मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

अस्मुरारी नंदन मिश्र की कवितायें


                              अस्मुरारी नंदन मिश्र 

अस्मुरारी नंदन मिश्र की ये कवितायें प्रकृति के बहाने अपने समाज को समझने की कोशिश करती हैं | बेशक इन कविताओं में कलात्मक दृष्टि से एक कच्चापन भी झलकता है , लेकिन एक उभरते युवा को इतनी छूट तो मिलनी ही चाहिए | 
                         
                   तो प्रस्तुत है अस्मुरारी नंदन मिश्र की कवितायें

1....   
ठंड .....1


अलसाया पड़ा रहता है
अपने  कुहरे के कम्बल में
कभी इस करवट , कभी उस करवट
अब उठता हूँ  ....
अब उठता हूँ .....
में लगा  देता है
अच्छा खासा वक्त
बिस्तर छोड़ते छोड़ते
सूरज

      ठण्ड-2
..................
 ठण्ड आ गयी
इस ठिठुरते दिन में
कहीं न कहीं बची रहे 
थोड़ी सी धूप
थोड़ी सी आग.

ठण्ड-3
..........

इन सिकुड़ते दिनों
बहती ठंडी मौत सी हवाएं

जकड़ते हैं हाथ
उलझते हैं केश
फट जाते हैं--गाल और होंठ

इन रूखे दिनों में चाहिए ही
स्नेहभरी चिकनाई
नरम गरमाई भरे हाथ
और तरल-गाढ़े चुम्बन.


ठंड-4


अभी  जिनकी  आँखें भी नहीं फूटीं
ये पिल्ले माँ के स्तन से खुद को दबाये छिपाये
गुजारते हैं घड़ियाँ
जबकि माँ को पेट  भी  भरना होता है

इनमें कुछ  आँखें खोलते खोलते
सदा के लिये आँखें बंद कर लेंगे
कुछ बाद में भी ठंड की अकड़न ठिठुरन को
हो जायेंगे समर्पित
और जो बचेंगे उनके अनुभव में
दिसम्बर की रात सा  
अकड़ा रहेगा
ठंड



ठंड-5

बिस्तर की महीन सिलवटों पर
कम्बल का रोमांचक भार
साथ में हो गुदाज गर्म देह
तो किसे पड़ी है ठंड की
आये जैसे आती हो
समझें वे
जिनके घर
एक के कम्बल ओढ़ते
तीन को मार जाता है
पाला


ठंड-6

कातिक की कुतिया
एक भद्दी  गाली है
किसी के लिये भी
पर गालियों के अर्थ खोलते लोगों में
किसी ने नहीं देखा
वही कुतिया
पालती है कैसे
चार पाँच पिल्ले
पूस माघ के ठंड में 




2. ....... धुंध


किसी का आह -उच्छवास
टपकता बूँद बनकर
बरजोर रोके हुये आँसू
बरबस चू पड़े
टप... टप...

धुंध है
घनघोर
वातावरण सारा उदास
चुपचाप
अपने  आप  में  खोया हुआ
  कुछ  कहता न सुनता
किसी की मर्सिया पढ़कर कि जैसे मौन हो

कुछ भी न दिखता
जरा सा  फासला भी
अपने रूप में अदृश्य सा
हर मोड़
हर मंजिल
क्षितिज में खो गयी जैसे

धुंध छाया हुआ  गहरा  आंखों पर
धुंध जमा ठहरा मस्तिष्क में
धुंध जिसने  आईने को रहने दिया न आईना
धुंध बहता हर दो के बीच

धुंध के मारे
कहीं पर हादसे
कहीं ठहराव
रेल , वायुयान सब रद्द
सड़क पर निकलना भी
खौफ देता है

धुंध है घनघोर
लेकिन ऐसा भी नहीं कि
मौसम का दिया यह दाय
काटा न  जाय

हाँ गहरे धुंध में चलना हो तो
बत्तियों को सजग कर दो
रास्ता कुछ न कुछ दिखेगा
जरुर

धुंध तो
बस धुंध है




परिचय और संपर्क

अस्मुरारी नंदन मिश्र                
केन्द्रीय विद्यालय , पारादीप, उड़ीसा में शिक्षक


12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी कवितायेँ हैं

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  2. Nice one! Keep it up...Regards, Ravi.

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  3. असमुरारी की कविताओं से लगातार गुजरने का सौभाग्य मिला है,एक सम्पूर्ण जनचेतना की प्रकृति और संवेदना मे जीने वाला है हमारा यह युवा कवि।तभी तो कातिक की कुतिया जैसी गाली जिसका उपयोग कभी रेणु ने विशेष अर्थ और संदर्भ मे किया था।इनहोने इसका भी काव्यतम उपयोग सफलता पूर्वक किया है।कवितायें ठंढ शीर्षक पाठकों को प्रभावित करने मे समर्थ है।6 छोटी टुकड़ियों मे कही गयी बातें मन-मस्तिक पर एक छाप छोडती हैं॥धुंध का गठन उम्दा है,शेष इनकी कविताओं पर विशेष बातें मैंने पहलीबार पर कही है www.pahleebar.blogspot.com स्पष्ट है की असमुरारी जैसे जेनुइन कवि की कविता प्रस्तुत करने के लिए रामजी भाई को विशेष आभार ........

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  4. धुंध तो बस धुंध है?क्या अद्भुत चित्रण है....साथ ही ठंढ कविता मे व्यक्त दृश्य,परिवेश हमरे संवेदन तन्तु को झकझोरती हैं

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  5. सही कह रहे हैं 'कातिक की कुतिया' मैंने रेणु से ही लिया है...

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  6. Achchhi kavitayen hain! Thand-3, Thand-4 aur Dhundh vishesh pasand ayin! Asmurari bhai ko lagatar naye shilp ko explore karte dekh maza aya, bahut badhaiyan!

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  7. शुरूआती कविताओं के लिहाज से इन्हें बेहतर कहना ही होगा, लेकिन आपने जिस कच्चेपन की बात की है उसके साथ भाषा में खासतौर से अस्स्मुरारी जी को ध्यान देना होगा. यहाँ 'ठण्ड'का एक जगह स्त्रीलिंग की तरह प्रयोग है (ठण्ड-२) तो दूसरी जगह (ठण्ड ४) पुलिंग की तरह. यह असावधानियाँ कविता में बड़ी चूक हैं.

    धुंध दो मुझे अच्छी लगी लेकिन यहाँ भी 'किसी की मर्सिया' पढ़कर चौंक गया. किसी 'का'मर्सिया पढने का ही अभ्यास रहा है. भाषा के प्रति युवा कवियों की यह असावधानी आगे के लिए दिक्कततलब होती है.

    उम्मीद है कि शुभकामनाओं के साथ अधिक सावधान रहने की इस विनती को अस्मुरारी जी अन्यथा नहीं लेंगे.

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  8. वैसे कविता के एक पक्ष के लिये यह अच्छी है शुक्रिया ।

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  9. अन्यथा लेने की बात ही नहीं है Ashok Kumar Pandey भाई !!ऐसी टिप्पणियाँ ही तो मुझे रस्ता बनाने में मदद करेगी....जहाँ तक ठंड के दोनोँ लिंगों में प्रयोग की बात है , ठंड को स्त्रीलिंग मानते हुये भी मुझे उसका प्रयोग पुलिंग में करना पडा ।''दिसम्बर की रात सा

    अकड़ा रहेगा

    ठंड'' के बदले 'अकडी रहेगी' का प्रयोग जमा नहीं..., उसी तरह चुंकि कातिक की कुतिया गाली देने वाले पुरुष ही हैं इसलिये अपने मारक रूप में ठंड को पुलिंग रूप में रखना पड़ा , बाकी आपकी सलाह ( विनती न कहें) मुझे मार्ग दिखायेगी...

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  10. अच्‍छी कविताएं हैं... बधाई।

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