शनिवार, 17 अगस्त 2013

'ईश्वर की गलती' - अरविन्द की कहानी


                           अरविन्द          


                
मौलिक बिम्बों और गहन संवेदनाओं वाली कविताओं के लिए ‘अरविन्द’ को हम सब जानते हैं \ वे फिल्मों में भी गहरी रूचि रखते हैं और जब कभी भी मौक़ा मिलता है , उन पर अपनी राय से हमें अवगत भी कराते रहते हैं | अच्छी बात है , कि उन्होंने कहानी की विधा में भी हाथ आजमाने की कोशिश की है | और कहूं तो , खूब कोशिश की है | कथा कहने की सदियों पुरानी शैली को अपनाते हुए , वे यहाँ भी एक मौलिक शिल्प की परम्परा की शुरुआत करते हैं | अरविन्द की तरह मैं भी यही चाहता हूँ , कि ‘यह कैसी है’ , या ‘है भी कि नहीं’ , इसका निर्णय आप सुधि पाठक ही करें |


         प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर युवा रचनाकार ‘अरविन्द’ की यह कहानी      


                            ईश्वर की गलती

(समस्त घटनाएं काल्पनिक हैं .किसी का कही कोई अस्तित्व नहीं है .राजा ,रानी और अन्य किरदार तो काल्पनिक हैं ही ,इसमे लाया गया ईश्वर भी एक काल्पनिक पात्र है .यह ईश्वर भी एक आदमी की तरह है या फिर ऐसा मानिये कि ईश्वर के नाम से कोई आदमी ही है .जो दुनिया में व्याप्त तमाम किस्म के ईश्वरों के कार्यों और चमत्कारों से प्रभावित है .और अपनी इस कथा में ईश्वर का जनक मैं हूँ .जब चाहे इसे निकाल सकता हूँ और मार सकता हूँ .और इससे पहले कि आप निकाले मैं बता दूँ कि इस कथा में एक नहीं दर्जनों कमिया हैं .और आस्था नामक तर्कहीन शब्द की तरह यह कहानी भी तर्कों,तथ्यों और वैज्ञानिकता के सीने पर छुरी रख कर चलती है .और वे कमियां ,जिन्हें मैंने खुद निमंत्रित किया है ,के लिए कोई खेद नहीं है .)
               


ईश्वर गलतियां नहीं करता .पर गलतियों का अस्तित्व बना रहे  और हो रही उनकी निरंतर शिकायतों की वजह से उसे भी गलतियाँ करनी पड़ जाती हैं .चूँकि वह ईश्वर है इसलिए अपने कद के बराबर वह गलतियां भी कर जाता है .

               जैसे उस रोज की हुई गलती ने तो पूरी व्यवस्था को ही उजाड़ कर रख दिया था .अपने सुदूर नैहर में दो वर्ष बिताने के क्रम में चिनकती हुई धूप में शिकार खेलते हुए बीच जंगल  में रानी को प्यास लग गयी थी .अब प्यास तो प्यास ठहरी .रानी की आज्ञा काहे मानती .पानी तो पीना ही था .आम दिन होते राजमहल वाले ,तो वे उस झोपड़ी में अपने पाँव की परछाई तक नहीं जाने देती .लेकिन यहाँ इस यात्रा में तो कुछ खास ही था .यही वह समय था ,जब ईश्वर को गलती कर जाना था .हुआ यह कि जिस पीतल के लोटे में वे पानी पी रही थी .यह वही पानी था ,जिसे पीने के ठीक वैध दिनों के बाद राजमहल में एक सलोने राजकुमार का जन्म हुआ था .बचे हुए पानी को बाद में खेत के काम से आने के बाद उस जंगल वाले सुदर्शन युवक की पत्नी ने पीया था ,जो रानी के घुटक-घुटक कर रहे घेन्टुआ को देखते हुए कहीं बिला गया था .रानी के आने का जीवन में उसके बहुत बड़ा सुख तो था ही ,लेकिन दुःख भी कम बड़ा नही था .वह चाहता था कि उसके झोपड़े में कम से कम एक खटिया तो रहती जिस पर बैठने के लिए वह रानी से निवेदन करता . जमीन पर बिछायी गयी मूंज की चटाई पर बैठने का आग्रह कर ,वह धृष्टता कैसे कर सकता था .फिर भी ...इस दुःख पर उसका सुख चढ़ जाता था .और केवल चढ़ता ही नहीं था उसे ओनच भी देता था .एक गौण कथा यह भी कि ठीक उसी समय उस युवक की पत्नी भी गर्भवती हुई थी .आप कह सकते हैं कि केवल पानी पी लेने से रानी या उस झोपड़े वाले युवक की पत्नी गर्भवती कैसे हो सकती है .तो आपको बता दूँ कि ईश्वर चाहे तो क्या नहीं हो सकता .और होता भी तो आया है .

                              
और इधर रानी जब जंगल से पिता के राजमहल में आई तो दूसरे महीने में आ रही उबकायियाँ और स्वाद के बदलते खट्टेपन ने उन्हें यह सूचित किया कि वे अब माँ बनने वाली है.बात तो ख़ुशी की ही थी .पर रानी ने दो वर्ष अपने नैहर में बिताया था और इन एकाकी दो वर्षों के खालीपन में  राजा क्या !राजा की दुम भी उनके साथ नहीं थी .यह सोचकर रानी के अम्मा के रातों की नीद तक कुफ्र हो चुकी थी .रानी का बुरा हाल तो था ही .गर्भ के दिनों के पीलेपन के साथ वे इस चिंता की कमजोरी में असाधारण रूप से दुर्बल होती जा रही थीं .लगातार उपज रहे और बढ़ रहे दुःख को ध्यान में रखते हुए रानी के पिता ने निर्णय लिया कि रानी को उनके घर यानी उनके ससुराल भेज दिया जाये .बिना किसी पठावा या बुलावा के उन्होंने पालकी सजवा दी थी .हालाँकि यह मानहानि था ,पर रानी का खुद  चलकर राजमहल में जाने के सिवाय कोई चारा भी नहीं था .
                          
 पेट के बेहद हलके उभार को ढक- तोप कर आई रानी ने सबसे पहले यह सूचना हिरनी की तरह डबडबाई आँखों से राजा को दिया था .राजा ने त्वरित प्रतिक्रया नहीं दी थी .और रानी के लिए उनके चेहरे के भाव को पढना भी दुष्कर हो गया था .राजा ने एक अंदाज में अपने उत्तरीय को कंधे पर फेंका और वे उस कक्ष में चले गएँ जहाँ बैठकर वे सोचते थें .जहाँ उन्हें कोई मारक किस्म की स्थितियों में भी डिस्टर्ब नहीं करता था .और बैठकर कुछ बुदबुदाने लगे थे .उधर रानी अपने भाग्य और दशा को लेकर परेशान थीं ,इधर राजा अपने मधुर दिनों को गिनते और हिसाब करते हुए परेशान हो गया .उसने रानी के साथ बिताये गए अंतिम समय का हिसाब लगाते हुए उसमे नौ महीने का योग कर दिया था .पर वह समय तो जाने कब बीत गया था .और रानी ने वह सारी कसमे उठा ली थीं ,जो एक आदर्श नारी को ऐसे आपातकालीन मौसम में उठा लेना चाहिए ..राजा की गेंहू जैसी पकी और संपुष्ट नीद में अब घुन लग चुका था .वे सो नहीं पाते थें .कहीं खड़े रहते तो खड़े ही रह जाते .बार बार वे अपनी तलवार के मूंठ पर से हाँथ हटा लेते .भोजन का कौर मुंह तक ले जाकर घंटों सोचने लगते थें . यही वह समय था जब ईश्वर अपनी गलतियों मुस्करा रहा था .इससे पहले कि वे कुछ गलत सही कदम उठाते कि निर्दोष और पाक रानी को बचाने के लिए और कथा आगे बढाने के लिए एक थके दिन वह राजा के सपने में आया और सारी घटनाएँ विस्तार से बताया .उस पानी के गुण के बारे में समझाया .वह मामूली h2o नहीं था .उन्होंने समझाया कि जो भी उस पानी को पीता .उसे गर्भवती हो जाना था .राजा ने पूछना चाहा था कि भगवन क्या अगर कोई पुरुष पीता तब भी .पर अव्वल यह प्रश्न ही मुर्खतापूर्ण है और दूजे यह कि उस रूहानी बखत राजा की जबान ही बंध गयी थी .वैसे ही जैसे सपने में जब सांप लखेदता है तो पैर बंध जाते है .


                                       
अब जब कि सब सपने से ही संभव था तो रानी ने ठीक नौ महीने पहले का वह मधुर सपना याद कर लिया था .जहाँ से यह अघटित व्यापार के संभव हो जाने का बीज पडा था .रानी ने बताया कि खूब गहन निद्रा में हो जाने पर सुतकड़ आत्माएं घुमने लगती है .वे सारे काम कर डालती हैं जिनके बिना उनका रहना दुर्लभ हो जाता है .उसने यह भी जोड़ा कि एक बार उनकी नानी को घनघोर नीद में जोर की प्यास लगी थी .और उनकी आत्मा घूम रही थी ,उसी वकत उसने एक गाँव के झोपड़े में घडा देखा जिसमे ठंडा पानी भरा था .घडा खुला था .वह उस घड़े में घुसकर पानी पीने लगी थी .कि तभी घर की मालकिन ने एक परवे से उस घड़े को ढक दिया था .और आत्मा दिखती भी कहाँ है .अगर किसी चूहे की तरह आत्मा भी दिखती तो समझदार मालकिन उसे निकाल बाहर कर देती .इधर सुबह उनके नानी के मरने की घोषणा कर दी गयी थी .उनकी मिट्टी को हरे बांस पर बांधा जा रहा था .कि तभी सुबह सुबह उस झोपड़े वाली मालकिन ने पिसान सानने के लिए परवे को हटाया और पानी निकालने लगी .बस यहीं से उनकी नानी की आत्मा में जान में जान आई और सर पर पैर रख कर भागी .इस तरह से वे पुनः जीवित हुई थी .रानी ने इस कथा को विस्तार से नमक मिर्च लगा के बताया .और उन संभव लौकिक सूत्रों और लोककथाओं पर खूब जोर दिया .जिनमे किसी राजा या पात्रों  के आत्मा को भी प्रेम में सात समन्दर पार चले जाने वाली बात थी .रानी ने उस विशेष रात के बारे में भी खूब बढ़ा चढ़ा कर बताया कि कैसे वे राजा की आत्मा के आने से डर गयी थीं.और विशवास में लेने के लिए कैसे उनसे अपनी  देह के बारीक तिलों के बारे में भी तफसील से पूछा था .राजा के आत्मा की आवाज तो नहीं सुनाई देती थीं .पर हवाएं जो खिड़की से आ रही थीं ,जहाँ से चांदनी में डूबी नदी दिखती  थी,ने भरपूर मदद की थी.हवाएं कब एक धीमी फुसफुसाहट में बदल जाती थीं ,नहीं पता चलता था .राजा की आत्मा ने सब कुछ विश्वसनीय बताया .यहाँ तक कि वे दोनों कब कब प्रणय प्रसंगों के दौरान मसहरी से गिरे थें .कौन सी प्रिय मुद्राएँ थीं .और भी अनाप शनाप चीजें .जिसे राजा रानी के अलावा केवल ईश्वर ही जान सकता था .वह सब कुछ उस हवा की फुसफुसाहट ने बताया था  .अब इतने  बारीक बयान और दस्तावेज को याद रखने की औकात हवा हरामजादी में कहाँ से हो सकती है !रानी ने मान लिया था कि वास्तव में वह राजा की आत्मा ही है .और इतने ताल ,नदी पोखर ,पहाड़ चलकर उनके पास आई है तो एक आदर्श नारी का क्या फर्ज बनता है ?और इस किस्म के अविश्वसनीय और अलौकिक प्रेम में तो रानी पहले ही मदहोश हो चुकी थीं .उस पर यह प्रखर इश्कधर्मी सोचना अफीम का काम कर गया था .इस तरह से वे जहाँ थीं अर्थात फर्श पर ही बिछ गयीं .और आत्माओं को फर्श या गद्दे से क्या मतलब .अलबता प्रेम नामक चीज से जरुर होता है .इस तरह से उस संसर्ग का ही परिणाम था कि वे गर्भवती हुई .अब वकील टाईप के जानकार लोग यह भी कह सकते हैं भाई मासिक भी तो रुका होगा .उसी समय राजा को सन्देश पठावा नहीं दे सकती थी .यानी वह समय पहले महीने के आस पास बैठता है .तो उनसे एक ईश्वर का जागरूक प्रतिनिधि होने के नाते कहना चाहूंगा कि उस्ताद यह कहानी है .वह भी ऊपर वाले की गलतियों से सम्बंधित है ..संभव है .मान लो .धर्म की चीजें हैं .आगे पीछे होता रहता है .नहीं भी होगा तो क्या कर लोगे .मुक़दमा करोगे क्या ?


फिलहाल अगली सुबह प्रजा के धीरज और संतोष के लिए राजा ने यह घोषणा कर दी थी महल में नया मेहमान आने वाला है .और उन्होंने वे सारी तैयारियां और रस्मे शुरू करवा दिए थे ,जो सम्मानित रूप से होने चाहिए .और एक झूठ (जिसे मैं और ईश्वर जानता है )को पपड़ी न छोड़ देने वाले एक मजबूत सत्य  के रूप में प्रचारित करवाया था .वह सत्य था कि कभी कभी वे जब शिकार करने अपने ससुराल वाली दिशा में चले जाते थे तब कोई सन्देश देकर पहली वाली रानी से तम्बू कनात में भेंट-घाट भी कर लेते थे .अब अगर आप भेंट का अर्थ जानते है तो घाट के अर्थ को समझाने में मैं अपना माथा नहीं खराब करने वाला .कहानी के नए आयाम पर आते हैं .

.बहरहाल अब राजा के अन्दर की भी कुछ बातें  थीं  .अगर ईश्वर उनके सपने में नहीं आये होते तो वे रानी के इस कहानी पर कम ही विश्वास करते .और जो भी गलत सही फैसले करने होते ,जल्दी ही कर डालते .लेकिन जिस तर्ज पर उन्होंने ईश्वर  वाले सपने पर विशवास कर लिया था .उसी लीक पर चलकर  रानी का कम अपना मन ज्यादा रखने के लिए इस बयान पर भी विश्वास कर लिया था कि उनकी आत्मा भी घुमक्कड़ है .रह गयी रानी से प्रेम वाली बात तो राजा ने विवाह के  महीने भर रात के बाद ही रानी में दिलचस्पी लेनी कम कर दी थी .और प्रेम तो वे चौथी नवेली रानी से भी नहीं करते थे .बस वे तो अब चौथी रानी के रूप के शौक़ीन थे .बची आने वाले बच्चे की बात तो यह उनका पहला पुत्र था .और राजा को पुत्र में नहीं अपने वंश में दिलचस्पी थी .

रानी को पुत्र हुआ था .राजकुमार के आने से रानी का मान सातवें आसमान तक तो बढ़ा ही था .राजा का संग -साथ भी उन्हें ज्यादा मिलने लगा था .राज महल में सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था कि एक दिन ईश्वर सो कर उठे थे .उबते हुए उन्होंने दिन भर में एकाध सौ उबासियाँ ली .और उस उबन के अटूट एकांत में उनका थोड़ा-सा मनोरंजन करने का विचार हो आया था .इधर राजकुमार को पैदा हुए पांच साल हो आये थे .इन पांच सालों के खालीपन में वे कुछ ज्यादा ही बूढ़े दिखने लगे थें .और राजा ने भी तो यज्ञ हवन बंद कर रखा था .इस तरह से तो वे क्षीण हो जायेंगे .और धरती पर आये दिन नास्तिकों की जनसंख्या भी भाग रही थी .और वह कथा भी पूरी करनी थी जिसे अपने आलस और कामचोरी की वजह से उन्होंने छोड़ रखी थी.लेकिन कथा को पूरा करने के लिए एक बहाना भी तो चाहिए . अच्छा बहानेबाज कथाकार अनूठा होता है .वे तो ठहरे पूरी दुनिया को संचालित करने वाले और सारे तर्कों को एक किनारे रखकर एक बहाने में ढाल  देने वाले एक कलाबाज थे वे  .तो जो बहाना निकाला गया वह उनके गलतियों के कंफेसन से निकलता था .लेकिन वह तो  सर्वशक्तिमान ,स्वयम्भू और तानाशाह थे .किस पादरी और किस खिड़की के सामने प्रस्तुत होते ! बताइए !तो जैसा कि जम्बुद्वीप की जनता पहले से जानती है कि भगवान अपने भक्तों को बहुत प्रेम करते हैं .इसलिए नहीं की भक्त उन्हें पुजते है और चढावा चढाते है .वह तो है ही .इसलिए भी उनके होने से ही खुद का अस्तित्व बनता है .इस तरह से कथा को आगे बढ़ाने के लिए जिस पात्र का ऊपर वाले ने चुनाव किया वह थी ,दूसरे नंबर वाली रानी .और यहीं से मैं अब रानियों को नंबर से बुलाउंगा .

                                     
अब बारी दूसरी रानी के सपने की थी .यही से बिखराव शुरू होता है .और ईश्वर को अपनी गलतियों का आनंद आने आने लगता है.इस आनंद की नेमत से वे थोडा थोड़ा जवान भी होने लगे थें .और इन दिनों नीचे से जो अधिक याद कर रहा था ,वे थीं दूसरी रानी .दूसरी रानी कम खूबसूरत थीं .उनके खूबसूरती का कम परसेंटेज और राजा के नगण्य लगाव ने उन्हें पूजा पाठ के करम में लीन कर दिया था .कभी कभी उनकी काया पर कुछ हाई टेक किस्म की देवियाँ भी आ जाती थीं .यह विशिष्टता राजा को तो प्रभावित नहीं करती थी ,अलबत्ता राज पुरोहित ओवर टेक कर जाते थें .वे तमाम किस्म की अगरबत्तियां ,धुप और मान मनौवाल के बाद उन्हें शांत करते थें .और अगले सावन के किसी विशेष सोमवार को चढ़ रहे बकरे की संख्या और चढ़ावों में इजाफा कर देते थें .इनके  अलावा उनके इस दैवीय शक्ति का जिस पर वज्र सा प्रभाव पडा वह थी भोली प्रजा .इस विशेष गुण के कारण दूसरी रानी ने एक पवित्र किस्म की ख्याति अर्जित कर ली थी .और राज्य के सारे मंदिर उन्होंने एक तरह से हथिया भी लिया था .वहां से आ-जा रहे धनों के हिसाब बही रानी के हांथों में होती थी .वे मनमाने तरीके से हिसाब रखती थीं .और कभी कभार राजा के पूछने पर एक अनोखी जिद में डूबकर हबुआने भी लगती थीं .’’स्साली पागल औरत!!’’ कहकर राजा ने उन्हें निरंकुश भी तो छोड़ दिया था .इस निरंकुशता का इस्तेमाल उन्होंने धारदार हथियार की तरह किया .किसी भी किस्म की कोई एक्टिविटी उनके मोहर के बगैर नहीं होती थी .कभी कभार उनकी अनुपस्थिति और बीमारी ,छुत्का आदि दिनों में चार्ज राज पुरोहित ले लेते थें .

                                        तो पांच साल के हो चुके राजकुमार का नाम उसी तरह से राजकुमार पड़ा ,जिस तरह से सुदूर जंगल में उसी वक्त पैदा हुए एक बच्चे का नाम अराजकुमार पडा .ढोल,नगाड़ो, खिल, बताशों, नर्तकियों के बीच एक वैभवपूर्ण उत्सव मनाया गया .पर दूसरी रानी का उन दिनों उपवास चल रहा था .तो वे इस टटकरम से दूर ही रहीं .उन्होंने अन्न का एक दाना और पानी की एक बूंद तक जीभ पर नहीं जाने दिया था .दूसरी रानी को अपने सौभाग्यवती और खांटी पतिव्रता होने का गुरुर था .वे एक पसर भर लाल सिन्दूर अपने मांग में इस तरह से डालती थीं कि जैसे ज्यादा सिंदूर डालने की कोई जीती जगती प्रतियोगिता हो .यह एक विशेष किस्म का सिन्दूर था .जो सुदूर बल्वागढ़ नामक जगह से मंगाया जाता था .बहुत महँगा और आम जनता के पहुच से दूर .ऐसी धारणा थी कि इस सिन्दूर को माथे पर धरते ही तवायफें भी सुहागिनों की तरह एक पतिधर्मा हो जाती थीं .पूजा-घर में सिन्दूर ही सिदूर बिखरे मिलते थे .रानी बहुत नेम-तेम से देवियों का सारा श्रृंगार खुद करती थीं .बेचारे राज पुरोहित हाँथ बांधे मूर्तियों से दूर खड़े रहते थें .हाँ !कभी कभार राज पुरोहित के घने और माथे तक उड़ रहे बालों पर भी सिंदूर की कुछ निशानियाँ मिलने लगी थीं .लेकिन राज पुरोहित आजीवन बाल ब्रम्हचारी थें .और प्रजा के लिए दूसरी रानी के बारे में शक करना एक तरह से ईश्वर और देवियों के होने पर प्रश्न चिन्ह लगाना था .प्रजा के लिए दूसरी रानी एक तरह से रामबाण वैद्य साबित होती जा रही थीं .एक विशेष दिन निर्धारित होता था जब वे अपने पसंदीदा मंदिर पर जाती थीं ,और वहां वे भूत-प्रेत और तंत्र-सम्बन्धी लोगों को देखती थीं .देखती क्या थीं ,कहा जाए कि रक्षा करती थीं .उनके हाँथ का जादू बहुत लोकप्रिय होता जा रहा था .लोग दूर दूर से आते और भभूत ले जाते थे .दूसरी रानी का यह सब धतकरम देखते हुए राजा उब जाते थें .और उनके उबन और बेखयाली से ही रानी की स्वतंत्रता में नए हथियार की तरह एक धार पैदा होने लगी थी   .


                                      सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि राज महल में  असाधारण किस्म की घटनाएँ होने लगी थीं .हुआ यह था कि किशोर राजकुमार एक विशेष प्रतिभा वाला बालक निकला .वह दौड़ते हुए पेड़ों पर चढ़ जाता था .वह मुंज की चटाई मिनटों में बीन देता था .वह तीर से बिना देखे निशाना लगा लेता था .और वह कोई राग नहीं गाता था ,जबकि राज्य में रागों के एक से बढ़ कर एक महारथी गवैये थें .वह भोर जब सभा बैठी हुई थी और राग भैरवी को साधा जा रहा था कि अचानक बालक ने एक लोकगीत गाना शुरू किया .वह लोकगीत चिड़ियों के बारे में था .अचानक चिडियों का घोसलों से दूर उड़ता हुआ झुण्ड लौटने लगा था .एकदम सवेरे की यह घटना अप्रत्याशित निकली थी .वे राजमहल के बुर्जों पर बैठ कर उस गा रहे लडके को देखने लगी थीं .जब गाना समाप्त हुआ तब फिर वे दानो की खोज में उड़ गयी .वहां के गवैयों के पैरों के नीचे से जैसे जमीन अलविदा कह गयी थी .एक बुजुर्ग ने उस लोकगीत के बारे में बताया कि यह एक आदिम ज़माने का जंगलों का गीत है .इस गीत में चिड़ियों के आयु के उर्ध्वगामी हो जाने का रस-रहस्य छिपा था .और बहुत साल पहले इसे आखिरी बार किसी आदिवासी ने गाया था .इसके बाद सालो साल इसे नहीं सुना गया था .इस तरह अचानक और इतने सधे सुर में इस गीत को सुनना और चिड़ियों का बेजोड़ संख्या में बुर्जों पर आ जाना न केवल उस गीत के पुनर्जीवित हो जाने का प्रमाण था  बल्कि उस लोक गवैये की आत्मा के बचे रह जाने का प्रमाण भी था .पर क्या राजकुमार में उस गवैये की कोई आत्मा है या फिर कोई टोना टोटका है .इस प्रश्न को पूछने की हिमाकत कौन कर सकता था .राजा उस दिन से राजकुमार के इस निरर्थक और जंगली किस्म के संज्ञान से विशेष रूप से चिंतित रहने लगे थे .और राजकुमार इस रोग में दिनोदिन डूबते गए थे .वे भरे हुए तेज धार वाली नदी में कूदते थे और गति और तीव्रता की रानी मछलिया जैसे रोहू ,बंगुर आदि को पलक झपकते पकड़ लेते थे .अपने को बड़े बड़े मछरमार का बाप समझने वाले मल्लाह जिस काम को संभव नहीं कर पाते थें .राजकुमार पलक झपकते संभव कर डालते थें .राजा ने एक से बढ कर एक पंडितों को लगाया पर वेद श्लोक की ऋचाएं छोडिये ,वे पठ धातु का ल्रीटलकार तक नहीं याद कर पाते थें .जबकि तितलियों के पास जाके पता नहीं क्या बुदबुदाते कि सारी तितलियाँ उन्हें ऐसे घेर लेती जैसे वे ही उनका उद्गम हों ,माता पिता हो ,ईश्वर हो ,या इन सबसे भी बढ़कर वे फूलों का कोई खजाना हों .रानी भी इस दुश्चिंता में दुबली होती जा रही थी ,कि आखिर उनके बेटे के दिमाग में क्या घुस गया है .जो इस तरह की बेवकूफों वाली क्रियाएं करता जा रहा है .युवराज बनने की धेले भर योग्यता उसके पास नहीं थी.सबसे बड़ी दुर्मुख चिंता तो यह थी .


                                आप समझ सकते हैं कि राजकुमार के इन कृत्यों पर जिसे आकाश भर ख़ुशी नसीब हुई ,वे थीं दूसरी वाली रानी .वे इस सनक भरे संवेगों में और उपवास रखने लगी थीं .और इस क्रम में वे ईश्वर के और नजदीक होती गयी .धीरे धीरे ईश्वर की नजदीकी ऐसे बढ़ी या कहें ईश्वर ने ही कुछ यूँ नजदीकी बढ़ा ली थी कि जब भी वे कोई राय मशवरा लेना चाहते वे रानी के सपनों में पहुँच आते थे .मैं पहले ही बता चुका हूँ कि ईश्वर को अपनी गलती सुधारना था .और  पूरे  राज्य में दूसरी रानी जैसा शुभचिंतक शायद ही कोई मिलता .एक तरह से उन्हें एक दोस्त मिल गया था .एक ऐसा दोस्त जिसके सामने वह गलतियों वाली सारी बात बाँट लेना चाहता था .कि ऐसे ही एक नाजुक समय में जब गिर रही ओस से पनीली होती जा रही रात में चांदनी गुड की एक डली की तरह नदी में घुल रही थी .और महल में दूसरी रानी पूजा करते हुए वही फर्श पर ही निद्रामग्न हो चुकी थीं .पहरेदार सो चुके थें .बिना किसी से पूछे सीधे वे पूजा घर में चले आये .वैसे पूछने की जरुरत ही क्या थी !वह कमरा तो उनका ही था .आये और जमीं पर ही उकडू बैठ गए .वे सीधे दूसरी रानी के रक्ताभ चेहरे की ओर देखते रहे .दिए के ललछौह उजाले में वे और भरी लग रही थीं .मैं ठीक ठीक नहीं बता सकता पर वे जिस अंदाज और गति में वे उस रानी के चेहरे की तरफ आयें ,ऐसा लगा कि चूम ही लेंगे.लेकिन यह शायद मेरी गलती थी . वे देर तक वहीँ बैठे रहें .फिर सोचे की चले जाएँ या बता दें .कि तभी दूसरी रानी ने एक करवट ली.इस करवट अंत ठीक ठीक ईश्वर की गोंद में होता था .सो किसी पुरुष के अनचाहे स्पर्श से वे जग गयी .रानी ने ईश्वर  को साक्षात देखा और इस तरह से उन्हें कायदे से बेहोश हो जाना चाहिए था .पर उन्हें नहीं होना था .और न ही हुई .अलबत्ता खुद को पच्चीस बार चिकोटी काट कर जब वे निश्चिन्त हो गयी कि नहीं सामने ईश्वर ही हैं .तो वे उस चरम आनंद से भर गयीं जिसे शायद मोक्ष-वोक्ष कहते हैं .अब जब कि भोर अपने किवाड़ से झांक न ले .और सारी गोपनीयता जान न ले यह सोचकर उन्होंने धीरे धीरे वह गलती बताई जिसे पाठक चाहें तो रहस्य भी कह सकते हैं .ईश्वर ने बताया कि जिस लोटे में उन्होंने अभिमंत्रित पानी रखा था .उसका पहला हिस्सा कायदन उनकी स्क्रिप्ट के मुताबिक जंगल वाले युवक की पत्नी को पीना था .दूसरा जूठा हिस्सा पहली वाली रानी को पीना था .जिससे समस्त गुणों वाले राजकुमार का जन्म होता .लेकिन सब कुछ उनकी गंभीर हरजाई नीद के चलते उलटा हो गया था .हुआ यह था कि ईश्वर के जगने से पहले ही युवक की पत्नी गेंहू काटने खेतों की ओर चली गयी .और स्क्रिप्ट के मुताबिक़ वे उसे पानी पिलाने वाला कार्यक्रम क्रियान्वयित नहीं कर पाए थे .इस तरह से उन्होंने बड़े गंभीर स्वरों में बताया कि जो बच्चा महल में होना चाहिए था .वह जंगल में है .और जिसे जंगल में होना चाहिए ,वह साला महल में गुलछर्रे उड़ा रहा है .इससे पहले कि दूसरी रानी कुछ पूछे कि बस यहीं के बाद वे उड़नछू हो गए .और स्वर्ग में जाकर बीस गिलास पानी पीया.एक तरह से उनके दिल में राज रखने से जो उनका हाजमा खराब हो रहा था .वह ठीक हो गया .और कहानी को आगे चलने का एक बहाना मिल गया .ईश्वर अपने अन्दर उपजी निश्चिंतता के नशे में आकर अब थोड़ी देर के लिए सो जाना चाहते थें .थक भी पुरजोर गए थे .इसलिए आगे जो कुछ भी होगा उसके लिए सीधे सीधे ईश्वर जिम्मेदार नहीं होंगे .न ही पुकारने पर आयेंगे .न ही चढ़ावा लेंगे .लगे हाँथ इसी तरज मैं यह भी बता दूँ की इसके लिए यह खाकसार लेखक भी जिम्मेदार नहीं होगा .जिस काम के लिए ईश्वर खुद नहीं जिम्मेदारी ले सकता तो मैं क्यों कर लूँ भाई !यह तो जाने इस कथा के पात्र जो तबियत नासाज हो जाने की हद तक परम आस्तिक हैं .और मरदूद दो पेज की कहानी को आठ पेज तक खीच लाये हैं .




यह सब इतना त्वरित घटित हुआ था कि सब कुछ एक छू लेने वाले या जी लेने वाले एक सपने कीतरह लगा .ईश्वर के सीने से निकल लेने के बाद उस दुष्ट राज ने दूसरी रानी के सीने में पनाह ले ली थी .और पनाह ही नहीं, उनके दिलोदिमाग और हरी नसों में घर भी कर गया था .और घर ही नहीं किया बल्कि एक दिन तो बारूद की तरह फटकर राजमहल की नीव तक हिला दी.लेकिन उस दुर्घटना घटना के पहले यह एक घटना घटी .अपने एकलौते बेटे के पहाड़ सरीखे ग़म में पहली रानी ने दूसरी रानी से रार मोल लिया .वह कहते हैं न कि खिसयानी बिल्ली खम्भा नोचे .उस समय तक दूसरी रानी के सपने में ईश्वर नहीं आये थे .और वे उस राज से दूर थीं .जिसने तबाही मचानी शुरू की थी .कि एक दिन पहली रानी ने राजा से शिकायत की कि हो न हो इस दूसरी रानी ने ही कोई टोना टोटका कर रखा हो .वैसे भी  दूसरी रानी शुरू से राजकुमार को कुछ खास पसंद नहीं करती थीं .और राजकुमार का आँगन में लोटना किसी सांप के लोटने से कम नहीं लगता था .राजकुमार को वे कभी गोद नहीं लेती थीं .वैसा झूठा प्रेम भी उसे नहीं दें पायी थी जिससे पहली रानी का शक कुछ डायलूट होता .लेकिन उस दिन पता नहीं कौन सा उनके दिल में प्रेम उपजा कि पूजा घर के बाहर खेल रहे उस पांच साले बच्चे को पूजाघर में लेती आई .और टिका फटीका कर हाँथ पर थोडा प्रसाद रख दिया था .बस यही से पहली रानी का शक विश्वास में बदलने लगा था .वह तब की बात है जब राजकुमार ने बोलना तक नहीं सिखा था .म .मम आदि थोड़ी बहुत ध्वनियाँ निकाल पाते थें .देखने वाली दासी ने कहा था की पूजा घर में ले जाकर दूसरी रानी ने कुछ खास उपकर्म नही किया था .लेकिन शक तो शक ही होता है .और यह कभी नष्ट नहीं होता .भले पृथ्वी का समूल नाश हो जाए .

                         
लेकिन कुछ टोटके ऐसे भी तो होतें है जो एक खास समय के बाद असर करते है .ऐसा पहली रानी का मानना था .और वे राजा पर विशेष दबाव बना रही थीं कि किसी तरह कोई सुराग तो मिले .कहीं से कोई तो हामी भरे .राज पुरोहित से सौदेबाजी तक वाली बात हुई पर वे तो दूसरी रानी के पलड़े में ही पड़े रहे .कोई दूसरी रानी से खुलकर पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता था.और दूसरी को तो इस शक वाली बात की भनक पहले से ही थी .पता नहीं कैसे .बस वह मन ममोसकर रह जाती थी. पहली रानी को छोड़कर किसी को बच्चा नहीं था .यह बच्चे वाली बढ़त दूसरी के मन में मछली के फांस की तरह धंसी थी .या तो राजा ही नपुंशक थे या फिर एक साथ इन तीनो रानियों के कोख में ही कोई दोष था .चौथी रानी जिसके रूप में फंसकर राजा दिन रात घेरे रहते ,उसे ही कौन सा बच्चा हुआ था .और तीनो रानियाँ कभी एक साथ बैठती तो बातचीत का यही मुद्दा  उभरता था कि लगता तो यह है कि पहली तो कहीं दूसरे से ही ले के आई है .


लेकिन इससे पहले कि चौथी रानी और तीसरी रानी का मुंह खुले और लेखक उनका दुःख कहे ,कथा को अब समाप्तप्राय करते है.कि वह एक दिन वह कोई धुलकर आई हुई सुबह थी .जब दूसरी वाली रानी धुप अगरबत्तियों की थाली लेकर गुम्बद वाले परकोटे में जा रही थीं .और अचानक सामने से आ राजा के एक तमातामये हाँथ के तमाचे से सब कुछ भहराता हुआ चला गया .और रानी के मांग का सिन्दूर छिटक कर धरती पर बिछ आया था .उन्होंने गाली देते हुए कहा कि बता साली हरामजादी कैसे टोना टोटका करती है .और राजकुमार के साथ तूने क्या कर रखा है .यह उसी चांदनी वाली रात की बात है जब रानी ने रोते हुए पूजा घर में सारी रात बिताई थी .और उन्हें ईश्वर का दर्शन दिया था और एक विशेष राज के बारे में पता चला था .

                                   
उस तमाचे के बाद दूसरी रानी कई दिनों तक खामोश रही .और बात रफा दफा के मुहाने तक पहुँच गयी .और एक दिन जब नर्तकियों की कोई प्रतियोगिता होने वाली थी तब राजा ने उन्हें निमंत्रण भिजवाया.वे नहीं पहुंची .फिर उन्हें बुलवाया गया और कार्यक्रम को रोके रखा गया.वे फिर नहीं आई .इस बार राजा के पुरोहित खुद चल कर आयें .तीसरी बार के बुलावे के बाद दूसरी रानी गयी थीं .और आगे की कतार में राजा के साथ पहली वाली रानी को देखकर अन्दर ही अन्दर वे जल गयीं थी .और उस जलने में घी का काम पहली रानी की उस मुस्कुराहट ने कर दिया ,जब वे अपने निर्धारित सिहांसन की ओर बढ़ते हुए लडखडा गयी थीं .यह वैसी ही बदन को छिलती हुई मुसकान थी ,जब उनपर देवी आती थीं ,तब पहली रानी अक्सर मुस्करा देती थी .और  बहुत धीमे अपने अन्दर के किसी कोने में कह आती थीं .पगली कहीं की !बड़ी देवी बनती है !सती सावित्री बनती है !कुतिया !बाँझ !रांड! .लेकिन उस दिन पता नहीं कहाँ से यह संवाद हवा में गूंज गया था.हरामजादी हवा ही रही होगी .ऐसी गुस्ताखी कौन कर सकता है .या हवा में घूम रही कोई दुष्ट आत्मा रही होगी .हाँ इतना तो मैं बता सकता हूँ कि यह ईशवर की गलती नहीं .वह बेचारा तो सो रहा था .बस यहीं से ताश के महल की तरह सारे पत्ते भरभरा कर गिर जाने वाले थे .
                                   
 दूसरी रानी की आंखे एकदम चेरी के फलों की तरह फूलकर लाल हो आई .उन्होंने अभी अभी गुंथे गए गजरे वाले चोटियों को खुला छोड़ दिया .और झुमने नाचने लगी थीं .उनके पैरों के नीचे आये गजरे के फूल कुचलने लगे .आवाज का घनत्व बढ़ गया .नर्तकियों ने वह जगह छोड़ दी .जहाँ वे कुछ देर में कला का प्रदर्शन करती .अब वह जगह दूसरी रानी के लोटने ,खेलने और हबुआने के लिए हो गयी .उन्होंने सबसे पहले रानी की और देखते हुए उन्हें रांड .रंडी और कुतिया आदि शब्दों से संबोधित किया था .इसके बाद सीधे उन्होंने राजकुमार की ओर इशारा करते हुए उसके वैधता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया .और वे झोपड़ी वाली बात को अपने तरीके से ढालकर (वैसे नहीं जैसे ईश्वर ने उस दिन बताया था )चिल्लाने लगी थीं .उनके कहने का मैं यहाँ अनुवाद कर देता हूँ क्योंकि अगर मैं हू ब हू  उनकी बात को लिखूंगा तो अस्फुट स्वरों को समझने में परेशानी होगी.

                                      
उस देवी समय में उनका कहना यह था कि उस झोपड़े में घुसते ही पहली रानी उस जंगल के युवक पर मोहित हो गयी थी .और जैसे ही पीने के लिए उसने लोटे को आगे किया था .रानी ने हाँथ पकड़कर अपने अकेलेपन की दुनिया में उसे खीच लिया था .और उस झोपड़े की खरी जमीं पर मुंज की चटाई पर उनकी फुल सी देंह छिलती चली गयी थी .बाद में जब वे निढाल हो गयी तब उन्होंने फिर लोटे से पानी पीया .यही वह समय था जब युवक सोच रहा था .कि काश कोई अदद खाट रहती ! और चलते हुए वे झोपड़े के दरवाजे पर देर तक खड़ी रहीं .शायद कुछ कहना चाहती थी कि जो हुआ था उसे भूल जाना नहीं तो खाल खिचवा लूंगी .युवक की हिम्मत तब भी नहीं थी कि पुनः वह उस मुंज की चटाई पर उन्हें बैठने के लिए कहे .या फिर कब आओगी जैसा बेहूदा और अनाधिकारिक प्रश्न पूछे .और आगे राजा की और इशारा करते हुए जोड़ा कि इस नामर्द के कमर में इतनी कहाँ औकात की एक बच्चा पैदा कर दें.और चौथी रानी की ओर इशारा करते हुए कहा कि क्यों दुलारी कुछ बुझाता है इसके साथ तुम्हे .अरे कहती कहे नहीं .बेचारी चौथी घूँघट में और सिमट गयी .क्या कहती ?

इतना सुनते ही पहली रानी की देह से जैसे जान ही निकल गयी .उफ़ !इतनी झूठी और नारकीय बात !राजा के कनपटी से पसीना चूने लगा था .ठीक कनपटी के बगल वाली नस जैसे सांस लेने लगी थी .क्रोध में उनकी मूछे कांपने लगी थी .कुछ भी हो इस झोपड़े वाली बात में कम से कम वह झोपड़ा और युवक और लोटे के पानी की सूचना एकदम सही थी .शेष फर्जी बातें थीं .क्या ईश्वर ने उनके साथ धोखा किया था या दूसरी रानी सही कह रही थी  या फिर पहली रानी ही कुछ छुपा रही थी  .पर इन तीनो में से जो सबसे अधिक विश्वसनीय था ,आप जानते ही है वह ईश्वर था .राजा पूरी तरह से अपने को ईश्वर के पक्ष में ले जा रहे थे .दूसरी रानी को झूठी अफवाह और राजा के अपमान के जुर्म में कैद कर लिया गया और जंगल में ले जाकर जिबह करने की सजा सुना दी गयी .सेनापति को इस आदेश का पालन कर शाम तक दूसरी रानी के कटे सर के साथ उपस्थित होने के लिए कहा गया .सेनापति हुकुम बजा लाया .दूसरी रानी का कटा हुआ सर देखकर राजा के मन में एक ठंडक दौड़ गयी थी  .लेकिन अब राजा के जेहन में दूसरे किस्म के शक का कीड़ा लग गया था .राजा ने ईश्वर से सपने में मिलने के सारे जतन कर डाले .उसे फिर से प्रश्न पूछना था कि आखिर सत्य क्या था ?पर उनसे मिलने की इच्छा ,हर रात धरी ही रह जाती थी .राजा ने हर जतन किये .हवन किये .यज्ञ किया .बलि दी .पर सब बेकार .कथा पढ़ने वाले जानते है कि उस बखत ईश्वर सो रहा था .और वह थककर सो रहा था .एक ऐसी नीद जो अपनी गलतियों के स्वीकारोक्ति के बाद उपजती है .उसे कौन जगा सकता था .बस ऐसे ही किसी एक रात राजा अनिद्रा के घनघोर शिकार हो गए .और उन्हें सपने क्या नीद ही आनी बंद हो गयी थी .वे बौखलाए से दिन रात घूमते थे .सर पकड़ कर बैठ जाते थे .


                                अब कथा में ईश्वर को न तो आना था और न ही आया .इस तरह से उनकी अनुपस्थिति में राजा की निजी दुनिया अनियंत्रित हो गयी .राजा बेचारे पगला गए .जनता में यह बात फ़ैल गयी थी कि राजकुमार अवैध है .जनता पर दूसरी रानी का ही वर्चस्व था .और आम जनता को समझाने ईश्वर काहे आयेगा .दूसरी रानी ईश्वर से कम थोड़े ही है .जिसके जिबह होने पर वे क्षुब्ध और क्रोध में थें.वे राजा को गद्दी बदर करना चाहते थे और संभावित बगावत तो किसी समय हो सकती थी .बस ऐसे ही किसी एक रात जब राजा सोने का अन्तिम प्रयास कर थक हार गया. तब रात वह उस कक्ष में गया जहाँ राजकुमार सो रहा था.उसने ध्यान से राजकुमार के चेहरे की ओर देखा .अपनी नाक से नाक का मिलान किया , नहीं मिला .आँख राजा की मिचमिची थी ,राजकुमार बड़ी आँखों वाला था .उसने माथे का मिलान किया ,वह भी नहीं मिला .होठ और मुंह बस रानी को पड़े थे .उसने अपने दादा परदादा के चहरे को याद किया .कहीं से कुछ नहीं .रंग तो पहले से ही राजकुमार का सांवला था .जबकि राजा और रानी हल्दी मिले दूध की तरह गोरे थे .उसका हाँथ तलवार की मुठ पर गया .और दरवाजे की और खून की एक लकीर बह चली .यह वही गाढ़ा लाल रंग था ,जिसे राजा क्या तमाम लोग जानते थे .और सबका ही मिलता था .फिर वह बगल के कमरे में गया जहां पहली रानी सो रही थी .उसने ध्यान से देखा .शायद कोई सपना देख रही हो .राजा के चेहरे पर थोड़ी देर के लिए दया किस्म का भाव उभरा .वह सपने को तरस चुका था .वह सपने के महत्त्व और जहर को जानता था .वह उसके सपने के पूरा होने का इंतज़ार नहीं कर सकता था. रानी के जगने का इन्तेजार करना उसे बरस की तरह लगने लगा था .शायद वह सच्ची बात जानना चाहता था .जिसे रानी और केवल रानी ही बता सकती थी.इसके बाद वह कुछ करना चाहता था .ईश्वर से उसका भरोसा धूमिल हो चुका था .कि तभी हरामजादी हवा की वह फुसफुसाहट सुनाई दी कि इस नामर्द के कमर में इतनी औकात कहाँ कि एक बच्चा तक पैदा कर दे .इस आवाज को पूरा होते होते ही उसने रानी के सीने में तलवार उतार दी .इससे पहले कि हवा खिड़की से बाहर निकलती .उसने खुद को मार लिया था .राजकुमार के कक्ष से खून पहले ही बाहर चला आया था .बाद में राजा रानी का खून भी एक साथ मिलकर कक्ष से बाहर आने लगा था .राजकुमार का खून जैसे बाहर इंतज़ार के लिए रुका था .वह भी मिल गया .तीनो खूनो में से कौन किसका था ,पहचानना कठिन ही नहीं असम्भव था .


यह बिलकुल भोर का वक्त था .चिड़ियों का कोरस सुनायी देने लगा था .और यह वह समय था जब ईश्वर की नीद टूट गयी थी,



कहानी के दरवाजे के बाहर जिन कहानियों को रह जाना था अर्थात परिशिष्टात्मक कहानी
१ सन्दर्भ ;-राजकुमार की ह्त्या
प्रसंग :
रानी ,राजकुमार की हत्या और राजा के आत्मह्त्या के बाद भोर ने करवट लेनी  शुरू कर दी थी .यह वही समय था जब चिड़ियों के दिलों में बहुत उमंग होती है और उनके परों में रात भर के थके आकाश को एक पलड़े में तौल लेने का हौसला होता है .लेकिन उस रोज की भोर इस परिभाषा से उलट थी .राज्यवासियों ने दूर दराज के क्षेत्रों से उड़कर उन्हें राजमहल की ओर जाते देखा था .राजकुमार जो वास्तव में कहा जाये तो चिड़ियों का ही राजकुमार था ,महल वालों ने तो उसे कभी माना ही नहीं था .पहली रानी को जो भी थोड़ी बहुत आशा बनती थी ,वह भी समय के साथ धूमिल और बाद में धूसरित होती चली गयी थी .राकुमार के लिए जिनके दिलों में सम्मान था वह इन्ही चिड़ियों की देन थी .वे अटूट संख्याओं में आई थीं .और बुर्जों ,छतों ,कंगूरों पर बैठकर पर बैठकर वैसा ही शोर मचा रही थीं जैसे अपने अण्डों की ओर बढ़ते हुए किसी जहरीले सर्प को देख लिया हो .महल के बाहर बैठे उस बुजुर्ग ने यह सनद की कि आखिरी बार चिड़ियों के लोकगीत का वह आखिरी इंसान मर गया .और जहाँ ‘’मर गया’’ लिखा था ,उसे काटकर बनाया कि ‘’मार दिया गया ‘’


२ .सन्दर्भ ;-राजा का तमाचा
प्रसंग ;-उस दिन जब दूसरी रानी धुप अगरबत्ती की थाली ले के जा रहीं थीं तो अचानक राजा ने थप्पड़ क्यों मारा था !वे चाहते तो बुलाकर थोडा सा सम्मानित तरीके से दरियाफ्त कर सकते थें .टोना टोटका का प्रश्न उनके लिए उतना अहम् नही था .अगर होता तो वे पहले मर्तबा ही गुस्सा हो गए होतें .पहली रानी उनपर कई बार दबाव बना चुकी थीं .उस दिन आखिर इतना हाई टेम्पर की उत्पत्ति कैसे हुई थी ?तो साहब बता दूँ कि  यह सब पहली रानी की वजह से हुआ था .उस रात राजा भोजन के बाद राजा देर तक रानी से बात करती रहीं .वे राजकुमार के अजीबोगरीब व्यवहार और उसमे होने वाले अपेक्षित परिवर्तनो के संभावना के बारे में बात करने लगी थे .यही से बात राजपुरोहित के माथे पर पाए जाने वाले सिंदूर के बारे में और उस सिंदूर के नमूने का बल्वागढ़ के सिन्दूर से मैच कर जाने की बात पर पहुच गयी .राजा चौक कर पहली रानी की ओर देखने लगे थे .ऐसा है क्या ?राजा के मुंह से सुनते ही पहली रानी के बात के पंख खुल गए .उन्होंने यह भी जोड़ा कि कई बार राजपुरोहित की देंह से उस इत्र की खुशबू आती है ,जो दूसरी रानी विशेष रूप से मंगाती हैं .ऐसा है क्या ?इस बार यह कहते हुए जबड़े पर अधिक बल पद गए .पहली रानी को यह सही समय लगा और उसने उड़ान भर दी .तीसरी बात जोड़ी कि हुजुर !पुरोहित के कमरे से दूसरी रानी के झुमके तक मिले .उनके घर में झाड़ू लगाने गयी एक दासी से मैंने मालूम किया था .इस बार राजा कुछ नहीं बोले.बहुत गंभीर सन्नाटे में डूब गए थे .और ठीक उसी सुबह उनकी भेंट दूसरी रानी से हो गयी थी .और .............................

३;-सन्दर्भ ;-एक गौण कथा जो इस दौड़ में पीछे छुट गयी थी

अच्छा उस अराजकुमार का क्या हुआ था .जो कहानी और ईश्वर के हिसाब से राज महल का खून था .और जो जंगलों की धूल फांक रहा था .तो साहेब वह नंबर एक का आलसी निकला था .इतना निर्मम निकला था कि अगर वह राजकुमार होता तो सबसे पहले अपने पिता यानी राजा को ही हलाल कर देता .कई बार वह अपने बाप के सीने पर चढ़ जाता .और हंडिया के नशे में यहाँ वहां घूमता रहता था .और वह कबीलों से गुजरते हुए चिल्लाते हुए जाता कि सालों !तुम लोगों को क्या मालुम मैं राजा हूँ !राजा !....और किसी सुकुमारी को देखता तो कहता कि तुम मेरी रानी हो .इस तरह से वह बिगडैल ,निकम्मा और गैरजिम्मेदार निकला ..एक दिन जब सूरज डूब रहा था .नशे में झूमता वह घर आया .और बाप से लड़ बैठा .उसने चूल्हे के ऊपर रखी हुई हांडी उठाई और दे मारी .बाप के सर से खून रिसता रहा .रिसता रहा ....रिसता रहा ....मां दौड़ते हुए आई थी  .उसने वही हांड़ी उसके सर पर दे मारी .खून दुगुने अनुपात में रिसता रहा .....रिसता रहा .........और रिसता रहा .और इससे पहले कि वह कहानी से बाहर लेखक के पैर तक आ जाये .लेखक उस झोपड़ी के दरवाजे से कापी कलम ले कर बाहर आ गया .

४ ;-सन्दर्भ ;-क्या दूसरी रानी को सचमुच हलाल किया गया ? 

रानी को कैद कर के जब सेनापति और दो सैनिक बाहर निकलें तब बाहर प्रजा की बहुत भीड़ थी .उस भीड़ ने उसे आगे जाने से रोक दिया था .राजा के लिए जनता के दिल में चाहें जो जगह रही हो , दूसरी रानी उनके लिए आस्था का प्रश्न थीं | भीड़ शांत हो गयी थी | मामले को आगे बढ़कर राज पुरोहित ने कंधे पर ले लिया था .बाद में भीड़ का ताप ठंडा होता चला गया था .प्रजा समझ गयी थी कि रानी का पुनः महल में लौट जाना ठीक नहीं .इन्हें हलाल होने के लिया जंगल में ही जाना श्रेयस्कर है .और बीच जंगल में जाते हुए उसने कुछ आदमियों को दो शव ले जाते हुए देखा .एक स्त्री थी .दूजा पुरुष का था .दोनों के सर से रिसता हुआ खून अब एक बहुत काले थक्के में बदल गया था .राज पुरोहित ने उन शवों को ढो रहे लोगों से बात की .मुद्रा गिनी .और बस कथा पूर्णविराम की और बढ़ चली .

दूसरी रानी को एक पेंड की आड़ में ले जाकर राज पुरोहित ने देर तक चूमा .उस सघन चुम्बन में हुआ क्या कि राज पुरोहित के माथे का बाल सिन्दूर से लगता गया .लगता गया .और वही थोड़ी दूर पर सिपाहियों ने हलाल का कार्यक्रम आरम्भ कर दिया था .और उन दो लाशों को वही दफ़न कर दिया गया .

५ ;-वह हवा हरामजादी सचमुच थी ?

उस दिन जब थक कर ईश्वर सो गया था .और लेखक और पाठकों ने सोचा कि वह अब नहीं आयेगा ,गलत सोचा था .सोना दरसल उसकी योजना में था .उसने वह सारे कम सपने में किया .वह समय जब राजा मरने मारने को लेकर दोहमस में थे .तब वह फुसफुसाहट कहाँ से आई .ऐसे ही थोड़े ही चली आई थी .वह ईश्वर के सपने से निकलकर इसी काम के लिए आई थी .वह बहुत गहरी नीद में चल रही ईश्वर की आत्मा थी .और आप क्या समझते हैं ? नर्तकियों के कार्यक्रम में इतनी खुलकर गालियाँ क्या पहली रानी ने दिया था .कुछ भी हो पहली रानी को इतना पता था कि सामाजिकता क्या चीज होती है .और समय कितना महत्वपूर्ण होता है .कब क्या कैसे करना चाहिए  .भरी महफ़िल में गालियाँ एक पागल ही दे सकता है .और पहली रानी आप जानते हैं कि बेहद समझदार थीं .और कथा में ईश्वर का सोना बस एक नाटक था .

६ ;-राज्य का क्या हुआ ?   

होना क्या था ? बस राजा के नाश होते ही दूसरी रानी लौट आई थी .और साथ में अराजकुमार भी था .राज पुरोहित और दूसरी रानी का सम्बन्ध , अवैध ही बना रहा .रानी सावित्री ही बनी रहीं .वे आजीवन विवाह नहीं कर पाए .और उनका व्यापार चलने और बाधित नहीं होने देने के लिए और राजा बनाने के लिए अराजकुमार से बढ़कर अयोग्य पुरुष पूरे राज्य में नहीं था .इस असम्भव कार्य के पूरा करने के लिए दूसरी रानी ने मोर्चा लिया और बहुत धर्मान्धों के लिए उनकी बात मान जाना बहुत आसान था .अराजकुमार दिन रात मदिरा पीता  ,बेहोश रहता .बहुत हुआ तो हरम में चला जाता .साले को किसी दिन बहुत जल्दी मर जाना था . और आगे किसे राजा बनाना है ,दूसरी रानी तय कर देती .कही साल दो साल के लिए तीर्थ पर निकल लेती .और किसी अपने से लगते बच्चे को ले आती और युवराज बना देती .या फिर कुछ भी जो उसे अच्छा लगता करती .

                     हाँ !इस कथा में ईश्वर को खूब फायदा हुआ था .उसके मंदिरों की संख्या में खूब वृद्धि हुई .बहुत सारे लोग भक्त बने .बनाये गए .हवं पूजा और चढ़ावा चढ़ता रहा .और ठीक ईश्वर के बाद दूसरी रानी के जयकारे लगने लगे थे .ईश्वर भी खुश .और इधर बीच रानी के सपनों में खूब आने लगा था .इस तरह से मुझे लगता है कि अब कहानी को ख़त्म ही कर देना चाहिए .लेकिन अंत में दो मिनट और ..........फिर आप पात्रों से भी मिल लें .


७ ;-गृहकार्य अर्थात कहानी के हिट होने पर पार्ट २ की संभावना

अराजकुमार कौन था ? राज महल से उसका सम्बन्ध क्या था ?यह नास्तिको के लिए प्रश्न है .और आस्तिक पाठक तो जानते ही है कि सब ईश्वर की कृपा से हुआ.सब उस पानी के कारण से हुआ था .तो मैं उनके आस्था पर चोट नही पहुचाना चाहता .

 

(आ जाओ लड़कों और लड़कियों   ! अरे ईश्वर ! अरे ओ ईश्वर ! रे साले ईश्वर .....बहरहाल वह अभी तक सो रहा है ......सबसे बड़ी शिकायत तीसरी और चौथी रानी के रोल को अदा कर रही हेमा और निशा की थी .उन दोनों का कहना था कि अरविन्द !जब तुम्हे मुझसे कुछ काम ही नहीं करवाना  था ,तब काहे बुला लिया.बेवजह बैठाये रखा .और ये घुंघट !जानते हो मेरा चेहरा तक नहीं दिख रहा था .मैं जब सिमटी तो जोर से सिमटना पडा .कि लोगों को मेरी हरकतें दिखे .इतनी देर में मैं ....तुम्हे क्या बताऊँ? कूल !कूल!कूल!अब मैं क्या कहूँ ...मान लो तुम्हारी जरुरत पड़ ही जाती तो...अगली बार के लिए तुम लोगों के लिए लीड रोल है  .कहानी को हीट तो होने दो .....अबे साले बेहुदे ये भी कोई कहानी है....सड़ी हुई .. !अरे यह तो अराजकुमार है .और सचमुच साला कमीना है .उसने मेरे होंठों से सिगरेट लपक ली है .ये बता कि साले कोई अच्छी दारू तुम्हे नहीं मिली .देख पचास फीट से मुंह महक रहा है .पहली रानी यानी मिस निकिता जो इस दारुबाज की प्रेमिका है ,हंस पड़ी .....निकिता इसे संभालो !साला अभी तक लडखडा रहा है ......दूसरी रानी यानी सांवली -सलोनी नेहा अभी तक चरित्र के अन्दर है और अमन द्वारा जोर से चूम लिए जाने पर थोड़ा नाराज भी है ...सो मैंने उसे एक गर्म चाय पहुंचवा दी है ,अनिकेत यानि राजकुमार बाहर रिचार्ज करवाने गया है .राजा पेप्सी लाने गया है .राज पुरोहित यानी अमन वहां बेसिन पर सिंदूर छुडाने में व्यस्त है .और कहानी का हीरो अरे वही साला लंगोटिया रामनिहोर अभी सो रहा है .....अबे ईश्वर ....अरे साले इश्वर .....अबे रामनिहोर ...सॉरी पाठकों!! वह नही सुन पा रहा है .).




               
परिचय और संपर्क

अरविन्द                      
      
उम्र – २६ वर्ष
      
बी.एच.यू. से पढाई-लिखाई
      
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित

कहीं भी छपने वाली यह पहली कहानी
       
सम्प्रति – प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक

चंदौली , उ.प्र.
      
मो. न. - 07376844005





                  

2 टिप्‍पणियां:

  1. जादुई और अनूठी -शिल्प भी,कथ्य भी.......शैलेन्द्र सिंह राठौर

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  2. बहुत दिनों बाद कोई कहानी पढ़ा अभी तक ऐसी कोई कहानी नहीं पढ़ा था अद्भुत !!बधाई अरविन्द जी

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