गुरुवार, 6 जून 2013

अविनाश मिश्र की कवितायें

                                 अविनाश मिश्र 



अविनाश मिश्र अपनी कविताओं में समाज के छोटे-छोटे विवरणों को न सिर्फ संजीदगी से पकड़ते हैं और उठाते हैं , वरन बिना किसी अतिरिक्त शोर-ओ-गुल के उसे कविता में पिरो भी देते हैं | जब यह समाज अपनी टीस को टटोलने के लिए अपने बदन को यहाँ-वहां दबा रहा होता है, तब अविनाश की कवितायें उसकी बहकती हुयी उँगलियों को उठाकर ‘सही मुकाम’ पर रख देने का काम करती हैं | उनकी ये कवितायें ‘तद्भव’ पत्रिका में इसी अंक में छपी हैं , और इन्हें पढने के बाद मुझे ऐसा लगा , कि युवा कविता के इस प्रतिभाशाली चेहरे से सिताब दियारा ब्लॉग के पाठकों का भी परिचय होना चाहिए | मेरे आग्रह को अविनाश ने स्वीकार किया , इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ |   


      प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर युवा कवि अविनाश मिश्र की कवितायें


एक .... 

फर्स्ट टाइम क्राइम एंड पनिशमेंट और ये वे नन्हे फूल हैं जो...   
                                    

वे शायद सुधर रहे थे तब ही खबर आई कि वे एक मुठभेड़ में मार दिए गए...

पहले जुर्म की स्मृतियां नहीं होतीं
लेकिन एक मस्तिष्क में वह वैसे ही विकसित होता रहता है
जैसे इस संसार में एक वृक्ष या एक देह या देह में मस्तिस्क...
आपराधिक प्रवृत्ति के इस विकासक्रम के वे विस्मृत बीज कहां हैं?
                
इस प्रश्न पर विचार करते हुए सामान्यताएं भी वैसे ही विकृत नजर आती हैं
जैसे कि अपराधी... लेकिन वे विस्मृत बीज कहां हैं...??

गर्भ में नन्हें-नन्हें पैरों से बेवक्त और बार-बार मां को पीड़ा पहुंचाना
और बेवक्त और बार-बार ही फारिग होगा एक असमर्थ देह की जरूरतों से
वे एक उम्र तक जुर्म क्या है नहीं समझते
लेकिन मांएं दर्द को विकल्पों में से नहीं चुनतीं
वहां वह इतना शाश्वतसहज और अनिवार्य होता है कि बस और क्या कहा जाए...
लेकिन वे एक उम्र तक दर्द क्या है नहीं समझते
नए-नए उभरते हुए दांतों की प्रखरता मां के गुदगुदे स्तनों पर दर्शाना...
वे उम्रें गुजार देते हैं और दर्द क्या है नहीं समझते...

बाग-बागीचों से गुजरते वक्त फूलों और पत्तियों को तोड़ते हुए चलना
बैठना जब भी घास पर तब उसे उखाड़ते रहना
मिल जाए जो भी सिरा उसे उधेड़ते रहना
जमीं पर रेंगती हुई चींटियों को कुचलते हुए चलना
ठोकरों और ठोकरों से जूतों को जल्दी-जल्दी फटने देना
पतंगों को उड़ाना कम फाड़ना ज्यादा
और होमवर्क की कापियों को हवाई जहाज बनाकर उड़ा देना
या उनकी कश्तियां बनाना बारिश के मौसम में
और इसी मौसम में स्कूल से लौटते वक्त भीगना और भिगाना उन किताबों को
जिन्हें मुहावरे में मां-बाप ने पेट काटकर खरीदा था
बाद इसके बीमार और अनुपस्थित होना कक्षाओं से एक लंबे वक्त के लिए
फिर बीमारियों के महत्व को समझते हुए उनके बहाने बनाकर पढ़ाई से दूर बने रहना
स्कूल की ड्रेस में स्कूल न जाकर भटकना शहर के कूचों में बीड़ियां फूंकते                         
और यह खोजते हुए कि वे आखिर कहां निकलते हैं
दीवाल पर बैठी मक्खियों के मटमैले खून को हथेली पर जांचना
गुलेल से गौरैयों के घोंसले तबाह करना
और मधुमक्खियों के छत्तों पर आजमाना तीर-कमान
गायों की आखों में चुभोना सींकें और तितलियों को चिंदी-चिंदी करना
भमीरी के पैरों में धागे बांधकर उड़ाना
और कुत्तों की दुमों में बांधना पटाखे

इमारतों में लगे शीशे तोड़ना और गाड़ियों के टायरों की हवा निकाल देना
पेड़ों पर बरसाना पत्थर कच्चे फलों के लिए
और कांच की गिलास के भीतर एक कीड़े को कैद कर
परखना उस घुटन को जिसे वे नहीं समझते
अध्यापक या अतिथि जब बैठने वाले ही हों तब ही उनके ठीक नीचे से कुर्सी हटा देना
और अगली बार कुर्सियों पर च्यूंगम या कोई नुकीली चीज रखना
ऊंचाइयों पर चढ़कर गुजरते हुए राहगीरों पर थूकना या कुछ फेंकना
इंकपैनों और प्रकारों से हमले करना समवयस्क और समझदार सहपाठियों पर
करंट और आग से डरानामारनाचिढ़ाना और गलत ढंग से पुकारना
उम्र में छोटे भाइयों और बहनों को
'उठो लाल अब आंखें खोलो...को नजरअंदाज करना और
'मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों...टाइप जिदों से गुंजा देना आसमान
इम्तिहानों में नकल और घर में चोरी करना
बड़ों की बुलाहटें अनसुनी करना
और भयंकर शोर मचाना एक काहिल बौद्धिक के कमरे के बाहर
दीवार में लगी बंद खिड़कियों को खोलकर भाग जाना
और दरवाजे पर पड़े पर्दे को लपेटकर खुद के इर्द-गिर्द गोल-गोल घूमना देर तक
भिखारियों को छेड़ना और पागलों को डिस्टर्ब करना

खेल कोई भी हो उसमें बेईमानी करना
खेल कोई भी हो उसमें परस्पर चोटिल कर देने वाली कार्यवाहियां करना
शतरंजकैरमकबड्डीकंचेक्रिकेट... खेल कोई भी हो उसे जुए में बदल देना
गंदी गलियों से सीखी गई गालियों के प्रथम प्रयोग बुजुर्गों पर करना
और आशय से वंचित होते हुए भी कहना एक चुभती हुई बात सबसे निकटवर्तियों को
और कुछ बड़े होने पर गली में से गुजरती एक लड़की की छातियां नोचकर भाग जाना
और बाद इसके धीरे-धीरे उस सब कुछ के प्रति नफरत से भर उठना जो हासिल नहीं है...

वे एक उम्र तक जुर्म क्या है नहीं समझते
और पहले जुर्म की स्मृतियां नहीं होतीं...

सरकार के उन पर कई एहसान थे
वे सरकारी अस्पतालों में पैदा हुए
सरकारी स्कूलों में शिक्षा पाई
सरकारी फुटपाथों पर रातें गुजारीं
सरकारी परिवहनों में बगैर कुछ चुकाए यात्राएं कीं
सरकारी बाल सुधार ग्रहों और जेलों में रहे
सरकारी अदालतों ने उन्हें सुधारने के अनेक प्रयास किए
लेकिन आखिरकार वे एक सरकारी मौत मरे...

सरकारी हरदम असरकारी नहीं होता
लेकिन यहां अ-सरकारी भी असरकारी साबित नहीं हुआ
वे उन 'एनजीओस' को ही बेचकर खा गए
जो उन्हें पुनर्वास और स्वावलंबन के मायने समझाने आए थे...

शरारतें जुर्म नहीं होतीं, जुर्म का रियाज होती हैं 
आहिस्ते-आहिस्ते एक लत एक जरूरत बनती हुईं 
कई बड़ी नुमाइशों के लिए खुद को मुस्तैद करतीं
सब तरफ शरारतें ही तो दिखती हैं इस वक्त में इतना रक्त बनकर
मानवाकृतियों के घेरे में स्याह और जमी हुई शरारतें...

ये सिलसिले रुक नहीं रहे और ब्यौरे हैं कि बढ़ते ही जा रहे हैं
बस अब मैं और तफसील में नहीं जाऊंगा...



दो ..... 


मेट्रो में रोना


जैसे रोना चाहिए वैसे नहीं रो रही थीं वे

वहां संसद थी और केंद्रीय सचिवालय का मेट्रो स्टेशन
जहां से एक लंबी सुरंग से गुजरकर
मेट्रो रेल दिल्ली विश्वविद्यालय तक जाती थी
बगैर धूल उड़ाए मेरे धूल धूसरित भारत में

यह शासन के अनुशासन में गुजर जाने का वर्तमान है
और रुलाइयों के व्याकरण पर इसका गंभीर प्रभाव है
यहां बेवफाइयां हंसमुख और जुदाइयां शुष्क थीं
और इस वर्तमान में एक लड़की और उसके साथ दो बच्चियां
जो उस लंबी सुरंग में से गुजर रही मेट्रो रेल के भीतर
बराबर रोए चली जा रही थीं
जैसे रोया जाता है वैसे
जैसे रोना चाहिए वैसे नहीं

मलाई लड़कियों और दैवीय सेलफोन धुनों को बेअसर करती हुई
उन बच्चियों की रुलाई भीड़ में 'हॉर्न प्लीज' की तरह थी

दिल्ली पुलिस के आंख और कान बनने के चक्कर में
लगभग अंधे और बहरे हो चुके नागरिकों
और दिल्ली मेट्रो रेल कार्पोरेशन के अब तक के स्वर्णिम अतीत में
यह रुलाई संभवत: पहली बार थी


दिल्ली पुलिस के आंख और कान बराबर पूछताछ कर रहे थे
लेकिन बच्चियां अपनी रुलाई से आगे नहीं बढ़ पा रही थीं
और लड़की खुद की चुप से

अंधी और बहरी नागरिकताएं तब तक चैतन्य नहीं होतीं
जब तक सामान्यताएं अपवाद में न बदल जाएं
लेकिन यह चैतन्यता अपंगता ही है
इसलिए एक रुमाल एक कलम एक ट्रांजिस्टर बम है
सब मकान मालिक शरीफ और सारे किराएदार लुटेरे हैं
पांच सौ और एक हजार के सब नोट जाली हैं 
कहीं कोई मजबूरी बताकर कुछ मदद मांग रहा व्यक्ति ठग है 
और यदि यही मजबूरी कहीं कुछ बेच रही है तो माल यकीनन चोरी का है 
और बच्चे यहां तभी रोते हैं जब वे अपह्रत होते हैं 
                        
और इस अर्थ में मेट्रो में रोना अपहरण में रोना था 
मेट्रो में रोना सब गंतव्यों पर रूक-रूककर रोना था 
मेट्रो में रोना संसद से जहांगीरपुरी तक रोना था 
मेट्रो में रोना मेट्रो में होना था...





परिचय और संपर्क

अविनाश मिश्र

युवा कवि और आलोचक
दिल्ली विश्वविद्यालय से पढाई-लिखाई  
फिलहाल 'पाखी' पत्रिका के सम्पादकीय विभाग में कार्यरत
मो . न . - 09818791434



                        

3 टिप्‍पणियां:

  1. हमेशा की तरह कमाल ।बधाई अविनाश और रामजी तिवारी भाई ।

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  2. परिपक्व और बेहतरीन कवितायेँ जिनमें अपराधों के जन्म की कथा और नक्कारखाने में टूटी की आवाज की अहमियत को बखूबी दर्शाया गया है.

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