बुधवार, 19 जून 2013

'चन्दन राय' की लम्बी कविता - 'इन दिनों मरा करता हूँ'

      

                            चन्दन राय 





     सिताब दियारा ब्लॉग पर प्रस्तुत है ‘चन्दन राय’ की यह कविता


इन दिनों मरा करता हूँ ..

इन दिनों मरा करता हूँ ..
जी मुझे मरने का शौक है !
हाँ जी ! मरने काहाजी हूँ
साली ! मौत चीज ही ऐसी है..
तबियत ठीक करता हूँ लिखने से .
जितना जला हूँ.. कम जला हूँ
सूरज को बीमार देख था जब ..
लिखने की चाहत बना डाली ,
वो फतन राख होने का मजा,
मैने सीखा है मरघट में मुस्कराती चिताओं से !

बावस्ता है मुझे सडक पर बिछी जिन्दगी की सौगात  से
पहियों सी घिसती दौडती जिन्दगी
सड़क जहाँ से ठीक होते है हमारी रूह के पंचर
जब भी मिलाआमीन  पंचर वाले  से
मैने उसकी जेब से एक लावा लिया...पी लिया
मिटटी में पड़े पंचर वाले  से पूछा ……
क्यों बे ! धूप कितनी तेज है !
गर्मी नहीं लगती क्या ?
घिसे टायर की पंचर ट्यूब सा मिटटी में लदा-पदा
मेरे नाजायज से जीने का फिर सेवो एक यमराज
अपनी आँखों से बर्फ उड़ेल रहा था
“ 48 डिग्री की बर्फ               
साहब ! क्यों मजाक करते हैं ?......बर्फ पड़ रही  है,
मैने मरकर उसका इस्तकबाल किया
और 48 डिग्री की बर्फ मली अपनी लाश पर !
जिन्दा होकर मैने  बगल में देखा
एक सनकी पंचर वाले का वफादार कुता
वो अन-फिल्टर्ड पानी पी रहा था
जिसमे धुल रही थी हमारे पहियों की गंद
मैने उसका सजदा किया आँख में बची
आखिरी दो बूंदों  से
आमीन ! जख्मों के पंचर वाले  !

आमीन ! हमारे घावों का पंचर निरस्त्रीकरण है
वफादार होना आख़िरकार कुत्ता होना ही तो है
यकीनन मौका था शर्म से ख़ाक होने का
मै राख हुआ
घर तक पहुंचा अंगारों की बंद बोरी में
चेहरा फिर से आईने में देखा
रोया..रोया..कह रहा हूँ खूब रोया
देर तक देखा मै कैसा लगता हूँ रोते हुए
कलम उठाई
अपना चेहरा फिर से काला किया
मै एक धोखेबाज था आईने में भी

मै रिक्शेवालों से दुनिया में सबसे ज्यादा डरता हूँ
उनसे मिलना अपने पुनर्जन्मों का विनाश करना है
उनका पसीना मेरी आत्मा का जोंक है
मरने से काम चलता है
जीने से
वो ही तो…. विष्णु है विराट विष्णु
उनके पैरों में घुमती पृथ्वी
मेरी हार का कुरुक्षेत्र है
दर्द के तपते तवे पर भुनता आदमी
कैसे मुस्करा सकता है
कैरियर में रख कर सुना करता है रेडियों पर विविध भारती
वो शैलेन्द्र के गीतों पर भूख को थपकियों से सुला सकता है
मै एकलव्य हूँ उस रिक्श्वाले का
पर वफादार नहीं
उसके पास एक कविता है
"अरे बाबु जी कल कभी तो आएगा
छुट्टे नहीं मुआ मेरी किस्मत हो गई
आप याद तो रखेंगे....कहेंगे..
यार किसी दिलदार रिक्शेवाले से पाला पड़ा था
हाय ! रिक्शेवाले तूने मुझे जोगी बना डाला !


आह ! खुदा मेरे लिए मौत से जुदा कोई चीज बना
जब मेरी आत्मा के पिघलने से भी काम चले
तू ही बता क्या करूँ  मै कमबखत
एक काम कर " दिलदार रिक्शेवाला ही बना दे"
सहर मिले की शहर में एक ही तो सरपरस्त है
अपने जिस्म की माल-गाड़ी पर ढोया करूँ
तुम्हारे आँख की कफ़स में कैद दुखों की काइयां
मुझे एक दफा मरना ही है तुम्हारा कूली होकर

ये उनके हिजाब है
आज मरघट को मयघट हो जाने दे
मै कभी जो निकलू "भिखारी" बन कर
आप से दरख्वास्त है
आप अपने दुःख अता करें
मै एक पियक्कड़ हूँ दुःख की शराब का
और मरघट मेरी पियक्कड़ पार्टी
दुःख एक चखना है चटपटा

वो अजीब सा शख्स है खोमचे-वाला 
"मेरी आत्मा बिकाऊ है" ये कहकर
तीसरे पटियाले पैक पर उसने रेहड़ी पर
अपनी आत्मा निकाल कर रख दी थी
रेहड़ी हमारी आस्थाओं का धाम है
हमने चौथा पैक बनाया काकटेल की
पूरा 503 या 505  बीडी का बण्डल फूंका
पढा-हमारा ट्रेडमार्क देख ले..हम असली है
हम नकली हुए फिर से
हमने खूब गालिया बकी
खोमचे वाले की जेब टटोली
अपनी नसीब के पांच रूपए हक़ से  चुराए
आखिरकर हम मौकापरस्त लोग हैं
उसकी जेब में बीमार पड़ी उसकी माँ को छोड़कर
हम भाग खड़े हुए
जैसे उसकी बीबी भाग गई थी अपने यार के साथ

हमने उसके आँख में वो कहानी भी पढ़ी
की उसके लाडले के दिल में छेद है
और हमने दिल पे झाड़ू फेर ली
हम उसके घर कभी नहीं गए
बस सरकार पहुंची थी बुलडोजर लेकर
हाँ जब कभी वो ज़िंदा था
उसके पेट ने किया था रोटी के लिए अवैध निर्माण
मैने तभी जाना था यारों !
पृथ्वीब्रह्मदेवका नहींसरकारके बाप का माल है  !

वो बुढिया अजीब सी बेईमान है
हर बात पे दुयाएँ देती है जो
मेरे महंगे से गम से ले लेती है
एक सस्ती सी मुस्कराहट में
वो एक बेसहारा सी विधवा मुस्कराहट है
उसने जिस दिन खोल कर दिखाई अपनी आत्मा पर उकेरी सलवटें
मुझे याद है मै आदमी होते-होते बचा था
उसके पास मुस्कराने की अजीब सी तसल्ली है
सौ मुफ्त सी दुयाएँ है हमारे "बेटा" हो जाने की
और हमारे पास है एक औछा "विधवा आश्रम"

"प्यारी माँ" तुम नहीं अब हमारे काम की 
एक पुरानी बदसूरत झुर्रीदार तुम
मेरे घर में अच्छी नहीं लगती
घर हो जाता है तुम सा बूढ़ा बीमार झुर्रीदार
सुन माँ तू जाते वक्त ले जाना
अपनी लोरियां-फोरियां,
तुम्हारे स्तन से पिया दूध .
तुम्हारी गोद,लाड-दुलार तुम्हारी थपकियाँ,
मेने गठरी बाँध दी है !
"ममता" और "कोख" की भी तू तय कर ले
"एक भुगतान राशि"
हम नए से साफ़-सुथरे चमकदार लोग है
"सोशल स्टेटस के तमीजदार "
हमें नापसंद है घर में कोई भी पुरानी चीज
तुम समझती हो  
माँ तुम कितनी अच्छी हो
"शुक्रिया"

इन दिनों माँ चाय बनाती है चौराहे पर
मेरा बाप एक पान वाला पनवाड़ी है
जिसे ईमानदार होने की खतरनाक  बीमारी है
सो इन दिनों घर के  चूल्हे पर पकती हैं
आदर्श-उसूलों की सड़ी रोटियाँ “ 
मुसलसल भूख से रोज मुलाकात होती है

इन दिनों रोज मै तारे गिनकर ही  सो जाता हूँ
जब धोखा देती है भूख से कांपती पसलियाँ
मै पेट की आँच पानी से बुझाता हूँ!
मुझे बेहद सख्तजान नफरत है अपने बाप से
जो अपने बच्चों की खातिर अपना जमीर नहीं बेच सकता
मेने बेच दी है अपनी किताबे अपनी माँ के लिए
 मै उसकी तरह अपनी अस्थियाँ दान करने वाला दधिची नहीं हूँ
इन दिनों बेईमान होने का हुनर खोजता हूँ
अपने इरादों कालाबाजारी का ट्यूशन लेता हूँ
इन दिनों पूरा तैयार हूँ आपके पैर धोकर पीने के लिए
मुझे एक दफा फुलानी है अपने बाप की छाती
एक दफा माँ की दुआओं को मुस्कराता देखना है

मगर…. एक श्रवण अब तक जिन्दा है मेरे भीतर
नहीं मिटता अंतस से अच्छाई का जरासीम 
मेरे बाप का सत्यवादी  "अनुवांशिक गुण"
सर उठाता है हर बार पूरे इनकार के साथ
तुम्हारी पोली चलित्तरी चालबाज चुह्लता के खिलाफ
मै अपना आत्मसम्मान फिर से आज बचाता हूँ
इन दिनों मरना ही अच्छा है !

        



परिचय और संपर्क

नाम  : महाभूत चन्दन राय 

जन्म तिथि स्थान : 25.11.1981 ,जिला वैशाली बिहार
वर्तमान पता : फ्लैट नंबर 2311 हाउसिंग बोर्ड कालोनी सेक्टर-55 फरीदाबाद-121004, हरियाणा , मेलrai_chandan_81@yahoo.co.in,   
दूरभाष - 09953637548
शिक्षा  :  केमिकल इंजीनियरिंग
कार्यक्षेत्रस्वतन्त्र लेखन        

                      
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेनामी8:59 am, जून 21, 2013

    कविता अच्छी है | आपमें संभावना दिखाई देती है | आगे बढ़ते रहिये | बधाई ..| दिनेश प्रसाद ..लखनऊ |

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