रविवार, 8 सितंबर 2013

पद्मनाभ 'गौतम' की लम्बी यात्रा-कविता - 'शिलापथार'






पद्मनाभ गौतम की यह लम्बी यात्रा-कविता ‘ शिलापथार’ हमें उस भूगोल से तो परिचित कराती ही हैं , उस समाज और जीवन से भी हमें जोडती चलती है , जो इस देश का होते हुए भी हमारे लिए अनदेखा है , अनजाना है | इस कविता में संस्मरण भी है ,और यात्रा भी | और सबसे अच्छी बात तो यह है कि ऐसी लम्बी कविताओं में आम तौर पर छूट जाने वाली वह ‘कविता’ भी , जिसके नाम पर ये चलती हैं | पहली बार ‘सिताब दियारा ब्लॉग’ पर अपनी रचनाओं के साथ उपस्थित ‘पद्मनाभ’ जी का हम हार्दिक स्वागत करते हैं , और यह उम्मीद भी कि इस ब्लाग के साथ आगे भी उनका रिश्ता बना रहेगा |               


  
             प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर पद्मनाभ ‘गौतम’ की
                        यह लम्बी यात्रा-कविता ‘शिलापथार’  
                                                 
                                                          


शिलापथार - 1



शिलापथार है यह
और मैं यहाँ पर
एक मुसाफिर
कई बार होते हैं हम
किसी जगह बस इस लिए,
क्योंकि होता नहीं संभव
होना कहीं और
कहीं और होने का
विकल्प नहीं,
इस वजह से हूँ मैं
शिलापथार में
चंद रोज यहाँ रह कर जाना
कि शिलापथार है यह,
अर्थात् शिलाओं से भरा खेत
जानता था अब तक इसे
शिलापत्थर के नाम से,
और हँसता रहा था इतने दिनों/
भला दो समानार्थी
शब्दों को जोड़ कर भी
बनती है कोई संज्ञा
अब हँस रहा हूँ मैं
अपने-आप पर,
और हँस रहा हूँ याद कर
हायुलियांग के अबू नेसार की
उस बौड़म व्याख्या को भी,
जिसने ठग दिया था मुझको,
असमिया में चिलाका उच्चारण
शिलासे जोड़ कर,
जैसे प्रांजल बाबू
पुकारते हैं चायको शाय
और चिन्ताको शिन्ता
पूरे आत्मविश्वास के साथ,
साबित कर दिया था
अबू नेसार ने
इसे चीलों का गाँव
अब उड़ रही है
अबू नेसार की व्याख्या
उसके क्लासिक अल्ट्रा सिगरेट के
धुएँ की तरह
होकर गड्ड-मड्ड
आसमान में,
और उस धुएँ से
छन-छन कर उतरती शाम में
अकेला बैठा मैं,
सोच रहा हूँ
कि कुछ बातें होती हैं आरक्षित
काल की अनवरत यात्रा में
बस उनके लिए,
होता है जिनके पास
ठहर कर ध्यान देने का समय
कभी-कभी गुजर जाती है जिंदगी
जूझते उन उसूलों के लिए
होती नहीं जिनकी कोई जमीन ही
गेस्ट हाउस का
वाशबेसिन भी जैसे
चिढ़ा रहा है मुझको इस बात पर
- भला कुछ रोज यहाँ रूके बगैर
किस तरह जान पाते तुम
कि खुलता है मेरा नलका
ऊपर की जगह
नीचे की ओर लगी घुंडी से
एक अरसे तक
झुँझलाता रहा था मैं जिस पर
अव्यवस्था के नाम पर


शिलापथार-2


चार दिन भटकना है मुझे
इस कस्बे में,
लाइन पार बाबू साहब होटल,
कारेंगबील टैक्सी स्टैंड
और बंद रेलवे स्टेशन के बीच
बंद रेलवे स्टेशन बंद है,
क्योंकि
उखाड़ दी गई हैं
उसकी देह से दोनों तरफ
बाजुओं की तरह फुटकती
मीटर गेज की सिंगल लाइन
खुश हैं लोग
कि कुछ दिनों में
धड़धड़ाती दौड़ेगी
रंगिया से जोनाई
चौड़े गेज की रेलगाड़ी
खुश लोग यह नहीं जानते
कि छिन रहा है उनसे
धीरे-धीरे चलने का सुख
पटरियों के नीचे से
निकल आई है
चिकनी-सपाट जमीन,
जैसे रगड़ कर उघड़ आई है
त्वचा की अंदरूनी तह,
और इन दिनों
बेकारी भुगतता सिगनल
जैसे देख रहा है मुझको
एक बीड़ी की दरकार से
पर देखते हैं
बंद स्टेशन के पुलिसिये
मुझे संदेह के साथ,
यहाँ कुछ भी
संदेह से परे नहीं
पुलिस की निगाहों में
आहिस्ता-आहिस्ता
चल पड़ा हूँ मैं
वापस अपने ठिकाने को
पटरी के इर्द-गिर्द बस आए
अवैध झोपड़ों के बाहर खड़ी
जवान लड़कियाँ
कोस रही हैं
बीहू की तरंग में मस्त शराबी को,
और डर रहा है मेरा भयभीत मन
कि कोई समझ न ले मुझको भी
रस और रंग का गाहक,
मैं तो बस भटक रहा था यहाँ
मीटर गेज पटरियों की तलाश में


शिलापथार-3


ढेर सा समय है मेरे पास
और उसे काटना
उतना ही मुश्किल
किताबों की दूकान पर
मिलती हैं असमिया किताबें
जिनकी बिंदियों वाली
लिपि के सौंदर्य से अधिक
कुछ भी नहीं बूझ पाता मैं
हँसती हैं किताबें मुझ परदेशी पर
स्टेशन पट्टी की लड़कियों की तरह
पर इतना भी परदेशी नहीं मैं,
मिल गए हैं मुझको एक दुकान में
पेलागेया निलोवना, प्रेमशंकर,
अलेंग्जेंडर इलिनोइच और मोहनदास
जैसे मेरी ही प्रतीक्षा में
जितनी प्रसन्नता से झपटता हूँ मैं
लुगदी कागज़ पर छपी किताबों पर
उतनी ही व्यग्रता के साथ
पकड़ाया है दुकानदार ने
उन्हें मेरे हाथों में/
इन चार किताबों के बाद
अब नहीं मँगाएगा वह
हिन्दी की कोई किताब/
चार बीयर की बोतलों का खर्चा,
किताबों पर कौन करेगा बेकार
-कहा है मुझसे दुकानदार ने
माँ”, ”प्रेमाश्रम”, ”लेनिनऔर
सत्य के प्रयोगपर भारी हैं
बीयर की चार बोतलें
शिलापथार में


शिलापथार-4


शाम उतरती है
और गूँजने लगती हैं शिलापथार में
उलू देती गृहणियों की आवाजें
उलू की गूँज के साथ
फैलती है शिलापथार में
अगरबत्तियों की सुवास
पता नहीं, शिलापथार में
शाम होने पर जलती हैं अगरबत्तियाँ
अथवा अगरबत्तियों के जलने पर
होती है शाम
उलू की आवाज
केवल पूजा का पवित्र घोष नहीं,
उलू की आवाज है
मृत्य के आदेश पर
जीने की इच्छा का विजयगान/
हो रही हैं पराजित
दशकों से थर्राती-दहलाती
बमों और गोलियों की आवाजें
उलू के समवेत घोष से,
सालों से हवा में फैली
बारूद की विषैली गंध को
सुवास में बदल रही हैं अगरबत्तियाँ
शिलापथार में
इस सुवासित शाम में
आधे चांद की रोशनी में नहाए
तमूल के ताड़ से लम्बे पेड़
झूम रहे हैं हरे रामा-हरे कृष्णा के
एकल पद गान पर/
बीहू की मस्ती मे मस्त तमूलों ने
झूमते-नाचते ओढ़ ली है
जुगनुओं जड़ी साँझ की चादर
सोचता हूँ कभी चिढ़ाऊँगा
ताड़ के पेड़ों को
तमूल सा लम्बा बोल कर
कर पाता है कैद
मेरा मध्यमवर्गीय कैमरा
बस इस शाम के धुंधलके को,
शाम के नीलेपन से भीगी है
गहरे रंग की तस्वीर,
पर मैं जीवन भर देख पाऊँगा
इस धुंधली तस्वीर में
तमूल के पेडों के बीच से
झाँकती मद्धिम रोशनी,
गूँजेगी कानों में
उलू की जादुई आवाज,
और सारी उम्र महकेगी यह
शिलापथार की सुवास से


शिलापथार-5


शिलापथार बसस्टैंड पर
हँस रहे हैं टैक्सी एजेंट-
खो गया है कोई
शिलापथार की गलियों में/
खोए आदमी की पुकार के बीच
नाराज है कोई उस बोके पर,
जो खो गया है
सड़क के आर-पार बसी बस्ती में/
एक मुहल्ला सड़क के इस पार
दूसरा सड़क के उस पार/
सिलीगुड़ी में तुम्हारा
क्या होगा रे बोका लोग”-
चुटकी लेता है कोई
और फूट पड़ता है
उन्मुक्त हँसी का फव्वारा
चाय की दुकान पर खड़े
बिहारी मोटिये ने की है
दुकान मालकिन से सिफारिश
कि दे दी जाए चाय
मुझ बाहर से आए सरको
बारी से पहले,
बाहरी जो हूँ मैं शिलापथार में/
वह जो खुद आया है
भटकता बिहार के किसी गाँव से,
भूल गया है कि वह खुद भी है
मेरी तरह बाहरी/
थक मर कर हम्माली के बोझ में
शिलापथार में
मैं भी तो भूल गया हूँ
अपने आप को
इस सड़क के किनारे बसी
बस्ती के मायाजाल में
वापस लौटते हुए
रेलवे कालोनी के पंडित जी ने
उवाचते  ”जेन बद्धो बली राजा...का मंत्र
बाँध दिया है मेरे हाथ में कलावा,
चल रहा हूँ मैं सोचता
कि एक स्वयं असुरक्षित बाभन का बांधा
यह कच्चा कलावा
किस प्रकार करता होगा
रक्षा इंसान की


शिलापथार-6


आखिरी शाम है यह मेरी
शिलापथार में
और फिर से आ पहुँचा हूँ मैं
भटकता हुआ बाजार को,
नुक्कड़ पर रखा
चाय का ठेला खींच रहा है
मुझको अपनी ओर
कुछ चीजें होती ही हैं मेस्मेराइजर,
जैसे मेरे लिए
चाय के भगोने में
दो बालिश्त की ऊँचाई से
गिराई जाती चाय
चाय की दूकान के पीछे बैठी है
चने बेचती स्त्री
जो कर रही है
दिखा कर बाँए हाथ की तर्जनी
किसी से कठोरता से बात,
और सामने खड़ा मर्द
दे रहा है मरियल सी आवाज़ में सफाई,
बाँए हाथ से बेफिक्र दाहिना हाथ
घूमता है यंत्रवत्
भुँजते चने के कड़ाह में,
और मेरे मन में घुमडता है विचार
कि क्यों न बन जाए वह स्त्री
देश की प्रधानमंत्री
जो दिखाकर बाँए हाथ की उँगली
कर देगी सबको मौन
और दाँए हाथ से
ईमानदारी से करेगी अपना काम,
चल पड़ा हूँ मैं
हँसता अपने आप पर,
सड़क के इर्द-गिर्द की
मलाईदार धन्धों की दुकानें हैं
सुदूर उत्तर-पश्चिम से आई
परदेशी मुट्ठियों में कैद,
और स्थानिकों के हिस्से में
चाय के ठेले, सब्जियों के फड़
और गौहाटी जाती बसों की दलाली,
मुझे डर है कि यहीं-कहीं
दिख जाएगा मुझे
अलेग्जेंडर इलिनोइच
मन में लिए एक कठोर संकल्प
और माँगेगा मुझसे
मेरा पहचानपत्र
पर दिखता है मुझको एक मोटिया
जो बीच सड़क पर चीख कर
दे रहा है किसी को
ए हो रुका तनी, हमू आवातानी
की आवाज,
आस-पास की दुनिया से
निर्लिप्त है मोटिया
शिलापथार भी तो है
मोटिये की दुनिया से निर्लिप्त ही,
जो चला जा रहा है अधनंगा
बीच सड़क पर
चारखाने की लुंगी पहने अलमस्त
सड़क जो आज है निर्बाध,
काटती थीं कभी इसे
मीटर गेज की पटरियाँ,
परंतु क्रासिंग पर लगे बैरियर
आज भी खड़े हैं पूर्ववत्
दो आसमान ताकती तोपों की तरह
धमकी देते हैं बैरियर,
कि जरा ठहरो
अभी दम ले रहे हैं हम,
दोबारा फिर सताएँगे तुम्हें
पहले की तरह,
जब दौड़ेंगी हमारे बीच से
धड़धड़ाती हुई
बड़ी लाईन की गाडि़याँ
उधर तैयार हो चुकी है
लाइनपार के बड़े मंदिर में
संझा-आरती,
पर मुझे देख कर
कुछ अकड़ कर बैठे महंत
अब हैं निराश,
उनके चरण छूने की जगह
बैठ गया हूँ मैं जो
मोटियों के  धमा-चौकड़ी मचाते
बच्चों के बीच
एक दुष्ट लड़के ने मारा है
एक मुलायम सी बच्ची को
जोर का थप्पड़ ,
लेकिन पुचकार नहीं सका हूँ उसको,
क्योंकि देखी थी
उसकी बेबस आँखों में
मैंने एक दहकन
एक दिन यही दहकन
बनेगी तुम्हारी ताकत ”-
मैंने दिल से दी दुआएँ उसे
और तभी घनघना उठीं
मंदिर की घंटियां जोर से
उस लड़के को भी
कहाँ दे सका मैं बद्दुआ कोई


शिलापथार-7


रात गहरा चुकी है
और गेस्ट हाउस में
अंडों की ट्रे का
कागज जला कर
मच्छर भगाता दाजू
कर रहा है मेरी प्रतीक्षा
भाग जाएँगे मच्छर
इस गंध से,
कहता है दाजू
कल मैं भी तो
चला जाऊँगा यहाँ से,
हँसता हूँ मै
कल आने वाला है
आलंग से
कर्नल मूर्ति का भेजा हुआ
पुष्पक विमान,
यानी कर्नल के बेड़े की दुर्लभ जीप
जिससे उतरेगा
देवदूत की तरह
मोटी तोंद वाला सर्वेयर प्रदीप
और सवार होऊँगा मैं
उसकी जगह स्वर्गारोहण के लिए
विमान में
पहाड़ों के ऊपर
स्वर्ग के कुछ पास ही तो है
आलंग
दर्ज हो जाएँगे जीप की लॉगबुक में
एक यात्रा में दो यात्री,
तय हो जाएगा
महामंदी के माहौल में
संसाधन का अधिकतम उपयोग
पर कहीं दर्ज नहीं होगी
मेरी पाँच दिनों की बेकारी,
शिलापथार में
इस बचे समय में ताक रहा हूँ मैं
आधे चन्द्रमा को,
झूलते-झूमते तमूलों को,
भर रहा हूँ कलेजे में
अगरबत्तियों की सुवास,
कर रहा हूँ दर्ज
अपनी स्मृति में शिलापथार को
इस बचे समय में
कुछ और जी ले रहा हूँ मैं
इस बेशकीमती आवारगी को

(शिलापथार - असम और अरूणाचल की सीमा पर बसा असम का अंतिम कस्बा )

परिचय और संपर्क

पद्मनाभ गौतम

रिलायंस कॉम्प्लेक्स
ग्राम-कामकी, पो.-काम्बा
जिला-पश्चिमी सियांग
अरुणाचल प्रदेश, पिन-497335.
मो.-9436200201



4 टिप्‍पणियां:

  1. बिम्ब अच्छा उठाया था पद्मनाभ जी ने. लेकिन कविता के फ़ार्म में उसे कस नहीं पाए. शब्द स्फीति बहुत ज्यादा है और कविता बोझिल हो गयी है.

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  2. धन्यवाद अशोक भाईजी, आपने मुझे अपने को माँजने की जो हिदायत दी है उस पर अवश्य अमल करूंगा। इस बारे मे कोई बचाव नहीं..आप आगे भी इसी प्रकार मार्गदर्शन करते रहें यही अपेक्षा है..

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  3. suder aur khoobsurat kavita.sudur north east ke kasbe rubaru hone ko mila .abahut achacha laga .padmnaadh ji ko badhai .

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    1. मार्गदर्शन हेतु आपका धन्यवाद दीपेंद्र जी, रामजी भैया को धन्यवाद कि उनके माध्यम से यह आप तक पहुंची!!!

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