मंगलवार, 15 मई 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय का संस्मरण ----पहली किश्त





                                                                    विमल चन्द्र पाण्डेय 


विमल चन्द्र पाण्डेय  युवा कथाकारों की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं , जिन्होंने पिछले एक दशक में हिंदी साहित्य जगत पर गहरी छाप छोड़ी है | इन्होने कथा जगत में सार्थक हस्तक्षेप करने के साथ ही साथ  , अन्य रचनात्मक विधाओं में भी काफी महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय योगदान दिया  है | विमल का उदाहरण हमारे सामने है | पत्रकारिता और सिनेमा की उनकी समझ और उस पर किया गया कार्य इस तथ्य की गवाही देता है , कि उनका रचनात्मक दायरा कितना विस्तृत है | 'डर' कहानी संग्रह पर उन्हें ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार भी मिल चुका है | वे जब कुछ नया लिखते या करते हैं , वह जरुर चर्चित होता है ..| पिछले दिनों लिखी गयी उनकी कवितायेँ इतनी मारक और बेहतरीन रही  हैं , कि सहसा यह विश्वाश नहीं होता की यह शख्श कविता  के अलावा किसी दूसरी विधा में भी लिखता होगा ..| 

यहाँ विमल फिर से एक नए प्रयोग के साथ हमारे सामने हैं | पढ़ाई के बाद अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए उन्होंने 'संस्मरण' विधा में हाथ आजमाया है | " शहरों से प्यार वाया इलाहाबाद - मेरी जिंदगी के सबसे उपजाऊ साल '" नामक यह संस्मरण हमारी आपकी कहानी जैसा ही चलता दिखाई देता है |  भाषा की यह रवानी और अपने को निर्ममता  पूर्वक जांच पाने की यह कोशिश देखने लायक है | जब भी हम अपने आपको इस तरह से खंगालते हैं , कुछ स्थान , कुछ लोग और उनसे जुडी कुछ स्मृतियाँ हमारे सामने खड़ी हो जाती हैं | ...ऐसी स्मृतियाँ , जिन्होंने हमारे निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान किया है ...| 

                                          तो प्रस्तुत है विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                     ' शहरों से प्यार वाया इलाहाबाद - मेरी जिंदगी के सबसे उपजाऊ साल' 
                                                             की पहली किश्त |  







दिल्ली में भीषण बेरोज़गारी के दिन गुज़ारने के दौरान, जब ज़िंदगी के दिये का तेल खत्म होता ही लग रहा 
था, कि यूएनआई में नौकरी लग गयी। नौकरी क्या थी, एक चमत्कार था। यूएनआई का लिखित और 
साक्षात्कार निकालने से पहले इसी एजेंसी में नौकरी के लिये दो बार पहले भी परीक्षा में बैठ चुका था 
लेकिन हिंदी सेवा यूनिवार्ता के लिये। कमाल यह कि दोनों ही बार हिंदी सेवा से नौकरी में चयनित न हो 
पाने के कारण तीसरी बार जब अंग्रेज़ी में प्रयास किया तो पहली बार में ही चयन हो जाने पर इस नश्वर 
दुनिया के बारे में दो बातें समझ में आयीं। पहली यह कि इस दुनिया में कभी भी कुछ भी हो सकता है, 
खासतौर पर अगर आप नगर निगम, लोक निर्माण विभाग या मीडिया में से किसी दुनिया की बात कर रहे 
हैं। दूसरी यह कि मेरी अंग्रेज़ी अच्छी है (कई भ्रमों की तरह यह भ्रम भी मेरा काफी बाद में टूटा जब एजेंसी 
की रुटीन पत्रकारिता के अलावा अलग से कुछ लिखने का मौका मिला, खैर प्रयास जारी है) और भविष्य में 
मैं हिंदी में लिखने के अलावा कभी अंग्रेज़ी में भी लिखने में हाथ ज़रूर साफ़ करूंगा। बहरहाल, पहली 
पोस्टिंग इलाहाबाद थी और लाख गुरबतों के बावजूद मैं उस समय दिल्ली छोड़ने को मानसिक रूप से तैयार 
नहीं था। हर अखबार और चैनल में नाक रगड़ कर वापस आ चुकने के बाद कोई काम न मिलने के एवज़ 
में मैंने शशि और मुरारी के साथ एक प्रोडक्शन हाउस शुरू कर दिया था जिसका नाम स्ट्रांग विज़न मीडिया 
(इन शॉर्ट एसवीएम प्रोडक्शन यानि शिश विमल मुरारी था जो कि नाम से ही पिटा हुआ था) था और जिसे 
जल्दी ही खूब सारी अच्छी और सारगर्भित डॉक्यूमेंट्रीज बनानी थीं और दुनिया पर छा जाना था। हमें अपना 
पहला असाइनमेण्ट कांग्रेस के एक प्रत्याशी के लिये नो प्रॉफिट नो लॉस पर मिला था जिसके गम को मैं 
शशि के साथ ´´अबे हम प्रोफेशनल्स हैं और हमारे लिये कांग्रेस और भाजपा में कोई अंतर नहीं। ग्राहक ही 
हमारा भगवान है´´ टाइप की चीज़ें बोलकर ग़लत किया था और काम पूरा किया था। यह 2007 के मार्च 
महीने का अंतिम हफ्ता था जब 9, रफी मार्ग पर एक बंद कमरे में एक बड़ी मेज़ के पीछे बैठे दो तीन 
पत्रकार कम और व्यवसायी अधिक दिखते लोगों ने मुझसे पूछा था, ´´आर यू कम्फर्टेबल टु वर्क 
आउटसाइड डेलही ?´´
´´आय´म ओपन टु वर्क एनिव्हेयर इन इंडिया।´´ इस उत्तर से उन्हें मेरी काम के प्रति निष्ठा का पता चला 
न कि मेरी खराब माली हालत का।
´´एण्ड इफ वी सेण्ड यू टु अलाहाबाद, वुड यू लाइक टु वर्क देयर ? यू नो, द पालिटिक्स ऑफ स्मॉल 
सिटीज़ मैटर अ....।´´´´अलाहाबाद हैज ऑलवेज़ बीन अ सेकेण्ड होम टु मी। माय अंकल लिव्स देयर एण्ड आय´म वेरी मच 
फेमिलियर विद द ज्योग्राफी...।´´ मैंने अकुताहट में उनकी बात काट दी। वे मुस्कराये और मुझे परिणाम 
के बारे में बाद में बताने को कह कर जाने को कहा। मैंने बाहर निकलते ही आनंद को बताया कि इस बार 
लगता है नौकरी मिल जायेगी। नौकरी का कॉल लेटर आया तो विभव ने जाने को मना किया और मुझ 
हमारे वादे की या दिलायी जिसमें हमने एसवीएम प्रोडक्शन के दुनिया पर छा जाने की बात कही थी। मैंने 
इस बात को भूल जाना ही बेहतर समझा।   






                                                                                                                 क्रमशः .......
                                                                                                   ( प्रत्येक रविवार को नयी किश्त )





संपर्क 

विमल चन्द्र पाण्डेय 
प्लाट न. 130 - 131  
मिसिरपुरा , लहरतारा 
वाराणसी . उ.प्र. 221002 

फोन न. 09820813904
            09451887246  

फिल्मो में विशेष रूचि 


5 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन विमल जी आप इतने शकाहारी तो पहले कभी नहीं रहे. कुछ छूट रहा है बाबू.मेरा इशारा उस तरफ नहीं है. लेकिन मैं ये भी नहीं चाहता की आप इधर से ही जाए.अब तो शादी हो गई है.अब किस लिए परदा.जाने दीजिए ,समझ में नहीं आता कैलाश जी से मैं क्या मुँह दिखाऊँ.

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  2. आज ब्रजेश का फोन आया था कह रहे थे कि बहुत मजेदार है. मैंने सहमति में हुंकारी भरी सिर्फ इसलिए नहीं कि वे हमारे समय के श्रेष्ठ शकाहारियों में शामिल है.

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  3. इस विधा को भी कायम रखें। यह पढ़कर तो अपेक्षाएं बढ़ गई हैं... बधाई...

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  4. sangharshon ki yaden bahut sukhad hoti hain.. darasal sirf sangharsh aur shram karte hue hee vah lamhe hote hain jo hamari sabse madhur smritiyon ka nirmaan karte hain..

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