रविवार, 14 जुलाई 2013

अनुज कुमार की लम्बी कविता - 'स्त्री कोलाज'

                                  अनुज कुमार 




अनुज कुमार की यह ‘ कविता : स्त्री कोलाज ’ समाज के आधे हिस्से हकीकत को बड़ी साफगोई और ईमानदारी से व्यक्त करती है | इसमें समाज द्वारा रची गयी साजिश का पर्दाफाश तो है ही , उससे मुक्त होने और बाहर निकलने की छटपटाहट भी देखी जा सकती है | अच्छी बात यह कि अनुज यह सब लिखते समय कविता की भाषा को कभी नहीं चूकते , जबकि ऐसे आवेग और गुस्से में उसके छूट जाने का ख़तरा सदा ही बना रहता है |
                                           

प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर युवा कवि अनुज कुमार की यह ‘कविता – स्त्री कोलाज’ |
                                    


                कविता : स्त्री-कोलाज  

एक  

वह सुबह का भूला नहीं,
सुबह का निकला,
शाम को आनेवाले प्रजाति में से था,
जिसकी आँखों की चमक को दीमक खाए जा रहा था,

वह घर की मुर्गी नहीं,
घर की सूत्रधार थी, 
जो पति के आँखों की चमक के लिए किया करती थी साफ,
घर भर का चेहरा,
जीवन भर पोंछ-पांछ करती रही,
कुछ तो था जो साफ होने को बाकी था.
बच्चों का आना भी शायद जिसे उजला धूसर न कर पाया.

दो

वह किसी को न छोड़ती,
जो मिलता उसे खिला-पिला के ही दम लेती,
जब लोग अघा जाते,
तो उस विधवा पर तरस खा चूक जाते देने से आशीर्वाद,
विधवा थी कि उसे कुछ सूझता न था, वह करे तो क्या करे,
कि जिस घर गई थी वह, उस घर के कमाऊपूत को लील गई,
अब भाई के पास रहती है,
इतना बड़ा दिल है भाई का,
कि सारा घर अब विधवा बहन संभालती है.



                    
तीन

दाढ़ी-मूँछे, छातियों, शिराओं में बहते खून के ठीक बढ़ने के दिनों में,
स्कूल की टन-टन के बाद,
खाली बेंचो पर बैठ उसने झेंपते लड़के की पप्पी ली,
इतनी सिहरी कि तीस साल हुए.
आज भी सिहर जाती है वह.
लड़का इश्क की सिहरन की दुनिया से कोसो दूर, दो बच्चों का बाप है,
सिहरी हुई लड़की उस पल को सोचकर आज भी सिहर जाती है.    .


चार

शराब को सौतन मानने वाली औरतें,
शायद उन औरतों से अलग होती हैं, जो अपना सीना उघाड़े,
बोतलों के साथ तस्वीरों में नज़र आती हैं,
या कि किसी अंडरवियर पहिने, बनियान पर हाँथ फेरते पुरुष
के साथ सटी औरतें अलग होती हैं,
या ऐसा भी तो हो सकता हैं,
कि कोई फर्क ही न हो,
महज़ इसका कि....
एक घर से निकल बाज़ार का शिकार हुई.
और दूसरी घर का. 



पांच

वह पूछता है, तुम सजती क्यों हो,
वह कहती है, अच्छा लगता है,
वह उसे कोस्मेटिक उद्योग का हवाला देता है,
वह हँस देती है,
वह पूछती है मैं मोटी तो नहीं,
वह उसे मशीनों, दवाइयों का हवाला देता है,
वह हँस देती है,
वह पूछती है आप बाल क्यों नहीं उगाते,
वह उसे बाल उगानें के दर्जनों शिशियों का हवाला देता है,
वह हँस देती है.
वह जब भी पूछती है कुछ, वह बाजार की ओर कर देता है अंगुली,
वह हँस देती है.
वह बोलता है, उसकी बीबी बहुत सीधी है,
अभी सीखना है उसे विज्ञापनों में छपी औरतों की तरह
बाज़ार का व्याकरण.
तमाम ऐबों से भरे बाज़ार में ही ढूँढना है उसे
अपनी आजादी और बराबरी की चाभी..
बाज़ार से होते हुए बाज़ार से मुक्त होना है.

छः   

पोल्गा फ्रॉक पहनी वह लड़की,
आँगन में,  
ठोड़ी के नीचे हाथ रखे,
पांवों को क्रिस-क्रॉस किये हुए...
बेखटक देख रही है चुगती मुर्गी को,
मुर्गी के एक साथ चुगने और सचेत रहने,
से शायद जुड़ा हो उसका भविष्य.
या कि वह दाल बराबर होने से करेगी विद्रोह,
इसका निर्धारण होने में एक मुश्त उम्र है बाकी,
फिलहाल एकटटके उसका मुर्गी को देखना
एक मोहक तस्वीर के क़ैद में होने की मांग करता है.





सात   

धान-तीसी कूटती औरतें,
गा रहीं हैं बारहमासा,
लग रहें हैं सुरों पर आक्षेप
आरोह-अवरोह भी पिसे जा रहे हैं
कोई कहीं से उठा कहीं भी कर रहा है ख़त्म,
न मुखड़ा, न अन्तरा, न बंदिश कोई,
फिर फ़ज़ा में जो बिखरी है मिठास
वह बारहमासा नहीं तो और क्या है ? .

आठ  

वह पैरानोइड स्किज़ोफेर्निया की शिकार नहीं,     
जो कि कहते हैं उम्र के साथ बढ़ती जाती है,
सम्मोहन के साथ उलजुलूल बातें भी होती हैं जिनमें शामिल
सुनते हैं,
पहाड़ जब उजाड़ हुआ तो दिल्ली धकेल दी गई. 
तब से...
शाम होते करती है घर साफ,
खोल देती है खिड़की और दरवाज़े.
रख देती है दो गिलास दूध,
संशय मिश्रित झिझक से पूछती है...
आपके बच्चे वापसे आये?
पता नहीं, मेरे रास्ता भूल गए हैं,
खुदा जाने कहाँ रह गए,
मिले तो कहना उनके इंतज़ार में है उनका दूध.

नौ

बटन टाँकती औरतें,
कम हो गयी हैं शायद,
अब तो फिल्मों में भी नहीं दिखतीं,
वे अभिनेत्रियाँ, जो,
अपनी शिकायत, चुभों के जताती थीं,

दरअसल,
बटन टाँकती औरतें,
टाँक देती थी अपना प्रेम भी,
आखिर में दो चार बार धागा घुमा,
कसके लागाती थी गाँठ,
ऐसी कि मनमुटवल को कर लेनी पड़ती थी खुदखुशी,

चलिए,
खुशफहमी में ही सही,
मैं जी लूँगा,
कि बची हैं अभी भी बटन टाँकती औरतें.



दस   

वह भोर से पहिले जाती हैं दिशा,
बतियाते-आते निहार आती हैं अपना खेत,
घर के काज सैंत,
हो लेती हैं अपने मरद के पीछे,
रोपती हैं धान,
बकरियों का जोड़ती हैं घास,
फसल की कटनी-दौनी में होती हैं शरीक,
औसतन, घर से खेत तक करती हैं मजूरी,
बस घर उनका नहीं होता, न ही खेत होते हैं उनके नाम,
वे बटईया मजूर की तरह होती हैं.



ग्यारह

“तनी सा जींस ढीला करा, ढीला करा, ढीला करा”
पर हवा में घूँसा चला रहे हैं छटाक से बच्चे,
जिन्हें देख माएँ खूब खुश,
कि उनके लला हो गए हैं पूरा रंगरेज,
अभी से पुरुष के सारे गुण समा गए हैं,
कि जब होंगे बड़े,
तो खूब धोयेंगे अपनी बीबी को,
सीधा रखेंगे,
कि क्या मजाल की सास-ननद की पेशानी पर पड़ जाए एक भी बल,

हमारे प्रधानमन्त्री अपने जोड़ीदारों के साथ,
बनाते रहंगे कानून पर कानून,
बाल-विवाह उन्मूलन, बाल-श्रम, स्त्री-शिक्षा,
बहुत होगा तो दो-एक को पकड़ बजेगा डंडा.
फिर बजेगा खूब जोर  “लोलीपॉप लागेलू”
और घंटा बदलेगा कुछ.




बारह

डर के घर करने को ज़रूरी नहीं सरका दे कोई नीचे की धरती, 
मसलन,
यह ज़रूरी नहीं,
कि सतर्क रहने को रोज़ बाँचा जाए अखबार,
पर्स में रखा जाए चाकू या स्प्रे,  
किया जाए ईव टीस,
जला दिया जाए चेहरा,
काट दी जाए छातियाँ,
भांग दी जाए योनि,
निकाल ली जाएँ अंतड़ियां और सुनाया जाए विजयनाद.

खौफज़दा करने को ऐसे हादसे ज़रूरी नहीं...
कि मुझे सकते में लाने को काफी है एक सुई की नोक सी घटना
मसलन,
दरवाज़े का खटखटाना,
खिड़की के नीचे लड़कों का जमा होना,
राह-चलते किसी का हॉर्न बजाना,
बस के लिए क़तार में खड़े होना, 
किसी रिश्तेदार का अकेले यूँ ही आ जाना,
रात का बेतरतीब स्याह होना,
अपनी ख्वाहिशों का बेतरह उमड़ना.

बहुत ज़रूरी तो नहीं कि इस वहशियाने माहौल में,
औरत की हड्डियाँ कंपाने को घटे कोई बड़ी घटना.



परिचय और संपर्क

अनुज कुमार
जन्म स्थान - मुजफ्फरपुर, बिहार
जन्म तिथि - 22 जून 1979
हैदराबाद विश्वविद्यालय से उच्च-शिक्षा
सम्प्रति – उत्तर पूर्व में शिक्षक                    

                                                                                                











1 टिप्पणी:

  1. जमीन से जुडी औरतों पर गंभीर कविता जो हवाई नारे लगाती -फैशनेबल औरतों से अलग घर परिवार की समस्याओं में जीती हैं.

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