रविवार, 24 जून 2012

विमलचन्द्र पाण्डेय का संस्मरण -- आठवीं किश्त

             
विमलचन्द्र पाण्डेय


पिछली किश्त में आपने पढ़ा कि शाहरुख खान की बहुचर्चित फिल्म 'ओम् शांति ओम्' को देखने के बाद विमल और उनके इलाहाबादी दोस्त इस बात से हैरान होते हैं कि ऎसी सतही और बेकार फिल्म बाक्स आफिस पर इतनी हिट कैसे हो गयी ..| उनके मन में यह ख्याल आता है , कि हमें भी इस लाईन में कुछ करना चाहिए ..| वे लोग प्रयास भी करते हैं , लेकिन जैसा कि इस तरह के प्रयासों का हश्र होता है , उनके साथ भी वही दोहराया जाता है ..| इस बीच विमल का सामना पत्रकारिता के उस चेहरे से होता रहता है , जो न सिर्फ सडा-गला है , वरन आजकल किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए जानलेवा भी बनता चला गया है ...| कि तभी उनके इलाहाबादी जीवन में कैलाश जी का आगमन होता है ...और फिर आगे ...

                     तो प्रस्तुत है विमलचन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                              ई इलाहाब्बाद है भईया 
                                 की आठवीं किश्त 
                                  

                                      13...

यू.एन.आई. की राईवल कही जाने वाली एजेंसी पी.टी.आई. के इलाहाबाद के ब्यूरो चीफ नचिकेता नारायण मेरे लिए उस वक्त एक बड़े भाई की तरह मदद लेकर तब आये, जब मुझे इसकी सख्त ज़रूरत थी. हुआ ये कि जिस जियालाल जी ने मेरा उनसे परिचय कराया था , मेरे जाने के साल भर के भीतर ही उनका वाराणसी ट्रांसफर हो गया. ये मेरे लिए अच्छी बात भी थी और बुरी भी. मैं अब एक तरह से इलाहाबाद यूएनआई का अघोषित चीफ था लेकिन मेरे सिर पर जियालाल जी कंपनी की एक आलमारी, कई सभ्यताओं पहले का एक कंप्यूटर, एक बाबा आदम के ज़माने का टाईपरायटर, दो मेजों और कुछ कुर्सियों का भार भी छोड़ गए थे. वे अपने परिवार के साथ तीन कमरे का फ्लैट लेकर रहते थे और कंपनी के सामानों का उपयोग करते थे. मैं एक कमरे के लौज में रहने वाला इनका उपयोग कहाँ करता. एक दिन यूँ ही मुलाकात में मैंने अपनी समस्या नचिकेता जी से बताई और उन्होंने मेरी समस्या बाकायदा हल कर दी. उन्होंने एक पत्र लिखवा कर उसकी कार्बन कॉपी अपने पास रख ली जिसमें लिखा था कि आवश्यक जगह न होने पर मैं एजेंसी के कुछ सामान फलां पते पर रख रहा हूँ. यह मेरे लिए थोड़े संकोच की बात रही कि जितने समय के लिए वो सामान मैंने वहाँ रखे थे उसे कई गुना समय मुझे उन्हें वहाँ से हटाने में लग गया , लेकिन नचिकेता जी ने कभी इसकी शिकायत नहीं की. मैं उनका बहुत सम्मान करने लगा था और हमेशा उन्हें बड़े भाई जैसा आदर देता था जो अब भी बरक़रार है. मुझे वो एक कंप्लीट पत्रकार नज़र आते थे जो फालतू की किसी प्रेस कांफ्रेंस में कभी नहीं दिखाई पड़ते थे और उनके सूत्र हर जगह ऐसे मौजूद होते थे कि कोई भी खबर जब मुझे कहीं से नहीं मिलती तो मैं उनकी ही शरण लेता. उन्होंने कभी मुझे निराश नहीं किया और आज भी उनका स्नेह मुझ पर बड़े भाई की तरह ही है लेकिन शायद वह मूर्तियों के टूटने का समय था और वह दौर मुझे सिखा रहा था कि दुनिया में आदर्श नाम की कोई अवधारणा नहीं होती. मैं उस समय तक काफ़ी किताबी टाइप का आदर्शवादी था और थोड़ा व्यक्तिपूजक टाईप का भी . जो आदतें मेरे घर और समाज ने मुझे दी थीं वे साहित्य का साथ मिलने के बावजूद पूरी तरह टूटी नहीं थीं , हालाकि इलाहाबाद बड़े करीने से उन्हें एक-एक कर तोड़ता जा रहा था. नचिकेता जी अच्छा साहित्य पढ़ने वाले और अच्छी फ़िल्में देखने वाले एक सुलझे हुए इंसान थे और उन्हें देख कर मुझे लगता था कि अगर मैं दस साल और पत्रकारिता कर पाउँगा तो शायद उनके जैसा ही होऊंगा.

एक दिन मेरे पास भारतीय जनता पार्टी के पूर्व मंत्री मुरली मनोहर जोशी के यहाँ से फोन आया कि उन्होंने कुछ चुनिन्दा पत्रकारों को एक ख़ास वार्ता के लिए अपने घर पर आमंत्रित किया है. दो एजेंसियों यानि यूएनआई और पीटीआई के साथ ईटीवी के उमेश, आकाशवाणी के सुनील शुक्ल जी भी थे. मेरी याद्दाश्त के हिसाब से खुद को सबसे बड़ा कहने वाले दो अख़बारों के प्रतिनिधि भी थे. भाजपा और विहिप के ज्यादातर नेता खाली बैठे थे और उनके पास कहने सुनने को कुछ ख़ास नहीं हुआ करता था. अक्सर विहिप अध्यक्ष अशोक सिंघल जी के घर पर राम सेतु पर कांफ्रेंस हुआ करती थी जिसमें वो अकाट्य सबूतों के साथ बताया करते थे कि कैसे राम सेतु स्वयं श्रीराम जी ने अपने हाथों से बनाया था और इसका टूटना देश का टूटना है. वो इसके पक्ष में कुछ वैज्ञानिक सबूत भी दिया करते थे जिससे खबरों में दम आ जाता था. बड़े-बड़े बैनरों के स्वघोषित प्रबुद्ध पत्रकार इस बात पर काफ़ी चिंतित दिखाई देते कि देश को खतरा बढ़ता ही जा रहा है. कभी जोशी जी जैसे वरिष्ठ नेता किसी होटल में कांफ्रेंस बुला कर ये घोषणा किया करते कि वे मायावती की राज्य सरकार, संप्रग की केन्द्र सरकार, मार्क्सवादियों द्वारा दिए गए समर्थन, मुलायम के समाजवाद, लालू के परिवारवाद, महंगाई, बेरोज़गारी, गुंडागर्दी, नशेबाजी, ट्रेन डकैती, शिक्षा में ह्रास, कुसंस्कृति, लिंगभेद, आदि आदि सभी चीज़ों की निंदा करते हैं. पत्रकार चुपचाप उस निंदा में अपनी तरफ से दो चार चीज़ों की और निंदा करते हुए छाप देते और राज्य में कोई भी समस्या होती तो सामने वाले से कह देते, “और हरवाओ भाजपा के, अब तो फटबे करीगा.”

तो हम कुछ पत्रकार मुरली मनोहर जोशी के आवास पर पहुंचे और उन्होंने देश की सुरक्षा और राम सेतु, गंगा और भ्रष्टाचार पर कुछ रूटीन बातें कीं. हमने उन्हें अपनी डायरी में नोट किया, कुछ जलपान किया और चलने को उद्यत हुए. जोशी दरवाज़े पर खड़े थे. उमेश एक युवा नौजवान था जो हमेशा अच्छी ख़बरों की तलाश में रहता था. वह जोशी जी का अभिवादन करके बाहर निकल गया, मैंने भी नमस्कार किया और बाहर निकाल कर नचिकेता जी का इंतजार करने लगा. शुक्ला जी ने बाकायदा जोशी जी के पैर छुए और मुझे इस पर ज़्यादा आश्चर्य नहीं हुआ. लेकिन जब नचिकेता जी ने भी उनके पैर छुए तो मैं बाहर से खड़ा देख रहा था और इस दृश्य को हजम करने में मुझे लंबा समय लग गया. मैं एक आघात में था और ये ऐसा मुद्दा था जिस पर मैं उनसे बात भी नहीं कर सकता था. हमारा रिश्ता बड़ा पारंपरिक सा था और वहाँ ऐसे सवालों की गुंजाईश नहीं थी. वो मुझे चप्पल पहन कर बाईक चलाने पर डाँटते और कहते कि मुझे जूते पहनने चाहिए, मैं उन्हें यकीन दिलाता कि मैं कल से जूते पहन कर ही बाहर निकलूंगा. मैं एक ऐसी बात पर दुखी था जिसका उस टाइम फ्रेम में कोई ख़ास अर्थ निकलता नहीं था. मैंने सामान्य होने की कोशिश की और इस कोशिश में लंबे समय तक असामान्य रहा. विवेक मेरी परेशानी को जितना समझ पाया उस हिसाब से उसने मुझे भी समझाने की कोशिशें कीं, “अमें तुम कईसन कईसन बात पे आपन दिमाग खराब करत हो. हमका तुम्हार दिमागे नै ना समझ आवत. कभी हमका लगित है कि तुम समद्दार आदमी हो अउर कभी लगत है कि तुम एकदम्मै बकलंड हो.” मैंने कुछ समझाने की कोशिश की तो उसने लाउड होकर कहा कि मैं चूतिया हूँ और चाहता हूँ कि हर जगह मुझे हमेशा अच्छी लगने वाली चीज़ें ही दिखें. उसकी इस दलील ने मुझे एक साथ कई बातें समझाईं.
                                
मुखातिब की एक गोष्ठी में लालबहादुर वर्मा
और उनके साथ में बैठे सुरेन्द्र  राही और नीलम शंकर 
                                 
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मुखातिब ने मेरी रचनात्मक ज़िंदगी में इतना कुछ जोड़ा कि ना मैं इलाहाबाद का एहसान उतार सकता हूँ ना ही मुखातिब का. हम हर दूसरे रविवार गोष्ठियां करते और जब तक ये तय नहीं हुआ था कि वहाँ आने वाला हर सदस्य चायपान और फोटोकॉपी वगैरह के खर्चे के लिए हर महीने १५ रुपये मात्र दिया करेगा, मेरा उत्साह इतना ज़्यादा था कि मैं अपनी मोटरसाईकिल पर अपने खर्चे पर फोटोकापियाँ बाँटा करता था. मुखातिब के कुछ नियम बनाये गए थे जो और कहीं बनाये गए नियमों के खिलाफ थे. जैसे इसमें कोई अध्यक्ष नहीं होगा, संचालन हर हफ्ते बदल बदल के कोई भी करेगा, कोई मुंहदेखी वाह-वाह नहीं होगी, बेबाक ईमानदारी से अपनी बात रखी जायेगी, पहले से छपी प्रशंसित रचनाओं की जगह नयी रचना का पाठ और उस पर बात की जायेगी और नए से नए रचनाकार या श्रोता को अपनी बात रखने की आज़ादी दी जायेगी. वैसे तो रचनाकारों की नयी रचनाएँ सुनने का उत्साह बहुत रहा करता था लेकिन उससे कहीं ज़्यादा उत्साह बाद में उन दो लोगों को सुनने का रहने लगा जो साहित्य की किसी भी विधा पर इतने अधिकार और तार्किक रूप से बोलते थे कि गोष्ठी एक ऊंचाई पर पहुँच जाया करती थी. मुरलीधर जी और हिमांशु जी बिना किसी घोषणा के मुखातिब के सभी नियमों का कट्टरता से पालन करते थे और जिन रचनाओं पर मैं मुग्ध रहा करता था, अपनी बारी आने पर उनमें से कोई ना कोई अक्सर उसकी बखिया उधेड़ देता. मुझे याद है जब हमने नीलाभ जी को मुखातिब में अपनी कवितायेँ पढ़ने के लिए आमंत्रित किया था. उन्होंने अपनी दस कविताओं का पाठ किया जिनमें से कई कवितायेँ नई थीं. मैंने नीलाभ को पहले बहुत ज़्यादा नहीं पढ़ा था और मुझे उनकी कई कवितायेँ पसंद आई थीं. और श्रोताओं को भी कवितायेँ काफ़ी अच्छी लगी थीं ,लेकिन कई सकारात्मक प्रतिक्रियाओं के बाद जब हिमांशु जी का नंबर आया तो उनकी बात की शुरुआत कुछ यों थी, “मुझे नीलाभ की कविताओं ने कभी प्रभावित नहीं किया. उनकी कविताओं में एक चौकन्नापन है जो अक्सर उनकी सहजता पर हावी हो जाता है और कविताओं को परफेक्ट बनाने के चक्कर में जो अतिरिक्त श्रम किया जाता है, उसकी वजह से कवितायेँ अक्सर नापीतौली लगने लगती हैं,” हालाँकि इसके बाद हिमांशु जी ने उन दस कविताओं में से किन्हीं दो कविताओं की तारीफ भी की जिन्होंने उन्हें प्रभावित किया था. नीलाभ जी एकदम शांत थे जैसे किसी पुराने इलाहाबादी साहित्यकार को होना चाहिए. मुखातिब की साहित्यिक उपलब्धियों के अलावा मुझे कैलाश जी के रूप में एक और उपलब्धि हासिल हुई थी. वह मुझे पहले पढ़ चुके थे और मेरे प्रशंशक टाइप के थे. उनसे हमारी खूब बनने भी लगी थी ,क्योंकि हमारी गन्दी आदतें एक जैसी ही थीं. मैं भी नशे के प्रकारों को लेकर अधिक नखरा नहीं किया करता था और वो भी वक्त ज़रूरत देसी तक से काम चलने वाले आदमी थे. उनका कहना था कि उनकी शुरुआत देसी से ही हुई थी इसलिए वो उन्हें ज़्यादा अपनी लगती है. उनके बचपन की कहानी में काफ़ी संघर्ष था लेकिन इसके बावजूद उनका विकास कुछ इस तरह हुआ था कि बचपन की दुर्घटनाओं का ज़िंदगी पर बुरा असर पड़ने की बात बेमानी लगने लगती थी. हालाँकि उन्हें पूरा मैं काफ़ी बाद में समझ पाया. शुरू में तो यही लगता था कि वे इतने खुशमिजाज़ और हंसमुख आदमी हैं कि उनकी जान भी मांग ली जाए तो वे आसानी से दे देंगे और जान निकाले जाने से पहले जान मांगने वाले से कहेंगे, “इस बात पर एक पार्टी तो बनती है बंधु.”

उनके बचपन में हुए ज़मीन जायदाद के बंटवारे में उनके पिता के हिस्से काफ़ी कम संपत्ति आई थी और धोखे से उन्हें लगभग कंगाल बना दिया गया था . कैलाश जी हाई स्कूल पास करने के बाद इस घटना की वजह से एक ट्रक पर खलासी का काम करने लगे और लगभग दस सालों तक वह खलासी रहे. परिस्थितियां कुछ सही होने पर उन्होंने पत्राचार से इंटर पास किया और पत्राचार से ही बीए भी. हिंदी से एमए में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बाकायदा प्रवेश ले लिया और कभी कभी समय निकाल कर कक्षाएं अटेंड करने भी गए लेकिन ज़िंदगी ने उतना वक्त नहीं दिया कि वे एक तरफ ध्यान दे पाते. लेकिन उन्हें साहित्य से प्यार हो गया था और किताबें उन्हें अपने जिंदा रहने का कारण देतीं. प्रेमचंद से लेकर शरतचंद और रेणु तक की कहानियां और मुक्तिबोध से लेकर धूमिल तक की कवितायेँ उन्हें जीने की वजह बतातीं. वे चाह कर भी परीक्षाओं से पहले परीक्षाओं की तैयारी नहीं कर पाए और वह दिन भी आ गया जब अगले दिन से पेपर था. वे उस ट्रक पर रात में एक क्वार्टर लाकर पीते और सिलेबस उठा कर सुबह तक पूरा पढ़ भर डालते. एक पेपर पर एक क्वार्टर के हिसाब से उन्होंने अपने पेपर दे दिए और फिर से किताबों से हिम्मत पाते हुए ज़िंदगी को अपनी जिजीविषा से चिढ़ाने में लग गए. जिस दिन परिणाम आने वाले थे, उनके साथ परीक्षा दिए हुए किसी परिचित ने उन्हें बताया कि आज परिणाम आने वाले हैं और उन्हें विश्वविद्यालय जाकर अपना परिणाम देखना चाहिए. उन्हें पूरा विश्वास था कि वे अच्छे नंबरों से पास होंगे लेकिन जब उन्होंने वहाँ लगी सूची में अपना नाम देखा तो उनकी आंखें भर आयीं. उन्होंने पूरे विश्वविद्यालय में टॉप किया था और भविष्य में उन्हें सबसे अधिक अंक लाने के लिए स्वर्ण पदक दिए जाने की घोषणा की जानी थी. कैलाश जी आज भी इस बात पर सख्त अफ़सोस करते हैं कि जब उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय कि पहचान माने जाने वाले प्रोफ़ेसर सत्य प्रकाश मिश्रा ने अपने अंडर में पीएचडी करने के लिए कहा तो उन्होंने सिर्फ़ इसलिए एक मैडम के अंडर में शोध करना स्वीकार किया, क्योंकि उन्होंने उन्हें स्कूल में पढाया था और वे उन्हें पहले ही कह चुके थे कि वे उनके अंडर में ही शोध करेंगे. शोध पूरा होकर कैलाश मिश्रा से डॉक्टर कैलाश मिश्रा बन जाने के बावजूद कैलाश जी प्राइमरी से होते हुए अभी जल्दी ही इंटर कॉलेज तक पहुंचे हैं तो इसमें दोष हमारी उस व्यवस्था का सबसे ज़्यादा है जहाँ सरस्वती का उपक्रम करने के लिए बिना लक्ष्मी के पत्ता तक नहीं सरकता. कैलाश जी को किसी विश्वविद्यालय में होना चाहिए था लेकिन क्या मजाल कि इस बात पर उनकी सुई कभी दो मिनट से ज़्यादा रुके. खुश रहना उनका धर्म है और सकारात्मकता उनकी जाति, हालाँकि कभी-कभी ये सकारात्मकता इतनी ज़्यादा हो जाती है कि भागने को रास्ता नहीं मिलता.

कैलाश जी मेरे लोज पर दो तीन बार आ चुके थे और मेरे साथ बैठ कर एकाध घंटे बाद चले गए थे. तब तक मैंने उनके साथ सिर्फ़ एकाध बार ही पी थी और वो पीने के बाद बड़ी अच्छी-अच्छी बातें करते जो कभी-कभी शाकाहारी नहीं रह जातीं. हमारे बीच जो माहौल बनता उसमें पता नहीं चलता कि मेरी और कैलाश जी की उम्र में कोई अंतर भी है और वो भी दसेक सालों का.

एक दिन मैं और विवेक खाना खाकर कंप्यूटर पर कोई फिल्म देख रहे थे कि अचानक दरवाज़ा खटखटाया गया. रात के एक बजे थे और हम हैरान थे कि इस वक्त बिना इत्तला किये कौन आ धमका. मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने कैलाश जी थे. उन्होंने तुरंत मुझे एक ओर धकेला और आकार चौकी पर निढाल गिर गए. मैं कुछ पूछूं, इससे पहले अपनी रेडियो वाली भाषा और बेदाग उच्चारण में बोलने लगे.

“इस लाइन में सारे शटर साले एक जैसे ही हैं, मैं कितनी देर से इस लाइन में घूम रहा हूँ और आपके लोज का शटर ढूँढने की कोशिश कर रहा हूँ.” मैंने कहा कि उन्हें मुझे फोन कर लेना चाहिए था. उनका कहना था कि वह घर से अचानक ऐसे ही टहलने निकले थे, मोबाइल और मोटरसाइकिल के बिना कि चौराहे पर एक दोस्त मिल गया.

“हम दोनों ने साथ में बैठ के एक बार में पिया फिर वो अपने घर चला गया. मैं बहुत देर तक एक पार्क में बैठा गुलज़ार के गाने सुनता रहा. जब सुनते सुनते ऊपर तक कुछ भरा आया तो जाकर थोड़ी शराब और पी. इसके बाद मेरा आपसे मिलने का बहुत मन होने लगा. देखिये आपको खोजते-खोजते मेरे पैरों में छाले पड़ गए.”

उन्होंने वाकई एक अबोध प्रेमिका की तरह अपने पांव उठा कर मुझे दिखाए तो विवेक से रहा नहीं गया, “आपौ गजब आदमी हैं, राती के घरे जाए के चाही तो....भाभी क्या सोच रही होंगी ?”

“मैं उन्हें बता दूँगा कि मैं विमल जी से मिलने गया था तो वो कुछ नहीं कहेंगी.” उन्होंने विश्वास से कहा. मैं उनके विश्वास को देख कर खुश हुआ वरना असलियत मैं जानता था. मैं जानता हूँ कि मेरे नए पुराने सभी दोस्त मुझे बहुत मानते हैं लेकिन इसका गलत उपयोग इतना हुआ है कि ये बुरी तरह से मेरे खिलाफ चला गया है. मैं जब भी बनारस जाता हूँ, मेरे जिन दोस्तों की शादियाँ हो गयी हैं, उनकी बीवियां घबरा जाती हैं. कभी राजेंद्र यादव का कोई संस्मरण पढ़ा था, और अब लगता है कि उनकी जो उस समय हालत थी वैसी ही आज मेरी भी हो गयी है. बनारस में कोई भी दोस्त जैसे सुनील, अनुज या संजय ही जब मेरे साथ रहे और देर हो जाए तो सफाई देने की गरज से पहले ही बीवी को फोन करके कह देता है, “अरे वो विमल आया है ना तो थोड़ी देर हो जायेगी,”. 

काफ़ी समय बाद दोस्त मिलते हैं तो कुछ पीना पिलाना होगा ही. तो संजय जैसे एक पैग वाले दोस्त भी पहले ही पत्नी को सूचित कर अपनी वफादारी का परिचय देते हैं. अगर रात को घर पहुँचने में देर हो गयी तो अनुज अपने घर पर अपनी बीवी को सफाई देता है, “अरे विमलवा रोक लिया था, साला आने ही नहीं दिया.” या सुनील मुँह महकने की सफाई इस तरह देता है, “अरे मेरा मन तो कतई नहीं था. विमल कहने लगा तो बस एक पैग ले लिए.”

कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा हो गया है कि मैं मुंबई में भी रहूँ और किसी दोस्त को बाहर देर हो जाए तो कई बार उनकी पत्नियों के मैसेज मुझे सीधे आ जाते हैं, “आप बनारस आ गए हैं क्या?” मैं समझ जाता हूँ. अब तो मेरे दोस्तों ने मेरा लिहाज करना भी छोड़ दिया है और वे कहीं से भी गला तर कर के आते हैं तो निस्संकोच मेरा नाम लगा देते हैं. मेरे कंधे पर बन्दूक चलाने और पत्नी के साथ मिल कर मुझे चार गालियाँ देने के बाद वो रात को सोते समय मुझे मैसेज भी कर देते हैं, “यार आज एक दोस्त के साथ दारू पी लिए. तुम्हारी भाभी पूछी तो कह दिए कि तुम पिलाये हो. अगर बाई चांस फोन करे तो कह देना कि एक हफ्ते के लिए बनारस आये हो. गुड नाईट, स्वीट ड्रीम्स.”

                                                  क्रमशः  .........

                                                                                                   प्रत्येक रविवार को नयी किश्त 

संपर्क - 

विमल चन्द्र पाण्डेय 
प्लाट न. 130 - 131 
मिसिरपुरा , लहरतारा 
वाराणसी , उ.प्र. 221002

फोन न. - 09820813904
         09451887246


फिल्मो में विशेष रूचि 



7 टिप्‍पणियां:

  1. भाई, अब तो हर सप्‍ताह इसका इंतजार होने लगा है... वाकई बहुत जीवंत संस्‍मरण हैं... बधाई।

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  2. यार गजब...बहुते मजा आ रहा है. कब्बो ग्वालियर आया जाय. लगता है बइठ के बतियाने में बड़ा मजा आएगा...न संभव हो तो हमही मुंबई आ धमकते हैं...कह देंगे बीबी से कि ऊ विमलवा है न..उहै बुलाय ले गया..वरना हमारा तनिको मन नहीं था...तब्बो खाली दुइए पैग लिए हैं :)

    हाँ हमरे अजीज वर्मा जी का फोटू देख के हम्मे हमेशा ही अच्छा लगता है...उन्हें सलाम!

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  3. बढ़िया ..उत्सुकता बढती जाती है ..अगली किश्तों का इन्तजार बराबर बना रहता है ..बधाई विमल

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  4. बहुत रोचक होता जा रहा है यह संस्मरण विमल जी!! बधाई आपको और रामजी भाई को धन्यवाद इसे हम तक पहुंचाने के लिए...

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  5. bahut sahi..agla sabse mast hoga.....

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  6. vimal bhaiya thode jiwan k sachchaiyo ne climex me dhakel diya tha.........lekin iss kist me majak aur hasi rupi byaj km tha,,,lekin jo v tha solid muldhan tha,,,,,,,
    rochak raha,,,,
    aur dost to hote hi iss liye...level chipka chipka kr,,,,,,gandagi faila dete hai

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