रविवार, 12 मई 2013

अरविन्द की पांच कवितायें


                                     अरविन्द 



अरविन्द की कवितायें आप पहले भी 'सिताब दियारा' पर पढ़ चुके हैं | और आप ही की तरह मैं भी इस अत्यंत प्रतिभाशाली युवा कवि को बार-बार 'सिताब दियारा' पर देखना और पढ़ना चाहता हूँ | पच्चीस साल की उम्र में इनके पास 'अपनी सहपाठिनों की यादे तो हैं ही’ , ‘अपनी अंतिम ईच्छा बताने का साहस भी है’ | अरविन्द जैसी अनूठी और नितांत मौलिक शिल्प की कवितायें मैं भी लिखना चाहता हूँ  , लेकिन इन कविताओं को पढने के बाद , किसी भी लेखक की तरह मेरा मन भी पाठक ही बने रहना पसंद करने लगता है | सो मैं इन्हें लिखने काम अरविन्द पर छोड़कर इनमे डूबने और जीने का काम पसंद करना चाहता हूँ , जैसा की 'अरविन्द' स्वयं चाहते और जीते हैं | 'अरविन्द इतना कम क्यों लिखते हैं' , यह सवाल जितना सालता है , 'अरविन्द इतना बेहतर लिखते हैं' , यह जबाब उतना ही तसल्ली प्रदान करता है

                  
                 प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर प्रतिभाशाली युवा कवि 
                               अरविन्द की पांच कवितायें 


एक .....

सहपाठिने - जो आधा मौन और आधा आवाज थीं ...


कक्षाओं में उनकी उपस्थिति
धरती पर अपनी उपस्थिति की तरह थी .

किसी आश्चर्य सुख या हरी वनस्पतियों की तरह
देखा करते थे हम उन्हें छिपकर
वे उन दृश्यों में अपने को ऐसे मौजूद रखती थी
जैसे उन्हें कुछ नहीं मालूम .

कक्षाओं में उनकी अनुपस्थिति के दिनों में
ऐसा लगता था कि हमारा वजूद आस पास कही खो गया बिखर गया है
और लगातार ढूढ़ने से भी नहीं मिल रहा .

वह दिन लगता था रिक्त चला गया
अपने बीच के संबंधों को लेकर हम हमेशा चुप थे
हम केवल हवा हंसी आवाज चलने और बोलने की तीव्रता से
प्रेम की सांद्रता मापते थे .

हम हमेशा विषय से उलट बात करते थे
जैसे हम रंग के बारे में बात करना चाहते थे
तो हम अमोनियम नाइट्रेट के बारे में बात करते थे
हम आँखों ,मन ,परिन्दगी ,और इच्छाओं पर बात करना चाहते थे .
लेकिन गुरुत्वाकर्षण ,सूत्रों,और प्रमेयों के बारे में बात कर जाते थे

आँखे मन इच्छाएं रंग और परिन्दगी
हमारे बीच के चुप आकाश में तैरते रहते थे .

वे बेंचों पर अपने नाख़ून खुरचती रहती थी
हम उनके नेलपालिश के उतरनो को मोरपंखों की तरह सहेज लेते थे .

हम उनके धरे गए पांवों की जगहों पर
अपने कदम रखते हुए चलते थे
उनकी बैठी जगहों पर बैठते थे .

नलों पर उनके पानी पीने के ठीक बाद
हम पानी पीते थे
वहां उनके चेहरे की छायाएं महसूसते थे
उनकी हंसी को हम हरसिंगार की तरह चुनते थे .
वे मध्यावकाश में हमें
पराठे,आचार के टुकड़े,नीबू की एक फांक या कोई फल
देती थी ,जिसे हम जीवन भर बचा लेना चाहते थे .

उन दिनों उनकी हेयर क्लिप बिंदी या कलम
या लिखावट पाकर हम असीम सुख से भर जाते थे .

खाली कक्षाओं में कभी कभी
जब वे श्यामपट्ट पर बना देती कोई चित्र ,अल्पना या फूल
या खींच देती थी कुछ निरर्थक रेखाएं
हम चाहते थे अंकित रहे वह
पूरी सभ्यता तक .

सहपाठिने
जो आधी प्रेमिका और आधा दोस्त थीं
जो आधी आवाज और आधा मौन थी
जो आधी नदी और आधा समुद्र थीं
जो आधी आत्मा और आधा मन थीं .

हमारे जीवन में कुछ इसी तरह शामिल थीं वे
जिनके बिना हम तब भी आधा लगते थे
और क्या कहें आज भी आधा ही लगते हैं |


दो ....


भाषा ...


बहुत सारी भाषाएँ हमारे आस-पास थीं
जीवन को उदार बनाने वाली संभावनाओं की भाषा
हमारे घरों के आस-पास ही थी.

तिनकों की भी भाषा थी
तिनकों की सर्वश्रेष्ठ किताब घोसला था
चिड़ियाँ की चोच कलम की तरह नुकीली थी .

हवा किसी ब्रेललिपी की तरह थी
जिसे छू कर पढ़ा जाता था
पक्षियों की उड़ान
हवाओं के असाधारण उड़ान की तरह थी .

पानी की कोई भाषा थी
जिससे दुनिया भर का जीवन लिखा गया था
मछलियों से बढ़कर नदी का कोई पाठक नहीं था .

पेड़ अपने वादों में सर्वाधिक विश्वसनीय थे
वे वही मिलते थे
आँगन में उगे पेड़ की भाषा की अनुवादक
एक कोयल थी
सारा बगीचा दिन भर बतियाता था .

किसी फल का स्वाद भी एक भाषा
उनकी पत्तियों का स्वाद
फलों के स्वाद की किताब की पूर्वपीठिका थी .

खुश रहने की वर्णमाला दूब में रोप दी गयी थी
पैरों तले लगातार दबकर भी
उसके जिल्द नहीं मुड़ते थे .

रंगों की भाषा के प्रचार की जिम्मेदारी
तितलियों के पास थी
वे पीठ पर शब्दकोष ढोती थीं .

आकाश के कागज पर
नीली स्याही का विस्तार था
जिसके ऊपर पूरब और सूरज का अनुबंध लिखा था .

पत्थरों पर दूब सर्वश्रेष्ठ आत्मकथा की तरह उगी थी .

दुनियां में जिसे सर्वाधिक लोगों ने पढ़ा था
जीवन को और अधिक उदार बनाने वाली संभावनों की आधारशिला
प्रेम जिसकी भाषा महान थी .

आखिर पृथ्वी किसके सम्मान में
पूरी विनम्रता के साथ झुक कर
जीवन का अध्याय लिख रही थी !


               
तीन ...

और आखिर में मरने के बाद 

मरने के बाद भी कुछ चीजें चाहिए मुझे लोगों।
               
मेरे गाँव की नदी के तल से
ले आना सीपियाँ
जिसके कोषों में बन्द है मेरा अतीत
रख देना सिरहाने
ये मेरे होने की याद दिलायेंगी

आसमान के रंग में डूबा मेरा आँगन
वहाँ से थोड़ा नीलेपन की मिट्टी
थोड़ी गीले भोर में डूबी उषा
ये मुझे घर की याद दिलायेंगी  ।

गलियों के मोड़ो से ले आना
आहटों के परिन्दे
इनकी फड़फड़ाहट से मुझे बगीचे की याद आएगी।

बाँस की गाढ़ी हरितिमा और उनके अन्दर डूबा अन्धेरा
थोड़ी हवा जो बाँसुरी के इन्तजार में रहती है
केले के हरे तने से थोड़ी ठण्डक
जो मेरी आँखों को जिन्दा रखेगी
दो अंजुली चिड़ियों का बहता स्वर
और उनके अण्डो की गर्माहट
मेरा तापमान बनाये रखेंगे ।

कविताओं की किताबों के बिना मैं
एक रात भी नहीं रह सकता
हो सके तो मुझे एक लैम्पपोस्ट के नीचे दफनाना
गयी रात गर गुजरो इधर से
और पढ़ने की धीमी बुदबुदाहट सुनो तो
समझना मैं ही हूँ ।

अगली शताब्दियों में कभी आओ मिलने तो
फुलों का गुलदस्ता मत लाना
अच्छी कविताओं की कोई किताब लाओगे
तो मरने का दुःख नहीं रहेगा।

मेरी कब्र के इर्द-गिर्द इनकी उपस्थिति रहेगी
तो यकीनन मैं मरा हुआ महसूस नहीं करूंगा।
मुझे जलाना मत मेरे लोगों
किसी पेड़ की सूखी जड़ों के बीच दफना देना
मेरी आँखों पर थोड़ी कम मिट्टी डालना
अगला जन्म अगर सच में होता होगा
तो मैं एक पेड़ की तरह उगना चाहता हूँ ।

सुना है
पेड़ों के बड़े दुःख होते हैं
अगर वे लिखते या बोलते
तो सच्चे कवि साबित होते।



चार ...

शहर-दर-शहर  -- छूटी ईच्छाएं 


एक नीद की तरह बीत गया था बचपन.
बचपन के दिनों से ही लगातार बदलता रहा ठिकाना
मेरा घर
शहर दर शहर
कभी पहाड़ कभी जमीं कभी रेत पर .
लगातार बदल रहे घरों के साथ
हवा धुप रंग आसमान
और आँगन भी बदलता रहा
और मिटटी की खुशबू भी .
एक झटके से मेरे घर का जमा जमाया
वृक्ष उखड़ता था
और चल पड़ता था उस शहर में अपनी जड़ें छोड़कर .
बार बार उजड़ने बसने में माँ ज्यादा अचकचायी रहती थी
हर रात वह कुछ इस दुश्चिंता में सोती थी
बस अगली सुबह हमें दुसरे शहर चल पड़ना है
.
मां की आँखों में एक अप्रत्याशित यात्रा का झलकना रहता था.
एक शहर में एक नदी मिलती थी
एक शहर पहाड़ों का शहर था
एक शहर में घर के बगल में पुराना पीपल था
एक शहर में सहजन के पेड़ था
मै बिछड़े बचपन के उन कई मित्रों से मिलाना चाहता हूँ
जो स्मृति में किसी अविस्मरनीय फिल्म की तरह है
मै उन सभी घरों को देखना चाहता हूँ
जिसमे मेरा बचपन बिता था
जहाँ मेरे दोस्त थे
जहाँ अक्कड़ बक्कड खेले थे
उस गली में जाना चाहता हूँ जहाँ मैंने साईकिल सीखी थी
पतंग की उस डोर को देखना चाहता हूँ जो आज भी अटकी होगी
एक शहर मेरी प्रेमिका का शहर था
उसे छोड़ते आसमान से नीलापन
नदी से किनारे
फुल से रंग
शब्द से अर्थ और
देह से मन छुट गया था .
मै उस शहर में उस प्रेमिका के पास जाना चाहता हूँ
और देहरी पर अटके मन से बात करना चाहता हूँ .
शहर के किसी घर में खो गए
एक हरे सफ़ेद रंग की गेंद मै खोजना चाहता हूँ
जो हाँथ की पहली गेंद थी
उस कमीज को खोजना चाहता हूँ
जिससे मैंने बटन लगाना सीखा.
अपने बोले गए पहले वाक्य को जानना चाहता हूँ .
मै जानता हूँ की मेरी इच्छाओं में वर्णित कई चीजें
अस्तित्व में नही होंगी
लेकिन इच्छाएं तो इच्छाएं है .
वह कभी नहीं मरती
वह केवल पूरी हो सकती है
इच्छाएं और स्मृतियाँ मरने के बाद मरती होंगी


पांच ....

अन्तिम कुल है

सभ्यता की बची
कोई अन्तिम ईंट
बराबर कुल शहर ।

किसी छोटे निर्जन द्वीप पर बचा
एक आदमी
बराबर कुल आबादी।
           
कहीं किसी में बची कोई लुप्तप्राय भाषा
बराबर कुल आवाज ।

कहीं बची हुई कोई नदी
बराबर कुल समुद्र।

इस वक्त पच्चीस साल का हूँ
पच्चीसवें साल के अन्तिम दिन की आखिरी सांस में
बराबर पच्चीस साल की कुल सांस।

अन्त समय में
पत्नी का हाथ
हाथ में लेकर मुस्कुराना
जीवन भर के कुल हँसी के बराबर
मरते वक्त उसका हाथ पकड़कर मरना
जीवन भर हाथ पकड़कर रहने का सुख।

अब तक बह्मण्ड में
बची केवल एक पृथ्वी
बराबर कुल पृथ्वी ।

अन्तिम कुल है !


परिचय 

नाम – अरविन्द


उम्र- 25 वर्ष        
शिक्षा - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर 
सम्प्रति - प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक 
मो.न.  07376844005  
निवास- नौगढ़ , जिला चंदौली , उ.प्र.  
फिल्मों में विशेष रूचि        




  

11 टिप्‍पणियां:

  1. कवि ने प्रेम का तरल स्पर्श पाया है जो अब भी उसकी आत्मा का आवरण है । वह जिस चीज को स्पर्श करता है वह उसके प्रेम से भीग जाती है और अपने रंग छोड़ने लगती है । ये कवितायेँ उन्हीं रंगों के मुखर शब्द हैं । कवि का यह प्रेम बना रहे और उसके स्पर्श चीजे बोलती रहें । अरविन्द को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं । ब्लॉग का आभार ।

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  2. arvind aapko dil se shubhkamnayen..aaj pahali baar aapki kavitayen padhin..subah se udaas mn khush sa ho gyaa..sahpaathine...wah kitani komalta se saheja hai aapne us yaad ko ..ek ke baad ek sabhi kavitayen..kamaal ek saans me bade dinon baad padhi itani sundar kavita..ram ji sir ka aabhaar...

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  3. prbhavit karti hain kvitayen.. gahri parton me dabi kinhi smritiyon ko kured kar hara kar deti hain.. bahut badhai..

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  4. अरविन्द के कथ्य और कहन दोनों में नवीनता है .ये कविताएँ हमारे आस पास का मोहक और संवेदनशील अवलोकन हैं .

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  5. Arvind ke anubhav, bhasha aur abhivyakti ke sansaar ka is tarah nirantar saghan hota jaana atyant sukhad hai. Unko badhai aur Shubhkaamnaaen!

    Shrikant

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  6. 'सहपाथिनें' कविता पढनी शुरू की तो स्कूल कॉलेज के दिन आँखों के सामने आ गए.निस्वार्थ बेफिक्री का दोस्ती का यह रिश्ता फिर कभी नहीं मिलता.'भाषा' में मन और प्रकृति का तालमेल किया गया है कि आत्मस्फूर्त भाव अपनी भाषा कहीं से भी तलाश लेते हैं.'और 'आखिर में मरने के बाद' लेखक की अंतिम इच्छा के बहाने यह दिखलाती है कि जीना कितना महत्वपूर्ण है. बिना शरीर रह जाना उदास करता है क्योंकि कवि किताबॉ से घिरा रहना चाहता है और अगले जन्म में पेड़ बनकर प्रकृति का हिस्सा बन जाने की उम्मीद रखता है.'शहर दर शहर-छूटी इच्छाएं' सबसे उम्दा कविता है. जब भी हम रहने की जगह बदलते हैं हमारा कुछ हिस्सा वहीँ रह जाता है.बचपन में किराये के मकानों में बिताये दिन सपने में आवाजाही करते रहते हैं.'अंतिम कुल है'में जीवन का जमा भाग है.

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  7. Haan, waqai, bahut jeevant kavitayein, badhai Arvind ji. College ki class mein dubara bitha dein jo aapko, ya sair kara layein. Gaon se mangaane wali cheezein bhi bahut sundar chuni hai aapne, kele ki hari chanv, hare tane uske. mujhe premika ke shahar wali baat sabse khoobsoorat lagi. Shringaar rus hai kavitayon mein, aur chayawaad bhi ghanghor.

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  8. उम्र के हिसाब से परिपक्व कवितायेँ जहां इच्छाएं है और यह स्मर्तियों की भाव-गूंज में रची-बसी है ' अपने बोले गए पहले वाक्य को जानना चाहता हूँ ' और देहरी पर अटके मन से बात करना चाहता हूँ '....... हमें सहज सरल अनुभव में मनुष्य होने की एक तरल सह्रदयता का स्पर्श प्रदान करती 'पेड़ों के बड़े दुःख होते अगर वह लिखते या बोलते तो सच्चे कवि साबित होते '
    ...इन कवितायेँ को पढ़ते मुझे कवि हेमंत कुकरती की कहन शैली याद आई ... इसमें कहीं कहीं रूप का प्रभाव है ... आगे बस यह हावी न हों ... मेरी तरफ से युवा कवि मित्र को बधाई ... सिताब दियारा का आभार

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  9. सहपाठिने बहुत अच्छी लगी...बधाई !!! सभी कविताएं टटकी है....

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  10. सहपाठिने एक विशिष्ट कविता है ऐसी कविता शायद नहीं लिखी गयी होगी

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