रविवार, 10 अगस्त 2014

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर ..... अशोक आज़मी

                                अशोक आज़मी


सिताब दियारा ब्लॉग पर धारावाहिक के रूप में छपने वाला यह दूसरा संस्मरण है | इसके पहले विमल चन्द्र पाण्डेय के चर्चित संस्मरण ‘ई ईलाहाबाद है भईया’ को आप लोग इस ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं | हमारे लिए यह अत्यंत सुखद है कि कई दिनों/सप्ताहों की झिझक के बाद युवा कवि/आलोचक अशोक आजमी ने जब अपनी स्मृतियों को दर्ज करने का फैसला किया, तो इसके लिए उन्होंने ‘सिताब दियारा’ ब्लॉग को चुना | हालाकि अभी वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इसे अनियतकालीन ही रहने दिया जाए | और इसके लिए अपनी लम्बी-चौड़ी व्यस्तताओं का हवाला भी दे रहे हैं | फिर भी हमारी दिली ख्वाहिश है कि हम सब प्रत्येक रविवार को इसे ‘सिताब दियारा’ ब्लॉग पर पढ़ें | मुझे उम्मीद है कि पाठकों की तरफ से आने वाली प्रतिक्रियाएं उन्हें इसे आगे लिखने के लिए प्रेरित करेंगी |

               
            तो आईये पढ़ते हैं युवा कवि/आलोचक अशोक आज़मी के संस्मरण 
                                           
                            ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर...
                                              
                                की पहली क़िस्त  

स्मृतियों के बारे में जब भी कुछ दर्ज़ करने की इच्छा होती है तो कोई चार साल पहले ग्वालियर के पास के अपने जन्मस्थान से लौटे वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना का उदास चेहरा याद आता है. उन्होंने कहा था, “जहाँ की स्मृतियाँ बहुत सुखद हों, वहाँ लौटकर नहीं जाना चाहिए...स्मृतियाँ नष्ट हो जाती हैं. फिर शुरू करें तो कहाँ से करें? सारी स्मृतियाँ अर्जित नहीं होतीं. माँ और पापा ने जितना कुछ बताया है बचपन के बारे में वह सब याद्दाश्त के सहारे दर्ज है मष्तिष्क में... जो जन्म के पहले से शुरू हो जाता है. लगता है जाड़े की वह अँधेरी रात और हसन हुसैन की याद में सीना पीटते मातमी लोगों के साथ मुंह में रुई के फाहे से दूध पिलाती छोटी बुआ का चित्र वैसे के वैसे अंकित है. आधी रात को जाकर भजन मंडली बुक कराते बाबा की हुलस और सारे शरीर पर निकले दानों के साथ इस हास्पीटल से उस हास्पीटल घूमते माँ पापा मेरी इस याद्दास्त में शामिल हैं. रायपुर का वह खपरैल का छत और उसमें इकलौते टेबल फैन पर तौलिया निचोड़ कर रखता वह बालक और पड़ोस के साइकल मैकेनिक की बेटी शब्बो जैसे इस ब्लैक एंड व्हाईट एल्बम में सबसे बीच के पन्ने पर सजे हुए हैं और ऐसे ही कितने सारे चित्र जिन्हें माँ पापा की बातों ने गढा है.

फिर यह ख्याल कि आखिर ऐसा क्या अलग है इस ज़िन्दगी में कि किसी की दिलचस्पी हो? चालीस की उम्र का खिचड़ी बालों और उभरते खल्वाट वाला दागों से भरे काले चेहरे और बेडौल शरीर वाला यह कलमघसीट आख़िर क्योंकर किसी की दिलचस्पी का बायस हो? वह भी तब जब इस चालीस साल का हासिल महज कुछ काले सफ़ेद पन्ने और ढेर सारी नाकामियाँ हों? बारह साल कविता लिखने के बाद जिसके पास एक अदद पुरस्कार तक न हो और जिसे साल में भूले भटके कोई दो एक बार कविता पढने बुलाता हो उसे खुद को कवि कहने का हक़ भी पता नहीं है या नहीं? ऊपर से एक ऐसी विचारधारा का झंडा उठाने का दुस्साहस जिसका फैशन अब बीत चुका हो, वह भी किसी संगठित गिरोह के प्रमाणपत्र के बिना! या फिर यह होना ही अलग होना है? अगर सिर्फ इतना ही अलग होना है तो ऐसे अलगकी ऐसी की तैसी कर देनी चाहिए न? तो फिर यह लिखना यह ऐसी की तैसीकरना ही हो तो एक वजह बनती है शायद. लेकिन अपनी ऐसी तैसी कर पाना आसान है क्या? फिर आसान काम करने में मज़ा भी क्या है? तो लब्बोलुआब यह कि बस लिखने का मन है...खुद से बतियाने का मन है. जहाँ तक मुमकिन हो. काम मुश्किल और आसान दोनों इसलिए है कि न कभी डायरी लिखी न कोई नोट्स लिए. तो जो स्मृति में अपने आप रह जाए बस वही था याद रखने लायक. जो भूल गया वह शायद भूल जाने लायक था. आखिर खाना खाना भूला जा सकता है, सांस लेना थोड़े न भूला जा सकता है!

मूर्त स्मृतियों की सबसे पुरानी कड़ी स्कूल की ही है. यह भी एकदम साफ़ नहीं है. पुराने ब्लैक एंड फोटो को जैसे किसी ने अनजाने में गोंद लगा के चिपका दिया हो और फिर उसमें उभर आये धब्बों के बीच से कुछ कुछ पहचानने की कोशिश कर रहा हो. देवरिया...जहां पापा इकलौते साइंस कालेज में भौतिक विज्ञान पढ़ाते थे. पारस नाथ श्रीवास्तव का बहुमंजिला मकान जिसका दूसरा हिस्सा उनके सबसे छोटे भाई का था और कुल मिलाके पंद्रह से अधिक किरायेदार उन दोनों हिस्सों में रहते थे. पारस लाल जी पटवारी से प्रमोट होके कानूनगो हो चुके थे. उम्र इतनी थी कि हम उन्हें बाबा कहते थे. उनके दोनों पुत्र हुए चाचा और चारो पुत्रियाँ बुआ. अगल बगल ऐसे चाचाओं और बुआओं की भीड़ थी. इन मकानों से किरायेदार तभी निकलते थे जब उनके अपने मकान बन जाते. विश्वास अभी बाकी था तो न कोई लिखा पढ़ी होती न कोई डील या बिचौलिया. बस लोग रहने लगते और फिर उसके रहवासी बन जाते. हम पहली मंजिल पर रहते थे. पापा के गुरूजी होने की अलग इज्जत थी. तीन कमरे थे एक चौका एक बड़ा सा आँगन जिसके बीचोबीच खटिया का नेट बनाकर हम बैडमिन्टन खेलते थे..हम यानी मैं और पापा. छोटा भाई बहुत छोटा था. छत से चिड़िया टकराए तो फाउल होता था. पापा की सारी दुनिया घर से थी. सुबह अखबार पढके नहाने जाते और फिर नाश्ता करके कालेज. शाम को क्लास छूटते ही साइकिल सीधे घर पर आके रूकती. न पान की कोई गुमटी, न चाट का कोई अड्डा.

यह सब मुझे करना था पर उसमें अभी वक़्त था. अभी तो सरस्वती शिशु मंदिर का टिन से बना गुमटी वाला रिक्शा था जिसमें बैठ के रोज़ आना जाना था. अभी उसमें बैठे बच्चों का मुझे अशोक मसाले कह कर चिढ़ाना था और मेरा उनसे लड़ना. अभी तो विश्राम जी थे, सुदर्शन जी थे, रामाश्रय जी थे...और तमाम आचार्य जी लोगों की उपस्थिति में रोज़ सरस्वती वंदना से भोजन मन्त्र, शान्ति मन्त्र और प्रेरक प्रसंगों के बाद वन्दे मातरम गा के लौटना था. जी. वन्दे मातरम...जनगण मन नहीं. देश में सरकारी शिक्षा का भगवाकरण भले अब हो रहा हो लेकिन इन शिशु मंदिरों के ज़रिये गैर सरकारी स्तर पर यह बरसों से ज़ारी है. संघ के प्रचारक ही इसमें शिक्षक होते हैं. इतिहास से लेकर हिंदी तक की किताबें भगवा रंग में रंगी होती हैं और साथ में प्रेरक प्रसंगों से लेकर सुभाषित और प्रातः स्मरण बचपन से एक साम्प्रदायिक मानस का निर्माण करते हैं. इतिहास गा रहा है में जो इतिहास है वह इन दिनों टी वी सीरियल्स में दिखाए जा रहे इतिहास से बहुत अलग नहीं होता. यहाँ गोलवलकर और हेडगेवार पूज्य होते हैं तो ज़ाहिर है उनकी शिक्षाएँ गीता के श्लोकों सी होती हैं. शहर का वणिक समुदाय जो कभी इनका सबसे बड़ा फाइनेंसर होता था, अब जो अपने स्कूल खोल रहा है उनमें भी संस्कृति के नाम पर यही सब परोसा जाता है. उस दौर में छोटे शहरों का सवर्ण मध्यवर्ग अपने बच्चों को कान्वेंट के सांस्कृतिक प्रदूषण से बचाने सरकारी स्कूलों की जगह इन स्कूलों में भेज रहा था. वही बच्चे आज बड़े होकर संघ और भाजपा के समर्थन वाले मध्यवर्ग में तब्दील हुए हैं.

खैर डायलेक्टिक्स भी एक चीज़ होती है! हमने उस स्कूल में सीखा भाषण देना. जिस दिन हमारी कक्षा को प्रेरक प्रसंग कहना होता उस दिन अक्सर कोई किस्सा गढ़ लेते. आखिर जो सुनाये जाते थे वे भी तो गढ़े ही हुए थे न. एक और चीज़ सीखी. नेतागिरी. शिशु मंदिर में छात्र कार्यकारिणी का अध्यक्ष बना तो विद्या मंदिर (मिडिल स्कूल) में भी शायद विज्ञान मंत्री था. शुद्ध हिंदी में ओजस्वी भाषण देता था और पढने में भी ठीकठाक था. भाषण देने की यह कला बाद में भी और अब भी बहुत काम आती है. स्कूल के कुछ किस्से और...लेकिन अगली किस्त में.


                                    ...........जारी है

परिचय और संपर्क

अशोक आज़मी  ... (अशोक कुमार पाण्डेय)

वाम जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव
युवा कवि, आलोचक, ब्लॉगर और प्रकाशक
आजकल दिल्ली में रहनवारी


           

16 टिप्‍पणियां:

  1. बीते हुए कल को आज की दृष्टि से देखने की कोशिश । और सहज होइए , अशोक भाई ।

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    1. सही कह रहे हैं आप. आगे कोशिश होगी

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  2. संस्मरण बहुत ताक़तवर विधा है, मैंने इस बात को बहुत शिद्दत से महसूस किया है. यह पढने वालों पर किस्से कहानियों और कविताओं से बिलकुल अलग एक दीर्घकालिक और विश्वसनीय प्रभाव डालता है. मैंने बिना सोचे समझे इत्तेफकान लिखना शुरू किया था, मेरे पास सिवाय कुछ दोस्तों के किस्से के कुछ खास नहीं था. आपके पास जो क्षेत्र का विषद अनुभव है वह लोगों के लिए आँखें खोलने वाला साबित हो सकता है जैसे सरस्वती शिशु मंदिरों की बाबत हम दोस्त यही बातें करते रहते हैं जो आपने रेखांकित की हैं. बहुत अच्छा लगा यहाँ तक का हिस्सा, आगे अपनी यादों के साथ दृष्टि का ऐसा ही सूक्ष्म प्रयोग इस संस्मरण को अपने समय की डीटेल्ड व्याख्या बनाएगा, ऐसा विश्वास है. शुभकामनाएँ आपको और बधाई रामजी भाई को. सिताब दियारा पर अभी कई कारनामे होने हैं

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  3. रामजी भाई / सिताब दियारा और अशोक भाई इसे पढ़ लेने के बाद बढ़ी मेरी उत्सुकता के दायी आपलोग हैं ...इसके दूसरे कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी ...हार्दिक शुभकामनाएं आप सभी को

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  4. आगे आगे देखिये होता है क्या .... राम जी भाई की सार्थक सोच (अशोक भाई तो हैं ही साथ में) को नमन !

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  5. प्रवाहमयी और प्रभावी ढंग से साझा किये विचार.... शेष का इंतज़ार

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  6. वाकई संस्मरण की धार औरों से अलग और पैनी होती है. जिया और भुगता हुआ सच ताकतवर होता है. इस मायने में सबके सच अपने-अपने किस्म के अलग और अनूठे होते हैं. अशोक भाई के संस्मरण ने इसे आगे पढने की उत्सुकता जगाई है. सिताबदियारा पर हम इसे आगे भी लगातार पढ़ते रहेंगे या यूं कहें कि रामजी भाई पढवाते रहेंगे इसकी उम्मीद तो हम कर ही सकते हैं.

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  7. काल-खंड के यथार्थ और बाल अशोक पर उसके प्रभावों का भी सूक्ष्म चित्रण हो , उस समय अशोक का बाल-मन क्या सोंचता था ,यह सब भी आये तो संस्मरण में एक गहराई आयेगी। शुरुआत बहुत अच्छी है।

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  8. ऐ चला चल खुदा के बंदे तुझे परवाह किस बात की,

    जो दिए के सहारे चले वो ज़िन्दगी किस काम की.

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  9. बहुत खूब भईया, आगे पढने की उत्सुकता मुझसे ज्यादा भला किसी को क्या होगी....

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  10. और पढ़ने का इंतजार है, इस पुरअसर शुरुआत के बाद

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    1. धन्यवाद सर. कोशिश होगी कि कुछ ढंग का लिख पाऊँ..

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  11. बहुत अच्छा संस्मरण | अपने बचपन के दिन याद आ गये क्योंकि मैं भी सरस्वती विद्या मंदिर के स्कूल में पढ़ा हुआ हूँ ! अगले अंक का इंतजार रहेगा बेसब्री से...

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  12. अभी फेसबुक खोला ही था कि आपके संस्मरण पढ़ने को मिल गए ,यादो के गलियारे , उनका जमघट , कभी सुखद कभी दुखद परिस्थितियाँ आजके बचपन से सर्वथा अलग हमारी पीढ़ी , लिखते रहिए , एक लेखक के लिए इससे बड़ा पुरस्कार नहीं हो सकता कि पाठक कहे आपके लेखों का इंतजार है .

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  13. संस्मरण सबके अलग-अलग होते हैं बेशक। आप अपने विचारों और अपनी कविताओं से लोगों में और युवाओं में उम्मीदें जागते है। सच को सामने लाते हैं और निजी ज़िन्दगी में भी हर समस्या से जूझना आता है आपको। आपके संस्मरण लिखने की शुरूआत बहुत बढ़िया तरीक़े से की है। आगे पढ़ने की उत्सुकता ..... शाहनाज़ इमरानी

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