बुधवार, 30 मई 2012

विपिन चौधरी की कवितायें





                                  विपिन चौधरी 

युवा हिंदी कविता का स्त्री स्वर आज पूरी मुखरता के साथ साहित्यिक परिदृश्य पर जगमगाता  दिखाई देता है | उनके पास सवालों की एक लंबी सूची है , जिसको वह इस पुरुष वर्चस्व वाले समाज से पूछना चाहती हैं | और जाहिर है कि ये सवाल सिर्फ उस समाज को कोसने या उसे मलामत भेजने के लिए नहीं वरन उस समाज को वास्तविक अर्थों में न्यायपूर्ण और जनतांत्रिक बनाने के लिए उठाये जाते हैं | हाशिए पर सदियों से दोयम दर्जे का जीवन जीती हुई स्त्री  पहले जिन सवालों और मुद्दों को जानते और झेलते हुए भी चुप्पी की कोटर में अपने मनोभावों को छिपाए रखती थी , उसके उलट, आज वह इन प्रश्नों को पूरी बेबाकी और साहसिकता के साथ हमारे सामने रखने लगी  है |                                                      
लेकिन सिर्फ इसी खांचे में रखकर इस स्वर को देखना और समझना भी एकांगी नजरिया ही कहा जाएगा | यदि वह दुनिया की आधी आबादी के लिए संघर्षशील है , तो उसकी नज़रें देश दुनिया की हर उन छोटी और महत्वपूर्ण घटनाओं की तरफ भी है , जिस पर किसी भी संवेदनशील और जागरूक व्यक्ति की नजर होनी चाहिए | यहाँ प्रस्तुत कवितायें उपरोक्त बात की गवाही देती हैं और यह आश्वस्ति भी , कि न्याय और जनतंत्र की अवधारणा में कुछ भी एकांगी नहीं होता , और दूसरे के लिए किया गया संघर्ष ही अंततः हमारे अपने संघर्ष को चटकदार और जवान करता है | 

          तो प्रस्तुत है, आज 'सिताब दियारा' ब्लाग पर इन्ही स्वरों में से एक युवा कवयित्री       
                           विपिन चौधरी की पाँच कवितायें                           


1...        आदिवासी औरत और पेप्सी

बाज़ार की चमचमाती आंखे
सड़क पर चलते हाथों में सिमटी
दमड़ी को टटोल रही हैं

समाज की आंखे इंसान की 
पीठ पर नज़र गड़ा कर 
उसका लहू पीने की तैयारी में हैं

तभी एक आदिवासी औरत के हाथ में पेप्सी देख
समाज का चेहरा कठोर हो
तन जाता है 
अपनी सूजी हुई आँखों से
समाज देख रहा है
आदिवासी महिला का काला-कलूटा रंग
खनिज की प्रकृति से मेल खाता हुआ उसका
दरदर्राया हुआ कठोर और नुकीला चेहरा 

समाज को आदिवासी औरत के
आदि पन से परेशानी नहीं है
परहेज़ है तो
माथे तक सिन्दूर पोते
चटक लाल सस्ती साड़ी पहने
छम-छम करती मेट्रो में चढ़ आई
आदिवासी महिला के हाथ में पकड़ी हुई
उस चिल्लड पेप्सी’ से

इस बीच आदिवासी महिला
समाज की नजरों की ठीक सिधाई में बैठ
बिना साँस लिए पूरी की पूरी
पेप्सी  उतार लेती है
अपने हलक के नीचें

यह  देख  समाज का गला अचानक से सूखने लगता है   




2...              शरीर की भीतरी दशा


मरने से पहले जिन्दा रहना जरूरी है

लेकिन जीनें का एक बहाना तो शिराओं में बहते रक्त
के पास है
जो एकबारगी  
भीतर के एक उन्नत रास्ते को देख थम गया है

लाल रक्त की कोशिकाएं धीरे-धीरे
एक मृत ढेर में तब्दील हो रही हैं

गुदा, लहू साफ़ करने के अपने पाक धर्म से
विचलित सी जान पड़ रही है  

बाहर की व्यवस्था पर मैं अपना पाँव रख कर खड़ी हूँ
पर भीतर की व्यवस्था मुझसे बगावत करने को बेतरह आतुर है

आंखे सही अक्स उतारने में आना-कानी कर रही हैं 
एक औंस रक्त साफ़ करने में
ह्रदय को पसीना आने लगा है

दिमाग को भेजे गए सन्देश
अपना परम्परागत रास्ता भटक चुके हैं
सांस, एक कराह के साथ बाहर का रास्ता खोज रही है

पशोपेश में हूं कि
पहले तन साथ छोडेगा या मन

तन पहले चला जाये तो ठीक
मन के बिना एक पल की गुज़र  बेमानी  है


३...               नजरबंद तस्वीर
                                            (सरबजीत के लिये)

सभी चौराहे की गोल दीवार पर चिपकी एक तस्वीर
हर नुक्कड़ हर मोड़ पर आपका पीछा करती तस्वीर
हुकुमरानों की कुर्सी के चारों पायों ने नीचें दबी
हुई वही तस्वीर

आप कितने ही जरूरी काम में व्यस्त हों
यह तस्वीर आपके आगे कर दी जाती है
और आप लाख बहाने कर आगे निकल जाते हैं  

इस तस्वीर में कैद
नज़रबंद चेहरे की उम्र एक मोड पर आ ठहर गयी है
तस्वीर के बाहर
इस तन्दरुस्त चेहरे की साँझ कहीं पहले ढल चुकी है
अब तो इस तस्वीर वाला शख्स
बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकता

अच्छे बुरे का माप तौल हमने
उस दिन से छोड दिया जब हमारे ही कारिंदे
अपने साथियों के खिलाफ गुटबाजी में लिप्त पाए गए
और हुकुमरानो ने सह्रदयता दिखाते हुए उन्हें माफ कर दिया

पर इस तस्वीर के
पक्ष में उठी माफ़ीनामें की आवाजों को
बेशकीमती कालीन के नीचें छुपा दिया गया 

सरहद की मजबूती के आगे
नतमस्तक हैं 
दोनों ओर की फौजें
और इस तस्वीर के आगे बेबस हैं
चारों सेनाएं और दो लाजवाब देश 

लोकतंत्र में सरकार की मजबूती
इस तस्वीर की मार्फ़त
अच्छी तरह से देख ली हैं
आगे से हम
इस सरकार की तरफ पीठ करके सोने वाले हैं   



4....          पीड़ा का फलसफा

दर्द को मुठ्ठी में कैद कर उसके फलसफे का पाठ

फिर चार- पांच दिन अपने हाल पर जीना
अपने तरीके से जूझना 
अभ्यास  करना
सहजता से चाक-चौबंद रहने के लिए  
और  सजगता भी ऐसी जो
धूनी की तरह सिर से पाँव तक अपना पसारा जमा ले 


पीड़ा को अपनी गोदी में सुलाने के ये दिन
पीड़ा जो पीठ की तरफ से आती   
या कभी तलवे से उठान भरती  


हर बार दर्द का चेहरा बहुत अलग होता है 
हर बार उससे जूझने का तरीका वही


हर दिलासा का दूत एक तरफ से या
नज़दीक आये बिना पल में हवा हो गया


मानीखेज़ चीजें  गोल दिशा में डूब कर यी
दुःख, प्रेम, ख़ुशी
फिर ख़ुशी, प्रेम, दुःख
सात राग बारी बारी से जीवन में आये
पर चार दिन वाली  इस सनातन पीड़ा
ने चारों दिशाओं से अपनी बर्छियां  चलायी


महीनें के इन चार दिनों वाली अबूझ पहेली से पहले पहल
परिचय विज्ञान की कक्षा ने करवाया   
जब सर झुकाए
मिस लीला को सुनाते और 
सोचते,
 ‘क्या ही अच्छा होता
कि आज  कक्षा में बैठे ये सारे के सारे लडके लोप हो जाते


फिर एक दिन स्वयं साक्षात्कार हुआ 
कई हिदायतों से बचते बचाते 
सिर छुपाते
कहर के पंजों के लडते रहने वाले इन दिनों से


खुदा, खुद
औरत की जुर्रत से भय खाता था
सो औरत को औरत ही बनाए रखने की यह जुगत उसकी थी 


हम औरतों  के ये चार दिन अपनी देह की प्रकृति से लडते बीतते 
तभी जाकर एक जंगली खुनी समुंदर को अपने भीतर जगह देने का साहस
इस आधी आबादी के नाम पर लिखा जा सका 


इन चार दिनों में औरत का चेहरा भी
हव्वा का चेहरा के बिलकुल  करीब जाता है
हालाँकि  हव्वा भी अब बूढ़ी हो गयी है 
इस चार दिनों वाली परेशानी से जूझने वालेउसके दिन अब लद गए हैं 


इन्हीं भावज दिनों में अपनी भावनाओं को खोलने के लिए  
किसी चाबी का सहारा लेना पड़ता है
कभी ना कभी हर औरत कह उठती है   
माहिलाओं  के साथ  इस व्यवाहरिक  मजाक  को क्यों अंजाम दिया गया 
फिर एक मुस्कुराते बच्चे की तस्वीर को देख कर
खुद ही वह अपनी सोच वापिस ले लेती है 


हर महीने जब  प्रकृति का यह तोहफा  द्वार खटखाता है
तब योनी गुपचुप एक आतंरिक योग में व्यस्त हो जाती है
अपरिहार्य कारणों से
पीड़ा की इस स्तिथी  में भी महिलाओं की उँगलियाँ  मिली  हुई (crossed ) रहती   हैं 
जिनकी बीच कस कर एक उम्मीद बेपनाह ठाठे मारती है

यो प्रक्रति का पीड़ादायक रुदन
सहज तरीके से सुरक्षित बना रहता है
संसार की हर औरत  के पास
जब एक स्त्री पांचवे दिन नहा धो कर
आँगन में चमेली की महक के बराबर खड़ी होती हैं तो
प्रकृति  उसका  हाथ और भी मजबूती  थाम  लेती है 


5...             चन्द्रो  
                  (स्तन कैंसर से जूझती महिलाओं को समर्पित)

चन्द्रो,
यानी फलाने की बहु
धिम्काने की पत्नी
पहली बार तुम्हें चाचा के हाथ में पकड़ी एक तस्वीर में देखा
अमरबेल सी गर्दन पर चमेली के फूल सी तुम्हारी सूरत


फिर देखी
श्रम के मजबूत सांचे में ढली तुम्हारी आकृति
कुए से पानी लाती
खड़ी दोपहर में खेतों से बाड़ी चुगती
तीस किलों की भरोटी को सिर पर धरे लौटती अपनी चौखट   
ढोर-डंगरों के लिए सुबह-शाम हारे में चाट रांधने में जुटी 
किसी भी लोच से तत्काल इंकार करती तुम्हारी देह


इसी खूबसूरती ने तुम्हें अकारण ही गांव की दिलफेंक बहु बनाया
फाग में अपने जवान देवरों को उचक-उचक कोडे मारती तुम
तो गाँव की सूख चली बूढ़ी चौपाल
हरी हो लहलहा उठती
गांव के पुरुष स्वांग सा मीठा आनंद लेते
स्त्रियाँ पल्लू मुहँ में दबा भौचक हो तुम्हारी चपलता को एकटक देखती
                                                                       

अफवाओं के पंख कुछ ज्यादा  ही चोडे हुआ करते हैं
अफवाहें तुम्हे देख
आहें भर बार- बार दोहराती
फलाने की दिलफेंक बहु
धिम्काने की दिलफेंक स्त्री

इस बार युवा अफवाह ने सच का चेहरा चिपका
एक  बुरी खबर दी
लौटी हो तुम अपना एक स्तन
कैंसर की चपेट में गँवा कर
शहर से गाँव  
डॉक्टर की हजारों सलाहों के साथ
 
अपने उसी पहले से रूप में
उसी सूरजमुखी ताप में


इस काली खबर से गाँव के पुरूषों पर क्या बीती
यह तो ठीक-ठीक मालुम नहीं
उनके भीतर एक सुखा पोखर तो अपना आकार ले ही गया होगा
महिलाओं पर हमेशा के तरह इस खबर का असर भी
फुसफुसाहट के रूप में ही बहार निकला

चन्द्रो हारी-बीमारी में भी
अपने कामचोर पति के हिस्से की मेहनत कर
डटी रही हर चौमासे की सीली रातों में
अपने दोनो बच्चों को छाती से सटाए


निकल आती है
आज भी   बुढी चन्द्रो
रात को टोर्च ले कर
खेतों की रखवाली के लिए 
अमावस्या के जंगली लकडबग्घे अँधेरे में    | 


                                                                                               विपिन  चौधरी 

20 टिप्‍पणियां:

  1. विपिन युवा कवियत्रियों में मुझे काफी मैच्योर लगती हैं. उनसे बहुत उम्मीदें हैं...

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  2. क्या बात है विपिन... बधाई ...

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  3. विषय चयन के साथ-साथ प्रस्तुति की गम्भीरता आकर्षित करती है...कविता के लिए कवि को बधाई

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  4. बिपिन जी अपने समय की ऐसी कवियित्री हैं जो पाठक को अपनी रचनाओं को पढवाने के लिए बाध्य करती हैं. वे कुछ सरल से लगाने वाले स्त्री प्रश्नों को इस तरह उठाती हैं कि वे हमारे समय और समाज के महत्वपूर्ण सवाल बन जाते हैं. ‘पीड़ा का फलसफा’ शायद अपने अंदाज की विशिष्ट और अलग तरह की कविता है. बेहतर कविताओं के लिए बिपिन जी को बधाई और पढवाने के लिए रामजी भाई का आभार.

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  5. VIPIN JI, EK BEHETREEN RACHNAKAAR HAIN....UNKA DRASHTIKON VYAPAK HAI. UNKO BAHUT BAHUT SHUBHKAMNAYEN.........
    DINESH RAGHUVANSHI

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  6. "चंद्रो" बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति है....और आदिवासी स्त्री का ""होना"" अच्छा लगा....बधाई, विपिन।

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  7. Quietly in her room,
    Vipin Choudhary
    created a universe of poetry!

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  8. पीड़ा का फलसफा इस मौजू पर हिंदी की पहली कविता होगी . यह काव्यात्मक साहस भी इस कविता को महत्वपूर्ण बनाता है . इस कविता पर चर्चा होनी चाहिए .देह्पीड़ाके साथ इस सहेलीनुमा नोकझोंक से एक विशिष्ट स्त्री-व्यक्तित्व उभरता है , जो हिंदी कविता में बहुत सुलभ नहीं है .हाँ , 'कीपिंग वंस फिंगर्स क्रास्ड' जैसे अंग्रेज़ी मुहावरे का इस्तेमाल खासा अटपटा है . इस के विकल्प मिल सकते थे. .

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  9. बहुत उम्दा कविताएं!

    "मरने से पहले ज़िंदा रहना ज़रूरी है"

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  10. बाजार की चमचमाती नजर, दमडी को टटोल रही है---------- कविता अच्‍छी लगी, इसके अलावा पीडा का फलसफा, नजरबंद तस्‍वीर और शरीर की भीतरी दशा भी बेहद प्रभावपूर्ण है,

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  11. vipin ke sarokar kavitaon me jhalkte hain unki kavitaon me aatm vilaap se adhik doosron kee peeda jhalkti hai jo ek kavi ke liye shubh hai.. unhe meri anant shubhkamnayen.. shukria ramji

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  12. Manoj Chhabra ne apni fb wall pe ye link daala aur saath mein taareef ke kuchh shabd..yahaan aaya toh ek saans mein saari kavitaayein padh gaya..ab manan karne baittha hun..umda vichaar..umdaa prastuti..waah!! aur shukriya Manoj..

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  13. अच्‍छी कविताएं। इधर जो नई कविताएं आ रही हैं....उनमें विपिन चौधरी अपनी कहन में अलग पहचान में आती हैं। मेरी शुभकामनाएं।

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  14. आपका ज़ोर-ए कलम और बढे ! बहुत सुन्दर रचनाये !
    सादर

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  15. विपिन की कविताएं अपनी अलग पहचान बना भी रही हैं और बता भी रही हैं। उनके भीतर रचनात्‍मकता बहुत गहरे तक बसी हुई है और उनकी कविदृष्टि बहुत मामूली दिखने वाले विषयों पर भी बेहतरीन कविताएं संभव कर दिखाती हैं। मेरी शुभकामनाएं।

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  16. मुझे बहुत दिन बाद ऐसा कुछ मिला जिसे मैं मौलिक कविता कह कर, उसे अपने रूममेट को सुना कर थोड़ी देर तक ख़ामोश होना चाहता हूँ और सोचना चाहता हूँ कि कविता क्या है (वरना इधर आमतौर पर अच्छी कविताओं के लिए मनोज पटेल के अनुवादों का ही सहारा रह गया है). बहुत गहेरी कवितायेँ हैं जो ऊपर से हमारी धडकन की तरह सहज हैं और भीतर से हमारी ग्रंथियों की तरह जटिल...पीड़ा का फलसफा ऐसी कविता है जिसे पढ़ने के बाद सिर्फ़ उसी बिंदु पे हमारा ध्यान नहीं जाता जिस बिंदु पर ये कविता लिखी गयी है बल्कि हम कुदरत की ज्यादतियों (भले उन्हें अपरिहार्य बना कर दिया गया हो) के बारे में अचानक सोचने लगते हैं. इधर विपिन की कविताओं में बहुत गहराई और ठहराव आ रहा है जिसे संजोने की ज़रूरत है और कवियत्री को ये समझने की भी ज़रूरत है कि उनसे अपेक्षाएं बढ़ती जा रही हैं...

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  17. विपिन की कहानियां व कविताएँ काफी अर्से से गौर से पढ़ रहा हूँ. अभी बहुत अधिक रचनाएँ सामने नहीं आई पर उनके साहित्य में अनुभव संसार की विस्तृतता प्रशंसनीय है. स्त्री पर लिखी कविताओं में वे किसी भी फोर्मुले से मुक्त हैं, इसका सबूत इन में से चौथी और पांचवीं कविताएँ हैं. इनमें अनुभव वैयक्तिक ना हो कर व्यक्तिगत को सामाजिक बनाने की क्षमता है. एक बात अवश्य कवयित्री से क्षमा याचना सहित कहूँगा कि सरबजीत जैसी कविताएँ लिखने से पूर्व संबंधित विषय की विस्तृत जानकारी होनी अनिवार्य है. सरबजीत के मामले में किसने किसको बलि का बकरा बनाया यह खोज का विषय है. पर समग्र रूप से विपिन की ये कविताएँ तथा अन्य कई जिनमें से कुछ मेरे द्वारा संपादित कविता संग्रह में भी हैं, उन्हें कवियों की मेरिट लिस्ट में खड़ा कर देती हैं. उन्हें मेरी ओर से बधाई.

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  18. पुनश्च: मेरे द्वारा सम्पादित जिस कविता संग्रह की चर्चा मैंने पिछली टिप्पणी में की है वह अभी प्रकाशित होना है.

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  19. Your words are so powerful!
    You will change the course of many HARYANAS in our country!

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  20. Your method of describing all in this piece of writing is really good, all be capable of without difficulty understand it, Thanks a lot.
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