रविवार, 3 जून 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय का संस्मरण -- पांचवी किश्त


                                 
                                विमल चन्द्र पाण्डेय 

पिछली किश्त में आपने पढ़ा कि यू.एन.आई. में नौकरी कर रहे विमल चन्द्र पाण्डेय का सामना इलाहाबाद के उस पत्रकारिता जगत से होता है , जो न सिर्फ उनकी संस्था का मजाक उड़ाता हैं , वरन लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ का ऐसा चेहरा भी प्रस्तुत करता हैं , जिसमे कोई भी संवेदनशील और प्रतिबद्ध पत्रकार हताश होकर टूट और बिखर सकता है | ऐसे में विमल चन्द्र पाण्डेय की साहित्यिक रूचियाँ और मित्रताएं उनके साथ खड़ी होती हैं और उस गलीज माहौल के बीच भी कुछ सार्थक करने की प्रेरणा बनती दिखाई देती हैं | .....और फिर आगे .....

       
                        प्रस्तुत है विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                शहरों से प्यार वाया इलाहाबाद - मेरी जिंदगी के सबसे उपजाऊ साल 
                                    की पांचवी किश्त 

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मैं पहली बार शेषनाथ के कहने पर उसके कमरे पर गया और फिर बार-बार मेरा मन उसके यहाँ जाने को करने लगा | हम किताबों की, कहानियों की और पूरी दुनिया की बातें करते , जिसका अच्छा खासा हिस्सा युवा लेखिकाएं घेरतीं | शेषनाथ गज़ब का साहित्य प्रेमी था और इस चक्कर में कथाकुम्भ में कोलकाता और कथाक्रम में लखनऊ तक के चक्कर काट चुका था | मुझे उसकी बातें और साहित्यिक दुनिया की ख़बरें सुनना अच्छा लगता | उसका साहित्य अध्ययन भी मुझसे काफ़ी अच्छा और विषद था इसलिए उससे बहुत ज्ञानवर्धन भी होता | वह अपने रूम पार्टनर और भाई साहब को भी साहित्य पढ़ने को प्रेरित करता रहता लेकिन उनका कहना था कि वह वहाँ तैयारी करने आये हैं, वक्त बर्बाद करने नहीं | हालाँकि ये आंशिक रूप से सच था | वह और उसके बड़े भाई जितना ध्यान पढ़ाई पर लगाते उससे थोड़ा अधिक ही ध्यान खाने पर लगाया जाता और मुझे ये देख कर आश्चर्य होता कि पढ़ाई के घंटों से थोड़ा बहुत समझौता वे शायद स्वीकार कर लेते लेकिन खाने के मेन्यू से रत्ती भर समझौता उन्हें बर्दाश्त नहीं था | खाने में सुबह भात और रोटी के साथ दाल और सब्जी दोनों रहती और पेट पर उपकार करते हुए सलाद का विकल्प भी लगभग हमेशा ही रखा जाता | मैंने देखा था कि तैयारी करने वाले लड़के अक्सर भात और रोटी में से एक चीज ही बनाया करते थे और उसमे भी भात को ही तरजीह दी जाती थी क्योंकि उसे एक बार रखने के बाद सीधे उतारने के लिए उठना होता था | लेकिन इन दोनों का भोजन देख कर मैं सुखद आश्चर्य से भर उठता था | उस पर तुर्रा ये कि मुझे खिलाते वक्त दोनों भाई इतना मनुहार करते कि मैं सोचने लगता कि अपनी ससुराल में भी मेरा इतना स्वागत होगा या नहीं | जब मैं खाकर उठता तो मेरा पेट गले तक भर चुका होता और मैं बात करने कि स्थिति में नहीं होता था | मैं बिस्तर पर गिरने के कुछ ही मिनटों बाद  शेषनाथ से साहित्य की चर्चाएँ करते-करते सुप्तावस्था में जाने लगता | हम अमरकांत, स्वदेश दीपक, निर्मल वर्मा, नीलाक्षी सिंह से लेकर न जाने किन-किन- साहित्यकारों की रचनाओं और उनकी जिंदगियों के बारे में चर्चा करते | मैं कुछ देर तक हामी भरता फिर उंघने लगता | मामला हद से तब गुजरता ,जब मैं खर्राटे भरने लगता | शेषनाथ समझ जाता कि आज के लिए काफ़ी हो गया | वह भी करवट बदल कर सो जाता |


चैन की लंबी नींद लेने के बाद जब मैं उस कमरे में पहली बार उठा तो ये वो कमरा नहीं था जहाँ मैं सोया था | जहाँ रात को कुछ अश्लील बातें भी हुई थीं और जहाँ तेल मसालों की गंध आ रही थी | मेरी आंखें धीरे धीरे खुलीं तो किसी के मेरे पास जोर से सांसे छोड़ने की आवाज़ आई | मेरी नाक में किसी बढ़िया सुगन्धित अगरबत्ती का धुआं घुसने लगा | मुझे फिर से नींद आने लगी लेकिन मैंने मामला जानने की गरज से अपनी बगल में नज़र घुमाई | शेषनाथ नहा धोकर पूजा पाठ कर, अगरबत्ती दिखा, हाफ पैंट और बनियान में कपालभाति प्राणायाम कर रहा था | उसके चेहरे पर बाबा रामदेव जैसा तेज था और आँखों में श्री मनमोहन सिंह जैसी शांति, मैं झटके से उठ बैठा | उसने साँस लेने और छोड़ने के बीच इशारा किया कि मैं चाहूँ तो थोड़ा और सो सकता हूँ | इस इशारे में मुझे खुद को आलसी और काहिल समझे जाने का अपमानबोध हुआ और मैं फुर्ती से उठ बैठा | मैंने अभी सबसे ज़्यादा बिकने वाले अखबार के पन्ने पलटे ही थे कि शेषनाथ फुर्ती से अपना प्राणायाम खत्म कर उठा और चाय छान कर मेरे सामने रख दिया | मैं बहुत शर्मिंदा था और नियम धरम वाले इन महापुरुषों के कमरे में आकर खुद को उन पर बोझ बना हुआ पा रहा था | अभी मैं चाय पी ही रहा था कि शेषनाथ के रूम पार्टनर और भईया कहीं बाहर से आये और चहकती आवाज़ में मुझसे पूछ बैठे, “अरे बिना मुंहे धोए चाय ?” उनकी आवाज़ इतनी फ्रेश थी कि पता ही नहीं चल रहा था कि उनका सूरज कितना पहले निकला है | मेरी आवाज़ ऐसी थी जैसे नींद के सात पर्दों के पार से आ रही हो | उसी आलस भरी आवाज़ में मैंने जवाब दिया, “मैं तो प्रेशर बनाने के लिए पीता हूँ सुबह चाय , बिना फ्रेश हुए |” मेरी दलील से वह एक बार और खुल कर हँसे और मेरी ओर हिकारत भरी नज़रों से देखते हुए अपने काम में लग गए , यानि सब्जी कौन सी बनेगी, इसकी चर्चा करने लगे |


इस घटना ने मेरा ध्यान फिर से एक बार मेरी बेतरतीब जीवन शैली की तरफ खींचा जिसमें रहने की मुझे ऐसी आदत पड़ गयी थी कि किसी दूसरे के घर ठहरने पर मुझे अपने सोने जागने के समय में खलल पड़ने से ही सबसे ज़्यादा कोफ़्त होती थी | शेषनाथ मेरे लिए नियमित और संतुलित जीवन शैली का प्रेरणा स्रोत बना | मैंने तय किया कि मैं शेषनाथ की नियमित जीवनशैली को आदर्श मान कर अपने बेपटरी हो चुके जीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए कमर कसूंगा | मैंने उसी शाम वहाँ से लौटने के बाद विवेक के साथ एक आकस्मिक मीटिंग की और उसके अनियंत्रित होते जा रहे वजन के लिए उसे गलीच शब्दों में शर्मिंदा किया | कई बार ऐसा किये जाने पर उसके अन्दर का अनुशासित इंसान और पूर्व स्पोर्ट्समैन भी आखिर जाग ही गया और उसने मेरे जोश में जोश मिलाया कि हम लोग इस सोमवार से सुबह जल्दी जागेंगे और सिगरेट शराब जैसी गन्दी चीज़ों के बारे में न सोच कर सुबह सुबह प्राणायाम और आसन करेंगे | मैंने जब विवेक को बताया कि एक ज़माने में मैं योग शिक्षक रह चुका हूँ और शरीर इतना लुंजपुंज होने के बाद भी अभी भी चलते फिरते शीर्षासन जब चाहे कर सकता हूँ तो वह प्रभावित और प्रेरित हुआ | मैंने उसे और प्रभावित करने के लिए अपनी चौकी पर फटाक से शीर्षासन करके दिखा भी दिया जिसमें मुझे दीवार से बाहर निकली आलमारी से हलकी चोट भी लगी जिसे मैंने नज़रंदाज़ कर दिया | हम इस काम को कल से ही शुरू कर सकते थे लेकिन सोमवार का दिन चुनने का मकसद ये था कि अगले २-३ दिनों में हम मानसिक ताकत जुटा लें | सोमवार से बुधवार हम दोनों ने मेरे कमरे पर प्राणायाम और कुछ आसन किये. हमने सुबह की ठंडी हवा के बारे में बातें कीं और उन लोगों को मूर्ख कहा जो सुबह ८-९ बजे तक सोकर इस अमृत को व्यर्थ जाने देते हैं | हम अब तक की अपनी मूर्खता पर भी पछताए कि आज तक देर से जागकर जो अलौकिक अनुभव हमने खोया है उसकी भरपाई कैसे हो सकती है | विवेक ने कहा कि भरपाई तो ऐसे ही होगी कि हम पूरे मन से अपना अनुशासन जारी रखें | सोम मंगल बुध तीन दिन के अनवरत परिश्रम के बाद वृहस्पतिवार को विवेक ने मुझे फोन करके कहा कि वो मेरे कमरे पर नहीं आ सकता और अपने घर पर ही प्राणायाम करेगा क्योंकि उसे तुरंत कुछ काम से बाहर निकलना है | मैंने उसे आश्वस्त किया कि मैं भी अपने कमरे पर ही कर लेता हूँ | जब दूसरे दिन भी उसने ऐसा ही कहा तो मुझे थोड़ा गुस्सा आया और मैं गुस्से में सो गया कि उठ के करूँगा | ५ बजे जागकर फिर से सोने के बाद मेरी नींद सुबह आठ बजे खुली | देर से जागने और अपना अनुशासन भंग होने के कारण मेरा मूड बहुत खराब था | मैं बाहर निकला और शोले की दुकान पर चाय पीने के बाद एक सिगरेट पी और वहीँ अपना चेहरा पानी से धोया ताकि पता ना चले कि मैं अभी उठ कर आ रहा हूँ | चाय पीने के बाद मैं ये सोचता हुआ विवेक के घर की ओर चल पड़ा कि उससे कहूँगा कि मैंने आज दो आसन नए शुरू किये हैं जिन्हें उसे सीखना चाहिए था क्योंकि उससे वजन कम करने में सहायता मिलती है | उसके दरवाज़े को जब दो बार खटखटाने के बाद कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो मैंने वहीँ खड़े-खड़े उसे फोन किया | उसने फोन उठाया और अलसाई आवाज़ में पूछा, “कौन?”
“कौन? साले सो रहे हो क्या अभी?” मेरी गुस्से से भरी आवाज़ सुन कर उसकी आवाज़ अचानक मुस्तैद हो गयी |
 “नहीं यार जगे हैं. कहाँ हो?”
“तुम्हारे दरवाज़े के सामने, खोलो फट से | ”


उसने दरवाज़ा खोला | वह लोवर और बनियान में था और उसके बाल खौरहे कुत्ते की तरह बिखरे थे | कुत्ते का संबोधन हमें बहुत पसंद था और हम अक्सर कुछ परिस्थितियों के लिए इसका प्रयोग करते थे | उसने मेरी ओर देखा और शर्मिंदा हुआ | मैंने अन्दर जाते ही एक लंबी साँस ली और कहा कि आज मौसम बहुत अच्छा है | वह और शर्मिंदा हुआ | मैंने उसे बताया कि आज मैंने दो आसन ज़्यादा किये हैं तो वह थोड़ा और शर्मिंदा हुआ | मैंने कहा कि कोई नियम बनाना कठिन नहीं है, कठिन उसका पालन करना होता है | उसने कहा कि कल शाम से उसे जुकाम की समस्या है जिसके बाद उसे थोड़ा बुखार भी हो गया था, इसी कारण उठने में देर हो गयी | चूँकि हमारी दोस्ती नयी-नयी थी इसलिए मैं समझ नहीं पाया कि ये उसका बहुत पुराना और घिसा-पिटा बहाना है | मैंने एकाध और दर्शन परोसने के बाद उसे बता दिया कि दरअसल आज मेरी भी नींद देर से खुली है | उसके सीने से बहुत बड़ा बोझ उतर गया और उसने मुझे मक्कारी का आरोप देते हुए एकाध गालियाँ दीं और खुशी में मुझे बिठा कर ऊपर खुद चाय बनाने चला गया |


अपनी असफलता का गम किसी साथी की असफलता से मिलकर अकसर एक दार्शनिक आह्लाद में बदल जाता है |
                                  
                                     8...



शायद ऐसे कुछ असफल प्रयास ही इसके पीछे रहे हों कि हमने अपनी इच्छाशक्ति को बाकायदा जांचने के लिए एक बड़ा और बोल्ड निर्णय लिया | मेरे लिए ख़ास तौर से मेरे ५०-५२ किलो के शरीर को देखते हुए ये एक कठिन और दुस्साहसी निर्णय था | मैंने और विवेक ने अर्बेन्द्र को इतने अच्छे से कन्विंस किया कि वो भी इसमें हमारे साथ आ गया | हमें सुबह ५ बजे जागकर साढ़े पांच बजे तक फ्रेश होकर कीडगंज पुलिस चौराहे के पास एक जिम में पहुंचना था जहाँ मुझे सलमान खान की तरह, अर्बेन्द्र को सनी देयोल की तरह बॉडी बनानी थी और विवेक को अपने कमर के आसपास की अतिरिक्त चर्बी से छुटकारा पाना था | जिम के लिए सबसे उत्साहित विवेक था और मैं शारीरिक मेहनत करने से इतना डर रहा था कि मैंने दलील दी कि अगर कोच अच्छा न हो तो कसरत का बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है | इन सस्ते जिमों में प्रशिक्षित ट्रेनर नहीं होते जिसके कारण मैं वहाँ जाने से बचता हूँ | विवेक ने इसकी इतनी अच्छी काट निकाली कि मैं लाजवाब हो गया | उसने बताया कि हम दोनों को ट्रेनर से प्रशिक्षण लेने की ज़रूरत नहीं क्योंकि चूँकि वह स्टेट लेवल का वेटलिफ्टर रह चुका है, कसरत की बारीकियां समझता है | वह हम दोनों के लिए अच्छा कोच साबित होगा | वह वेटलिफ्टिंग में अपने राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुका था और करियर के एक अच्छे मोड़ पर उसने वेटलिफ्टिंग को तब अलविदा कह दिया था जब उसके कोच ने कहा कि इसके आगे के लेवल पर जाने के लिए उसे चिकन और मटन को अपने डाईट में शामिल करना होगा | हालाँकि मुझसे परिचय होने के बाद ,जब मैं उसके लिए माँसाहार अपनाने की प्रेरणा बना तो उसने इस बात पर दुख प्रकट किया कि अगर मैं उसे पहले मिल गया होता तो आज वह राष्ट्रीय स्तर का वेटलिफ्टर होता |


वह हम दोनों के लिए एक जालिम कोच साबित हुआ | जिम में जाने के बाद वह जैसे ही हमारी ओर हमें वार्मअप कराने मुड़ता, उसका पूरा व्यक्तित्व बदल जाता | मैं तो वार्मअप में ही थक कर चूर हो जाता | हांफने लगता और मेरे दिल की धडकनें तेज़-तेज़ चलने लगतीं लेकिन वह चेहरे पर एकदम गंभीर भाव लेकर कहता रहता, “हाँ ठीक है, पांच बार और करो, कम ऑन, तीन....गुड...चार.....शाबाश...अबे एक और कम ऑन...अरे यार...” मैं गिर कर ढेर हो जाता | वह व्यंग्य से मुस्करा कर कहता, “बस बाबा, वार्मपे में...कसरत कब करबो ?”


 वार्मअप के बाद मुझमे ज़रा भी हिम्मत नहीं बचती कि मैं उठ के अब प्लेट या डंबलों को हाथ लगाऊं | कभी जोश में मेरे मुँह से एक बार निकल गया था कि मैं अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहता हूँ और अपनी बॉडी को फिट बनाना चाहता हूँ | उसने मेरी इस इच्छा को दिल से लगा लिया था और मेरी बॉडी फिट कराने के लिए कुछ भी करने को तैयार था | हाई स्कूल के दिनों से ही विभिन्न प्रकार के नशों का अभ्यस्त मेरा शरीर आत्मसमर्पण कर चुका था लेकिन विवेक इस मामले में काफ़ी आशावादी था और उसे लगता था कि मैं आलस के कारण ज़्यादा मेहनत करने से कतरा रहा हूँ | अर्बेन्द्र ठेठ देसी आदमी था और मज़बूत शरीर का मलिक था लेकिन कसरत के लिए सबके पैमाने अलग थे | उससे भी विवेक तब तक कसरत कराता जब तक उसके माथे का पसीना पैरों तक नहीं आ जाता | सुबह जागने से अधिक दहशत हमें जिम में जाने से होने लगी | विवेक अन्दर घुसते ही कोई दूसरा इंसान बन जाता और हमारे मज़ाकों पर हमें डांट देता और कहता कि एक्सरसाईज की तरफ मन लगाओ फालतू की बात मत करो | बाहर निकलने के बाद हम फिर से वही पुराने दोस्त बन जाते और लौटते वक्त चाय की जगह मुसम्बी का जूस पीते |
जिम के मालिक की जिम के बगल में ही पेंट की दुकान थी और जिम से एकाध दिन कुछ चप्पलें चोरी हो जाने के बाद वह अपनी दुकान पर बैठा हर भीतर घुसने वाले के पैरों की ओर एक अपमानजनक दृष्टि से देखता रहता | मैंने उस दृष्टि का बहाना लेकर कहा कि मैं अब जिम नहीं जाऊंगा क्योंकि मुझे वहाँ का मलिक नहीं पसंद | एक दिन जिम बंद था और हम जब खुशी खुशी वहाँ से वापस लौट रहे थे तो विवेक ने हमारी खुशियों पर ये कहते हुए पानी फेर दिया कि हमें एडीसी (इलाहाबाद डिग्री कॉलेज) चलना चाहिए क्योंकि वहाँ फील्ड में कसरत करने के कुछ उपकरण लगाये गए हैं | हम एडीसी गए और वहाँ फील्ड की दीवार फांद कर भीतर घुसे | मुझे नहीं मालूम था कि जिम बंद होने पर हमें प्राइमरी स्कूल के बच्चों के स्कूल बंद होने जैसी जो खुशी हुई थी उसकी उम्र सिर्फ़ कुछ पलों की है | विवेक ने उस बड़े मैदान के, जिसमें कम से कम तीन चार टीमें क्रिकेट खेल रही थीं, हम दोनों को ४-५ चक्कर लगवाए और खुद चक दे इंडिया के शाहरुख खान की तरह पीछे से हांक लगाता रहा | हमने हांफते हुए उसे भी दौड़ने को कहा तो उसने कहा कि हम उसे सिखाने की जुर्रत न करें और अपने काम पर ध्यान दें क्योंकि वो तीन मंजिलें चढ़ कर नहीं हांफता | एक कोच के तौर पर वह सिर्फ़ दुखती रगों पर ही हाथ रखता था |


उसका हिसाब किताब ऐसा ही था | वह हमें तो खूब मेहनत कराता और खुद हल्की हल्की जोगिंग करता नज़र आता | जिम में भी वह एक दायें बाएं घूमने वाली मशीन पर बैठ जाता और हिलता रहता जबकि हम उसी समय उसके सामने बीस किलो की प्लेट उठा कर हांफ रहे होते | वह दायें बाएं घूमते ही चिल्लाता रहता, ‘’ऐसे नहीं विमल, ऐसे नहीं, कमर हिले नहीं, बस हाथ हिलना चाहिए. हाँ ठीक और स्थिर रहो |” उसकी इस ऐयाशी पर एकाध मेहनती कसरतबाज धीरे से फुसफुसाये भी, “एका देखो, लड़कन से मेहनत कराय रहा है अउर अपने झूला पर बकइती पेल रहा है.” हमें इस बात से बल मिला कि या तो विवेक खुद भी भारी कसरतें करेगा या फिर हमें कुछ रियायत देगा | लेकिन उसने इस बात को अफवाह की तरह सुना और भूल गया | हमें तो लगा कि उसने सुना ही नहीं लेकिन हम जब कमरे पर जाते वक्त जूस पी रहे थे तो उसने हँसते हुए बताया कि कोई उसे ताना मार रहा था | खैर, हमने एक महीना पूरी मेहनत के साथ जिम किया और आज मैं पूरे विश्वास से कह रहा हूँ कि अगर मैं ६ महीने जिम कर लेता तो मेरा हाथ से निकल चुका शरीर वापस हाथ में आ सकता था | जिम छोड़ने के कारण मुझे याद नहीं हैं और न ही विवेक को याद होंगे | वे इतने निश्चित थे भी नहीं कि उन्हें शब्दों में बताया जा सके | बस मुझे अंतिम हफ्ते का एक दृश्य याद है | मैं अपने हिस्से का बाईसेप्स और चेस्ट करके खड़ा हांफ रहा था और अर्बेन्द्र बीस किलो की प्लेटों के साथ चेस्ट की कसरत कर रहा था | उसे तीसरे राउंड में ये क्रिया बीस बार करनी थी और वह दस की संख्या पर कर चुका था | शुरू में उसने जो क्रिया की उसे हिंदी में काँखना कहते हैं और इस क्रिया का इससे जीवंत उदाहरण मैंने कभी नहीं देखा था | इस क्रिया के बाद अब वह बाकायदा कराह रहा था और अब उसकी कराह इतनी तेज़ हो गयी थी कि कई दयालु कसरतबाज़ अपना काम छोड़ कर उसकी ओर सुहानुभूति भरी नज़रों से देख रहे थे | जिम की गति ठहर गयी थी और अर्बेन्द्र कराहता हुआ कह रहा था कि अब नहीं हो सकता, विवेक उसे तेज़ आवाज़ में प्रेरित कर रहा था कि बस ग्यारह और करने हैं | अगर वह न करे तो फिर कल से जिम आने की ज़रूरत नहीं है | ‘कसरत काहिल लोगों का काम नहीं है’, कहने के बाद उसने मेरी ओर भी जलती नज़रों से देखा जिससे मैं शर्मिंदा हुआ | अर्बेन्द्र ने अपनी परेशानियों का वर्णन करना भी शुरू कर दिया था जिससे वहाँ उपस्थित लोगों की आँखों में आंसू भर नहीं भरे |
“अकेले पूरा खाना बनाना पड़ता है...”
“शाबास...तेरह.”
“उह्ह...कल रात का बर्तन अभी..आह उसी तरह रखा है...”
“शाबास....चौदह..”
“उसको भी धोना अआआ है...”
“रात का बर्तन रात ही में धो लिया करो. कम ऑन..गुड..पन्द्रह...बस पांच और.”
“आज कपड़ा भी ईईई धोना है..”
“शबाआआस...बस चार और...धोबी को दे देना...शाब्बास.”
“हमसे अब नहीं होगा....इग्नू का प्रोओओओजेक्ट भी ....बनाना है..”
“अबे इग्नू में क्या लिखना होता हमको न बताओ...करो करो..”
“बहुत दर्द हो रहा है...नहीं हो पा रहा...”
“बहुत सही गुरु...बस तीन और करो और काम खतम, देखो सब लोग इधर देख रहे हैं.”
“इतना काम करना होता है और हाआआथ उठता नहीं ईएई...”
“अबे दो और करो, देखो सब लोग देख रहे हैं......”


“गांड मराने जाएँ सब लोग....अआआ..और तुम भी....हम मर जायेंगे | ” वह वहीँ ढेर हो गया | उसे उठा कर बेंच प्रेस करने वाली बेंच पर लिटाया गया तो अर्धबेहोशी की हालत में उसे लगा कि उससे बेंच प्रेस करवाया जायेगा और वह कुछ बुदबुदाने लगा | उसने अन्याय के खिलाफ पहली बार मुखर आवाज़ उठाई थी और मैं उसके साथ था | मैंने कहा कि वह कुछ न बोले और लंबी सांसें ले, उसे आराम मिलेगा | इस दृश्य को पूरी सुहानुभूति और उत्सुकता से देख रहे लोगों ने , अर्बेन्द्र की कुछ निर्मम बातों के बाद , अपने भीतर की सुहानुभूति को खत्म किया और अपने कामों में लग गए |
                                                             
                                                                                                                क्रमशः 

                                                                                            प्रत्येक रविवार को नयी किश्त 

संपर्क - 

विमल चन्द्र पाण्डेय 
प्लाट न. 130 - 131 
मिसिरपुरा , लहरतारा 
वाराणसी , उ.प्र. 221002

फोन न. - 09820813904
         09451887246


फिल्मो में विशेष रूचि 

9 टिप्‍पणियां:

  1. :)))) पढ़ने के बाद मनमोहन जैसी शांति छा गई..

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  2. सुबह जल्दी उठने से अधिक अनुपयोगी कार्य मुझे आज तक कोई नहीं लगा और early to bed and early to rise makes a man healthy wealthy and wise से बड़ा झूठ कोई दूसरा नहीं .

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  3. बहुतै मजा भव .... ! बस लिखत रही , बतियाये अस .... बढ़ाए चली...!

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  4. बहुत ही शानदार... इतना प्रवाह भरा गद्य... इतना जीवन्त... मुझे इस बात का तगड़ा अफसोस है कि विमल के इलाहाबाद पहुँचने तह मैं इलाहाबाद छोड़ चुका था.... सिताबदियारा और विमल को बहुत सारी बधाइयाँ...

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  5. Vimal bhai padhh kar anand aa gaya sach kaha bhor me uthhana aur jim ya akhadhhe jana bahut mushkil kam lagata tha,mujhe bhi. Dimag se jitani chaho kasrat karalo par dand marana, uthhak-baithhak karana! 85-90 me ek daur tha log body banane ke lie pagal hue ja rahe the, aapaka sansmaran padhh ke mujhe bhi jhansi ke kai kisse yad aa gaye, mere dosto ne picture dekhane ke lie ek pahalvan se shart laga li aur mujhe akhadhhe me utar diya, zahir hai, khub dhunai hui par usane daya dikhai aur ham sabko picture dekhane ke paise bhi diye, par picture me main dard se karahta raha.

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