गुरुवार, 6 सितंबर 2012

जीवन अंततः किस एकांत की ओर जाता था - अरविन्द


            
                                     अरविन्द 

अरविन्द की कवितायें आप पहले भी 'सिताब दियारा' पर पढ़ चुके हैं | और आप ही की तरह मैं भी इस अत्यंत प्रतिभाशाली युवा कवि को बार-बार 'सिताब दियारा' पर देखना और पढ़ना चाहता हूँ | पच्चीस साल की उम्र में इनके पास 'जीवन अंततः किस एकांत की तरफ जाता है , जानने की ईच्छा भी है' और 'जों लड़कियां सुन्दर नहीं थी , वे कहाँ गयीं , तलाशने की व्याकुलता भी' | 'प्रेम की बारिश में भीगने का हुनर भी है' और 'मृत्यु की आहट को आगे बढ़कर थाम लेने का जज्बा भी' | अनूठे और नितांत मौलिक शिल्प की ये कवितायें किसी भी लेखक के मन में पाठक बने रहने की तीव्र लालसा पैदा कर सकने में सक्षम हैं , जैसा की 'अरविन्द' स्वयं चाहते और जीते हैं | 'अरविन्द इतना कम क्यों लिखते हैं' , यह सवाल जितना सालता है , 'अरविन्द इतना बेहतर लिखते हैं' , यह जबाब उतना ही तसल्ली प्रदान करता है | 

                  प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर प्रतिभाशाली युवा कवि 
                               अरविन्द की छः कवितायें 

 1...    एकांत


हर एक का अपना एकांत था

हर एक
खुद के शोरगुल से भागकर
खुद के एकांत में बैठ जाता था

बुद्ध
खुद के शोरगुल से भागकर खुद के एकांत में बैठ गए थे

कबीर का एकांत करघा था

दीवान-ए-ग़ालिब के एकांत में बैठकर लोग खुद को भुला देते थे

मिलने से पूर्व
एक एकांत तुम्हारा था
और जो मेरा था
कहीं न कहीं वह
तुम्हारे एकांत की तलाश में था

दो एकांत मिलकर एक सघन एकांत रचते थे

एक पेड़
अपने हरेपन के एकांत में डूबा खुश दिखता था

पतझड़ किसी शोरगुल की तरह था

स्वप्न का एकांत नींद
प्रेम का एकांत मौन
नदी का एकांत किनारा
और शब्द का एकांत कविता थी   

फिर जीवन अंततः
घड़ी की टिक-टिक पर बैठ के
किस एकांत की ओर जाता था ..?


2..  पाठक ही


हमेशा एक पाठक की तरह रहा |

कभी कुछ लिखकर भेजा भी तो
एक लेखक की हैसियत से नहीं
एक पाठक की तरह ही पूछताछ किया |

कोई और मैं होगा
जों लिखता होगा
मैं तो बस एक पाठक की तरह रहा |

अचानक छपी
कोई कहीं कभी
भेजकर भूल गई कविता
उसे पहचानने में
कौंध भर इनकार रेंग गयी |

कोई और था
जों मेरे पते पर रहता था
मैं उसे खोजता रहा |

कभी अच्छी लगी कोई कविता
तो अपने पते की तरह कोई पता था
एक पाठक की तरह
उस पर चिट्ठी लिख छोड़ आया |
मिली चिट्ठी को मेरे अंदर छुपा कोई मैं पढता रहा
दूर से आये दूरभाष को कोई मैं सुनता रहा |

दोस्त कहते थे कि
मैं कवि कि तरह कहता हूँ |

अंदर कहीं कवि था
तो इतना कम कि
खोजना असंभव |

एक ज्यादा पाठक उसे
स्थगित करता चला गया |

आजीवन पाठक की तरह रह जाने की ईच्छा इतनी तीव्र थी
कि खुद की कविता को
एक कवि की नहीं
एक पाठक की कविता कहलाना ज्यादा पसंद किया |



3...   आगत मृत्यु


मृत्यु
इतनी अनिश्चित
इतनी आकस्मिक
जैसे दोनों शब्दों का जन्म ही मृत्यु से हुआ हो |

इतनी अनिश्चित कि
मृत्यु का इन्तजार करता हुआ एक आदमी
दस बजे नहीं मरा
और इतनी आकस्मिक कि
अगली सुबह दस बजे मर गया |

जीवन के सृजन की धमक
महीनों पहले सुनायी पड़ती थी |

जैसे कोई बच्चा
जन्म से महीनों पूर्व
सांस लेने का हुनर सीखता था |

अतिथि की पदचाप सुनायी पड़ती थी
दरवाजे पर खड़ा होकर
वह पुकारता था |

मृत्यु थी
कि अचानक आती थी
पदचाप तो दूर
सांस लेने की आवाज तक नहीं आती थी |

इस दुनिया में
कोई न कोई चाहता तो होगा
कि मृत्यु एकदम अतिथि की तरह आये
दरवाजे पर खड़ी होकर पुकारे
और यह भी कि
मृत्यु को अपने बैठके में बैठाया जाए
उसे गरम चाय पिलायी जाए |

हत्या और मृत्यु में फर्क था
मृत्यु एक सम्मानजनक प्रश्न थी
मृत्यु हत्यारी नहीं थी
दुनिया की हर हत्याएं नियोजित थीं
जैसे गोधरा की बोगियां
झज्जर की झोपड़ियाँ
सन ८४ के सिखों की दुनिया

मृत्यु
शोक का विषय नहीं थी
विलाप मृत्यु का धरम नहीं था

बहुतेरे थे
जों दो बरस का जीवन नहीं जी पाए थे
कई थे
जों उम्र पूरी कर भी डर गए थे
अपने दुखी रहने में वे मृत्यु को
शाश्वत बहाने की तरह इस्तेमाल में लेते थे

मेरी आज की उम्र
कुल पच्चीस वर्ष

लगता था कि मेरे जन्म की बात कल की थी
तो यह भी लगता था कि
मरने का दिन भी कल होगा

शोक या दुःख मनाने का अवसर कहाँ था
हर रोज प्रेम में डूब जाने के लिए कई चीजें थीं

मृत्यु
जब भी आओ
तुम्हारा स्वागत है !

मैं तुम्हारे अचानक प्रेम में ऐसे पड़ना चाहूँगा
कि जैसे लोग कहें
किसी युवती की आँखों में डूबकर
वह अपना जीवन तक भूल गया |


4....   बारिश


बारिश होती है
तो बारिश की पूरी दुनिया घूमने का मन करता है
जहाँ से बारिश शुरू होती है से आरम्भ कर
वहाँ तक जहाँ बारिश खत्म होती है ।
     
कभी तो लगता है भीगते हुए
घूमते हुए पूरा जीवन काट दिया जाय
जैसे कोई पेड सारी उम्र भीगता रहता है
और कितना खुश दिखता है !

दूर से
बारिश की धारासार में आपादमस्तक डूबे घर को देखते हुए लगता है कि
जैसे मैं  बारिश के घर का मालिक हूँ ।

छाता लगाकर
मै बादलों की तरह घूमना चाहता हूँ
वहां तक जाना चाहता हूँ
जहाँ कोई बीज बीहड मरूस्थल में सदियों से सोया पडा है
जहाँ किसी स्त्री के आँगन ने नही देखा इन्दधनुष।

बारिश में मैं इतनी तन्मयता और पहचान के साथ घूमना चाहता हूँ कि
कोई मुझे आया देखे तो कहे बारिश हुई
जाते हुए देखे तो कहे बारिश गई ।

बारिश के नाम कोई चिटठी लिखे तो मुझ तक पहुंचे ।

और बारिश बीत जाने पर
अपनी स्मृतियों में मैं पेड की पत्तियों की तरह
बूंदे बचाकर रखना चाहता हूँ  ।
अगर कोई मुझे छूये
तो झर्र से बरस जाना चाहता हूँ  ।


5..... जो खूबसूरत नहीं थीं 


जो खूबसूरत नही थी
वे लडकियां कहाँ गयीं  ?

ढलती हुई सांझ की तरह सांवली
जिनमें किसी ने कोई रंग नही देखा
जिनके लिये नही लिखा गया कोई अभिज्ञानशाकुंतलम
आखिर वे लडकियां कहाँ गयीं  ?

दुनिया में जो
बिना किसी आवाज के जीती रही
जो बुत की तरह निस्पंद रही
जिनकी लिये नही लिखी गयी प्रेम कविताएं
नही रचा गया किसी नायिका का पाठ
वे कहां गयीं  ?

क्या वे धीरे-धीरे
भाप बन के उड गयी बादलों में
क्या वे सन्नाटा बनकर अंधेरो में बस गयी
उनके मन का संगीत जो कभी सुनायी नहीं दिया
क्या वह हवाओं में घुल गया ?
मैं नही जानता

वे जब दिखती है तो
उनकी आंखो की नमी में छिपा धुँधला इन्द्रधनुष दिखता है
कभी नही हंसी गयी एक हंसी दिखती है
उनकी पुतलियों में बसी थकी आत्मा दिखती है ।

बस

और एक दिन अचानक
वे रहस्यमय तरीके से गायब हो जाती हैं ।



6..... रोजनामचा


रोज रोज मरना
और रोज जिन्दा होना ।

रोज-रोज मृत्यु
हर रोज पुनर्जन्म ।

एक ही जन्म में
अमर होने की तरह रहता हूँ
एक ही जन्म में बार-बार मरता हूँ ।

खुद की कब्र खुद में खोदता रहता हूँ
खुद को जन्म देता रहता हूँ बार-बार ।

जीने से पहले कई बार मर जाता हूँ
मरने से पहले कई बार जीता हूँ  मित्रों ।


परिचय 

नाम - अरविन्द
उम्र- 25 वर्ष 
शिक्षा - काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर 
सम्प्रति - प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक 
मो.न.  07376844005  
निवास- नौगढ़ , जिला चंदौली , उ.प्र.  
फिल्मों में विशेष रूचि 



रविवार, 2 सितंबर 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय का संस्मरण - अठ्ठारहवीं किश्त



                                 विमल चन्द्र पाण्डेय 

पिछली किश्तों में आप यह पढ़ते आये हैं कि विमलचन्द्र पाण्डेय एक तरफ अपनी यू.एन.आई. की नौकरी में चुनौतियों को झेल रहे हैं , तो दूसरी तरफ पारिवारिक और आर्थिक अस्थिरता का दबाव भी उनकी परीक्षा ले रहा है | वे अपने प्यार , मित्रों और मुखातिब के सहारे इन चुनातियों को यथासंभव पलटने की कोशिश करने में लगे हैं , लेकिन वे हर बार नए तरीके से उनके सामने आ खड़ी होती हैं .....| और फिर ..... 


              प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                          ई इलाहाब्बाद है भईया की 
                               अठ्ठारहवीं किश्त 

                                    २९-

इलाहाबाद सरप्राइजेज के मामले में मेरे लिए बड़ा धनी साबित हुआ. इसकी शुरुआत तो वहाँ पहुँचते ही हो चुकी थी जब मैं वहाँ के प्रेस क्लब में पहुंचा था. इलाहाबाद न्यूज रिपोर्टर्स क्लब (एएनआरसी) नाम की एक स्वनामधन्य संस्था वहाँ मीडिया की स्वघोषित माई-बाप थी और शहर के ज़्यादातर मठाधीश वहाँ दिल्ली के प्रेस क्लब से भी अधिक ठसक के साथ बैठा करते थे. कई पत्रकारों का करेस्पोंडेन्स एड्रेस वही था जो अक्सर वहाँ बैठे जी सिनेमा पर कोई मारधाड़ वाली फिल्म देखा करते थे और किसी अभिनेता को न पहचान पाने की स्थिति में पास बैठे दरबारी पत्रकार से पूछते, “ई कौन है में?”

कोई युवा पत्रकार उस उम्र से वरिष्ठ पत्रकार को उत्साह में भर कर बताता, “सर ई साहिद कपूर है. और ई हिरोइन करीना कपूर, पिच्चर का नाम फिदा...”

“अमें हिरोनिया को तो पहिचानी रहे हैं, लौंडवा नै आवत रहा पहिचान में.” फिर वे अपने आसपास किसी से पूछते, “कुछ है अभी ?”

अगले पत्रकार का जवाब आता, “हाँ ३ बजे एक ठो प्रेस कांफ्रेंस है यहीं पे. कहीं जाना है क्या आपको?”

“हाँ, जाना तो था लेकिन अब का जाएँ दो घंटे के लिए. एक बजी रहा है, कर लेते हैं ये वाली प्रेस कांफ्रेंस.” फिर वे लोग बातों में मशगूल हो जाते. शहर में किसी भी संस्था या पार्टी को प्रेस कांफ्रेंस कराने के लिए आश्चर्यजनक ढंग से इस संस्था की स्वीकृति अनिवार्य होती थी और यहाँ कोई प्रेस कांफ्रेंस आयोजित किये जाने की एक नियत फीस थी जो हर जगह होती ही है लेकिन मजेदार बात यह थी कि यहाँ की स्वीकृति के बिना कहीं भी हो रही प्रेस कांफ्रेंस या प्रेस सम्बन्धी किसी भी गतिविधि को इस तरह से इल्लीगल बताया जाता था मानो सारे लीगल कम करने का ठेका इसी संस्था के पास हो. इसके पदाधिकारी पता नहीं पिछले कितने सालों से नहीं बदले थे और पता नहीं अगले कितने सालों तक नहीं बदलने वाले थे. मेरे साथ तो संस्था के सचिव और अध्यक्ष का व्यवहार अच्छा ही रहा था जिसके पीछे का स्पष्ट कारण मेरा यूएनआई जैसी बड़ी संस्था से होना था और जियालाल जी ने खुद जाकर उन महानुभावों से परिचय कराया था लेकिन पत्रकारिता के अन्य नए रंगरूटों के साथ उनका व्यवहार खराब होता. अध्यक्ष जी तो फिर भी थोड़े धीर गंभीर आदमी थे लेकिन सचिव महोदय नए पत्रकारों और नए अख़बारों को बहुत हेय दृष्टि से देखते और किसी नए बैनर को प्रेस क्लब कही जाने वाली उस संस्था की सदस्यता देने में बहुत नखरे दिखाते. शुरू में मुझे मामला समझ में नहीं आया कि आखिर खुद को पत्रकार कहलवाए जाने के लिए इस संस्था की क्या ज़रूरत है और कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस कराये जाने से पहले इस संस्था की इजाजत इस तरह क्यूँ ली जाए जैसे किसी शहर में मेला लगाने से पहले जिलाधिकारी की अनुमति ली जाती है. बाद में मैंने समझ लिया कि इस संस्था की ताकत हिंदी के अधिकतर और अंग्रेज़ी के ज़्यादातर अख़बारों के वो पत्रकार थे जिन्होंने इस स्थिति को सहर्ष स्वीकार कर लिया था और इससे उन्हें कोई समस्या नहीं थी. इसका सामाजिक बहिष्कार कर रहे पत्रकार भी कहीं न कहीं इसका मुखर विरोध न करने के गुनाहगार थे और इसका दबदबा चल रहा था.

दुर्गेश ने अपनी संस्था को वहाँ रजिस्टर करवाने की बहुतेरी कोशिशें कीं लेकिन कई बार डायरी देने और आवेदन लिखने के बाद भी उसकी समाचार एजेंसी को वहाँ पंजीकृत नहीं किया गया. ज़ाहिर है, शहर में हो रही प्रेस कांफ्रेंस की जानकारी के लिए वहाँ सदस्यता की मजबूरी थी जिसके लिए दुर्गेश परेशान था. आखिर दुर्गेश की यह भागदौड़ तब रंग लाई जब उसके बाद नीरेन जी ने भी एकाध डायरियां प्रेस क्लब को भेंट कीं और आखिर राजेश जी के आने आने तक यह समाचार एजेंसी वहाँ रजिस्टर हो गयी थी. हालाँकि मुझे हल्का-हल्का याद आता है कि शुरू-शुरू में राजेश जी मुझसे ही पूछा करते थे कि आज कुछ है क्या शहर में ख़ास. दुर्गेश ने अपने शासनकाल में सिविल लाइन्स बस अड्डे के पास के नीम के पेड़ पर अपनी एजेंसी का एक बॉक्स बनवा कर भी ठोका था जिसमें वह शाम को आकर ताला खोलकर प्रेस कांफ्रेंस की सूचनाएं खोजा करता. वहाँ डीएनए, अमर उजाला और अन्य कई अख़बारों के बक्से टाँगे गए थे जिसमें हाथ डालने पर अक्सर खबर का भ्रम पैदा करती कोई अर्जी या नोट निकलता लेकिन दुर्गेश के बक्से से कभी कुछ उल्लेखनीय नहीं निकला.

एक सरप्राईज तो मुझे शुरू-शुरू में लोकनाथ में मिला. लोकनाथ की शाम के बारे में मैं कविताओं में सुन चुका था और वहाँ की लस्सी एक बार पीने के बाद मैं वहाँ की बदनाम कही जाने वाली गलियों में एक कैमरे वाले पत्रकार मित्र के साथ गुज़रा. अलग-अलग उम्र की लड़कियाँ खिड़कियों और दरवाज़ों से झांक रही थीं. कैमरे वाला दोस्त मीरगंज की गलियों पर एक स्टोरी कर रहा था. उसने मुझे थोड़ी देर के लिए कैमरा दिया और खुद गुटका खाने चला गया. मैं गुटका नहीं खाता था और उसे यह जानकर खुशी हुई कि एक ऐसी भी चीज़ है जो मैं नहीं खाता. मेरे हाथ में कैमरा था और मैंने उसका काम कुछ हल्का कर देने की सोची. मैंने अपने एंगल से कुछ अच्छे शोट्स लिए और थोड़ी दूरी पर के अधखुले दरवाज़े से झांक रही एक लड़की को देख कर उसे पास आने का इशारा किया. वह बार बार दरवाज़ा खोल कर मुझे देखती फिर भीतर भाग जाती. मैंने चिल्ला कर कहा कि मुझे उससे कैमरे के सामने कुछ बात करनी है.

“काहें लिए ?” उसने पूछा.  

“तुम्हार जवन समस्या है तवन बताओ हमका कैमरा में, ई टीवी पर आईगा तो तुम्हार सब दिक्कत सही होई जाई.” मैंने उसे कैमरे पर कुछ बोलने के लिए प्रेरित किया. वह फिर से भीतर चली गयी और झाँकने लगी. मैंने फिर उसे बाहर बुलाया तो वह धीरे से बाहर आती हुई बोली, “फुटेज लै लो, बाईट न देबै हम.”

मैं हैरान रह गया और उसकी फुटेज लेना भूल गया. उसे ज़रूर टीसीआर लोक करना और व्हाईट बैलेंस भी पता होगा.

मेरा तीसरा सरप्राईज यह कमरा था. एक रात मैं सोया हुआ था कि दरवाज़े पर खटखट हुई. एकदम ऐसी खटखट जैसी कोई इंसान किसी के घर जाकर करता है. मैंने पहले इग्नोर किया लेकिन जब रुक-रुक कर तीन-चार बार खटखट हुई तो मुझे उठना पड़ा. मैंने सहमे कदमों से जाकर दरवाज़ा खोला. बाहर सिर्फ़ हवा थी और एक काला सन्नाटा जो मुझे डरा रहा था. मैंने दरवाज़े के दोनों तरफ देखा और हवा की उपस्थिति से सिहर कर तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया.

उस रात दरवाज़ा फिर नहीं बजा. सुबह मैंने जब विवेक को ये बात बताई तो वह ज़्यादा गंभीर नहीं हुआ. मैं ये बात सिर्फ़ उसी से कह सकता था क्योंकि और कोई इस बकवास को गंभीरता से नहीं सुनता और अधिकतर तो इसे मेरा मज़ाक मान लेते. 

“तुम तो साले मार्क्सवादी हो, न भगवान मानते हो न शैतान तब का दिक्कत है? फटने लगी...?” मुझे उसकी बात सुनकर गुस्सा आ गया.

“साले मैं मार्क्सवादी हूँ और भूतों में विश्वास नहीं करता, ये बात मुझे पता है, तुमको पता है, कोई भूत होगा तो उसको क्या मालूम, वो तो रगड़ देगा मुझे...” मैंने चिल्ला कर कहा तो विवेक थोड़ा गंभीर हुआ. उसके समझाने का एंगल तब भी यही रहा कि मैं यूएनआई से बढते जा रहे दबावों और अपने प्रेम के तनावों तले इतना दबा हुआ हूँ कि चीज़ें मुझ पर हावी हो रही हैं. मुझे भी उसकी बात सही लगी लेकिन फिर कुछ ही दिन बाद फिर से ऐसी घटनाएँ होने लगीं.

मैं हर रात अपने प्यार के सोने से पहले रात के दो या तीन बजे तक उससे बात करता रहता था. मैंने उसे सारी बातें बतायीं तो उसने मुझे कुछ राहत पहुँचाने वाली बातें कीं. वह ईश्वर में घनघोर श्रद्धा रखती थी और उसने इस बात को तुरंत स्वीकार कर लिया, मैंने बाकी असहज करने वाली बातें भी उसे बतायीं और उसने मुझे दिलासा तो दिया लेकिन उसके जो समाधान थे वे कन्विन्सिंग नहीं थे. मैं इस समस्या से बचने के लिए हनुमान चालीसा नहीं पढ़ सकता था.

उन्हीं दिनों एक बार शेषनाथ आरा से दो तीन दिनों के लिए इलाहाबाद आया. उसकी आरा में डीएवी कॉलेज में नौकरी लग गयी थी और हमने इस बात पर उसे रोज़-रोज़ फ़ोन करके पार्टी देने के लिए इतना हलकान कर चुके थे कि वह आखिर हमारे कमरे पर हमें पार्टी देने दौड़ा चला आया. मैंने मौका भांप कर मुरलीधर, हिमांशु जी और राजेश जी को भी आमंत्रित कर दिया. हमारे लिए चिकन बनने वाला था जो उस दिन मुरलीधर बनाने वाले थे जबकि अपने और राजेश के लिए शेषनाथ पनीर बना रहा था. भोजन बनने के दौरान दुनिया भर की बातें होती रहीं जिनमें मुखातिब के एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम पर चर्चा ख़ास थी जो १८५७ के डेढ़ सौ साल होने के बाद मुखातिब करवाने वाला था. हिमांशु जी ने एक पैग के बाद हाथ खड़े कर लिए और जबरदस्ती करने पर तरह तरह की दुहाईयां देने लगे. मेरी जिंदगी में मेरी कोई अच्छी उपलब्धि तो अब तक याद नहीं आती लेकिन कुछ अन्यान्य उपलब्धियां ज़रूर हैं जिनके लिए मुझे कोई दुआएं नहीं देने वाला. मैंने हिमांशु जी जैसे उम्रदराज़ दोस्तों से लेकर बोधिसत्व विवेक और बहुत से दोस्तों को पहली बार शराब पिलाई है और अर्बेन्द्र और विवेक जैसे कई दोस्तों को वेजिटेरियन से नॉन-वेजिटेरियन बनाया है.

साल भर से अधिक समय तक सफलतापूर्वक चलने के बाद मुखातिब की योजना थी कि दो या तीन दिन का एक कार्यक्रम करवाया जाए जिसमें १८५७ पर बोलने के लिए प्रियम्वद और कुछ अन्य वक्ताओं को बुलाया जाए. माहौल बहुत नशीला था और इस नशे की खुशी में मुरलीधर ने चिकन में दो बार नमक डाल दिया. मुरलीधर को अपनी दो बार नमक डालने वाली हरकत से अपराधबोध न हो इसलिए शेषनाथ ने भी पनीर में दो बार नमक डाल दिया.

चिकन और पनीर को खाने में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के व्यक्तियों को बराबर मेहनत करनी पड़ी और ऐसा होने का फायदा यह हुआ कि अधिक नमक पड़ने के कारण कोई पार्टी एक दूसरे का मज़ाक नहीं उड़ा सकती थी क्योंकि दोनों एक ही नाव में सवार थे. विवेक चिकन पीस को लगभग धो-धोकर खा रहा था और मैं भी अपने रचनात्मक तरीकों से नमक का असर कम करने की कोशिश में था. मुरलीधर शर्मिंदा होने की कोशिश कर रहे थे और अपनी ट्रेडमार्क हँसी ‘हा हा हा’ के साथ इस गलती का इलज़ाम दूसरे के सर मढने पर अमादा थे.

“हा हा हा, मैंने विवेक जी से पूछा कि उन्होंने नमक डाला है कि नहीं, उन्होंने कहा नहीं तो मैंने डाल दिया....”

शेषनाथ ने भी लगे हाथ सफाई देकर अलग हो जाना ठीक समझा.

“मैंने राजेश जी को कहा कि आप नमक डाल दीजिए हिसाब से तो उन्होंने कहा कि आप ही डालिए लेकिन फिर पता नहीं कब उन्होंने डाल दिया....”

मैंने मौका देखकर मुरलीधर और हिमांशु जी को भी कमरे के बारे में वह बातें बताईं तो शेषनाथ, विवेक और राजेश जी को पहले ही बता चुका था. मुरलीधर ने मुझे बताया कि दिमाग पर जोर पड़ने से कई बार मानसिक स्थिति ठीक न होने की दशा में ऐसी आशंकाएं हो जाती हैं, इन्हें दिल से नहीं लगाना चाहिए. मुझे अचानक लगा कि सब मिलकर मुझे पागल करार देना चाहते हैं. धार्मिक दोस्तों के पास इस घटना की परिभाषा देने के लिए कई तर्क थे और मेरी बात भी ध्यान से सुनते थे लेकिन उनके समाधान मेरे भीतर घबराहट भर देते. मैं कोई भी टोटका इससे बचने के लिए अपनाने के पक्ष में नहीं था और जिन बातों के पक्ष में मैं होता, उस पक्ष वाले लोग इन बातों को स्वीकार कर अपनी विचारधारा पर कोई संकट नहीं आने देता चाहते थे. मैं इन डिस्टर्ब करने वाली घटनाओं के बीच अपनी विचारधारा को समझने की कोशिश कर रहा था.

खैर उस रात की पार्टी शानदार रही और मुखातिब की महत्वाकांक्षी दो दिवसीय गोष्ठी की भी काफी चीज़ें फाईनल की गयीं. सब लोग अपने ठिकाने की ओर लौट गए और शेषनाथ और विवेक मेरे कमरे पर ही रुक गए. मैं और शेषनाथ नीचे चटाई पर सोये और विवेक हमारे बगल में रखी चौकी पर सोया. रात को मुझे दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई और मैं उसे अपन भ्रम मान कर सो गया. मैं तो सो गया लेकिन रात के करीब २ बजे विवेक ने ऊपर से नीचे हाथ करके मुझे धीरे से जगाया, “अबे कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है.” मैंने कहा, “सो जाओ, तुम्हारे दिमाग में कोई टेंशन होगी इसलिए ऐसा सुनाई दे रहा है.” मुझे बदला लेने का अच्छा मौका दिखा और मैं बदला लेकर सो गया. मुझे सोये आधे घंटे से ऊपर हुआ होगा कि मेरी बगल में सोया शेषनाथ अचानक चीखकर उठा और अपना गला पकड़ कर चिल्लाने लगा, “बचाओ, बचाओ....” वह अस्फुट स्वर में और भी बहुत कुछ बोल रहा था जो हमें समझ नहीं आया. मैं और विवेक दोनों जाग गए थे. हमारा नशा उतर चुका था और शेषनाथ नशा नहीं करता था. हमने शेषनाथ को हिलाया और उसे एकाध झापड़ लगा कर सामान्य किया. उसने बताया कि कोई उसका गला दबा रहा था और आंख खुलने के बाद भी उसे अपनी साँस घुटती हुई सी महसूस हो रही थी. मैंने विवेक को एक नज़र देखा और विवेक ने एक नज़र मुझे. शेषनाथ पहले भी एकाध बार सपने में बउआ चुका था और विवेक ने उसे उसके पुराने रिकोर्ड से जोड़ दिया. शेषनाथ की बात गंभीरता से नहीं ली गयी और हम फिर से शांतिपूर्वक सो गए.

अगले दिन शेषनाथ दिन भर इलाहाबाद घूमता रहा और शाम को आरा के लिए निकलने वाला था तो हमने उसे एक और दिन के लिए रोक लिया. विवेक दिन भर मेरे ही कमरे पर रहा. रात को हमने पिछले दिन के मसाले नमक वाले खाने से ऊबे होने के कारण हल्के खाने का विकल्प चुना और किचन में जो सिर्फ़ एक खाद्य पदार्थ मुझे अच्छा बनाना आता है, मैंने बनाया. तहरी खाने के बाद दोनों ने थोड़ी देर मेरी समस्या पर बात की और इस बहाने भूत प्रेतों के अपने सुने सुनाये अनुभव बांटते रहे. मैंने अनुभव किया है कि अगर भूत प्रेत का प्रसंग निकाल आय तो सबके पास एक से एक कहानियाँ होती हैं और वक्त के गुजर जाने का पता ही नहीं चलता. प्रेम प्रसंगों के प्रसंगों से इन प्रसंगों में अधिक रोमांच और अनिश्चितता होती है जिसके कारण शेषनाथ जैसे लोग, जिनका अब तक कोई प्रेम प्रसंग नहीं रहा था और प्रेम पर चर्चा में ये सिर्फ़ अपनी राय बता पाते थे अनुभव नहीं, भी सक्रिय रूप से भाग ले सकते थे.

इस रात भी हम पिछली रात की तरह सोये. मैं चटाई पर शेषनाथ के साथ सोया और विवेक ने कल की तरह मेरी चौकी हड़प ली. रात को अचानक विवेक ने मुझे झकझोर कर जगाया और पूछा, “तुम अभी बाथरूम गए थे क्या ?” मैंने नींद में ही जवाब दिया, “नहीं, तुम जानते हो मैं सो जाता हूँ तो सीधा सुबह ही उठता हूँ. रात में पेशाब करने नहीं उठता.” उसने यही प्रक्रिया शेषनाथ पर भी दोहराई.

अगली सुबह विवेक जिस हालात में मुझे दिखा, मैं इतना ही समझ सका कि विवेक को अगर पक्षियों से प्यार होता और उसने कुछ तोते पाले होते तो उस सुबह वे सारे के सारे उड़ गए होते. उसने रात की घटना बताई जिसने मेरी मानसिक तकलीफ और बढ़ा दी.

विवेक ने बताया कि उसे रात दो बजे के आसपास पेशाब लगी और वह चौकी से उतर कर बाथरूम में जाने ही वाला था कि उसने देखा कि नीचे चटाई से उठ कर कोई छाया बाथरूम की तरफ गयी. उसे कद काठी से लगा कि मैं गया हूँ. बाथरूम में पानी गिरने की आवाज़ थोड़ी देर आई फिर बंद हो गयी. विवेक चौकी पर लेटा-लेटा इंतजार करता रहा कि पानी गिराने वाला वापस लौटे तो वह बाथरूम जाए. जब काफ़ी देर तक कोई हलचल नहीं हुई तो उसने झुक कर नीचे देखा और हम दोनों को बेसुध सोते देख कर उसकी हालत खराब हो गयी. उसने हमें तुरंत जगाया और इस बात की तस्दीक की. उसे कोई मानसिक तनाव नहीं था और न ही वह इन बातों के बारे में कभी सोचता या बात करता था लेकिन एक घटना हुई थी जिसे या तो भ्रम कहकर टाला जा सकता था भले इसके पहले ऐसे भ्रम पूरी जिंदगी में कभी नहीं हुए हों या फिर इसमें विश्वास करके वहाँ से भाग जाना था. विवेक ने दूसरा विकल्प चुना.

“बाबा तुम्हार रूम है भुतहा, अभी तक हम मजाक समझत रहे लेकिन अब हमार गयी है फट. हम चलित है कीडगंज. तुमका मिले के होए तो आये जाओ शाम को और जल्दी से जल्दी इ रूम के छोड़े के विचार करो.”
विवेक का कहना पहले से ही था कि जब से मैं इस कमरे में शिफ्ट हुआ हूँ, मेरी जिंदगी में चीज़ें बिगड़ने लगी हैं. मेरा प्यार सही चलते चलते अचानक क्राईसिस में आ गया, मेरी नौकरी पे अचानक खतरा मंडराने लगा और यहाँ मैं कुछ भी न लिख पा रहा हूँ न पढ़ पा रहा हूँ. और तो और मैं निराशा में रहने लगा हूँ. मेरे जैसा आशावादी इंसान निराशा में रहने लगे तो ये वाकई खतरनाक बात है और इसमें मेरे कमरे का भी कोई रोल ज़रूर है, विवेक कि ये बातें मुझे ज़रा भी कन्विंस नहीं करती थीं लेकिन कुछ तो था कि मैं भी अब ऐसा ही सोचने लगा था.

                                         ३०-

संदीप उस समय कोई नौकरी नहीं कर रहा था और नाना प्रकार के तरीकों से धन कमाने के उपाय खोजता रहता था. विवेक ने एक बार मुझे बताया कि मेरे इलाहाबाद आने से पहले उसने कुछ समय तक एक धार्मिक चैनल के संवाददाता के तौर पर काम किया था लेकिन काम में मजा नहीं आने के कारण उसने यह काम छोड़ दिया था. उसने अभी प्रसंग ठीक से पूरा भी नहीं किया था कि संदीप ने बात लपक ली.

“कब के बात है ई?”

“पिछले साल २००७ के.”

“का बात कर रहे हो, पिछले साल तो अर्धकुम्भ था...”

“हाँ तो ?” विवेक ने पूछा.

“चूतिया हो तुम बहुत बड़े, इतने बढ़िया धार्मिक चैनल की आईडी पाए रह्यो और कुछ नै कियो. अबे हमका दै दिए होते बे....केतना माल चीरा जात. बताओ पत्रकारन के कमाए के सीजन रहा और तुम कुछ नै कमायो.”

‘माल चीरना’ उसकी पसंदीदा क्रिया थी और उसका पूरा ध्यान हमेशा इसी क्रिया पर रहता था. इसके लिए वह बहुत कोशिशें किया करता था और अक्सर ये कोशिशें रंग लाया करती थीं. जैसे कुछ समय पहले जब मैं इलाहाबाद गया था तो मैंने उसके हाथ में एक महंगा मोबाइल फ़ोन देखा जिसके बाबत पूछने पर वह थोड़ा शरमा कर बात को गोल कर गया. बाद में राजेश जी ने बताया कि ये मोबाइल उसने किसी चर्चालोलुप बाबा को शीशे में उतार कर झटका है. उसके पास एक अदृश्य शीशा था जिसमें वह जब चाहे जिसे चाहे अपनी बातों से उतार सकता था. यह कहते हुए मुझे थोड़ा संकोच लग रहा है लेकिन इस बात में कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर मुझे पता चले कि मैं इधर संस्मरण लिख रहा हूँ और वह उधर इस संस्मरण की फोटो प्रतियाँ लेकर इसके बेस कर कहीं से कोई क्रेडिट ले चुका हो.

संदीप उन लोगों में से था जिनके बारे में आप अच्छी तरह जानते हैं कि वह क्या है, कैसा है और कब अपना फायदा सोचता है लेकिन उसके अन्दर पता नहीं ऐसा क्या था कि उसे देख कर उस पर प्यार बहुत आता था. मेरे प्रेम प्रसंग को देखकर उसका भी मन प्यार में पड़ने को हो रहा था और छोटे शहरों के माहौल के कारण वह प्रेम और शादी जैसे दो ध्रुवीय चीज़ों को एक मान लेता और कहता, “हमार बियाह करवाय देओ में...”

‘कैसी लड़की चाहिए’ सवाल के जवाब में वह वैसी ही बताता जैसी बेस्ट अवेलेबल हो सकती है जैसे वह गोरी हो, सुन्दर हो, फिगर अच्छी हो, पढ़ी-लिखी हो, स्मार्ट हो, पति को प्यार करे, ज़्यादा महत्वाकांक्षी न हो, पति से कोई सवाल न पूछे, पति के माँ-बाप को अपना समझे, कोई नौकरी कर ले तो और बेहतर आदि आदि.

“जब तुमका इतना कुछ चाहीं लड़की में तो वहू को तो कुछ चाहीगा. अगर लड़की के घर वाले पूछें कि लउंडा का करत है तो का बतायी?” मैं पूछता.

“साले जन्त्यो नै का...? कह देयो लड़का पत्रकार है.”

“अरे लेकिन कहाँ पत्रकार है?”

“अमें न्यूज चैनल में और कहाँ.”

“कौन चैनल में ?” मैं पूछता. अब वह मुझ पर उसकी बातें न समझ पाने के लिए भड़क पड़ता.

“कौन चैनल के चाही आईडी ? संझा तक लाए देबे हम. तुमका जवन चैनल सही लगे वही बोल देयो, एनडीटीवी, स्टार न्यूज, आजतक....हम ओही के आईडी लाय देबै.”

यह सच्चाई थी. वह शाम तक किसी भी चीज़ का जुगाड़ कर सकता था और उसके संपर्क बहुत ज़्यादा थे. टिकट कन्फर्म करवाने से लेकर कहीं एडमिशन करवाने तक और किसी नेता से कोई काम करवाने से लेकर किसी की किताब छपवाने तक वह कुछ भी कर सकता था. मुझे तो लगता था कि अगर मैं उसे इमरजेंसी में सुबह कह दूं कि मुझे शाम तक मायावती को किडनैप करना है तो वह तुरंत गंभीर मुद्रा बना कर सोचने लगेगा और कहेगा, “अच्छा एक काम करो, हम एक नंबर दे रहे हैं, उसको फोन करके एक मारुती वैन का इंतजाम कर लो. हम जाते हैं कटरा क्लोरोफोर्म लेते आते हैं. तुमको शाम को फ़ोन करके बताते हैं.”

वह सिर्फ़ लड़कियों के मामले में दुखी हो जाता था और उसका आत्मविश्वास दरकने लगता था वरना बाकी सब जगह वह मुकद्दर का सिकंदर था. मेरे ही साथ पैसे कमाने के कई तरीके सोचता और मुझसे शेयर किया करता था जिनमें एक दिन उसने मुझे एक तरीका यह भी बताया कि कई दोस्तों से उधार लिए जाएँ और उनके मुहल्लों से गुज़रना बंद कर दिया जाए. इस तरीके पर चर्चा करने के एक हफ्ते के भीतर ही एक दिन उसका फ़ोन आया और उसने कहा कि राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय में शोध में प्रवेश के लिए उसे जो फीस चाहिए उसमें दो हजार रुपयों की कमी पड़ रही है. उसने मुझसे दो हजार उधार मांगे और कहा कि वह अगले सोमवार तक वापस कर देगा. मैं मांगते ही समझ गया कि ये पैसे मेरे पास वापस लौट के नहीं आने वाले हालाँकि मैं उसे बिना उधार दिए और यह देखे कि वह लौटता है या नहीं, उस पर शक नहीं करना चाहता था. किसी के बिना कुछ किये सिर्फ़ बनी बनाई धारणा पर उसके बारे में राय कायम करना कितना गलत है, ये मुझे अक्सर लगता. लेकिन ये दुनियादारी की बात थी, अन्दर से तो मैं जानता ही था कि वह लौटाने की नीयत से नहीं मांग रहा. विवेक ने मना किया कि उसे एक रूपया नहीं देना क्योंकि तुम्हें वापस नहीं मिलेगा. मैंने उसे बताया कि वह उधार मुझे वापस नहीं मिलेगा लेकिन इसके बदले उसको परेशान करने का जो आनंद मिलेगा, उसके सामने एक हजार की रकम कुछ नहीं है.

“चलो अच्छा कोई बात नहीं, एकै हजार दे देओ. बाकी कोई अउर दोस्त से लै लेबे.” मैं दो हजार न देकर उसे एक हजार रुपये दिए और एक हफ्ते इंतजार कर अगले सोमवार को उसको फ़ोन लगा दिया.

“यार अभी तो हम आये हैं चौफटका के तरफ. लौटने में देर होय जायेगी. तुम्हारा पैसा देंगे चिंता मत करो.”

इसके बाद मैं मांगता रहा और वह विश्वास के साथ मना करता रहा. बाद में जब उसे समझ में आ गया कि मुझे पैसे नहीं चाहिए और मैं उसका मजा ले रहा हूँ तो वह रक्षात्मक मुद्रा में आ गया. अब मैं दोस्तों के ग्रुप में बैठा हूँ, किसी बात पर बहस चल रही है और संदीप कोई तर्क ऊँची आवाज़ में दिए जा रहा है कि मैं एक ऐसी बात बोल देता कि उसके चेहरे के सभी भाव बदल जाते.
“अच्छा ई सब तो चलत रही. ई बताओ हमार पैसवा कब देबो ?”

वह बोलना बंद कर देता और मेरी ओर मुस्करा कर देखता, थोड़ा शर्माता और कहता, “बहुत हरामी पीस हो साले तुम.”

मैं कहता, “हम कि तुम ? काल शाम तक हमारा पैसा हमको मिल जाना चाहिए.”
वह अपना तकिया कलाम दोहराता, “सही कह रहे हो.”

मैं अब भी इलाहाबाद जाता हूँ तो मौका देखकर अपने हजार रुपये मांगता हूँ और वह उसी तरह शर्मिंदा होकर हँसता है जैसा मैं चाहता हूँ, इसमें वह अब ज़्यादा देर नहीं लगाता क्योंकि उसे पता होता है कि मैं कम दिनों के लिए ही आया हूँ.

रात में बत्तियों का अपने आप जल उठना, बाथरूम में अपने आप नल का चल कर बंद हो जाना जैसी घटनाओं में मैं अभ्यस्त होने लगा था. मुझे यह भी समझ में आ गया था कि ये चाहे जो हो रहा हो, मुझे इससे कोई नुकसान नहीं पहुँचने वाला. दरवाज़े की खटखट पर पहले मैं अपने डर से प्रेरित होकर कभी गन्दी गालियाँ देता हुआ दरवाज़ा खोलता और कभी हाथ में कोई डंडा लेकर लेकिन वहाँ कोई नहीं हुआ करता था. अब दरवाजे पर खटखट होती तो डर एकबारगी हावी तो होता लेकिन दरवाज़े पर जाने का आलस उससे बड़ा हुआ करता था और मैं लेटे-लेटे कहता, “अरे साले, जब भूत हो तो इतनी शराफत दिखाने की क्या ज़रूरत है, आ जाओ रोशनदान से और बत्ती जलती मत छोड़ा करो, बिल मुझे भरना पड़ता है.” कई बार मेरे कुछ बोलने से आवाजें थम जातीं और मुझे और ज़्यादा भयभीत छोड़ जातीं.

ऐसी ही एक रात जब मैं टीवी बंद करके सोने जा रहा था और फ़ोन पर अपने प्रेम से बातें कर रहा था कि दरवाज़े पर खटखट हुई. ये वाली खटखट ज़्यादा मुखर, ज़्यादा स्पष्ट और ज़्यादा तेज़ थी. मेरे साथ उसने भी फ़ोन पर ये खटखट सुनी. वह डर गयी, “इतनी तेज़? यहाँ तक सुनाई दे रही है.” मैं भी डरा लेकिन दरवाज़े पर आवाज़ भी आई, “विमल जी..सो गए क्या बंधु ?”

मैं आवाज़ पहचान गया. गुड नाईट कहकर फ़ोन काटा और दरवाज़ा खोला. “आइये...इतनी रात को ?”

“बंधु, मैं पैदल आ रहा हूँ मुट्ठीगंज से.”

“ऐसा क्यों ? आपकी बाईक कहाँ है ?”

“बंधु, मैं घर छोड़कर आया हूँ. मैंने अपना मोबाइल भी वहीँ छोड़ दिया है ताकि मुझसे कोई संपर्क न कर सके. मैं अब घर नहीं जाऊंगा. मुझे कहीं भेज दीजिए.”

“कैलाश जी, आप कमाल करते हैं. ऐसे कोई करता है ?”

“आप मुझे शरण नहीं देंगे तो मैं कहीं और जाऊं. मगर मुझे घर जाने को मत कहियेगा.”

मैं समझ गया कि इस वक्त कुछ कहना व्यर्थ है. मैंने उन्हें कमरे में बिठाया और थोड़ी देर तक वह बताते रहे कि आज उनका उनकी पत्नी से बहुत झगड़ा हो गया है और उनका गृहस्थी से मोहभंग हो गया है. उन्होंने मोटरसाइकिल और मोबाइल समेत पर्स और सारी चीज़ें घर छोड़ दी हैं और सिर्फ़ कुछ पैसे लेकर बाहर निकले हैं. बाहर निकल कर उन्होंने दो तीन अड्डों पर बैठ कर कई ब्रांड्स पी कर बहुत कॉकटेल कर दिया है जिससे उन्हें कुछ ठीक से समझ नहीं आ रहा है. वह यह शहर छोड़कर कहीं जाना चाहते हैं. मैं उन्हें मुंबई भेज दूं और किसी परिचित से कहकर कोई भी काम लगवा दूं. मैं अगले साल मुंबई पहुचुंगा तब तक वह मेरा वहाँ इंतजार करेंगे.

“आपके मित्र तो होंगे ही मुंबई में...मुझे सुबह की गाड़ी से भेज दीजिए.”

मैंने हामी भरी कि मेरे कुछ दोस्त हैं वहाँ जो उनका ध्यान रखेंगे तो वह जोश में आ गए और कहने लगे कि चलिए स्टेशन पर गाड़ी का पता लगा लेते हैं. मैंने हामी भर दी. मैं उनसे कुछ पलों के लिए अलग हटा और उनकी पत्नी को फ़ोन लगाया. यह इत्तेफ़ाक ही था कि एक बार उन्होंने घरवाले मोबाइल से मुझे फ़ोन किया था और मैंने वह नंबर सेव कर लिया था. वह बुरी तरह से रो रही थीं. मैंने उन्हें सांत्वना दी और आराम से सो जाने को कहा और बताया कि कल इन्हें सही सलामत आपके पास भेज दूँगा. वह रोना बंद कर मुझे दुआएं देने लगीं. फ़ोन काटते वक्त मैंने एक बात जिज्ञासावश पूछी भी, “जब ये ऐसी हरकत करते हैं तो आप चप्पल जूते कुछ उठाकर पीट क्यों नहीं देती इनको?”

“अरे भईया, आप ऐसे क्यों बोल रहे हैं, जो भी हैं मेरे पति हैं वो.” मैं समझ गया कि यहाँ टू वे कम्युनिकेशन की कोई गुंजाईश नहीं है. मैं वापस कमरे में आया तो कैलाश जी स्टेशन जाने के लिए अपने उतारे गए जूते फिर से पहन रहे थे. मैंने बाईक निकाली, स्टेशन तक उन्हें लेकर गया, वहाँ मुंबई जाने वाली गाड़ियों का नंबर नोट किया और कुछ सिगरेटें पीं. वापस आने पर कैलाश जी थक गए थे लेकिन उनका अभी कुछ और बताने का मन था कि वह मुंबई जाने के बाद अपने परिवार को कुछ पैसे भेज दिया करेंगे, अपना फ़र्ज़ वह हर हाल में पूरा करेंगे लेकिन अब परिवार के साथ नहीं रहेंगे क्योंकि उनकी ज़रूरत वहाँ नहीं रही, उसने कोई प्यार नहीं करता आदि आदि. मैंने कोई तर्क वितर्क करना ठीक नहीं समझा और बत्ती बुझा दी ताकि उन्हें जल्दी नींद आ जाए. मैं गृहस्थी की परेशानियों के बारे में सोचता सोचता सो गया.

सुबह मेरी नींद खुली तो कैलाश जी फ्रेश होकर अपनी जूते पहन रहे थे. “कहाँ ?” मैंने पूछा.

“बंधु आज मेरे स्कूल में बच्चों का प्रेक्टिकल है और मुझे थोड़ा जल्दी पहुंचना है. मैं अपनी मोटरसाईकिल भी नहीं लाया. आपकी ले जाऊं ? आपको कहीं जाना तो नहीं ?”

मैं मुस्कराया. मैं मुंबई प्रसंग छेड़ कर या रात की कोई बात याद दिला कर उनका फ्रेश मूड बिगाडना नहीं चाहता था. मैंने अपनी बाईक की चाभी उनके हाथ में दे दी. “मुझे कहीं नहीं जाना, आप आराम से ले जाइये.”

“धन्यवाद बंधु, शाम को मिलते हैं तो गाड़ी वापस कर दूँगा.”

मेरे चेहरे पर मुस्कराहट थी जिसमे संतोष का भाव मिला हुआ था. उनके चेहरे पर संतोष का भाव था जिसमें थोड़ी मुस्कराहट छिपी हुई थी.


                                                       क्रमशः .....

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