीलों

अमराइयों की छाँव सी ज़िन्दगी


कभी आँखों के इशारे से पलटती

बाज़ियों का नशा

तो कभी आखिरी बाज़ी के हारे हुए

दांव सी ज़िन्दगी


ज़िन्दगी तुझे क्या कहूँ

तू हाथ क्यू आती नहीं ?

मुट्ठियों से फिसल जाती

प्रवासी प्रिय के ठाँव सी ज़िन्दगी

                                                      




परिचय और संपर्क

नाम: मृदुला शुक्ला 

जन्म-तिथि : ११ अगस्त १९७० 

शैक्षिक योग्यता: स्नातकोत्तर (रसायन विज्ञान) और हिंदी साहित्य 

सम्प्रति: शिक्षण, स्वतन्त्र लेखन 

निवास: गाज़ियाबाद , उत्तर-प्रदेश

11 टिप्‍पणियां:

  1. मृदुला की कवितायें गहरी संवेदनाओं से भरपूर होती हैं ………सभी रचनायें दिल मे उतरती झकझोरती हैं

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  2. अच्छी प्रस्तुति ,बेहद गंभीर कविताए मन को छूती है अंत के कुछ अंशो में मे कवियित्री ने अपना संतुलन आंशिक रूप से खो दिया है प्रवाहभंगिता का भाव थोडा अखरता है बहरहाल रचना अच्छी लगी । मृदुला जी को बधाई और अभिनन्दन ।

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  3. एक मेरे मौत की खबर भर मुझे रिहा कर देती है
    *
    जीवन की क्षण भंगुरता
    *
    संवाद की डोर
    *
    शिकारी
    *
    मेरे सपने
    *
    थकी आखें सो जाती हैं तारों के जागने से पहले
    *
    कभी धूप कभी छाँव सी ज़िंदगी
    *
    सात कविताएँ........ या ख़यालों की जलतरंग पर सोच की सरगम
    ब्लॉग पर प्रथम प्रस्तुति के लिए बहुत - बहुत बधाई और शुभ कामनाएँ

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  4. अच्‍छी कविताएं हैं मृदुला जी की। इस दौर में जब बहुत सी लेखिकाएं प्‍यार मोहब्‍बत की बेहद चलताऊ किस्‍म की रूमानी कविताएं लिख रही हैं, मृदुला जी जीवन की तल्‍ख़ सच्‍चाइयों को बहुत नर्म और ठोस खुरदुरे अहसास के साथ उर्दू नज्‍़म की तहरीर में पेश करती हैं तो बहुत अच्‍छा लगता है... शुभकामनाएं मृद़ला जी को और धन्‍यवाद रामजी भाई को...

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  5. sitaab diyara par swagat..ram ji ka shukriya mridula di ko badhaii..kavtayen sari ki sari hi achchi...ek sath padhne ka mauka mila...so thx...subhkamnayen dil se

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  6. मृदुला जी एक बेहतरीन रचनाकारा हैं :)

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  7. jeevan ke kafee kareeb wa prashna kartee ,smavedansheel kavitaye, behad prabhavee

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