शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

विपिन चौधरी की कवितायें

                                 विपिन चौधरी 



विपिन चौधरी को आप सिताब दियारा ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुके हैं | यह कहते हुए ख़ुशी हो रही है कि उनकी रचनाएं जब भी इस ब्लॉग पर आयी हैं , उन्हें पाठकों का भरपूर प्यार और समर्थन मिला है | इस बार वे अपनी कुछ छोटी , किन्तु उतनी ही मारक कविताओं के साथ सिताब दियारा ब्लॉग पर उपस्थित हो रही हैं | इन कविताओं में इस युवा कवयित्री की प्रौढ़ता तो दिखाई देती ही है , उनमे होने वाला वांछित अपेक्षित विकास भी दिखाई देता है |  


         प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर विपिन चौधरी की कवितायें
                                 
बरसों से ज़मी हुयी उदासी  
खुरचखुरच कर उतार दी मैंने  
उसके ठीक नीचे साफ़शीतल ख़ुशी 
अपनी रौ में बहे चली जा रही थी  

 
लौटते हुए पतझड़ को 
आँख दर आँख  देखने की जुगत में   
मेरे भीतर की सभी कोशिकाये उदासी में नहा उठी हैं  

कल जब से मैंने अपने भूतकाल की गठरी 
उठा कर एक ओर रख दी है 
भविष्य का मोतियाबिंद खुद - -खुद ठीक हो गया  है 

तीर्थ यात्राओं में ढेरों मूर्तियों के चरण रज लेने के बाद ही मैं 
जान सकी कि ये चाँद-सूरजतारे भी आशीर्वाद देने का दम रखा करते हैं  

एक प्यास मेरे गले तक आकरवापिस लौट गयी 
उसने कई लठैतो को मेरी ओर आते हुए देख लिया था  

इन मजबूत रातों का शुक्रिया कैसे अदा करू
जो मेरी उदास शामों की अर्थी को अपना कन्धा दिया करती हैं  

पूरी रात जागते हुए तुम्हे याद किया 
और सपने में आज की तय मुलाकात एक फिर 'मिसहो गयी  

एक घोंसले में गौरया अंडे से रही है 
बगल की डाली पर चिड़ा एक पालना तैयार कर रहा है 
प्रकृति की इस अनगढ़ नैसर्गिकता पर मैं और कुछ कहना  नहीं चाहती 

आजकल मैं चीटियों के पदचिन्ह तलाशती रहती हूँ 
कि मीठेपन की बैचनी से तलाश है मुझे 

10 
उम्मीद का एक ताज़ा सिक्का रोज़ 
दिन के गुल्लक में डालती हूँ 
फिर भी यह कभी भरता नहीं दिखता 

11 
क्या मेरी नीदं में एक ऐसी सुबह कभी होगी 
जब मैं खिड़की खोलू और  नंगे पाँव कूड़ा बीनता कोई 
आपका अक्स  उकेरे  

12 
पाँव तले रौंदी हुई घास 
बगल की दूधमुंही कोपल से कुछ उम्मीद लगा बैठी है 
तो इसमे बुरा क्या है ? 

13 
ख़ुशी के पहाड़ पर  
जिस दिन मैं दुःख का परचम फहराउंगी 
उसी दिन ख़ुशी का यह अभिमानी ग्लेशियर पिघल उठेगा 

14 
वह दिन भर खेतों में गेहूं की कटाई करती थी  
उसे पूरा हक था कि वह 
रात को अपनी सूनी कलाईयों में धानी चूड़ियाँ पहने 

15 
मैं उस खुश-खबरी का क्या करू 
जो मेरे मुहं पर बड़ा सा ताला लगा कर घूमने चली गयी है 

16 
जिस रास्ते पर चल कर मैं उससे जा मिलूंगी उसी रास्ते से वापिस लौट भी आऊँगी 
ऐसा तो मैंने कभी सोचा नहीं था 

17 
यह जो रात है 
मुझसे मेरी सांझ का पता पूछती है 
एक मैं हूँ जो इन दोनों को एकदूसरे से दूर रखना चाहती हूँ 

18 
तुम्हारा सारा समय 
बंधनों वाले रिश्तों के लिये हैं 
पर मेरा-तुम्हरा रिश्ता तो 'आजादीका है  

19 
कुछ भी कहो,  मैं सहर्ष मान लूंगी 
पर प्लीज़ अबकी बार भी चुप्पी के बड़े से पुतले को अपने साथ मत ले लाना 
20 
इस प्रेम में कुछ भी नया नहीं था 
दोनों तरफ  से उठती हुयी नयी उम्मीदों की लौ के  सिवा
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दो ....

चिंताखुशीदुःख 

एक देश अपनी धरती पर बम गिरने के बाद
हुए नुकसान को दर्ज करने में जुटा हुआ है 
दूसरे देश का विदेश मंत्री ख़ुशी-ख़ुशी परमाणु संधि पर हस्ताक्षर कर रहा है

इधर मेरे दिन
पालक-पनीर का स्वाद चखने-परखने में ही 
स्वाहा हो रहे हैं

मेरे दुखों की दिशा दूसरी है
ख़ुशी की दूसरी 
दुःख है कि
अपनी देह के भीतर
अरबों-खरबों कोशिकाओं को दम तोडते नहीं देख पा रही हूं

खुश हूँ 
आज सुबह ही ‘न्यू अराइवल” ब्रांड ने 
फालसा रंग के एकदम नए शेड की
लिपस्टिक बाज़ार में आने की खबर दी है

मिलान कर रही हूं
इस हेयर पिन का
अपनी खरीदी हुई नई ड्रेस से

मेरी चिंता के आवर्त में चींटियों का वह समूह है जो
आज रात फिर मेरे बिस्तर पर चढ आयेगा
ये सारे सबूत 
इस दुनिया में जमे रहने की गवाही दे रहे  हैं 
कोई मुझे दुनिया से अलग ना समझे 



परिचय और संपर्क      

विपिन चौधरी

कवयित्री और कथाकार
जन्म- २ अप्रैल १९७६ , भिवानी (हरियाणा) में
दो कविता संग्रह प्रकाशित
कुछ कहानिया और लेख भी पत्र-पत्रिकाओं , तथा नेट-पत्रिकाओं में प्रकाशित
सम्प्रति – मानव अधिकारों को समर्पित स्वयं सेवी संस्था का संचालन
            


7 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी लघुता में विराट भावनाओं को समेटे हुए हम तक पहुँचती संवेदनशील रचनायें!

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  2. chhoti chhoti kavitaaon men gajab ki samvedana hai.vipin kee kavitaayen waakaee apnee praudhata men dikhayi padti hain. badhaaee. ewam sitabdiyara ka abar.

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(3-8-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  4. विपिन की कविताओं में एक जबरदस्त सम्मोहन है जो कम से कम मेरे जैसे कविता के पाठक को तो अपनी गिरफ़्त में पूरी तरह जकड़ लेता है और मैं बहुत देर तक कविताओं के आसपास मंडराता रहता हूँ, उनसे दूर होना हो ही नहीं पाता…

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  5. बड़ी आसानी से कही गई बातें, पर बहुत मुश्किल भी। बहुत अच्छा लगा।

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  6. बहुत खूबसूरती से कही है कविता में अपनी बात. गागर में सागर . पहली बार पढ़ा आपको.
    बधाई

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