शनिवार, 10 नवंबर 2012

आसां नहीं परखना सबका जिगर यहाँ - भरत तिवारी 'शजर'


                                भरत तिवारी 'शजर'

मुक्त छंद वाले कविता के इस दौर में गजलों की अहमियत काफी बढ़ गयी है | इसका एक कारण तो इनकी लयात्मकता और रिदम है , जिसके कारण आधुनिक कविता के बरक्स ये पाठक से सीधे-सीधे जुड़ती हैं , लेकिन दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है , कि इन्होने अपने आपको हाला और प्रेमिका की जुल्फों से निकालकर दुष्यंत कुमार और अदम गौंडवी के साथ , कविता की जनवादी परम्परा से जोड़ लिया है | भरत तिवारी ‘शजर’ की ये गजलें भी उसी गौरवशाली परंपरा का निर्वाह करती हैं , जिसने हिंदी में इस विधा को इतना चमकदार और महत्वपूर्ण बनाया है |  

    तो प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर युवा गजलकार भरत तिवारी ‘शजर’ की पांच गजलें


एक....

ये कैसा मौसम बना रहे हो 
गुलों में दहशत उगा रहे हो

धरम को पासा बना रहे हो
ये खेल कैसा खिला रहे हो

खुद तो घुटनों पे चल रहे हो
सम्हलना हमको सिखा रहे हो

ज़मीर जाहिल बना हुआ है
ये इल्म कैसा सिखा रहे हो

हक़ तो ये है तुम आज नाहक़
गुलों पे ये हक़ जमा रहे हो

खुली हैं आँखें शजर’ है जिंदा
क्यों अपनी शामत बुला रहे हो


दो ....

चमकते चाँद को गरहन लगाना काम है उसका
दुकानें रौशनी की फ़िर सजाना काम है उसका

शहर की आग गाँवों में लगाना काम है उसका
हमारे खेतों को बंजर बनाना काम है उसका

सरे महफ़िल कहेगा दाल रोटी के भी लाले हैं
मगर चुपचाप मुर्गे को उड़ाना काम है उसका

गुसलखाने कि दीवारें तिज़ोरी से नहीं कमतर
वहाँ भी ईंट सोने की लगाना काम है उसका

नहीं पहचान पाओगे शक्ल-ओ सूरत करो कोशिश
लगाना आग पहले फ़िर बुझाना काम है उसका

रहीम-ओ-राम इनके वास्ते सत्ता की हैं कुँजी
धरम के नाम पर सबको लड़ाना काम है उसका

हमें अपना बना कर फायदा वो खुब उठाता है
लगी बाज़ी नहीं के भूल जाना काम है उसका

बना कर कागजों पर खेत कहता है करो खेती 
नदी की घार पर कब्ज़ा जमाना काम है उसका

शजर’ दिखता नहीं अपने सिवा उसको जहाँ में कुछ
हमारे हक़ कि रोटी लूट खाना काम है उसका


तीन ....

किस को नज़र करें अपनी नज़र यहाँ
इक ख्वाब जो सजाया बरपा कहर यहाँ

कुछ तो सवाब के तू भी काम कर यहाँ
दो - चार दिनों की है सबकी बसर यहाँ

हमने मकान की इक ईंट थी रखी
बदला तिरा इरादाछूटा शहर यहाँ

मजबूत है अकीदा रब इश्क में मिला
मजबूरि-ओ चालाकी है बे-असर यहाँ

हर शय चला रहा जो आता नहीं नज़र
किसको दिखा रहा तू अपना हुनर यहाँ

वो दोस्ती न करना जो ना निभा सको
आसां नहीं परखना सबका जिगर यहाँ

तुम खेल खूब खेलो वाकिफ़ रहो मगर
आशिक नहीं रहा अब तेरा शजर’ यहाँ


चार ....

उसे ही तलाशा जो छुपता नहीं
मगर ना मिला वो जो छुपता नहीं

कहानी मुहब्बत ना बनती मिरी
अगर वो ज़माने सा बनता नहीं

खतों में मिरे जिसकी जाँ थी बसी
मिरा नाम भी अब वो लिखता नहीं

जो देता था नींदों को मेरी सुकूं
वही आज कल सोने देता नहीं

नये है कहानी के किरदार अब
मगर लिखने वाला बदलता नहीं

मुलाक़ात कैसे हो उससे भला
मिरी बात भी अब जो सुनता नहीं



पांच ....

थकते नहीं ग़म रोज़ चले आते हैं
खुशी के पल डर से छुपे जाते हैं

न करें जो सलाम चढ़ते सूरज को
आज के दौर में पीछे रहे जाते हैं

अब ना कर और दावा-ए-मुहब्बत
ये झूठे वादे न और सुने जाते हैं

बस कुचलते हो रास्ते को पैरों तले
ये भूल कर मंज़िल वही ले जाते हैं

घर ये होते हैं सिर्फ छलावे जैसे
वो नहीं देख सकते जो चले जाते हैं




परिचय और संपर्क

भरत तिवारी ‘शजर’

फैजाबाद में जन्म
दिल्ली में रहते हैं  
युवा गजलकार
ब्लाग – http://www.fargudia.com/ नामक ब्लाग का संचालन भी
मो.न.- 09811664796




48 टिप्‍पणियां:

  1. सिताब दियारा और श्री रामजी तिवारी को बहुत आभार ...
    सादर
    भरत

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    1. mai bahut he khush kismat hoon ke mai ek bhartiye hoon,or mujhe yeh sab mahaan logon ki likhi anmol gazals,shayri,sab padne ka
      moka milta hai.beshaq mai apne desh se door.so god bless u bharat.keep it up.

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  2. बहुत सुन्दर भरत तिवारी जी.... बेहद उम्दा है आपकी गजले.... उम्मीद है आपकी बेहतरीन कलम से आगे भी रूबरू होते रहेंगे हम....

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    1. सर उम्मीद को बरक़रार रखने की पूरी कोशिश रहेगी
      सादर

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  3. गज़ल में छंद का बड़ा महत्व है . छंद सधा तो कमजोर शेर भी असर कर जाता है .नहीं तो अच्छा शेर भी बेअसर हो रहता है . छंद पर और काम करने की जरूरत है .

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    1. आभार सर
      आपकी दी गयी राय पर अमल करना शुरू कर दिया है
      सादर

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  4. शायर को बहुत-बहुत मुबारकबाद। पहले भी भरत भाई को पढ़ा है,वो जिस तरह भावनाओं को जगह देते हैं,आसान से अलफ़ाज़ में बयाँ करते हैं,काबिल-ए-तारीफ़ है।

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  5. दूसरा वाला बेहतर है. उसके पक्ष में काम करने की ज्यादा जरूरत है.

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    1. हाँ सत्येन्द्र जी सही कहा लेकिन फिर रचनाकार का दिल .....

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  6. aap ki soch aap ke khayaal waqt ke sath jod dete hain...
    haan aashutosh ji ki bat dusrust hai..
    agar aaap ghazal kah rahe hain to us poori tarah se nibhaaiye..phir dekhiye sone pe suhaaga..
    shkriya.

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    1. जी रजनीश जी
      कोशिश ज़ारी है ...
      सादर

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  7. Bharat ji bahut sundar vichaar vyakht kiye hain aap ne. Achhi ghazlein ubhar aayee hai.

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  8. " sachmuch asaan nahin parakhna sabka jigar, Shajar!"

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  9. कथ्‍य बहुत अच्‍छा है... लेकिन सादगी कुछ अधिक ही है... ग़ज़ल में जो लुत्‍फ आता है पढ़ने-कहने का हर इक शेर में, वो ज़रा और खूबसूरत हो तो और मारक हो जाएंगी ग़ज़लें... मेरी शुभकामनाएं...

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  10. bahut hi shaandar gajale...Bharat ji....gajale jis prabhav se apni bat kah ja rahi hain ...kamal....
    shukriya roobru karwane ke liye....

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  11. भरत जी आपकी गजलें पाखंड की अच्छी तरह धज्जियाँ उड़ा हैं वो धर्म हो या सत्ता ! सुंदर गजलें बहुत - बहुत बधाई !!

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  12. गज़लों में पाखंड की अच्छी धज्जियां उड़ाई हैं ! सुंदर गज़लों के लिए मेरी शुभकामनायें !

    अनुपमा तिवाड़ी

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  13. खुद तो घुटनों पे चल रहे हो और सम्हलना हमें सिखा रहे हो...
    शानदार... अक्सर ऐसा ही होता है... चाहे हम हो या कोई और सबकी नियति कुछ ऐसी ही होती है...

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  14. waahh waahh bahut bahut khoobsurat gazalen bharat bhai ...bahut sari badhai aapko

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  15. बहई जी ...एक से एक ...मुझे No पांच बहुत सुन्दर लगी ...अब न कर दावा ऐ मुहबत .......वो चले जातें है ...बहुत उम्दा भाई !!!!!!!बधाई Nirmal Paneri

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  16. एक बात,,,,,,, एक खेल होता था अब पता नहीं कोई खेलता होगा कि नहीं,,,,,
    " कोलड़ा चपाकी जमे रात आई है,,,,,,,,,,"
    "आई है तो आने दो.,,,,,,,,,,,,,,,,"

    पहला वाक्य शजर जैसे क्रन्तिकारी ग़ज़लकारों की हठधर्मिता दिखाता है
    तो दूसरा वाक्य सत्ता के घमंड को दर्शाता है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
    शज़र जी का शासन को आगाह करना और वो भी खाली खुली चुनौती ना होके "कैसा" जैसे शब्दों के सहारे अंधी सत्ता को दर्पण दिखाने या फिर बहरी सत्ता को सुनाने का प्रयास काबिले-गौर है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
    अच्छी बात है सत्ता गूंगी नहीं है,,,,,,,,,,,,,,,मनमोहन तो खाली अपवाद है,,,,,,,, हो सकता है ये बहरा हो,

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  17. दूसरी बात,,,,,,,,,,, अब समझ में आया कि ग्रहण क्यों लगता है,,, वे कभी वे राहू-केतु का एग्जाम्पल देते है तो कभी हम धरती की ही परछाई बताते हैं,,,,,,,,
    भरत तिवारी "शज़र" ने एक ख़ास और सही एंगल से ग्रहण की सच्चाई को सामने रखा है,,,,,,,,,
    शहर का गाँव पे आक्रमण ग्रामीण सरल ह्रदय दिलों को भी बंजर बना देता है,,,,,,,
    दाल ? ,,,,,,,,,रोटी है फिलहाल पर हाल फिलहाल दाल गल नहीं रही पर जिनकी गल रही है वे रोटी से केवल खेलते हैं दाल भी उनके लिए खेल-भर है,,,,,,,,
    गुसलखाना उनके लिए नहाने का नहीं मयखाने के का स्थान है ,,,,,,,
    आग लगाना और बुझाना,,,,,,,वो भी राम-रहीम भाषा-भूषा के नाम पे,,,,,
    नदी की धार,,,,,,,,, भी नहीं बची उनके पास जो नदी को माँ कहते थे,
    ;;;;;;;;
    शजर जी की ये गजलें वामपंथी-धारा से सराबोर हैं,,,,,,शुद्ध वामपंथ,,,,ढकोसला वामपंथ नहीं,,,,,,,

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    1. सुदेश भाई आपने गज़लों के मर्म को समझा ... इससे ज्यादा खुशी की बात एक शायर के लिये क्या हो सकती है

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  18. बहुत अच्छा लिखा है ..बेहतर से बेहतर होते जाइए ..यही दुआ है

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  19. रामजी भाई ने भरत के कलाम को जगह देकर अपने आप ही एक इज्ज़त बख्शी है। भरत को यह फ़ायदा हुआ की उसे मशविरो के अनमोल मोती मोहब्बतों के साथ मिल गए। ऐसा कम ही होता है। यकीन है की भरत अपने कलाम से और लोगों और अदीबों क दिल जीतेगा, कलाम पहले पढ़ चुका हूँ प्रेम भी और आशुतोष जी से मै इत्तेफाक रखता हूँ।

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  20. mubarak-baad bhai jaan, behad achchha laga yahaan phir se padhkar

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  21. bahut ,sundedr,aaj ke sarokaro ko address karti hui behatreen ghazle,bahut bahut badhai

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  22. भारत भाई,बढ़िया है…,आदमी दिल का अच्छा हो तो अच्छा ही सोचता है…, और वही लेखन में भी आता है।

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    1. नेक दिल इंसान को नेक लगना वाजिब है विवेक भाई ...

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  23. भाव की ताज़ा खुशबु लिए हुए महकती रचनाये है.पढवाने के लिए आभार

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  24. wah bharat bhai. khoob likh rahen hain shandar ghazlein. bahut prabhavpurna hain... shubhkamnayen aur aashish (bhupal sood)

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  25. कुछ बंद बहुत अच्छे बन पड़े हैं. मसलन

    कहानी मोहब्बत न बनतीं मेरी
    अगर वो ज़माने सा बदलता नहीं

    इस के लिए बधाई !

    लेकिन गज़ल में रवानी भी बनी रहे इस लिए उसका तवाज़न और शब्दों का चुनाव एवं जमावट गौर मांगती है. गज़ल में रवानी के नुक्ते लिए अहमद फराज़ साहेब को पढ़ा और उनकी गज़लों से ये हुनर सीखा जा सकता है (हालांकि ये मेरी अपनी सोच हो सकती है). बाकी... भरत भाई को मुबारकबाद.

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  26. सभी गजलें बेहतरीन हैं... बधाई स्वीकार करें॥

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  27. बेनामी8:44 pm, जून 06, 2013

    shandar jandar sangit me dubi gajalen..sahityik aswad ka anupamanubhav ..

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  28. आप अच्छा लिखते है आदरणीय भरत जी!

    खुद घुटनों पे चल रहे हो ..सम्भलना हमको सिखा रहे हो! ख़ूब व्यंग

    आपकी गजल २ तो सबसे ज्यादा भा गयी ...सभी अश'आर एक से बढ़ कर एक ...वाह वाह !!

    गजल ३ में ...आंसा नहीं है सबका परखना जिगर यहाँ ....बहुत खूब !!
    गजल ४ में ...जो देता था मेरी नींदों को सुकूं
    वही आजकल मुझको सोने देता नही ....... लाजबाव !!

    ५ गज़ल में ...अब न कर और दावा ए मुहब्बत
    ये झूठे वादे न और सुने जाते है .....बहुत खूब !!

    बहुत सी शुभकामनाएँ आदरणीय

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  29. ग़ज़लें प़ाय: अच्छी हैं । एक ग़ज़ल यदि एक ही विषय पर केन्द़ित हो तो वह
    नज़्म के निकट हो जाती हैं । एक जगह ग़हण के के लिए गरहन का प़योग
    खटता है । ग़हण का ग़हन तो चल सकता है , पर गरहन नहीं ।उर्दू वाले लिखते
    हैं तो अपनी नादानी दिखाते हैं ।

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