रविवार, 19 मई 2013

पंखुरी सिन्हा की कवितायें



                            पंखुरी सिन्हा 


एक कथाकार के रूप में पंखुरी सिन्हा जाना-पहचाना नाम है | ख़ुशी की बात है , कि इधर के कुछ वर्षों में उन्होंने कविता की विधा में भी हाथ आजमाया है , और कहें तो बखूबी आजमाया है | सिताब दियारा ब्लॉग इसी वर्ष में दूसरी बार कविता की इस विधा में उनका स्वागत करता है |
                                      
           प्रस्तुत है युवा कवयित्री पंखुरी सिन्हा की तीन कवितायें

एक ..... 
कविता कहने की राजनीति

हर बात की काट थी,
हर बात पर चोट,
हर सोच पर आक्रमण,
भेजते हुए उन्हें गीत अपने,
हर किसी को,
प्रतिध्वनियाँ केवल पुरानेपन की,
बासीपन की,
कुछ इस तरह ख़बरों पर लिखी जा रही हो कविता,
याकि ऐसी हो दारुण खबरें चारो ओर,
जबकि बात बहुत ज़रूरी हो,
और नयी,
सर्वथा मौलिक,
ओस के बूँद सी ताज़ी,
सोच सी बारीक,
पर इस कदर आन्दोलन बन चुकी थी कविता,
या प्रत्युत्तर अत्याचार का,
जैसे एक कदम पीछे लौट गया हो वक़्त,
किसी आतंकी के राज में,
और कलाकार कहता जाये,
खिलाफत में उसकी,
शब्द की हस्ती हो सबसे महान,
जब वह करे विरोध,
गुनाह का, क्राइम का,
अनुभव सब बेकार, बर्बाद,
बिखरे,
भेजते गीत अपने,
चित्र अपने, प्रीत अपनी,
खाली सब,
रिक्तता केवल,
पूरी तरह बिखर गई,
अपनी ज़िन्दगी के टुकड़ों पर,
तलाशते नाम,
भाषा की सरहद पार,
भीतर, बाहर,
कि भाषा उन्मुक्ति भी हो,
गिरफ्तारी भी,
गिरफ्त के बाद,
जहाँ केवल अर्थ हो भाषा,
और बचा ले सकता हो नाम कोई,
भाव कोई,
नृत्य कोई,
गीत कोई,
तड़प ऐसी,
किन्तु अर्थ हो केवल भाषा,
और कुछ नहीं,
और मौसम भी हो भाषा,
आने जाने वाला हर मौसम,
बड़ी बेशर्मी से मौसम,
भुला कर उन सबको,
जिन के लिए सिर्फ मार है मौसम,
गर्मी मार, सर्दी मार,
और वसंत केवल रंगों की अनुपस्थिति,
सरकारी पेड़ों का फूल.....................








दो .....
त्यौहार मनाना


मनाना कोई त्यौहार ऐसे कि,
वो आपका नहीं हो,
आपकी कौम का नहीं,
या आप ही की कौम का हो,
बस आपका नहीं,
बन नहीं रहा हो आपका,
सीधी सी बात नहीं,
कि जैसे गरीबों का त्यौहार,
बल्कि जैसे लूटा गया हो आपको,
ठीक त्यौहार की एक शाम पहले,
और अगले दिन छुट्टी रही आई हो,
थाने में,
और छुट्टी ही रही आई हो,
थाने में, पूरे साल,
बल्कि सालगिरह हो यह उसकी,
और छुट्टी ही रही आई हो,
थाने में, पूरे साल,
बिना कहे कि नहीं करेंगे काम हम आपका,
नहीं देखेंगे केस हम आपका,
हम लोग नहीं आपके,
कौम नहीं आपकी,
कोई नहीं आपका,
त्यौहार नहीं आपका,
कोई भी,
औरों, औरों के त्यौहार में,
न्योते आपको,
सादर, सहृदय,
मर्ज़ी उनकी।



तीन ....

एक अद्भुत युक्ति में              


कुछ बहुत उम्दा कहे में,
अद्भुत युक्ति में एक,
जो कहती हो कई राज़ की बातें,
यानि सुराग वो, पता वो,
जिसमे जीत हो मेरी,
याकि सम्भावना जीत की,
यानि पाने की ज़िन्दगी अपनी,
जीने की भी उसे,
पाना कि कहीं कह दिया हो,
उसने,
अपने सबसे प्रिय के खिलाफ कुछ,
डर ये, खौफ ये, पर क्यूँ ये,
ऐसा महोत्सव एक,
अब ये गलत,
अब वो गलत,
नाकेबंदी ये,
कैसे गलत हो सकती है,
युक्ति ऐसी,
भक्ति ऐसी,
जो बताती है,
सब कातिलों का पता,
सारे गुनाहगारों का,
जो लापता नहीं,
बाकायदा ताजपोश हैं,
तख़्त पर आसीन,
उन गद्दियों पर,
मॉडर्न दफ्तरों के,
जो तख़्त हैं हमारे लिए,
और वह युक्ति हमारी,
जो मिली, ढूंढी जो,
जो खोले तालों के सुराग,
जलाये अँधेरे में चिराग,
धरी हुई कागज़ के किसी पन्ने पर,
चुपचाप, बंद अक्षरों में केवल।






परिचय और संपर्क
              

पंखुरी सिन्हा
                                  
संपर्क--- 510, 9100, बोनावेंचर ड्राइव, कैलगरी, SE, कैनाडा, T2J6S6
403-921-3438---सेल फ़ोन
जन्म ---18 जून 1975       
किताबें ----- 'कोई भी दिन' , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2006
                  'क़िस्सा--कोहिनूर', कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2008
                   कविता संग्रह 'ककहरा', शीघ्र प्रकाश्य,    




6 टिप्‍पणियां:

  1. सभी कवितायेँ सराहनीय हैं मगर अंतिम कविता विशेष रूप से प्रभावशाली है.पहली कविता में कुछ जगह पर शब्दों का दोहराव प्रवाह में बाधा डालता है.'त्यौहार मनाना' में समाज का यथार्थवादी चित्रण है.

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  2. ​ पंखुरी ...कविता में कहानी जैसा विस्तार कविता की कमर को तोड़ता है ......इससे बचाना चाहिए ...कविता कसावट की मांग करती है .....त्यौहार कविता में नया पन है .....अच्छा है बढ़े चलो ...​

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  3. arth ki bhasha,mausam ki bhasha,sarkari pedon ka phool......wah! naye bimb...nai soch.....antim kavita sarvtha naveen prayog......badhai....!!!

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  4. Thanks Mita ji, will keep in mind what you have said. But vistaar in poetry is tricky, especially when its not story-like but argumentative, like, "satpura ke ghane jungle, unghate anmane jungle"..............details not prohibited, I think, its like beauty lies in the eyes of the beholder. "sookhi ret ka vistaar, nadi jisme kho gayi krishdhar", and one has to keep practicising, thanks again

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  5. Thanks Neelam ji, am very honoured, in what a beautiful language have you given me compliments. Thanks again. Thankyou for liking my images and experiments.

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