गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

नीलम पृष्टी की कविताएँ



मित्र अस्मुरारी नंदन मिश्र द्वारा उपलब्द्ध करायी गयी इन कविताओं को मैं उन्ही की टिप्पड़ी के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ | उम्मीद करता हूँ कि उठ खड़े होने के इन लड़खड़ाते हुए प्रयासों को मदद करने के लिए आप अपने हाथों को आगे बढ़ाएंगे |

                                  
         प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर नीलम पृष्टी की कवितायें  



नीलम पृष्टी केंद्रीय विद्यालय पारादीप पोर्ट में अध्ययनरत कक्षा नवीं की छात्रा है। घर-बाहर में हिंदी का परिवेश नहीं है। हाँ! विद्यालय में हिन्दी को एक विषय के रूप में रखा है। वह हिंदी में लिखने का प्रयास कर रही है ।उसको इस भाषा में लिखने के लिए बहुत मेहनत की आवश्यकता है, जो वह कर भी रही है।

नीलम में एक सघन सम्वेदना है। वह बुराइयों से आहत हो जाती है और उत्तेजित भी। अपने स्तर पर प्रतिकार करना भी नहीं छोड़ती, किंतु हमारा समाज ऐसा है, जहाँ उसे कदम -कदम पर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में वह प्रतिकार का स्वर अपनी कविता में रखती है।
भाषा में सुधार के बाद उसकी कविता मार्मिक बन गयी है...

                                                   ... अस्मुरारी नन्दन मिश्र



1.  मौन गीत
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जिन्दगी की सांसें चलती गईं
चढता सूरज ढलता गया
कदम बढते भी रहे आगे
पर भूली नहीं जा सकीं
बीती हुई बातें

अँधेरी गुफा पर बना चित्र है किसका
किसने बनाया है इसे जाने-अनजाने

गुड़िया छोटी है
नहीं है अकल
पर चोट तो लगती ही है उसे
घाव तो बन ही जाता है
तन पर.....
मन पर.....

दिखते घावों पर मरहम लगा दिया तुमने
तुम्हारा काम खत्म हुआ
लेकिन मन के घाव तो रह गये
ज्यों-के-त्यों

दबाव झेलती रात ठहरी रही
फूटे नही कोई बोल
बहते रहे बस आँसू
और आँसुओं में पिघलती रही रात

पर पत्थर बन जमा दर्द
दिखला न सकी किसी को
सिर्फ़ गाती रही
अपनी ही जिन्दगी के मौन गीत
चुप...
चुप...
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2.कलियाँ कहती " मुझको भी समझो "
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हर कली कुछ बोल रही है
सूरज को
तेरी धूप हमें सिखलाती
हरदम हँसना
सूरज! तू मत आ रोज सुबह
मुझे अब फूल नहीं बनना
एक पत्थर दिल के हाथ
जब लगती
जो न समझे हमको
मुझे ले जाता घर-मंदिर
मूर्ति के चरणों में

इस मंदिर को है अब धिक्कार
तेरी मूर्ति को भी
नहीं चढूंगी .....
नहीं गिरूंगी ....
अब तेरे चरणों में
मुझको भी हे आजादी
फूल बन खिलने की
हँस न सकूँ तो क्यों मैं खिलूँ
इन पौधों के कंधों पर
नहीं आउंगी ....
नहीं खिलूंगी .....
इस बगिया मे
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3.आँचल
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कैसे कहूँ.......
इस पल तुम्हें......
उन यादों को........
कैसे बताऊँ???

देखा किसने तुम्हे
ले रही जान जब मेरी।
बेटी हूँ पर..........
महा मोह
पाप की खानि
लेकिन क्या तुम्हारे लिए भी यही थी मैं
फिर कहाँ गया तुम्हारा वात्सल्य
ओ ममतामयी...

शरीर मे बहता खून
है लाल
लड़कोँ जैसा
क्या देखा तुमने खुद
कुछ नहीं थी खून की अहमियत

मार सको तो
मार भी  देना
मेरे खून मे आँचल डुबोना।
वह धब्बा कभी नहीं जायेगा
वह तुम्हारा ही खून है...

याद तो आयेगी मेरी तुमको
हर पल...हर दम....
आखिर आप एक माँ हो।
फिर क्यों हो इतनी लाचार कि
मुझे रख न सको दुनिया में,
सो न सकूँ
तुम्हारे आँचल की छाया मेँ....
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4.एक तारा
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हर रात.........
हर शाम........
जब कोई पास न होता
जब कोई साथ न होता...
बस अकेलापन ही साथ निभाता
ढूँढ रहा उजाला यह मुसाफिर
इस नशा भरी निशा मेँ
जिँदगी मेँ
बस अँधेरा ही अँधेरा है
नीले नभ की नीम निशा मेँ
पर एक तारा है।



परिचय और संपर्क

नीलम पृष्टी

कक्षा नवीं में अध्ययनरत
केन्द्रीय विद्यालय पारादीप पोर्ट

उड़ीसा 

14 टिप्‍पणियां:

  1. कविताएँ पढ़कर यह यकीन करना मुश्किल होता है कि यह किसी नौवीं कक्षा की बच्ची की रचनाएँ हैं . बेतरीन कविताएँ . अस्मुरारी भाई ने एक शिक्षक के रूप में इन कविताओं को उचित मंच पर पहुंचकर अपने कर्तव्य का निर्वाहन किया है . उन्हें बधाई एवं धन्यवाद . सिताब दियारा पर रामजी सर ने इन्हें प्रकाशित किया इसके लिए उनका भी दिल से आभार .
    -नित्यानन्द गायेन

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    1. बेहतरीन * पढ़ें (नित्यानन्द )

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  2. यकीन नही होता ये नवीं कक्षा की छात्रा की कवितायें हैं कितनी सघन वेदना के स्वर फ़ूटे हैं और सोच का स्तर तो बडे बडे कवियों की सोच को भी मात कर रहा है ………नीलम पर माँ सरस्वती का वरद हस्त है जो इसी तरह बना रहे और एक दिन देश के जाने माने कवियों में उसका स्थान हो यही कामना करती हूँ । " एक तारा " मे आस का दामन थामे रखना उसका जीवन की जद्दोजहद से आँख मिलाने के साहस को दर्शाता है तो "कलियाँ कहतीं " मे बेहद उम्दा कटाक्ष किया है और " मौन गीत " तो मौन की वेदी पर होम होती आशाओं , उम्मीदों और चाहतों का वो रुदन है जिसे कहना और इस तरह लफ़्ज़ों में बाँधना सबके लिये संभव ही नहीं है ।

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (14.02.2014) को " "फूलों के रंग से" ( चर्चा -1523 )" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है,धन्यबाद।

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  4. उम्र की बंदिश कविता तक नहीं पहुँच पाई ...अद्भुत कल्पना शक्ति ...बधाई हो |

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  5. sarahniya kavita nilam ko subhkamnayen aise hi likhati rahen.....

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  6. ''नहीं आउंगी
    नहीं खिलूंगी
    इस बगिया में ''
    ये थोड़े से शब्द ही बहुत कुछ कह जाते है |

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  7. नीलम को शुभकामना और रामजी भाई को धन्यवाद!!

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  8. अद्भुत रचनाएँ .....उम्र का कच्चापन मन की परिपक्वता पर कहीं हावी नहीं होता ....बधाई !

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  9. अप्रिपक्का मस्तिष्क में परिपक्क विचार ...लाजवाब रचना !
    new post बनो धरती का हमराज !

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  10. अपरिपक्क मस्तिष्क में परिपक्क विचार ...लाजवाब रचना !
    new post बनो धरती का हमराज !

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  11. अद्भुत इतनी संवेदना इतनी छोटी सी बच्ची में .. निश्चित विलक्षण है ये बालिका ... नतमस्तक हु इस लेखनी के सामने .. माँ सरस्वती यूँ ही इसके सर पर अपना हाथ बनाये रखे इन्ही दुआओं के साथ .. शुभकामनाये

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