शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

अरविन्द की कहानी - 'रेडियो'




‘ईश्वर की गलती’ और ‘चिट्ठी’ कहानी के बाद मेरे पसंदीदा कवि-कथाकार अरविन्द की यह तीसरी कहानी भी सिताब दियारा ब्लॉग पर ही छप रही है | इस प्रतिभाशाली युवा के पास न सिर्फ कविता जितनी साफ़-सुथरी भाषा है, वरन उसे कहानियों में पिरोने का मौलिक हुनर भी है | और बात बात ‘प्रेम’ की आती है, तो ऐसा लगता है कि उसको व्यक्त करने वाले, वे हमारे समय के सबसे संवेदनशील युवा हैं | मुझे उम्मीद है कि इस कहानी को पढने के बाद आप भी उन्हें ‘दाद’ दिए बिना नहीं रह सकेंगे |

                 तो प्रस्तुत है अरविन्द की नयी कहानी “रेडियो”
                               
                                रेडियो


कथा पहले मुख़्तसर-सी - 

                          
पिताजी के विवाह की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि उनके दहेज़ में मिला हुआ रेडियो था .विवाह के बस एक साल के बाद मैं पैदा हो गया था .इसलिए रेडिओ की उम्र मुझसे एक साल बड़ी ही मानी गयी .माँ के इतना करीब था वह रेडियो कि लोग मुझे उसका छोटा भाई भी कहेंगे ,तो इस उम्र में भी मुझे हिचक नहीं होगी.

लोग बताते हैं कि जब मैं रोता था तो इसके गाने की आवाज सुनकर चुप हो जाता था .माँ मेरे सिरहाने में रेडियो चलाकर छोड़ देती थी और घर के सारे काम निपटाती जाती थी .धीरे धीरे इसकी आदत ने मुझे इतना जकड लिया था कि रेडियो की चुप्पी मेरे रोने का सबब बन गयी .माँ को इसकी बदौलत अनगिनत गीत याद हो गए थे .
                                
उस रात छायागीत का कोई कार्यक्रम था जब पिताजी बैठके में बैठे कोई कागजी काम निपटा रहे थे .रेडियो की आवाज थोड़ी ऊँची थी .उसके गीत दूर-दूर गलियों से होते हुए कई खिडकियों तक जा रहे थें .और माँ को एक धुन थी उसके गीतकार और संगीतकार याद करने की .सो वह ध्यान से सुनती थी .हुआ यह था कि पिताजी ने एक गिलास पानी मांगा था  . रेडियो की ऊँची आवाज की वजह से या फिर गीत में गुम हो जाने के कारण माँ ने आवाज नहीं सुनी .पिताजी ने तीसरी बार पुकारा था .और अंत में गुस्से में आकर रेडियो को पटक दिया था .पटकने की वजह से उसे चूर चूर हो जाना चाहिए था .लेकिन बस उसका एंटिना ही टूटा .कुछ घंटे तक रेडिओ बंद रहा और माँ बहुत नाराज रही .फिर जब रेडियो की चुप्पी से मैं रोने लगा तो पिताजी ने खुद रेडियो को ठीक किया .मैं इधर बगल में लेटा था .माँ देर तक सुबकती रही .उसकी आवाज मेरे बगल से जा रही थी ..और मैं गाने और उसके रोने की मिली जुली आवाज सुनता रहा .उस वक्त मेरी उम्र कुल जमा डेढ़-एक साल थी .    

माँ बहुत खुबसूरत गाती थी .उसका गला लाजवाब था .ऐसे दिनों में जब रेडियो के सेल ख़त्म हो जाते थे तब वह कंधे पर चिपकाकर मुझे सुलाने की कोशिश करती थी .लेकिन मैं उस वक्त बिना साज की आवाज को समझ लेता था और रोने लगता था .थक हारकर पिता जी को रेडियो का सेल लाना ही पड़ता था .पिताजी इसे फिजूलखर्ची कहते थे .पर मेरी वजह से रेडियो घर में टिक गया था .और माँ के गीतों का शौक को विराम नहीं लगा था .नहीं तो कितने शौक थे उसके जो विवाह के बाद बलि चढ़ गए थे .

आप नहीं मानेगे लेकिन एक बार क्या हुआ था कि रेडिओ बिगड़ गया .बस वह दिन क़यामत का था .मैंने रो रो कर सारा घर सर पर उठा लिया .कसबे से बहुत दूर शहर जाकर पिताजी ने उसे ठीक करवाया .बस से आना जाना था .फिर भी शाम हो गयी .जैसे ही पिताजी गली में घुसे .मेरी आवाज सुनकर रेडियो आन कर दिया .और मैंने रोना बंद कर दिया था.उस दिन घर वाले समझ गए कि जैसे किसी राजकुमार की जान तोते में बसती है वैसे ही मेरी जान रेडिओ में बसती है .

जब सब लोग सो जाते थे तब माँ बर्तन मांजती थीं .और अंत में जब मैं सोने वाला होता था तो आहिस्ते से रेडियो को उठाकर उसे झाड पोछ देती थी .रेडियो को पोछने के लिए एक सूती कपड़ा अलग से था .फिर उसे मेरे सिरहाने से उठकर माँ अपने  बगल में रख लेती थी  .माँ कई चैनल बदलती थी .कभी सांय -सांय की आवाज में बहुत धीमे-धीमे कम तरंग पर गीत लहराते हुए आता .और फिर बहुत दूर चला जाता था .जहाँ से आता था शायद वहीँ .फिर गीत के वह बोल डूबकर सतह पर नमूदार होता .कुछ ऐसी ही किस्मत माँ की भी थी .डूबती उतराती सी .

                                    
माँ और पिताजी रहते तो एक साथ थे ,पर उनमे पटी कभी नहीं.एक अबोला सा था उनमे .जब घर के बाहर से पिता जी आते थे तो माँ एक गिलास पानी रखकर हट जाती थी .या फिर उनके पेट के हिसाब किताब से गिनकर रोटिया उनके थाली में रख जाती थी .या किसी दिन मनपसन्द सब्जी बनी होती तो अलग से प्लेट में रोटिया रख आती थी .उनके नमक ,चीनी और स्वाद के बारे में सटीक जानकारियाँ माँ ने हासिल कर ली थी .और उसे निभा लेने में पारंगत भी हो गयी थी .हफ्ते में एक दिन उनके सभी कपडे साफ़ कर दिए जाते थे .और चुपचाप एक निश्चित जगह रख दिए जाते थें .जरुरत के हिसाब से पिताजी हरेक रोज उसमे से एक-एक पहन कर जाते थे .माँ एकदम सीधे नहीं बोलती थी .अगर बहुत ही जरुरत हुई तो माँ अदृश्य हवा में कुछ बात फुसफुसा जाती थी और अगर पिताजी को करने का मन हुआ तो नियत समय पर वह काम कर देते थे .अगर मन नही हुआ तो नहीं होता था .बहुत जरुरी बात में जैसे अगर मुझे कोई विशेष इंजेक्शन लगवाना हुआ तो वह एक और मुंह कर के कहती कि मुन्ना को खसरा के इन्जेशन लगवाने है .अगर हो सके तो चलना .पिताजी उसी अदृश्य हवा से कहलवा देते कि शाम को जल्दी आउंगा तैयार रहना .और ऐसी बातें जिसमे कहना हो कि आज छुटकी की शादी है अगर साथ आप भी चलें तो .....तो वे उसी हवा से कहते कि तुम चली जाना मुझे फुर्सत नहीं है .

इन सब भारी बातों के बीच मैं कैसे पैदा हो गया था ,यह एक शोध का विषय था .पिता और माँ के बीच की इस रिक्तता को मैं कितना भर पाया था ,बता नहीं सकता .पर यह रेडियो ही एक कारण था जो हमारे बीच की मधुरता घोले रखता था.और मेरे साथ साथ शायद माँ के भी जीने का अच्छा साधन था .कोई गली से आते हुए बहुत दूर से हमारे घर की आवाज सुनता तो समझता हम लोग प्रेम करने वाले जीव हैं  .जहाँ से हर वक्त रेडियो की आवाज आती रहती है.गाने की आवाज आती रहती है .पर आपको पता लग ही गया होगा ऐसा बिलकुल नहीं था .यह हमारे अकेलेपन को भरता था .एक रिक्तता को भरता है .

माँ रेडियो की आवाज भरसक कम ही रखती .कि बैठके तक न पहुचे .पिताजी को रेडियो एकदम नहीं पसंद था .वह तो दहेज़ की चीज थी सो ले लिया था .नहीं तो अगर खरीदना हुआ होता तो आजीवन संभव नहीं होता .मुझे ठीक से नहीं पता कि माँ और  पिता जी में ठीक से क्यों नहीं जमी . माँ तो बहुत सुन्दर थी .या फिर हो सकता है कि पिता जी किसी और को पसंद करते थे .या फिर बीच में ही कभी कोई खट पट हो गयी रही हो .

माँ के संदूक में एक पतली सी कापी थी .उसमे उसने रेडियो से सुनकर सारे अच्छे गीतों को कलमबद्ध कर रखा था .उसमे बेसन के पकौड़े ,कोफ्ते ,सोयाबीन के हलवे बनाने के नियम भी लिखे हुए थें .जब भी कोई अच्छी सी रेसेपी रेडियो पर पढ़ी जाती वह उसे तुरंत लिख भी लेती थी .लेकिन बनाती कभी नहीं थी .बनाये तो तब न जब बाजार से सामान ले आयें .घर में तो वही भोजन बनता था जो शाम को बाजार से लौटते वक्त सब्जी पिताजी ले आते थे .या महीने के सबसे अंत में जब सामानों की कोई लिस्ट बनती थी .सामान में कोई ऐसा अतिरिक्त सामान नहीं होता था जो पिताजी का ध्यान खींचे .मैं आपको बताना भूल रहा हूँ कि इसी कापी के पिछले पन्ने पर ‘मेरे प्राणनाथ रवि ‘’लिखकर जैसे जानबूझकर भूला जा चुका था .यह रवि कौन था मुझे नहीं मालूम ! हो सकता है कि यही कारण झगड़े का मूल कारण रहा हो .अगर रहा हो तो उसके लिए कोई अलग कथा कहानी होगी लेकिन पहले मेरी कहानी !!
                                                  
माँ नाचती भी बहुत अच्छा थीं .जब कोई नहीं रहता था तब वे किवाड़ बंद कर लेती थी .और किसी गीत पर उनके पैर एक गति में घुमने लगते थे .वे संदूक में घुघरू भी रखती थीं .सच कहूँ तो पिताजी को उनके संदूक से काफी चिढ थी .उसमे तस्वीरों का एक एल्बम था .तस्वीरों में कई सारी सहेलियां थीं उनकी .बहुत पुरानी चिट्ठियाँ थीं ,कुछ शेरो शायरी की किताबें थीं .कहानियों की किताबें थीं .सिधौरा था .जो उनके विवाह में मिला था .चूड़ियाँ और बिंदिया के कुछ पैकेट थे .मेहंदी के पैकेट थे .कुछ अच्छी साड़ियाँ थी .यहाँ तक कि पहले-पहल जब वे आई थी तो रेडियो इसी में रखा जाता था .लेकिन जब से मेरा नवजात वाला शौक चढ़ा था तब से वह रेडियो मेरे साथ रहने लगा था .मेरे सिरहाने .

                                    
माँ कभी अकेले बाजार नहीं गयी .जाती तो बगल वाले मुनिया को साथ ले लेती .मुनिया की उम्र यही कोई पन्द्रहेक रही होगी .पिताजी टोकते तो कुछ नहीं पर उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगता था .यह उनके चेहरे से समझ में आ जाता था .जब वे नाराज होते थें तो उनका होठ का निचला हिस्सा लटक आता था .बाजार में एक रेडियोसाज की एक दुकान थीं .उसके दुकानदार का नाम तो पता नहीं .पर वह बहुत सुदर्शन था .उसकी आवाज बहुत प्यारी और गंभीर और  धीमी थी .जैसे कि रेडिओ अनाउंसर की होती है .उसे किसी रेडिओ स्टेशन में होना चाहिए था .लेकिन इसे किस्मत का धोखा ही कहेंगे कि वह बिगड़े हुए रेडियो की मरम्मत करता था .उसकी दूकान में अनगिनत किस्म के रेडिओ भरे पड़े थें .लेकिन अधिकतर बिगड़े हुए .तब बता दूँ कि रेडियो का जमाना था और टी वी नया नया था .और महंगा भी .जैसे कि टी वी देखने के लिए लोग दूसरों के घरों में चले जाते थें वैसे ही उन दिनों रेडियो सुनने लोग दूसरों के घरों में चले जाते थें .

माँ का मायका यानी कि मेरा ननिहाल उसी रेडियोसाज के शहर में था .माँ जब भी उस शहर में जाती थी तब वह कुछ देर तक उस दूकान पर रुकती थी .मैं उनके कंधे से चिपका होता था .और उनकी बातों के समय मैं सो जाया करता था .मैं नहीं बता सकता कि वे क्या बात करती रही  होंगी .उस वक्त मुनिया कही किसी दूकान में चूड़ियाँ या अन्य सामान देखने में व्यस्त रहती थी .माँ का चेहरा उस वक्त किसी फूल-सा नरम हो जाता था .और आँखों की एक कोनिली परत बहुत गीली हो जाती थी . यह मैं उस वक्त अपनी नीद में भी परख लेता था .किसी को कुछ शक जैसा कुछ न हो इसलिए वह सेल का पैकेट खरीद लेती थीं .रेडिओसाज उस सेल के पैसे नहीं लेता था .या क्या पता कभी-कभी ले ही लेता हो .यह उस वक्त होता था जब दोपहर का वक्त हो तब ग्राहक भी एक्का दुक्का आते थे .मेरे हिसाब से इसी आदमी का नाम रवि होना चाहिए था .

हरेक की तरह  मेरे जीवन में भी वह मौसम आया जब मेरे दांत निकलना शुरू हुए .उस वक्त मेरे पोतड़े लगातार हरे-पीले  रंग में गीले होते रहे .मैं पतला और चिडचिडा होता चला गया .दिन रात चिल्लाता रहा .तब रेडियो का जादू मेरे लिए थोड़ा फीका फीका हो गया .अगर गाने थोड़े धूम धडाम वाले न हुए तो मैं जल्दी चुप ही नहीं होता था .उस वक्त माँ समझ लिया करती थी और चैनल वहां ले जाती रही जहाँ अक्सर आर .डी .वर्मन के गाने आते थें .लेकिन जीवन गानों की तरह मधुर नहीं रहता . उसमे चाहे अनचाहे बदलाव आते जाते रहते हैं .एक बार क्या हुआ कि मुझे जोरों का बुखार चढ़ा .मेरा बदन तवे की तरह तपने लगा था .पिताजी जल्दी ही घर आ गए थे .उन्हें पड़ोस का एक आदमी बुलाने गया था .शहर की बस पकड़ते पकड़ते शाम हो आई .मैं माँ के आँचल में दुबका रहा .मेरा माथा तपता रहा .मैं एक लम्बी बेहोशी में था .और हिचक रहा था .

पहले तो मेरे माँ -पिता जी शहर के कई अस्पतालों में चक्कर लगाते रहें .मेरी स्थिति देखकर लगभग हर डाक्टर जवाब देता रहा .बच्चों का एक बहुत बड़ा डाक्टर था.उसने कहा कि यहाँ इसका ठीक होना संभव नहीं है और एक बड़े शहर में एक और बड़े अस्पताल का पता देकर कहा कि यहाँ जाओ .उसने किसी रोग का नाम भी  लिया .पर बहुत टेढा होने के कारण वह मुझे याद नहीं रह पाया था .वे वहां से निकलकर बढ़ाते हुए एक अँधेरे वाले चौराहे तक आयें .और माँ लिपट कर पिता जी से रोने लगी थीं .मेरे जेहन में यह मेरी वजह से पहली घटना थी .पहली बार मैंने उस अर्धचेतन अवस्था में माँ को पिताजी के इतने नजदीक देखा था .यह मेरे ही कारण था .मेरी गंभीर हालत ही इस नेक काम के लिए जिम्मेदार थी .माँ का चेहरा पिताजी के कंधे पर था .पिताजी ने वही खम्भे का सहारा ले कर माँ के सर को चूम लिया था .मैं उनके दुसरे कंधे पर था .और एक बहुत गहरी सांस ली थी .यह गहरी सांस ऐसे थी जैसे सदियों से चलकर उन तक पहुँच रही हो .और बीते सालों में मेरे लिए यह एक यादगार घटना थी .मैं उस वक्त सांस नहीं ले पा रहा था और मेरी नब्ज चुप होने कगार पर थी .

                                                                      
अब सब कुछ जैसे सही होने जा रहा था. एक रिक्शा वाला आता हुआ दिखाई दिया .पिताजी ने माँ को कंधे से अलग किया .मुझे उन्हें सौपा .और रिक्शे वाले की ओर बढ़ गए .वे उससे बस स्टेंड चलने के लिए कह रहे थें .माँ को रोता देख उसने कहा था कि क्या हुआ साहेब बच्चे की तबियत खराब है .किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया .फिर खुद वही बोला कि एक और डाक्टर हैं उसकी जानकारी में ,अगर आप लोग चाहें तो दिखा सकते हैं .रात आधी बीत चुकी थी .तारीख बदल गयी थी .और उस अँधेरे सुनसान में हमारा रिक्शा एक गली में बढ़ रहा था .उबड़ खाबड़ रस्ते की वजह से और कुछ इस दुर्निवार दुःख से माँ बार बार रोती हुई पिताजी के कंधे पर बिछल आती थी .और मैं सही सही बताऊँ तो उस वक्त यही चाहता था.

और अस्पताल क्या था ?दो चार स्टूल और तीन चार इंजेक्शन ,कुछ दवाई और एक नीला पर्दा लगाकर उसने अस्पताल का एक आभासी संसार कायम कर लिया था .रिक्शे वाले ने बार बार आवाज देकर डाक्टर को बुलाया .वह बहुत पतला सा जीव था .और उबासियाँ लेता हुआ नीद की भंवर से आया था .उसने मुझे एक चौड़े  से स्टूल पर लिटाया .और लगातार  मेरे सर पर गीली पट्टी करने लगा था .

यह रात के डेधेक बजे का समय रहा होगा .माँ पिताजी जी एक स्टूल पर बैठे मुझे एकटक निहारे जा रहे थें .बहुत दूर से किसी घर के छत वाली खिड़की से रेडियो की आवाज चलकर मेरे कानों तक पहुँच रही थी .कोई चलाकर सो गया होगा . या फिर उस वक्त ऐसे दीवाने भी थें जो इतनी रात गए भी रेडियो सुनते थें .मैं ठीक ठीक नहीं बता सकता था.मेरी आँख खुल रही थी .माँ ने इसे देख लिया था .उसने पिताजी को इशारा किया. और बस समझते हुए देर नहीं लगी उन्हें .

अब पिताजी शहर की गलियों में एक रेडियो खरीदने के लिए भाग रहे थें .वे उस वक्त खुली पनेडियों की दुकान से रेडियो की दुकान का पता पूछ रहे थें .और फिर तत्काल रिक्शे वाले से कहते कि जल्दी चलो .उस रेदियोसाज की दूकान का पता जब मिला तो रात के तीन बजने को आये थे .उसके पास सैकड़ों रेडियो बिगड़े हुए पड़े थें .और वह सभी को बहुत जल्दी जल्दी निपटा रहा था .उसकी आंखे नीद से चिपकी जा रही थीं .लेकिन जैसा कि होता है कि एक जूनून में वह खुली थीं .रेदियोसाज ने जैसे ही पिताजी को देखा वह तत्क्षण खडा हो गया .पिताजी, जो कि बदहवास थें ,ने एक सुर में मेरे बीमार होने की बात की .और एक रेडियो दिखाने की बात की थी .
                        
अब पिताजी और रिक्शा उस टूंटपुजिये-से अस्पताल की ओर भाग रहे थें .लेकिन उन्हें मालूम नहीं था कि वह रेडियोसाज भी अपनी सायकिल से उनके पीछे भागा हुआ आ रहा है .यह एक बहुत अच्छा संयोग था कि रेडियोसाज जो मेरी माँ को जानता था ,और पिताजी को भी .मुझे भी .और सच कहें तो जिसकी वजह से बहुत कुछ उलटा-सा था जीवन में .उसे मेरे पिताजी नही जानते थें .लेकिन उन्हें आभास था .और शायद यही आभास दरार की एक वजह बनता था .जिसे मैं अपने तई उसे भरने की कोशिश कर रहा था .उस रात की बीमारी तो इस कहानी को सुखांत तक लाने का बस एक बहाना भर साबित होने जा रही थी .
                                
पिताजी ,जिसने रेडियो से और गानों से कभी मुहब्बत नहीं की,वे मेरे लिए अब एंटीना निकालकर गली में किसी गीत को पकडाने की कोशिश कर रहे थें .और यह उनसे संभव नहीं था .सो माँ सामने आयीं और जिस गाने को वे शॉट वे पर पकडाने पर कामयाब हो गयी थीं .वह खय्याम का संगीत था .धीरे धीरे उन्होंने रेडियो को म्रेरे सिरहाने रख दिया .उस वक्त बहुत साफ़ साफ़ आवाज आ रही थी .लहराती हुई नहीं .शायद रात की वजह से .और मैं यह बात बताना नहीं भूलूंगा कि डॉक्टर इस सब नाटकों से हैरान था .पर यह सब नाटक नहीं था .सच में हुआ था .
                         
रेडियोसाज देर तक मुझे देखता रहा .माँ जो देर तक खड़ी खड़ी थीं वे आकर पिताजी के पास बैठ गयी थीं .मैं उन दो घंटों में काफी सुधर चुका था .और अब आज की रात मेरे जीवन और माँ पिताजी के संबंधों को लेकर निर्णायक सिद्ध होने वाली थी .रेडियोसाज देर तक वही बैठा रहा .एक सघन अबोला बीच में पसरा रहा .बीच-बीच में मेरे हिचकने से वहां की चुप्पी में छेद हो रहा था .यह बिलकुल भोर का समय था .जब रेडियोसाज उठा वह मेरे सिरहाने आया था .उसने रेडियो के ख़रीदे में लिए गए पैसे को जेब से निकाला और मेरे सिरहाने रखा .और आहिस्ते-आहिस्ते भारी  कदमों से बाहर चला गया .यह कुछ ऐसी आवाज थी जो फिर लौटकर हमारे पास आने वाली नहीं थी .उसके सायकिल के खटखटाने की आवाज देर तक आती रही .जब वह आवाज आनी बंद हो गयी तो पिताजी ने माँ से कहा था कि रवि था न ? माँ ने न तो हाँ कहा और न ही ना कहा था .वे थोड़ा सा और झुक आई थीं .यह बिलकुल अलबेली सुबह थी .

                                 
उस सुबह आने के बाद माँ ने पहला काम किया था कि अपनी डायरी के वे सारे पन्ने फाड़ के जला दिए थे .जिसकी वजह से जो भी कुछ तीता सा था .वह घर से निकल गया था .उस घटना के बाद बहुत बड़ा जो परिवर्तन आया आप माने या न माने .वह था कि पिता जी को अब गाने के बोल और गीतकार और संगीतकार याद होने लगे थें .वे उछलते कूदते घर आने लगे थे .आते ही माँ को बांहों में भरने लगे थे .वे मेरा ज़रा सा भी रत्ती भर ख्याल नहीं करते थें .मैं ही मुंह फेर लेता था .कि जब एक दुधमुहे बच्चे के स्मृति में उसके सामने की बातें लोड हो रही हैं तो चलने वाले बच्चे की स्मृति कितनी तेज हो सकती है .मैं अब चलने लगा था .

वह रात के अधियाने का समय था .रेडिओ चालू था .मैं कुछ भी बोल पाने में अक्षम था .सो प्यारे रेडियो का सहारा लिया था .पप्पा लाइट ऑफ़ कर लो .यह रेडियो की आवाज थी .वे चौकें कि अचानक यह आवाज कहाँ से आई .मैंने फिर कहा कि पप्पा प्लीज लाइट आफ कर लो .यह मेरी आवाज थी .लेकिन उन्हें लगा कि रेडिओ की आवाज है .वे विश्वास ही नहीं कर सकते थें कि मैं इतने स्पष्ट स्वर में बोल सकता हूँ. .वे उठें और रेडिओ और लाइट एक साथ आफ कर दियें .यह उस वक्त का समय था जब उद्घोषक यह कहकर स्टेशन बंद कर लेते हैं कि बारह बजाकर पांच मिनट हो रहे हैं और अब ये तीसरी सभा यही संपन्न होती है .



उपसंहार उर्फ़ किस्स्से समाप्त नहीं होते हैं ,या अंत नहीं होता कोई उर्फ़ कुछ और असमाप्त वाक्य


होती हैं ,कुछ चीजें इतनी तीव्रता से घटती हैं कि विश्वास करना मुश्किल सा हो जाता है .अब बस कुछ ही दिनों में मेरा दूसरा भाई आने वाला था .सब कुछ ठीक है .माँ शहर अकेले और पिताजी के साथ कई बार गयी . लेकिन उस रेडियोसाज से नहीं मिली .वहां वे फिल्म देखते और घूमते .रात में जब माँ बर्तन धो रही होती तो वे सिंक में मंजे बर्तन धो डालते .मैं थोड़ा बहुत बोलने लगा था .और बहुत स्पष्ट स्वरों में और ठहराव के साथ बोलता था .रेडियो मेरे इतने पास था कि जब अपने कुछ बन जाने का स्वप्न देखा तो वह उद्घोषक बन जाने का स्वप्न था .


   
   एक और कहानी जिसे न भी पढ़ा जाए या अलग से भी पढ़ा जाए तो कोई हर्ज नहीं है !!

                                
                           दृश्य १
                            
रजनी के कमरे तक रेडियो की आवाज आ रही है .यह आवाज तलत महमूद की है .एक शक्कर में पगे हुए शब्दों और आवाज में मन में उतर रही है .रवि का घर रेलवे की उस कालोनी में चार घर के बाद पड़ता है .कुछ ऐसे कि रजनी को उसके घर से होकर ही अपने घर जाना पड़ता है .रवि के घर में दिन रात रेडियो बजता रहता है .यह रजनी को अच्छा लगता है .रजनी के घर में रेडियो नहीं है .रजनी अच्छा गाती है और ग्यारहवी की छात्रा है . वह रवि की नयी नयी पड़ोसन है . 
                                        
                            दृश्य २

                           
यह सर्दियों की शाम का वक्त है जब रजनी स्कूल से लौट रही है .बगल से होकर रवि सब्जियां लिए हुए लौट रहा है .और अचानक उसकी सायकिल की चैन उतर गयी है . वह सड़क के के किनारे सायकिल खडा कर चैन ठीक कर रहा है .या फिर दूसरे शब्दों मे कहा जाए तो वह रजनी के अपने बगल से गुजर जाने का इन्तेजार कर रहा है .रजनी गुजरती है .यह गुजरने का काम ,साथ रहने का ज्यादा आभास कराता है .फिर आगे जाकर सायकिल का चैन उतर जाती है .रजनी फिर से गुजरती है .यह गुजरना शायद रवि के दिल से होकर गुजरना है .आओ सायकिल पर बैठ जाओ ! रवि रजनी से कहता है .रजनी हंसती है .रवि उस हंसी में डूबने लगता है .रजनी फिर गुजर जाती है .उसके साडी का पल्लू पहले रवि के सामने से लहरता हुआ जाता है .फिर उसके अस्तित्व में लहराने लगता है .सामने पश्चिम में जाने कब का सूरज डूब चुका है .

                                   
                            दृश्य ३

                              यह के एल सहगल की आवाज है .टीएन मधुप के बोल हैं .और खुर्शीद अनवर का संगीत है .यह एक जलता हुआ गीत है .रवि ने खिड़की के दोनों पाटों को खोल दिया है .रात के दस बजे का वक्त है .छाया गीत का कार्यक्रम .बहुत ठंडी हवा कमरे में भर रही है .रजनी जो इस वक्त शायद जग रही होगी .और खाट पर करवट बदल रही होगी .उस वक्त यह गीत अँधेरे में छलांग लगाता हुआ उसके बगल तक जा रहा है .बैजंती माला की ही तरह सुन्दर उसके मन में एक नृत्य चल रहा होगा .रजनी अभी नहीं सोएगी .वह विविध भारती की अंतिम सभा ख़त्म हो जाने पर सोएगी .समाचार आने के बाद .लेकिन रवि समाचार के पहले ही रेडियो बंद कर देता है .एक करवट लेकर रजनी सोना चाहती है .लेकिन देर तक जगी रहती है .

                                  दृश्य ४
                             
‘’क्यूँ तुम्हें दिल दिया ...पत्थर से दिल को टकरा दिया ‘’में किसकी आवाज है ?रजनी रवि से पूछती है .रवि को सारे गीत और उसके लिखे बोल याद है .रवि अपनी चैन ठीक कर रहा है .और यह सवाल रवि के बैठने के लिए कहने पर रजनी ने किया है .नसीम बानो और सुरेन्द्र की आवाज है . रजनी बैठती नहीं हंसती हुई चली जाती है .रवि देर तक किनारे बैठा रहता है .बहुत दूर जाकर जहाँ से उसके घर जाने का मोड है .वहां रुककर रजनी उसे देखती है .फिर चली जाती है .रवि पैडल मार रहा है .पर वह कहीं खो गया है .उसे पता नहीं लग रहा है कि वह पैडल मार रहा है .वह सड़क छोड़कर आसमान में चला गया है .

                                 दृश्य ५
‘                             
’ठुकरा रही है दुनिया ..हम है कि सो रहे हैं ....बर्बाद हो रहे थे ..बर्बाद हो चुके है . गैरों से न शिकायत गैरों से न गिला ‘’के एल सहगल की आवाज है .एक दुःख में लिपटी हुई .खिड़की खुली हुई है .आवाज रजनी तक पहुँच रही है .रजनी बार बार उठ कर बैठ रही है .वह आँगन में जाकर टहल आती है .रवि देर तक खिड़की के पास खडा टकटकी लगाए हुए अँधेरे में घूरे जा रहा है .उसे लगता है कि रजनी खिड़की से कूद कर आ रही है .लेकिन बस यह एक भ्रम है .फिर उसे लगता है कि गाने के यह बोल रजनी की खिड़की से आ रही है .लेकिन यह भी एक झूठ है .और अंत में रजनी इस बोल को देर तक गुनगुनाते हुए कब सो जाती है ,नहीं पता चलता .रवि देर तक जागता है .रेडियो बंद नहीं करता या बंद करना भूल जाता है .उसे बहुत देर से नीद आती है .और नीद में रजनी आती है .

                               दृश्य ६
                               
महीनो हो चुके हैं रजनी को आये हुए .मतलब सड़क के किनारे चैन को ठीक करते करते रवि को भी महीनो हुए आये हैं .रोज रात को वह गाने सुनता है .और एक आग में जलता है .यह आग में जलना कुछ ज्यादा ही हो गया है .सो उसे तेज बुखार है इन दिनों .अब वह घर में पड़ा हुआ है .रजनी जिसे आदत हो गयी है उस सड़क के किनारे की जहाँ बैठकर वह सायकिल के चैन ठीक करता है .उसे आते हुए अच्छा नहीं लगता .वह एक कल्पना करती है .एक झूठ मूठ के रवि की .वह एक झूठ मुठ की एक सायकिल की चैन ठीक कर रहा है .वह उसके पास जाती है .ध्यान से देखिये तो बस वहां हवा है .वह हवा को चूमती है .जैसे रवि को चूमती है .उसकी आँखें देह की  अंतिम तली तक बंद होने को आती है और उसकी आत्मा एक गश में हो जाती है .वह बहुत धीमे से कहती है ‘’मैं तुमसे प्रेम करती हूँ रवि ‘’सब कुछ झूठ झूठ रचा जाता है .पर यह कथन सच में उचारा गया होता है .और हवा में कुछ ऐसे घुल जाता है कि उस कथन की सुगन्ध देर तक उठती रहती है .वह एक झूठ मूठ की एक सायकिल पर बैठकर घर आती है .घर से गुजरते हुए वह रवि के घर को ध्यान से देखती है .वहां कोई आहट नहीं .वह उस झूठ मूठ  के सायकिल से उतर जाती है .बरामदे में झूठ मुठ का रवि झूठ मुठ का सायकिल ले कर जाता है .सायकिल के झूठ मुठ के खडखडाने की आवाज रजनी तक आती है .रवि घर में जाने से पहले झूठ मूठ का बाय -बाय करता है .लेकिन रजनी सच का बाय बाय करती है .घर आकर रजनी अपनी वह डायरी निकालती है जिसमे रेसिपी और गीत लिखती है .एक कोरे पन्ने को ध्यान से देखती है और अनजाने में वह कब ‘’मेरे प्यारे प्राण नाथ रवि ‘ लिख जाती है पता ही नहीं चलता ..

                                         दृश्य ७

                                
रवि जो बुखार में खूब झुलस चुका है .और रेडियो की आवाज उसके सिरदर्द में एक ठोकर की तरह लग रही है .एक रात वह रजनी की खिडकी से गानों को आते हुए सुनता है .वह धीरे धीरे खिड़की के पास आता है .और देर तक वह खड़ा रहता है.और यह कहने वाली बात नहीं है .आप समझ चुके होगें कि रजनी भी वहां खड़ी मिलती है . वे रात भर ऐसे ही खड़े रहते हैं .और इस कहानी में होता यह है कि अगली सुबह तक रवि बिना दवाई और दारू के ठीक हो जाता है .और पहले अपेक्षा ज्यादा उर्जस्वित महसूस करने लगता है .

                                     दृश्य १०
                              
शहर से दूर एक पहाड़ी का उपरी हिस्सा है .वहां रजनी के गोद में रवि लेटा है . बगल में रेडियो  के गाने है .रवि कहता है कि वह उद्घोषक बनना चाहता है .रजनी कहती है कि मैं गायिका बनना चाहती हूँ .वे आसमान के नीलेपन को देर तक देखते हैं .उनकी नजरें एक साथ एक में लिपटी हुई एक बादल तक जाती है .और फिर लौटकर दूर एक पेड़ को छूकर आ जाती है .उन्हें कोई देखता तो नहीं देख पाता.रजनी और रवि एक ओट में छिपे हुए हैं .उन्हें एक साथ कोई देखता तो बदनामी होती .रवि उठता है और रेडिओ बंद कर देता है .और अपनी बहुत प्यारी और मीठी आवाज में कहता है कि सुनिए ……..एक प्यारी आवाज में एक गीत .बोल तितलियों के हैं .संगीत हवा ने दिया है .आवाज है रजनी की .रजनी बहुत धीमे धीमे स्वरों में एक प्यारा गीत गाती है .दूर से सुनने पर लगता है कि रेडियो की ही आवाज है .सूरज धीरे धीरे डूब रहा होता है .
                              रजनी और रवि दो दिशाओं में लौट जाते हैं .रजनी के साडी का पल्लू पहाड़ से उतारते हुए देर तक लहराता है .तो उसके उड़ने का भ्रम लगता है .रवि रेडियो  के फंदे को कंधे में लटकाएं सायकिल से तेजी से पहाड़ से सरकता जा रहा है .  

                                  दृश्य ११


                                  
रजनी की बुआ आई हुई है .इसीलिए कुछ दिनों के लिए रजनी को अपने फुफेरे भाई का लाया गया रेडियो सुनने को मिल जाता है .वह रेडियो अब एक दिन अंतराल देकर सुनते सुनाते रहते हैं .जैसे आज अगर मंगलवार है और बारी रजनी की है .तो कल यानी बुद्धवार को रवि ,रात में खिड़की के पास रेडियो सुनाएगा .आज की बारी रजनी की है .रजनी ने अपनी खाट खिड़की के पास खिंच ली है .रवि को खड़े रहने की देर तक आदत है .’’ मैं तुमसे प्रेम करता हूँ रजनी ‘’ यह रेडियो की आवाज है .यह आवाज देर तक वातावरण में गूंजती रहती है .रवि भी इसे सुनता है .रवि इस आवाज की बार बार  नक़ल करता है .बिलकुल उद्घोषक की तरह .या यूँ कहें कि खुद उद्घोषक ही रवि की नक़ल करता है .अगर कोई रात में जगा होगा सुन लेगा तो क्या कहेगा .आवाज बाहर देर तक दौड़ती रहती है .रजनी बहुत धीमे धीमे मुस्कराती है .और सो जाती है .वही आवाज अब उसके सपनो में दौड़ी आ रही है .

                                           
                                 दृश्य १२

                                 
                                     
बुआ के दूर के पहचान में एक लड़का है .क्लर्क है .कस्बे में रहता है .इतना कमा लेता है कि रजनी खुश रहेगी .रजनी की माँ से बुआ उसके  बारे में कहती है .उसके हाँथ पीले करने के बारे में .रजनी की माँ कहती है कि रजनी को वे और पढ़ाएंगे .रजनी अच्छे नम्बरों से पास होती है .चलते हुए इन दिनों उसकी साडी खूब लहराती है .रजनी माँ के फैसलों से बहुत खुश होती है .रात में वह रेडियो की आवाज को थोड़ा और बढ़ा देती है .रवि उसके उमंग को पहचान लेता है .वह देर तक मुस्कुराता है .रात में जब समाचार ख़त्म हो जाते हैं तो ‘’मैं तुमसे प्रेम करता हूँ रजनी’’ की आवाज दूर दूर तक फ़ैल जाती है .बदले में एक जवाब रजनी फुसफुसाती है .लेकिन तभी रेडियो पर स्टेसन बंद होने की एक खरखराहट आने लगती है .

                                  दृश्य १३ 

                                  
शहर से थोड़ी दूर पहाड़ी का एक दृश्य है .रजनी रवि की बांहों में सिमटी हुई है .बगल में रेडियो पडा हुआ है .रेडिओ बंद पडा हुआ है .रजनी के रहते रवि को किसी गीत संगीत की जरुरत नहीं पड़ती है .वे बस साथ हैं .बिना किसी कारण कार्य के साथ है .वे एक दूजे के बिना अधूरे हैं .तो वे अब पूरे हैं .अब कोई अतिरिक्त चीज जैसे हवा ,बादल ,पानी की जरुरत नहीं रह गयी है . रेडियो तक की भी नहीं .यहाँ तक कि उन्हें देखने की भी जरुरत नहीं है .वे बिना दृश्य के भी सब कुछ देख ले रहे हैं .एक चिड़िया गयी है .वे आँखें मूंदे मूंदे हैं .उसके पंखों की आहट दोनों के पलकों से होकर गुजर गयी है .उनके कानों से होकर लता जी की आवाज जा रही है .यह किसी चैनल पर प्रसारित  होगी .एक बादल है जो उनके ख़्वाबों में आकर बरस-बरस जा रहा है .एक ताप रजनी के होठों के इर्द गिर्द चढ़ता जा रहा है .रवि के आँख और शब्द जो लगातार बर्फ की तरह ठन्डे होते जा रहे हैं .उस पर एक रंग चढ़ता जा रहा है .बहुत दूर आसमान में ठहरे ठंडे बादल में सूरज छिपता जा रहा है .

                                 दृश्य १४
                    
रवि की सायकिल बार बार लडखडा रही है .रजनी चुपचाप करियर पर बैठी हुई है .वह हिचकोले खा रही है .वह होकर भी वहां नहीं है .बहुत दूर कहीं अटकी हुई है .सामने मैदान में एक लडके पतंग उड़ा रहे हैं .हवा का रुख पहले की तरह नहीं है .हवा दृश्य से गायब हो रही है .पतंग जो उसके हाँथ थाम कर उड़ रही है .वह धीरे धीरे नीचे  आ रही है .लड़का जो छोटा सा बच्चा है वह बहुत तेजी से परेता लपेट रहा है .पतंग जो अपनी अंतिम सांस के आस पास है .वह लडखडा कर धरती पर आ रही है .और एक पेड़ में फंस गयी है .लड़का उसे निकलने की कोशिश कर रहा है .वह अब फटने को है .यह दृश्य रजनी देख रही है .रजनी के सीने में एक बगुला उठता है .रवि बहुत तेजी से पैदल मार रहा है और वह एक पेड़ से टकराने से बचता है .शाम अपने साथ उदासी का पीलापन लिए हुए झर रही पत्तियों पर टपक रही है .बहुत दूर कहीं पिटारे के समाप्त होने की एक धुन उडती हुई आ रही है .
                                       
                                  दृश्य १५
                                  
रात का समय है .ग्यारह बजे का आस पास .रजनी काम धाम निपटा कर खिड़की के पास किताब लिए पढ़ने के अदा में बैठी है .रवि के घर की खिड़की से कोई गीत चलकर रजनी के पन्नो पर गिरता है .शब्द एक स्वप्न में बदल जाते है .फिर रजनी की आँखों में चढ़ जाते हैं .फिर होठों पर .तभी पहले अम्मा आती हैं और फिर बुआ .अब सब कुछ लूटने वाला है .अम्मा किताब को रजनी के गोद से उठाकर किवाड़ पर दे मारती है .पिताजी दीवार के पास खड़े हैं .उनके कदमों में शब्द पहले बिखरते हैं .फिर स्वप्न बिखर जाते हैं .फिर गीत का वह हिस्सा जो रजनी के होठों पर चढ़ा हुआ है .वे अपने क़दमों से उस गीत को बुरी तरह कुचल रहे हैं .वह गीत पहले एक बगूला बनता है फिर एक रुलाई बन जाता है .वह रुलाई निकलकर रवि के खिड़की से होकर उसके पास तक जाती है .रवि रेडियो बंद कर देता है .रजनी रात भर रोती रहती है .दरवाजे पर पड़ी किताब रात भर ओस में भींगती रहती है .
                                 दृश्य १६  
                                  
रजनी अब घर में कैद है .उसकी खिड़की बंद है .रेडियो की आवाज लगातार उसके खिड़की के पल्लों तक आती है और उसे न पाकर वही लौट जा रही है .रजनी का कमरा अलग कर दिया गया है .जहाँ खिड़की नहीं है .साँस आने जाने के लिए एक छोटा सा रोशनदान है .वह कुछ देर तक के लिए अपने बरामदे में  निकलती है .फिर बुआ की आवाज सुनकर घर में चली जाती है .बुआ ने रजनी से वह रेडियो ले लिया है .नहीं तो आज की बारी उसी की होती .रवि देर तक रेडियो बजाता रहता है .कि कभी भी किसी तरह कोई गीत वह सुन सके .रेडियो एक तरह से रजनी के जीवन से गायब हो चुका है .इस तरह से एक स्वपन भी भहरा गया है .एक आधार अनंत में कहीं गुम  हो चुका है .रजनी की रातें रेत की तरह हैं .जिसमे लगतार अंधड़ चलते हैं .और रजनी उस गिरती पड़ती जलते हुए अंगारों पर चल रही है .

दृश्य १७
                
रो रो कर रजनी की सुबह से आँखें लाल है .लडके वाले देखने आ रहे हैं .लड़का बुआ का सुझाया हुआ है .उसका कहना है कि कुछ भी हो लड़की हाँथ से निकल न जाए इससे पहले कोई कदम उठा लेना है .लड़का भी आया हुआ है .लड़का लंबा छरहरा और अच्छा है .रजनी की माँ को खूब पसंद है .पिताजी के साथ बैठके में बैठा हुआ है .और अब बारी है रजनी के दिखाने की .बुआ के साथ चल कर वह आती है .जबरदस्ती उसका श्रृंगार किया गया है .काजल की कोर जोर से झटक देने से कुछ ज्यादा तिरछी और असंतुलित हो गयी है .जो पहचान में आ रही है .रजनी की नजर जमीं पर है .वह एक निर्वात में हो जैसे रजनी न हो .जैसे उसकी डमी हो .वह लड़के को क्या किसी को नहीं देखती है .उसकी नजर खिड़की के पार जाती है और एक ठूंठ हो चुके पेड़ से टकरा के लौट आती है .उस ठूंठ पर एक कठफोड़वा बैठता है और बचे हुए ठूंठ को ठोकने लगता है .रजनी के बहुत भीतर कहीं एक बड़ा सा छेद होता महसूस होता है .उसके अन्दर एक हूंक सी उठती है .वह उसे दबाती है .वह हूंक फिर आती है .इस बार वह उसे छोड़ देती है .और जाते हुए वह जोर से रोने लगती है .लडके को बड़ा अजीब सा लगता है .बीच में बुआ आ जाती है और बात संभाल लेती है .कहती है कि लड़की को बड़े जतन से पाला है बेटा ! घर छोड़ने का दरद तो एक लड़की ही जानती है न !!और बबुआ लड़की का गला बड़ा सुरीला है .जितना अच्छा रो लेती है उतना अच्छा गा भी लेती है .उसे रेडिओ खूब पसंद है .एक हंसी गूंजती है .जिसमे लडके की बस मुस्कुराहट शामिल होती है .

                                दृश्य १८
                                   
रवि की सायकिल बेवजह शहर भर में चक्कर लगा रही है .कहीं से कुछ भी सुराग तो मिले .वह बार बार रजनी के घर से होते हुए गुजरता है .रजनी का कहीं अता पता नहीं है .एक शाम वह बरामदे में भीड़ देखता है .और एक बिजली की झलक की तरह सजी धजी रजनी की आकृति  .इस उत्सवधर्मी माहौल को बुझते हुए रवि को एक पल भी नहीं लगता है .उसके अन्दर कुछ टूटता है .वह सायकिल मैदान की ओर भगाता है .और गयी रात तक एक चक्र में वह कई किलोमीटर तक सायकिल चला चुका होता है . वह लड़खड़ाते हुए लौटता है तो बहुत देर तक रजनी के घर के सामने वह अँधेरे में खडा रहता है .दरवाजे के सामने वह रजनी की कई आकृति बनाता है .फिर उसे पुकारता है .रजनी नहीं आती है .बार बार उस अँधेरे से बनायीं गयी रजनी फिर अँधेरे में घुल जाती है.उसकी आवाज अंधरे में टकराकर फिर लौट आती है .कोई एक आदमी गुजरता है .तो रवि चैन चढाने लगता है .वह झूठ मुठ का उतरा हुआ चैन चढ़ा रहा है .फिर एक झूठ मुठ की रजनी बनाता है .और उससे कैरियर पर बैठने के लिए कहता है .झूठ मुठ की रजनी नहीं बैठती है और वह उस अँधेरे  वाले दरवाजे की भाग कर गुम हो जाती है .सच की रजनी रहती तो जरुर बैठ जाती .रवि पैदल ही घर की और चल पड़ता है .और रेडिओ शांत पडा हुआ है .वह चुप रहता है .रात भर !
                                  दृश्य १९
           
                      
एक दिन बहुत सुबह सुबह, जब हवाएं बहुत नम होती है ,तब रवि समाचार के लिए रेडियो खोलता है .और एक सूचना पाता है कि रजनी की शादी तय हो चुकी है .अगले महीने की किसी तारीख को .रेडिओ का उद्घोषक दिखता नहीं है .नहीं तो वह तफसील से पूछता .रेडियो  बंदकर वह रजनी के घर की ओर भागता है वहां बरामदे में एक सन्नाटा पसरा हुआ है .घर में सबके होने की आहट तो समझ में आ रही है ,सिवाय रजनी के .तो रजनी कहाँ गयी ? वह फिर लौट आता है .वह दोपहर के समाचार में फिर से सूचना पाता है कि रजनी की शादी मुकर्रर है .और वह होकर रहेगी .इससे पहले कि वह कुछ और सुने ,ठीक उसी शाम वह सायकिल उठाता है और कंधे में रेडियो टांगता है और रजनी के घर वाले रास्ते से होकर गुजरता है .वह चाहता है कि उसकी सायकिल की चैन वहां उतर जाए .लेकिन बरामदे में कई नजर उस पर टंगी हुई है .और चैन को वह उतरने नहीं दे रही है . वह आहिस्ते आहिस्ते गुजरता है जैसे कि हवा गुजरती है .फिर वह एक बेचैनी और गुस्से में सायकिल के पैडल पर अपना गुस्सा उतारने लगता है .एक गति में भरकर वह कहीं गुम हो जाना चाहता है .जैसे कि लोक कथाओं में पात्र चलते चलते कहीं खो जाते हैं .वह कुहरे में खुद को ख़त्म कर देना चाहता है .वह  धूप,हवा ,समय से आगे निकल जाना चाहता है .लेकिन वे पात्र जो लोक कथाओं में गायब-से मिलते हैं ,वास्तव में वे कहीं जाते नहीं .वे वजूद में वहीँ आस पास  रहने लगते हैं .सबकी विज्ञता के बावजूद .और लोग उस पात्र को खोजने लगते हैं .वह पात्र जो सामने से ही गुजरता है .लोग उसे नहीं पहचान पाते हैं .और उसके गायब हो जाने की अफवाह फैला देते हैं .

                                
शायद वही हाल तो रजनी का नहीं है  ! रजनी घर में होकर भी नहीं है .वह अपनी पहचान खो रही है .उसके त्वचा की परत कहीं बहुत अन्दर से दरार छोड़ रही है .इस वक्त उसके आँखों से वाष्प में डूबी एक धुंध -सी रोशनी निकल रही है .वह उस कमरे में नहीं है .वह लगभग कैद है .उस रोज जब रवि उसे बरामदे में ताक रहा होता है .तब उसके गायब हो चुकी त्वचा और देंह के कारण उसे नहीं देख पाता है .रजनी जीती जागती लोक कथाओं की पात्र बन चुकी है .उसके देंह से होकर हवा गुजर रही है .समय उसके लिए मुर्दा हो चुका है .और धूप जिसके ताप पर विश्वास हरेक प्रेमी का होता है उसकी किसी किस्म की परछाई बना पाने में नाकामयाब है .वह रवि को देख कर जोर से चिल्लाती है .आवाज निकलती तो है पर हवा उसे ढोने से साफ़ मुकर जाती है .जब हम प्रेम में नाकाम होते हैं तो सबसे पहली हमारी सांस साथ छोड़ जाती है .रवि को जोर से पुकारने में रजनी के गले की नसे तन जाती है .आँख जैसे उबाल में आ जाती है .रवि उसे नहीं सुन पाता है .बुआ सुन लेती है .वह हवा जिसे चाहिए था कि उस आवाज को रवि तक ले जाए .वह बुआ तक ले जाती है .रवि सायकिल से आगे बढ़ जाता है .उसके कंधे पर लटका रेडियो झूलता रहता है .

                                   दृश्य २०
               
                     
वह पहाड़ के उसी छोर पर अपनी सायकिल रोकता है .फिर आसमान की ओर देखता है .आसमान बहुत धुंधला है .वह एक परिंदे की उड़ान को देखता है .आसमान में वह गोते लगाकर फिर अपनी परवाज साध ले रहा है .वह बगल में उड़ते हुए पतंगों को भी देखता है .आसमान में चमकती हुई कई सारी रंगीन पतंगें हैं .वे परिंदे की उड़ान को चकमा दे रहीं है .परिंदा बार बार गोता खा रहा है .उनसे बच रहा है .परिंदा शायद सोच रहा है कि अचानक इस मौसम में ऐसा क्या हो जाता है जो उसकी दुनिया को उजाड़ कर रख देता है .उसका पंख अब एक पतंग के तीखे धागे की चपेट में आ गया है .परिंदा लगातार नीचे आ रहा है .लेकिन वह अब भी पंख फद्फदा रहा है .लेकिन और अब फिर वह ऊपर जा रहा है .और ऊपर .और ऊपर ...उसके एक -एक पंख उस बेचैन और अंत में नाकाम हो जाने वाली उड़ान में टूट कर नीचे आ रहें हैं .और एक विशेष सीमा के बाद .वह सीधे फिर नीचे आ रहा है .शायद वह फिर कभी उड़ ही नहीं पायी .इस दृश्य से रवि आँखे हटा लेता है .

                                         
रवि रेडियो चालू करता है .रेडियो की खरखराहट बहुत ज्यादे है .वह कोई गीत ठीक से प्रसारित नहीं कर पा रहा है .रेडिओ के फ्रीक्वेंसी की परवाज भी परिंदे की ही तरह है .लगातार डूब रही है .और फिर अचानक सांय सांय की आवाज .तभी समाचार का वक्त होता है .और रवि फिर सुनता है कि रजनी की शादी तय है .रवि झटके में उठता है और रेडियो को उठाकर वह पहाड़ी से बहुत दूर एक खाई में फेंक देता है .रेडियो पहले हवा में कई कलाबाजियां खाता है फिर वह एक चट्टान से टकराता है और फिर वह एक जगह फंस कर रुक जाता है .पहले रेडियो से सेल निकलकर गिरते हैं .फिर वह सूचना शब्द बनकर चट्टान पर पसर आते हैं .फिर बोल रहे उस उद्घोषक की आवाज में चट्टान की गहरी ख़ामोशी घर करने लगती है .रवि जो कहीं बहुत ऊपर खडा है ,वह जोर से रजनी का नाम लेकर चिल्लाता है .आवाज चट्टानों से लड़ती है और वापस चली आती है .और वह गले में घर कर जाती है .वही वह अपने गले से उस आवाज को खो भी देता है जो उसकी पहचान बनती या थी  .वह इस प्रयास में फिर बोलता है और पाता है कि उसके गले से उसकी मीठी और गंभीर आवाज गायब हो चुकी है .जिसके अंतराल में उद्घोषक बन जाने का स्वपन बसता है .

                                            सपने बेआवाज टूटते हैं .और समय की हवा में गुम हो जाते हैं .बस जमीं पर बिखरी हुई उसकी किरचें जीवन में चलते हुए बहुत गहरे धसती रहती है .और जो बदले में एक रोना बहुत अंदर तक गूंजता रहता है .हम उम्र के एक पड़ाव पर उसे भले भूल जाएँ पर उसकी प्रतिध्वनि पहाड़ से टकराए हुए उस रजनी की नाम की तरह लौटती रहती है .जो अभी रवि के अन्दर लौट रही है .

                                           

                                     दृश्य २१
                                 
रवि की आवाज का गुम हो जाना रजनी को साल जाता है .वह बंद कमरे से एक आवाज लगाती है जो उसके होठों के कोरों तक आते ही बिला जाती है .एक हूंक आती है और आँखों तक आते आते पिघल जाती है .आज मेहंदी धराई की रात है .और रजनी हाँथ बार बार खिंच ले रही है .इस बलख़म में उसके हाँथ से मेहंदी की अंगडाई टूट कर फ़ैल फ़ैल जा रही है .एक चीख पुकार और गर्म सांस के ताप में मेहंदी की गंध जलकर धुआंसी हो जाती है .

                               सोई हुई रात के बीच का कोई निढाल पहर है .रवि की नीद किसी आहट पर टूटती है .अँधेरे में देखता है .कोने में जहाँ वह रेडियो रखकर सुनता है ,वहां रजनी खड़ी है .या क्या पता कि रजनी की आकृति की कोई प्रतिछाया ही हो .वह उठता है.अरे ! यह तो सचमुच ही रजनी ही है .वह सपना तो नहीं देख रहा है !वह उसका हाँथ पकड़ता है .हाँथ की गर्मी भी वैसे ही है . देंह की गंध भी वैसे ही है .वह बहुत धीमे से कहता है रजनी !! एक भारी खरखराहट वाली आवाज उस अँधेरे में उभरती है और फिर अँधेरे में गुम हो जाती है .बहुत देर तक वह अँधेरे वाली आकृति रवि के साथ रहती है .एक गर्म सांस की आवाजाही वह अपनी गर्दन के आस पास महसूस करता है .वह जैसे बहुत नर्म और फाहे से उसके गले की आत्मा में उतर रही हो .फिर वह आकृति जैसे आई होती है वैसे ही चली जाती है .उसी आकृति के बराबर घनत्व और अस्तित्व में वह अपने अन्दर एक खालीपन महसूस करता है .क्या पता वह सचमुच की रजनी नहीं रही हो .बस वह उसके अन्दर से चल कर ही आई हो और खिड़की के रास्ते बाहर निकल गयी हो.या फिर क्या पता रही हो !और रवि की आवाज उस सुबह से सुधरती जा रही है

                                                                              

                                    

                उपसंहार का दृश्य उर्फ़ किस्सा असमाप्त –सा

और दो चार दिन बाद ही रजनी चली गयी थी .रवि शहर में बेतरह सायकिल दौडाता था .वह वहां-वहां जाता था जहाँ-जहाँ रजनी दिनों में वक्त गुजारा था .कई दिनों तक वह उदास कमरे में पडा रहा .उबता रहा था .एक दिन जब वह कमरे में बैठा किसी किताब से मन बहलाने की कोशिश कर रहा था .कि कहीं से रेडियो की आवाज सुनाई पड़ी .यह वही गीत था जिसे रजनी अक्सर गुनगुनाया करती थी .वह कमरे से चलकर बरामदे तक आया .दूर किसी पान वाले दूकान से वह आवाज आ रही थी .वह बढ़ता गया और जाकर वहां रुक गया .और सुनता रहा .पान वाले ने जब कहा कि क्या चाहिए भैया !कुछ लेंगे ! तब उसकी नीद टूटी .और उसी दोपहर जब उसका मन लाख समझाइश के बाद भी नहीं लगा और मर जाने जैसा किया तो वह उस पहाड़ी पर गया जहाँ से उसने रेडियो को फेंका था .वह उसी चट्टान पर अटका हुआ था मानो किसी की बाट जोह रहा था .उसने रेडियो उठाया और कंधे में टांगा और घर आकर बरामदे में उसे बनाने लगा था .एक हलके प्रयास के बाद वह बजना शुरू हो गया था .और इसके बाद रवि के जीवन में कुछ विशेष नहीं हुआ था .उसके स्वप्न पहले ही बिखर चुके थे .उसे समेटने में वक्त तो लगता पर जैसे उसका मन ही नहीं हुआ था .जीवन जिस गति से बिखरता है उसी त्वरा से वह खुद को समेटता भी है .उसने रेडियो मरम्मत की एक दूकान खोल ली .और थोड़े ही दिनों में वह शहर में ख्यातिलब्ध हो गया .बाद में उसने शादी भी की .और बच्चे भी हुए .वह उद्घोषक तो नहीं बन पाया था ,लेकिन बहुत उम्दा रेडियोसाज जरुर बना था .और रजनी जिसके हांथों की मेहदियाँ ही इतनी अनगढ़ और भद्दी थी कि देखने वाला एक नजर में बता सकता था वह बेमर्जी और एक कैद में आई है . उससे रवि की भविष्य में मुलाक़ात हुई हो या नहीं, कह नहीं सकता .लेकिन अगर हुई भी हो तो वे अब नए जीवन में इतने मुब्तिला हो चुके थे,इतनी किस्म के लगाव और मोह आ चुके थे कि क्या पता घटनाएं क्या आकार ले लें,कुछ कहा नहीं जा सकता था .लेकिन एक तमन्ना ,एक इन्तेजार जो अतीत को लेकर रहती है, वह अपना असर, अपना पक्ष तो रखती ही है .बिछड़ना तो इस जीवन की अंतिम सच्चाई है .इसे समझना और झेल ले जाना बस बहादुरी का काम है .जीवन तो वह भी दाद देने लायक होता है ,जो अपने साथ एक नहीं कई जीवन को पालता और संभालता है .तो साथियों !उनकी कहानी तो बहुत तरह से आकार ले सकती है. .और एक तरीका शायद ऊपर की तरह भी हो सकता है .आप क्या कहते हैं ?? बताइयेगा !!! )
                             


परिचय और संपर्क

अरविन्द

उम्र – 26 वर्ष
बी.एच.यू. से पढाई लिखाई |
प्रतिभाशाली युवा कवि | फिल्मों में गहरी रूचि |
हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित |
अब कथा लेखन में भी सक्रिय .... यह तीसरी कहानी |
सम्प्रति – प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक , जिला – चंदौली, उ.प्र.
मो.न.... 07376844005


11 टिप्‍पणियां:

  1. सिर्फ एक सौंदर्यवादी पाठक के शब्दों में कहूँ तो- अद्भुत... तकनीकी पक्ष पर जरा भी विचार नहीं करूंगा और सिर्फ निजी राय लिखूंगा तो ये वो एन्द्रिक भाषा है जो मैं चाहता हूँ,जैसा की बार्थ 'प्लेजर ऑफ़ द टेक्स्ट' में कहते हैं कि टेक्स्ट का पहला गुण है वो मुझे चाहे, और जिस तरह से दृश्य उप-शीर्षक से भाग हैं वे यकीनन दृश्य ही रचते हैं,उनसे बाहर कुछ नहीं..सब भाव उसी निश्चित स्पेस में स्थिर....पढने के कई देर बाद तक ये दृश्य तैरते रहते हैं,और समय का अतिक्रमण भी कर जाते हैं,समय की तरलता..यहाँ क्या पहले और क्या बाद में घटित हुआ था ,नहीं मायने रखता....

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  2. दिलचस्प और पठनीय कहानी है. बचपन में रेडियो से लगाव के कई किस्से याद आ गये.प्रेम कहानी में खरखराहट लगातार चलती रहती है. यहाँ वह मधुर संगीत नहीं बन पाती. मगर यादें मन की नर्मी लौटा देती हैं.

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  3. अरविन्द भविष्य के चर्चित और गंभीर कथाकार होंगे| उनकी ये कहानी कहीं से भी तीसरी कहानी नहीं लगती ..... उनकी कविता और कहानी दोनों की प्रतीक्षा रहेगी| अरविन्द को हार्दिक बधाई|

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  4. कहानी का धन पक्ष हमें भावनात्मक स्तर पर सोचने को मजबूर करता है । बहुत कम आधुनिक कहानियाँ अंत तक बाँधने में समर्थ होती है। .इस अर्थ में यह विशेष है ।

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  5. ye arvind ke redio ne rok liya...aaj kaam bahuut thaa..abhi krana bhi tha..par jaise hi radio shuru hua to tesari sabha khatam hone par hi band kar paai..ye ek kahanikaar ki shandar jeet hai..arvind ko pahle bhi pdha hai..kavitayen...badhaai arvind...aapka likha hume apne hi kaam krane se rok le...ye jaadu barkraar rakhiye..

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  6. यह तीसरी कहानी भी आपकी ख्याति के अनुरूप है. रेडियो जिस तंतु को जोड़ता है, वह अद्भुत है.
    मैं एक फिल्म देख रहा था. the terminal. उसमें एक एयर होस्टेस रहती है जो अपने जार के प्रेम में बेजार है. वह अपनी एक आदत उसकी आदत से जोड़कर देखती है. वह बताती है, कि अल सुबह वह अपने प्रेमी को पज़ल गेम खेलते हुए देखती रहती है. जिस नायक से वह यह बताती है,वह कहता है- जब तुम उसके पास हो, उसे पज़ल गेम की क्या जरूरत? कहानी में रवि और रजनी जब पास होते हैं, रेडियो बंद रहता है.यह प्रेम की सघनता है.
    कहानी में जहाँ रजनी से प्रेम का इजहार है, वहीँ लगभग उसी समय रेडियो स्टेशन से प्रसारण के बंद होने की बात है. खरखराहट का जिक्र भी है. यह संकेत कहानी की कहन को बढ़ा देती है.
    आपका अंदाजे-बयां ख़ास है. आप के पास एक बढ़िया कथा-भाषा भी है.
    आपको बधाई देना महज शब्द में अपनी भावना को रख देना है.

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  7. एक बेहतरीन कहानी के लिए सबसे पहले अरविन्द जी को बधाई !सबसे पहली बात शिल्प के स्तर पर यह अरविन्द जी की मौलिकता है की वे कहानी को पूरा पढ़वा ले जाते है और सम्भवतः कहानी न पढ़ने वाला भी इसे निरंतरता में पढ़ ले जायेगा |दूसरी बात जो कहानी दृश्यों में लिखी गयी उसमें अद्भुत सफलता मिली हैं बिलकुल ऐसा लगता है सब कुछ सामने हो घटित हो रहा है |तीसरी बात कहानी में प्रेम के स्वरूप को बहुत ही सहजता के साथ रखा गया है कही कोई आवाज नहीं पुरी कहानी में रेडियो का मधुर संगीत चलता रहता है |

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  8. बेक ग्राउंड का चित्र बार - बार लिखावट के ऊपर आ रहा है , कई कोशिश के बाद भी अब तक पूरी पढ़ नही पा रही ....अच्छी लग रही है ....

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  9. जब पढ़ना शुरू किया ...तो देखना और सुनना शुरू हो गया ...उस पहाड़ी कस्बे की आबो हवा महसूस होने लगी ....सोच था कहानी पर कुछ कहूँगा ...मगर आखिर तक आते आते सारे शब्द खो बैठा !
    द्रश्य पर मजबूत पकड़ है ...द्रश्य भी एक तरतीब में हैं ...कई बार द्रश्य बहुत गहरे उतर जाते हैं ..वे कई कई स्तरों पर खुल जाते हैं..एक अच्छी कविता की तरह ..उनमें आवाज़ -रंग -चेहरे -शब्द होते हैं !

    मैं कारणवश इंटरनेट पर ज्यादा देर तक पढ़ नहीं पाता हूँ मगर तुमहारी कहानी ने उठने नहीं दिया !
    मेरे प्रिय हो तुम अरविन्द ! तुमको खूब सारी दुआएं मित्र !

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  10. aaj ke samay me kahaniya etna bandh sakti hai ...........?..... shayad bandh shakti hai...badhai ho sir....

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  11. Bahut hi sundar abhivyakti, bhavishye ke honhar kathakar hain Arvind,
    ham saubhagyeshali hain ki aaj se 30-40 saal baad ham garv se kah sakenge ki Arvind ji ki shuruvati kahaniyon mein se ek lajawaab kahani ko hamne padha tha, jab unhone sahitye ki duniya mein kadam rakha hi tha....

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