बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

रेखा चमोली की कवितायें

                                   रेखा चमोली 



रेखा चमोली उत्तरकाशी में रहती हैं | स्थानीय सवालों से टकराते हुए ये कवितायें उतनी ही सहजता के साथ पाठक के मन उतरती हैं, जितनी सहजता के साथ इन्हें बरता गया होता है | इनमें सरलता की उस परम्परा का निर्वाह भी मिलता है, जो उस पहाड़ की गौरवपूर्ण सांस्कृतिक विरासत है | लेखिका का एक कविता-संग्रह ‘पेड़ बनी स्त्री’ पिछले दिनों पर्याप्त रूप से चर्चित हुआ है |

       
     तो आइये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग पर युवा कवयित्री रेखा चमोली की कवितायें  
                                  


एक ..

चाहना                                   

चाहना कि
प्रेम के बदले मिले प्रेम
स्नेह के बदले सम्मान
मीठे बोलों के बदले आत्मीयता
तार्किक बातों के बदले वैचारिक चर्चाएँ
मिट जाएं समस्याएं  
संवर जाए काम
आसान नहीं
बदलाव के लिए
और भी बहुत कुछ करना होता है
चाहने के साथ
दो ...

उसकी आवाज एक उत्सव है
                                             
सुबह की हडबडी में
एक कप चाय जैसी उसकी आवाज
थकी दोपहरी में
हौले से दरवाजा खोल
हालचाल पूछती
कभी कभार
सोते हुए थपथपाती
जहाँ-जहाँ नहीं होता वो साथ मेरे
होती उसकी आवाज
खुशी में चहकती
उत्साह में खनकती
दुख और उदासी में बेचैन होती
नाराजगी में लुडकती हुयी सी
कैसे भी करके
मुझ तक पहुँच ही जाती
जब कुछ नहीं सुन पाती मैं
सुन पाती हूँ
उसकी आवाज
उसकी आवाज पहचानते हैं
मेरे कपडे ,बर्तन ,घर ,किताबें ,रास्ते
मेरे जबाब न देने पर
बतियाने लगते हैं उससे
उसे क्या पता
एक उसकी आवाज के सहारे ही
चल रही है सारी दुनिया


तीन ...

गणेशपुर की स्त्रियाँ

इन दिनों इन्हें खेतों में होना चाहिए था
बिजाड़ की गुडाई करते
मेड. बनाते
खरपतवार उखाडते
रोपाई की तैयारी में
इन सबसे व्यस्त दिनों में
पुष्पा दी की एक आवाज पर
दौडी चली आती हैं सब
गाँव का हर घर यथा सार्मथ्य मदद करता है
सडक किनारे सुलगाती हैं चूल्हा
कुशल हाथ गूंथते हैं आटा
फटाफट सिंकती हैं रोटियां
आलू प्याज की रसदार सब्जी 
कभी पूरी, कभी खिचडी
स्वाद भूख में था
मिठास बनाने वालियों के हाथों में
चुपचाप सुन लेती हैं
थके हारे यात्रियों की आपबीती
सप्रेम खिलाती हैं जो बन पडा
उनका बैग उठाए जाती हैं दूर तक छोडने
बदले में पाती हैं आशीष
धमकाती हैं बदमाश ड्राइवरों ,खच्चर वालों को
मन तो बहुतों का किया होगा
पर सब काम छोड
मुसीबत में फंसे लोगों के लिए
सडक पर चूल्हा जलाने का साहस
हर किसी के बस की बात नहीं
अजब गजब हैं गणेशपुर की स्त्रियां
अजब गजब है उनकी पुष्पा दी।


(इस वर्ष 16-17 जून को उत्तराखंड में आयी भयंकर आपदा के दौरान उत्तरकाशी के गणेशपुर की स्त्रियों ने 8-10 दिनों तक वहां से गुजरने वाले यात्रियों को भोजन कराया व अन्य मदद की)





चार ...

विकास                                                     

हमने
खारे समुद्र से
बनाया नमक
पकड़ी मछलियां
गये सुदूर यात्राओं पर
बढ़ाये व्यापार

हमने
मीठी नदी से
बुझायी प्यास
भरे कोठार

जब हमारा
गला हो गया तर
पेट गया भर

तब हमने
डूबाये जिन्दा गाँव
उजाड़े षहर
निचोड़े धारे-पनियारे
किषोर पेड़ों की लाषों से
पाट दी आरा मषीनें

अब
हमारे पास है
100 :वाटरप्युरिफाइड
उनके पास
लम्बी कतारों में खाली गागरें
हमारे पास जगमग षहर
उनके पास डूबे पुल

हमारे लिए नदी
भूख-प्यास से
ऊर्जा में
रूपान्तरित हो चुकी थी
हमने कहा
विकास के विरोधियों को
छोड़ दिया जाए
उनके हाल पर।


पांच ...

वे ही

वे ही बचाएंगे
इस हरियाली को
पेड़ों नदियों, पहाड़ों को
जिनके लिए
किसी जगह की जनसंख्या
1573 पुरूश 1104 स्त्रियां नहीं
बल्कि
दादा-दादी, चाचा-बुआ मौसी ताई आदि
होती हैं
जो किसी दुर्घटना को पढ़कर
क्या होगा इस दुनियाँ को
कहकर भूल नहीं जाते
बल्कि
उनकी आंखों में
स्थायी उदासी के तौर पर छा जाती हैं
हताततों की तस्वीरें
जो कुछ न कर पाने की बेबसी से
चुप नहीं बैठते
बिफर उठते हैं
कुछ भी गलत होता देख
जो सवालों से कतराते नहीं
ना ही किसी जबाब को अन्तिम मान
इतिहास बनाने की जुगत भिड़ाते हैं
जो नहीं समझते
काम को नौकरी
औरत को पशु
बच्चों को नासमझ
जो अपना घर बनाते समय
सार्वजनिक रास्तों की जगह नहीं घेरते
उन्हीं की खुरदुरी हथेलियां
थाम पाएंगी
इन नदियां, पहाड़ों, झरनों, धूप, मिट्टी को।





छः ....

नजरिया                                                 


जब मैं देखती हूँ उन्हें
विश्वास भरी मीठी नजरों से
तब पाती हूँ उन्हें
आत्मविष्वासी
हरदम नया करने को तत्पर
सवालों से जूझते
पाती हूँ उन्हें
अपने बेहद करीब
मानो मेरे  ही कितने
हाथ-पैर, आंखे-कान उग आए हों
पर जब मैं देखती हूंँ उन्हें
उलाहना देखती अविष्वासी नजरों से
पाती हूँ उन्हें
संकोची, भयभीत, आत्महीन
मेरा उन्हें देखने का नजरिया
कितना कुछ जोड़ जाता है उनमें।



सात   

बडी होती बेटी


माँ कहना चाहती है
खूब खेलो कूदो दौडो भागो
पर माँ कहती है
गली में मत जाना
रात हाने से पहले लौट आना
माँ कहना चाहती है
खूब हॅसों खिलखिलाओ
खुश रहो ,मस्त रहो
पर माँ कहती है
लडकियों को इतनी जोर से नहीं हॅसना चाहिए
राह चलते ज्यादा बातें नहीं करनी चाहिए
माँ कहना चाहती है
कोई बात नहीं
एक बार और कोशिश करो
गलतियाँ  सीखने की सीढियाँ  हैं
पर माँ कहती है
क्या होगा तेरा
एक भी काम ठीक से नहीं कर सकती
और बांह खींचकर चाय के बर्तन धोने भेजती है
माँ कहना चाहती है
कितनी प्यारी लग रही हो
इसे ,इस तरह से पहनों
ऐसे नहीं, ऐसे करो
प्यार से माथा चूमना चाहती है
पर माँ कहती है
ये बन ठन के कहाँ जा रही हो
फैशनेबल लडकियों को अच्छा नहीं माना जाता
ये सब अपने घर जा के करना।



परिचय और संपर्क                

रेखा चमोली

जोशियाडा उत्तरकाशी
उत्तराखण्ड
मो 9411576387
        



4 टिप्‍पणियां:

  1. रेखा चमोली जी की कविता इतनी सहज और सुगम है कि आम पाठक भी उनकी कविता के यात्रा में सहयात्री बन सकता है | इनकी कविताओं में ग्राम्य परिवेश उन्हीं की भाषाओँ में कही गई हैं जो मिट्टी से जोडती है | आभार रेखा चमोली जी और रामजी भाई को ..

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  2. बेहतरीन रचनायें दिल को छू गयीं

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  3. aabhar ramji , prashant ji , vandana ji aapka.

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  4. कविताएँ पढ़ कर अच्छा लगा
    .''सड़क पर चूल्हा जलाने का साहस
    हर किसी के बस की बात नही ''

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