रविवार, 26 जनवरी 2014

युवा कवि राहुल देव की कवितायें


                                      राहुल देव 


युवा कवि राहुल देव कविता की साधना के आरंभिक प्रयासों में हैं | ख़ुशी की बात है कि विचारों के स्तर पर उनकी पहुँच बन भी रही है | जैसे प्रत्येक साधना को लम्बी यात्रा के साथ-साथ उसी अनुपात में किये गए सार्थक लगन और निष्ठा की भी जरुरत होती है, उसी तरह इस यात्रा को  भी है | उम्मीद की जानी चाहिए कि ‘राहुल’ इस साधना से पीछे नहीं हटेंगे और आने वाले समय में अपनी एक विशिष्ट जगह बनाने में कामयाब होंगे |
                                                


       प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर राहुल देव की कवितायें


एक

भ्रष्टाचारं उवाच !

जी हाँ मैं भ्रष्टाचार हूँ
मैं आज हर जगह छाया हूँ
मैं बहुत खुश हूँ
और होऊँ भी क्योँ न..
ये दिन मैने ऐसे ही नहीँ देखा
मुझे वो दिन आज भी याद है जब
मैने अपने सफेद होते बालों पर लालच की डाई
और कपड़ोँ पर ईर्ष्या का परफ्यूम लगाया
बातों में झूठ और व्यवहार में
चापलूसी के कंकर मिलाए
फार्मूला हिट रहा..
लोग मेरे दीवाने हो गए
मैने सच्चाई के हाथ से
समय की प्लेट छीनकर
बरबादी की पार्टी मेँ
अपनी जीत का जश्न मनाया,
मेरी इस जीत मेँ तुम्हारी
नैतिक कमजोरी का बड़ा योगदान रहा
तुम एक दूसरे पर
बेईमानी का कीचड़ उछालते रहे
और मैँ कब घर कर गया
तुम्हारे अन्दर
तुम्हे पता भी न चला
मैने ही तुम्हे चालाकी और मक्कारी का पाठ पढ़ाया
सुस्त सरकार के हर विभाग में
फर्जीवाड़े संग घूसखोरी का रंगरोगन करवाया
घोटालोँ पर घोटालोँ का टानिक पीने के बाद
मैँ यानी भ्रष्टाचार
अपने पैरोँ पर खड़ा हो पाया.
इस अंधी दौड़ मेँ कुछ अंधे हैं
दो-चार काने हैं
जो खुली आँख वालोँ को
लंगड़ी मार रहे हैं
खुद जीत का मेडल पाने की लालसा मेँ
अंधोँ को गलत रास्ता दिखा रहें हैं
सब सिस्टम की दुहाई है
ऊपर से नीचे तक समाई है
मेरी माँग का ग्राफ इधर हाई है
और हो भी क्योँ न
ये गलाकाट प्रतियोगिता
आखिर मैने ही आयोजित करवाई है
मैँ बदनीयती की रोटी संग मिलने वाला
फ्री का अचार हूँ
पावर और पैसा मेरे हथियार हैँ
मैँ अमीरोँ की लाठी
और गरीबोँ पर पड़ने वाली मार हूँ.
तुम सबको खोखला कर दिया है मैँने
जी रहे हो तुम सब
जीने के मुगालते मेँ
सत्य के प्रकाश पर छा जाने वाली
तुम्हारे अंदर की काली परछाई हूँ
आज के युग मेँ मै सदाबहार हूँ
जी हाँ,
मैं भ्रष्टाचार हूँ...!



दो

अक्स में ‘मैं’ और 'मेरा शहर'!

ठहर जाता है समय
कभी-कभी
ठहरे हुए पानी की तरह
तो कभी फिसल जाता है वह
मुट्ठी मेँ बंधी रेत की तरह
जब आँखे बन्द रहती हैँ
और दिमाग जागा करता है
तब सोचता हूँ...
करता हूँ कोशिश सोने की
करवट बदलता हूँ
सुविधा,सुविधा-'दुविधा'
हाय रे 'सुविधा'!
मैँ अपने खोखलेपन पर हँसता हूँ
खालीपन को भरने की
करता हूँ एक नाकाम कोशिश
दोहरेपन के साये मेँ
दोराहे सी जिँदगी का
अन्जान राही बन
आगे-पीछे चलता
फीकी हँसी-फीकी नमी
उन खट्टे-मीठे पलोँ की यादेँ
गूँजती आवाजेँ;
अपने पैदा होने के कुछ ही वर्षो बाद
मैँने जान लिया था
क्या है जीवन-
जीवन संघर्षो का नाम है
जिस पर चलते रहना
आदमी का काम है !
कल यूँ ही
बाजार टहलने निकला
तो देखा-
ठेले पर धर्म,शांति और मानवता थोक के भाव में बिक रही थी
फिर भी कोई नहीँ था उसे लेने वाला
दूसरी ओर भ्रष्टाचार का च्यवनप्राश सबको मुफ्त बँट रहा है
जिसे लेने के लिए
धक्कामुक्की मची है
जिन्हे मिल गया वे
दोबारा हाथ फैलाए हैँ
कुछ आदमी पीछे लटककर
बाँटने वालोँ से
साँठ-गाँठ कर रहें हैं
आँख उठाता हूँ तो
दूर-दूर तक दिखते हैँ
कच्चे-पक्के चौखटे
और ऊपर भभकता सूरज
जिसकी तपिश से झोपड़े आग उगल रहे हैँ
इसी शहर मेँ कहीँ दूर नैतिकता
.सी. मेँ आराम कर रही है
दूसरी तरफ कुछ ईमानदार सच्चाई के बोझ से थककर
बेईमानी की चादर तानकर सो गए हैँ
आगे नुक्कड़ पर भूले बिसरे सज्जन
दुर्जनोँ को
अपने पैसोँ की चाय पिला रहेँ हैँ
यह इस शहर में आम है क्रिकेट में चौका,
दीवानेखास में मौका
प्लस बेईमानी का छौँका
यह इस तीन सूत्रीय कार्यक्रम का
अपना एक अलग इतिहास है
पंचसितारा होटलोँ की सेफ मेँ बन्द है
'परिश्रम' की डुप्लीकेट चाभी
सिक्सर्स हँस-हँस कर ताली पीट रहें हैं
समाधान,समाधान
समाधान !
हे. हे.. हे...
सौ प्रतिशत मतदान
बन्द हो गई राष्ट्रीयता की दूकान
आमतौर पर यहाँ हर दूसरा आदमी
'बाई पोलर डिसआँर्डर' से ग्रसित होता है
हर दुनियावी प्राणी का अक्स
उसकी परछांई से छोटा होता है !



तीन

हारा हुआ आदमी
       

बस एक ही काम
सुबह से शाम
और शाम से सुबह तक
एक यथास्थितिवादी की तरह
अपनी क्षमताओँ का आकलन
देना योगदान समाज को
अपने होने का एहसास
खुद की पहचान का सीलबन्द प्रस्तुतिकरण..
आज आदमी होने के मायने
कितने बदल गए हैँ
भीड़ बढ़ती जाती है
दुनिया सिमट रही है
चहुँओर मनी और पॉवर की धूम है
जहाँ देखता हूँ हर तरफ
आदमी दुबका जाता है
दूसरी तरफ समय चलता जाता है;
शायद आदमी के लिए आदमी होना
कोई बड़ी बात नहीँ
लेकिन मेरे लिए
आदमी को आदमी समझना
खुद के लिए शर्मनाक है
जिसकी आदमियत की डेट कबकी एक्सपायर हो चुकी है
लेकिन वो जीता जा रहा है, लाचारी से
जिँदगी जीने के मुगालते मेँ
किसी बन्द आवरण मेँ लिपटी प्रतिमा की तरह
मूक है जिसकी मौलिकता
उसकी सम्वेदनाओँ के शीशोँ पर
भौतिकता की मोटी परत चढ़ गयी है
आज वह जी रहा है अपने लिए
सोच रहा है तो सिर्फ अपने लिए
देख रहा है सिर्फ अपनी सुविधा,
जिनको पढ़ने वाला अब कोई नहीँ बचा
ऐसी फिलॉसफी, इतिहास और साहित्य की किताबों को
दीमक पुस्तकालयोँ मेँ बन्द अलमारियोँ मेँ
मजे से खा रहेँ हैँ
मानो सारा जीवन बगैर पटरी की रेल है
सारा सिस्टम ही फेल है.
कल क्या था और कल क्या होगा
इससे किसी को कोई मतलब नही
चर्चाओँ का माहौल गरम है
गाँव के गलियारोँ से
शहर के चौराहोँ तक
हर एक जगह लगा हुआ है
इन हारे हुए आदमियोँ का
अट्ठहास लगाता हुआ मज़मा
विरोध के नेपथ्य मेँ
एक आदमी बड़ा परेशान है
जी हाँ,
वह कवि है
कविता हैरान है!!



चार

एक टुकड़ा आकाश

टुकड़ों में बटा हुआ सब-कुछ
टुकड़े-टुकड़े जिंदगी
टुकड़े-टुकड़े मौत
टुकड़े-टुकड़े खुशियाँ
टुकड़े-टुकड़े दुःख,
सभी को चाहिए होता है-
एक टुकड़ा आकाश
और एक टुकड़ा भूमि
इस दुनिया में जो भी दिखता है
उसमें भी एक टुकड़ा सच है
और एक टुकड़ा झूठ
एक टुकड़ा आग तो एक टुकड़ा राख
टुकड़ो-टुकड़ों में चलती है सरकार
टुकड़ो-टुकड़ों में बढ़ता है व्यापार
टुकड़ो-टुकड़ों में उठते हैं
टुकड़ो-टुकड़ों में गिरते हैं
टुकड़े-टुकड़े पूर्वाग्रहों
और टुकड़े-टुकड़े विचारों से
हम ज़िन्दगी को टुकड़ो-टुकड़ों में जीते हैं;
किसी फटे हुए नोट रुपी इन टुकड़ों को
समय के ग्लू से जोड़-जाड़ कर
हम चलाने का प्रयास करते हैं
लेकिन एक न एक दिन
हमें उस बट्टे की दूकान पर जाना ही पड़ता है
जहाँ हमें उस नोट का
आधा मूल्य ही प्राप्त होता है
और हम हंसी-खुशी
घर वापस लौट आते हैं !






परिचय और संपर्क

नाम- राहुल देव                              

जन्म- 20 मार्च 1988
शिक्षा- एम.ए. (अर्थशास्त्र), बी.एड.
प्रकाशित – एक कविता संग्रह तथा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं एवं इन्टरनेट पर कवितायेँ, कहानियाँ, लेखों एवं समीक्षाओं का प्रकाशन |
प्रकाशनाधीन- एक कहानी संग्रह |
रूचि- साहित्य अध्ययन, लेखन, भ्रमण
सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन   
संपर्क- 9/48 साहित्य सदन कोतवाली मार्ग महमूदाबाद (अवध) सीतापुर, उ.प्र. 261203
मोबाइल नम्बर- 09454112975      
ई मेल पता- rahuldev.bly@gmail.com
ब्लॉग पता- rahuldevbly.blogspot.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. राहुल की सहज-सरल कविताएं पढ़कर अच्छा लगा। वे और अच्छा लिखें इसके लिए ढेरों शुभकामनाएं

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  2. कविताएं समाझ में नहीं आईं

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