रविवार, 1 सितंबर 2013

नालायक बनने में ही आदमी का बचाव है ....रामजी तिवारी




सिताब दियारा ब्लॉग पर अपनी कविता देने से अभी तक बचता आया हूँ | लेकिन कुछ मित्रों की सलाह है , कि उन्हें यहाँ भी उपलब्द्ध होना चाहिए | हालाकि इसे लेकर मन में थोड़ी झिझक भी है , कि ऐसा करना उचित होगा , या नहीं | लेकिन यह सोचकर कि ये सब कवितायें नेट के पाठकों के लिए एक जगह ही उपलब्द्ध हो जायेंगी , इन्हें यहाँ सिलसिलेवार तरीके से देना आरम्भ कर रहा हूँ | बताता चलूँ , कि इनमे से कुछ कवितायें अन्य ब्लागों पर भी छप चुकी हैं  | आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं का इन्तजार रहेगा | .......................
                                                        रामजी तिवारी
                                              
    एक ...   

 शिशु खारिज
               (जर्मन पादरी ‘पास्टर निमोलर’ को याद करते हुए)          
                                             
             
सबसे पहले वे              
मेरी कविता के लिए आये ,
यह सोचकर कि कोई आत्ममुग्ध ना कह दे
मैंने आदर किया
उनके लिए आसन भी बिछाए   |
                         
फिर वे
कविता की विधा के लिए आये ,
मैं एक खारिज आदमी
उन्हें रोकने में कितना दाखिल हो सकता था
कोई मुझे बतलाये  ?

और फिर
उनके हाथों का खारिजी फन्दा
साहित्य की गर्दन पर कसता रहा ,
मैं बेबस सिवान बदर
डँडार पर खड़ा पैमाईश देखता रहा |

अब काम पूरा हुआ समझना
मेरी भूल थी ,
उनके खारिजी अश्वमेध का घोड़ा
सारी रचनात्मक विधाओं को
एक-एक कर रौंदता रहा
चहुंदिस गुबार था , धूल थी |

सोचता हूँ
उस ‘शिशु खारिज’ के सामने
तन कर खड़ा हो गया होता ,
तो उसी पल उसी जगह
वही खारिज हो गया होता   |



दो .....

नालायक

मैं नालायक हूँ
और यह मेरा अपना चुनाव है ,
अब लायक होने की शर्तें इतनी नालायक हैं
कि नालायक बनने में ही आदमी का बचाव है |
         
नहीं जानता
कि नालायक कब से हूँ ,
डाक्टर बनने के बाद
आदिवासी इलाके को
कार्यक्षेत्र के रूप में चुनने पर
पिता ने नवाजा था
शायद तब से हूँ |

‘पिता समझदार हैं’
माँ ने इस पर आजीवन संदेह रखा ,
लेकिन इस चला-चली की बेला में
पहली बार उनकी नवाजिश पर नेह रखा |
जब गाँव की रामरती चाची
माँ से लिए गए कर्जे को
तीन साल में तीन गुना लौटाने आयीं थीं ,
और मैंने सिर्फ मूलधन लेने वाली बात सुझाई थी |

घर में घोषित नालायकी को
मेरे गाँव ने उस समय रुई जैसा धुना था ,
जब उस बीहड़ इलाके की
इकलौती आदिवासी शिक्षिका को
मैंने अपना जीवन साथी चुना था |

मेरी नालायकी से परिवार कभी सुखी नहीं हुआ ,
यह और बात है जिस पर मैं कभी दुखी नहीं हुआ |
उस समय भी नहीं
जब मेरे बेटे की डाक्टर वाली ईच्छा अधूरी रही ,
मैं वह डोनेशन नहीं जुटा सका , मेरी मजबूरी रही |
तब मेरे बेटे ने अपने दोस्तों से कहा था ,
‘मेरे दादा-दादी ठीक ही कहा करते थे
सचमुच उन्होंने एक नालायक को सहा था |’

मित्रों
चाहा तो मुझे भी गया था लायक ही बनाना ,
कि बीच रास्ते यह ‘समझ’ आ गयी
जिसने लिख दिया इस माथे पर
नालायकी का यह तराना |





परिचय और सम्पर्क


रामजी तिवारी

बलिया उ.प्र.

मो. न. 09450546312


12 टिप्‍पणियां:

  1. ye nalaayaki ...kaash sabko haasil ho jaaye.

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  2. दोनों कवितायेँ बेहतरीन हैं ..नालायकियत का आख्यान रचती कविता तो बहुत फबती है हम जैसे नालायकों पर

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  3. बेहतरीन कविताएँ ....
    'मैं नालायक हूँ
    और यह मेरा अपना चुनाव है ' गहरी बात ......

    आभार इन कविताओं को यहाँ प्रस्तुत करने के लिए |
    सादर
    नित्यानन्द गायेन

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  4. अब लायक होने की शर्तें इतनी नालायक हैं
    कि नालायक बनने में ही आदमी का बचाव है
    ***
    सटीक, लायक और गहरी बात!
    सादर!

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  5. नालायक बहुत अच्छी ठोस ठसक कविता है बहुत बहुत आभार आपका ।

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  6. पाश्‍चर नीमोलर को यह अलग ही किस्‍म की काव्‍यांजलि है राम जी भाई। बहुत ही आल्‍हादकारी... नालायक तो जैसे हम जैसे नालायकों के ही लिए है... बधाई।

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  7. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [02.09.2013]
    चर्चामंच 1356 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

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  8. nalayak kavita sach me bahut satik hai ham jaiso ke jiwan ke liye.

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  9. भाई आपकी दोनों कवितायें अच्छी लगीं. नालायक वाली कविता ख़ास तौर पर. बधाई.

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  10. Bhai Ramjee Tiwaree bahut khoob... laajavaab...
    Dono kavitain vaastav mein kavitain... gathjod aur kitrimta se ekdam door... saral, painee aur
    gahree... kaash sab nalyaakee ka chunaav Karen
    Ki drishti pa jaayen! Aao iske liye samoohik prayas karen. Abhaar.

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