सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

डा. सुनीता की कवितायें


                                   डा. सुनीता 


डा. सुनिता की ये कवितायें बहुत सहजता से हमारे भीतर उतरती हैं | इनमे न तो अतिरिक्त शोर है, और न ही अतिरिक्त बेचैनी | हां ! इनमे वह बात जरुर है , जिसे हमें जानना चाहिए , जिसे हमें समझना चाहिए |

            
               तो प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर डा. सुनीता की कवितायें 


1 ...   वक्त
वक्त
पत्थर पर खुरेचा एक अमिट लकीर है
जिसे लहरें नहीं मिटा सकतीं
जैसे पानी पर खींचे
ख़्वाबों की परछाइयों के
लकीरों को
लहरें नेस्तनाबूत कर देती हैं
वक्त
वह निशान है
जो पैदाईश की तारीख़
सांचे में ढली शक्ल
शरीर पर चढ़े
चमड़ी के दमड़ी का पुख्ता मुलम्मा
जिसके सबूत बदल नहीं सकते
बल्कि
वह शरीर में खून 
बसंत में पतझड़
सावन में हरियाली
कार्तिक में पूर्णिमा और
चैत्र की दुधिया चाँद जैसे
सर्वदा सत्य हैं


2 ...   विज्ञान

अमानवीय
सुरक्षा-कवच के नाम पर
रोज़ बनते/गढ़ते हैं
लोहे,पत्थर,लकड़ी और धातु मिश्रित
हथियार
और
हवाई हथियार
बहसी/अनियंत्रित
हथियारों में तब्दील
होते इन्सान को
भला क्या बनाएगा ?
यह विज्ञान


3 ...   कागज़
सीसे से कागज पर
पत्थर सरीखे शब्द अंकित हैं
जिसमें दर्ज हैं
मायावी जीवन के कच्चे-पक्के अनुभव
खरपतवार से लदे-फदे
सच्चे-झूठे अरमानों के दीप
कोरे पन्नों पर
शब्दों के लड़ियों ने
शब्दसेतु बांधे हैं
जहाँ पर संसार का
व्यापक चित्र उभरा हुआ है
जिसके आलोक में 
गोल घूमते
पृथ्वी के चक्कर लगाते सूरज की तरह 
गगनमंडल शल्यसेतु के निर्माण में निर्लिप्त शब्द हैं


4 ...   बंद

कुछ चीखें
समय के कुठिला में बंद हैं
जो कभी आस्था के नाम पर
तो कभी व्यवस्था के दरमियाँ दिखे हैं
उन बेनाम जख्मों के लिस्ट जरा लम्बी है
उस सांप की तरह
जिसके मुख और पीछे का भान नहीं हो पाता
और अचानक से
आगे आकर निगल जाता है 
ठीक वैसे ही
समय के मर्म में दर्द की कई सिसकियाँ बंद हैं
उस गेहूँ की तरह
जिसे ड्रम में बंद करके
सुरक्षित रखने के नाम पर
घुन के हवाले कर देते हैं
उसी के मानिंद कुछ
जिंदगियां स्नान के नाम
कुछ घाटी के घटना के सर
तो कुछ नक्सलबादी नर्सरियों के नाम दर्ज हैं



5...    कुछ

नामालूम सा दिन गुजरा है
आहिस्ता-आहिस्ता
जब कुछ अमल करती हूँ
शिगाफ़ के रंग बदल जाते हैं



6 ... शब्द

शब्द के खेल ने खिलना सिखा दिया
गुलो-ओ-गुबार से जीना सिखा दिया
रोते हैं किस बात पर
जबकि
जीवन ने शब्दों से लड़ना सिखा दिया


7....  चलो

बहुत हो चुका
आँख-मिचौली से मिन्नत
मुरव्वत के दिन गए
आ गए हैं
उस मैदान में
जहाँ से चलो तो कुछ हासिल है
वरना सफर तवील-दर-तवील है


8 .. दिहाड़ी


दम निकल गया पल में
वह मुस्कुराते रहे
दिन-रात के दिहाड़ी में बीते दिन
रात तारों से उलझने और सुलझने में
वह कहते हैं
हम मजे में हैं
अरे कोई तो उन्हें बताएं
दिहाड़ी के दर्द
कितने सालते हैं



परिचय और संपर्क   


डा. सुनीता

जन्म तिथि -- 12 जुलाई 1982 

जन्मस्थान – चंदौली , उ.प्र.

शिक्षा - बी.एच.यू. से पीएच.डी., नेट, बी.एड.

विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉगों में रचनाएँ -  लेख, कहानी, कविताएँ -- प्रकाशित |

सम्प्रति - सहायक प्रोफ़ेसर, हंसराज कॉलेज, नई  दिल्ली |   



5 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ सुनीता11:44 am, फ़रवरी 18, 2013

    हमारी कविताओं को 'सिताब दियारा' के मंच पर 'सृजन की उड़ान' मिली है.

    श्री रामजी तिवारी सहित पूरी टीम को धन्यवाद सहित शुभकामनाएं ...!

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  2. अच्छी कवितायेँ हैं.सवाल तरीके से उठाये गए हैं.पढ़ने वाले निराश नहीं होंगे.

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  3. बहुत बढ़िया ....अच्छी रचनाएँ , बधाई
    -नित्यानंद गायेन

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  4. Sabhi rachnaaye ek naye tevar ke saath likhi gayi hai ....vigyaan se kiya gaya sayad ye antim prasn hai....jivan ne shabdo se ladna sikha diya....dehaadi ka dard kitna saalta hai ....craftfully written and intense poetry.
    -
    Daljeet Singh Kalra

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