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रविवार, 14 सितंबर 2014

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर - अशोक आजमी - पांचवी क़िस्त





इस संस्मरण के बहाने ‘अशोक आज़मी’ अपने बचपन के उन दिनों को याद कर रहे हैं, जिसमें किसी भी मनुष्य के बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है | पिछली किश्त में उन्होंने किशोरावस्था के उन वर्जित प्रदेशों की यात्रा की थी, जिसके बारे में हमारा समाज न तो कुछ कहना चाहता है और न ही सुनना | इस पांचवी क़िस्त में वे मंडल आन्दोलन के बहाने उस पूरे दौर की मानसिकता को समझने की कोशिश कर रहे हैं | 
                                  
      
    तो आईये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग पर अशोक आज़मी के संस्मरण                       
               

               “ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर” की पांचवी क़िस्त

             

          “जब नौकरी मिलनी ही नहीं है तो पढ़ के क्या फ़ायदा”



शिशु मंदिर में एक दैनन्दिनी दी जाती थी. इस डायरी के पहले पन्ने पर नाम वगैरह के साथ एक सवाल था “बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं’ मैंने लिखा था “एम एल ए, एम पी फिर प्रधानमन्त्री!” यह पांचवी क्लास का हाल था!


राजनीति में मेरी रूचि जाने क्यों आम लड़कों की तुलना में शुरू से कहीं अधिक थी. राजीव गांधी जब देवरिया आये थे तो पापा बीमार थे. माँ ने दवाई लाने भेजा था और हम साइकिल लिए लिए उनका भाषण सुनने चले गए. उनका वह कांख के नीचे से निकाल कर शाल ओढ़ने वाला स्टाइल इतना भाया कि मम्मी की एक क्रीम शाल उसी स्टाइल में ओढ़ कर कहीं निकल जाता था. एक बार अटल बिहारी बाजपेयी रामलीला मैदान में आये तो वहाँ पहुँच गया और उनकी पाज देकर बोलने वाली स्टाइल अपनाने की कई असफल कोशिशें कीं. हमारे मकान मालिक रिटायरमेंट के बाद नगरपालिका सदस्य का चुनाव लडे तो रिक्शे पर बैठकर माइक लेकर प्रचार करने निकल जाता “आदरणीय भाइयों और बहनों, नगरपालिका परिषद् देवरिया के वार्ड 17 के सदस्य पद प्रत्याशी श्री पारस नाथ श्रीवास्तव को मछली पर मुहर लगा के विजयी बनाएं. याद रहे भाइयों और बहनों..मछली. मछली.मछली. आप सबका चुनाव निशान मछली.


अख़बारों में राजनीतिक ख़बरें भी बहुत गौर से पढता था. तब हमारे यहाँ जनसत्ता और आज आते थे. इसके कारण शायद उस दौर के राजनीतिक हालात में रहे होंगे. राजीव गांधी का इंदिरा जी की मृत्यु के बाद एक स्वप्नदर्शी युवा के रूप में उभरना, संचार क्रान्ति का आरम्भ वगैरह जो एक उत्साह लेकर आया था उसके तुरंत बाद बोफर्स का मामला क्या उठा, एक तूफ़ान खड़ा हो गया.  वी पी सिंह अचानक देश में मसीहा की तरह स्थापित हो गए. हम पगला गए थे उस दौर में. अभी पहले रोएँ चेहरे पर आना शुरू हुए थे लेकिन जहाँ कहीं सभा होती पहुँच जाते. उनका आफसेट पर छपा एक पोस्टर अपने घर के बाहर वाले खम्भे पर चिपका दिया. पापा वी पी सिंह को पसंद करते थे लेकिन मेरी इस दीवानगी से चिंतित भी रहते थे. तो पढ़ाई पर जोर बढ़ा दिया गया. सुबह पांच बजे उठा के कुर्सी पर बैठा देते थे, एक कप चाय खुद बना के देते थे और फिर स्कूल से आने के बाद चार से पांच घंटे रोज़. घर से निकलना मुश्किल हो गया था. लेकिन उस दिन तो हमारा मसीहा शहर में आने वाला था.


उनकी मीटिंग शाम छः बजे से थी. मैं कालेज से घर गया ही नहीं. प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी थी. रामलीला मैदान में होने वाली सभा कैंसिल कर दी गयी और  आखिरी समय पर हमारे राजकीय इंटर कालेज का मैदान दिया गया. नारा लगा “ बोफर्स के दलाल मुर्दाबाद”, “तानाशाही नहीं चलेगी”, “राजा नहीं फ़क़ीर है, भारत की तक़दीर है” और इन नारों के साथ हम राजकीय इंटर कालेज के मैदान में पहुँचे. कोई पांच सौ लोगों की भीड़ थी तब तक. कुछ लोगों को रिक्शे पर लगे माइकों के साथ जगह बदलने की सूचना के साथ शहर की गलियों और मुहल्लों में भेजा गया. बाक़ी लोग व्यवस्था में लगे. सबसे बड़ी समस्या थी मंच की. कालेज का मैदान खेल का मैदान था. वहाँ कोई राजनीतिक सभा होती ही नहीं थी तो कोई स्थाई मंच था नहीं. जितनी भीड़ की उम्मीद थी उनके बीच जीप वगैरह पर खड़े होकर बोलने से काम चलने वाला नहीं था. इसी बीच सलाह आई कि ट्राली जोड़ के मंच बन सकता है. आनन फानन में दो ट्रैक्टर ट्राली मंगवाए गए. लेकिन पुलिस ने कालेज गेट पर उन्हें रुकवा दिया. बड़ी हुज्जत की नेता लोगों ने. लेकिन पुलिस वाले टस से मस न हुए. बोले “ट्राली ले जाओ लेकिन ट्रैक्टर नहीं ले जाने देंगे.” अब बिना ट्रैक्टर ट्राली कैसे टस से मस हो. किसी ने उत्साह में नारा लगाया, खींच के ले चलो. नेताजी लोग सहम गए. सफ़ेद झकाझक कुर्ता पैजामा में ट्राली कैसे खिंचाती. चार पांच युवा आगे बढ़े..पीछे से मैं और मेरे जैसे कुछ और विद्यार्थी और देखते देखते दो ट्रालियां जोड़ के मंच बना. गद्दे बिछा दिए गए. शाम के छः बजे...फिर सात...आठ...वी पी सिंह नौ बजे आये महिन्द्रा जीप से. कालेज का छोटा सा मैदान पेट्रोमेक्स की रौशनी में लोगों से ठसाठस भरा था. वी पी सिंह की एक झलक पाने के लिए लोग बेक़रार थे. हम मंच सजाने के बाद वहीँ रह गए थे...कब धक्के लगे और कब मंच नेताओं से भर गया पता ही नहीं चला. हम नीचे खड़े थे. वी पी सिंह बगल से गुज़रे. मैंने नमस्कार किया तो लगा उन्होंने जो हाथ जोड़ा था वह मेरे ही जवाब में था. नारे और बुलंद हो गए. जहाँ वह खड़े थे वहां से उनकी छाया मुझ पर पड रही थी. दुबला पतला शरीर और मुचमुचाया कुर्ता पैजामा. गले में गमछा. पूरबिहा लोच वाली सधी आवाज़. लगा जैसे अपने ही कोई चाचा-मामा बोल रहे हैं. मंत्रमुग्ध सुनता रहा. बीच बीच में नारे. ग्यारह बजे घर लौटा तो पता ही नहीं चला पापा ने कितना डांटा...उनके थप्पड़ों में जैसे उस दिन कोई जान ही नहीं थी.


उस बार जनमोर्चा या (जनता दल ?) से चुनाव एक ठाकुर साहब लड़ रहे थे. नाम अब याद नहीं. भीखमपुर रोड पर उनका दो मंज़िला मकान था साधारण सा. मैं वहां नियमित जाने लगा. शाम को मीटिंग होती थी और उसमें गाँव गाँव के वोट का हिसाब लगाया जाता था. एक दिन मैं बैठा था और मेरे ननिहाल पीपरपांती की चर्चा चल निकली. वे मेरे उस गाँव से रिश्ते को नहीं जानते थे. किसी ने कहा “ऊ त बभनन क गाँव ह. अहिरन क वोट मिल जाई. चमटोली त कांग्रेस के देई और पंडिज्जी लोग भी कांग्रेसे के वोट दिहें.” ठाकुर साहब बोले “देख शारदा मिसिर क वोट त समाजवादे के जाई. अ ऊ चमटोलियों से दिअइहें.” मेरा सीना गर्व से फूल गया. शारदा मिश्र मेरे नाना थे!


उस चुनाव में सुबह से हम सब सक्रिय थे. घर घर जाके पर्ची बाँट रहे थे. सुभाष विद्यालय में बूथ था. वहीँ चौकी पर जमे हुए थे. कोई तीन बजे एक जीप आई. हम चार पांच लोगों की ओर इशारा कर किसी ने कहा, “चल लोगिन” मैंने पूछा, “कंहवा.” “चल पहिले. “रस्ता में बतावल जाई.” हम लद गए. जीप देवरिया से दो एक किलोमीटर दूर किसी गाँव में रुकी. हमें सीधे बूथ के भीतर ले जाया गया. उंगली में स्याही लगी और वी पी सिंह की पार्टी को पांच वोट मिल चुके थे!


वी पी सिंह आये और उनके पीछे पीछे आया मंडल कमीशन. हम सब जो उनके भक्त थे रातोंरात उनके विरोधी बन गए. घर में, मोहल्ले में, कालेज में हर जगह उन्हें गालियाँ दी जाती थीं. स्थानीय अखबार मंडल कमीशन के खिलाफ उठ रहे आन्दोलनों के विस्तृत समाचारों से भर गए. एक गुस्सा हम सब के भीतर कसमसा रहा था. एक शाम यों ही बैठा था तो मम्मी बोलीं, “पढ़ क्यों नहीं रहे?” मैंने कहा “जब नौकरी मिलनी ही नहीं है तो पढ़ के क्या फ़ायदा!” पापा हमसे तो नहीं लेकिन घर आने जाने वाले चाचा लोगों से ऊंची आवाज़ में मंडल कमीशन की लानत मलामत करते. दलितों का आरक्षण पचा पाना पहले ही सवर्ण कही जाने वाली जातियों के लिए मुश्किल था. अब पिछड़े भी! कालेज के इंटरवल में अब क्रिकेट की जगह मंडल की बातें होने लगीं. एक दिन यह तय किया गया कि कल से आन्दोलन शुरू करना है.


अगले दिन भी रोज़ की तरह सुबह प्रार्थना के लिए सभा लगी. प्रार्थना अभी ख़त्म भी न हुई थी कि मैं भाग के स्टेज पर पहुँचा. आवाज़ तब भी इतनी भारी थी कि माइक की ज़रुरत नहीं थी. भाषण देना शुरू किया. प्रिंसिपल साहब सहित सारे शिक्षक भौंचक्के! उन दिनों इलीट माने जाने वाले जी आई सी के इतिहास में ऐसी पहली घटना थी यह. होरा सर तो सीधे अंकल ही थे. पर उस दिन न किसी का डर लगा न कोई हिचक. भाषण ख़त्म होते होते अपील की गयी स्कूल के बहिष्कार की और किसी ने छुट्टी की घंटी बजा दी. सारे छात्र सड़क पर निकल आये. नारे गढ़ लिए गए. “मंडल आयोग मुर्दाबाद”, “बर्बादी का दूसरा नाम – राम विलास पासवान”, “राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है”...जुलूस महाराजा अग्रसेन इंटर कालेज पहुँचा. छुट्टी की घंटी बजा दी गयी. सारा कालेज मैदान में और एक ऊंची जगह खड़े होकर मेरा भाषण. फिर यही कहानी बी आर डी इंटर कालेज में. फिर एस एस बी एल इंटर कालेज. रास्ते में कस्तूरबा गर्ल्स इंटर कालेज था पर उसके पास जाने की किसी की हिम्मत नहीं हुई. कोई ढाई हज़ार छात्र! सड़क पर चक्का जाम का वह किस्सा होरा अंकल आज भी सुनाते हैं. सड़क पर लेटे हुए हम लोग. चीखते हुए “हमारी लाश से लेकर जाओ गाड़ी”...सारा जुलूस पहुँचा जिलाधीश कार्यालय और सभा में तब्दील हो गया. तभी अचानक शहर के डिग्री कालेज के नेता लोग आ गए. मंच पर चढ़ गए. मुझे मदन शाही और शिवानन्द शाही के नाम याद हैं. और लोग भी थे. ये सब वी पी सिंह के समर्थक रहे थे कभी. लड़कों ने नारा लगाया, “नेता नूती नीचे उतरो”, “हमारा नेता अशोक पांडे” वे बडबडाते हुए नीचे उतर आये. मैंने कोई आधे घंटे भाषण दिया. नीचे उतरा तो कुछ दोस्त चाय और समोसे लेकर खड़े थे...कई अखबारों के फोटोग्राफर और पत्रकार बात करने के लिए इतेज़ार कर रहे थे. अगली सुबह मैं छात्रनेता अशोक कुमार पाण्डेय में तब्दील हो चुका था...आश्चर्य इन सबके बीच न पापा की कोई डांट थी न मार. 


आन्दोलन एक बार शुरू हुआ  तो बढ़ता गया. मंडल आयोग विरोधी छात्र मोर्चा बना. मुझे उसका संयोजक बनाया गया. कोई विनीत त्रिपाठी बनारस से संयोजित करने आये थे. राघवनगर के एक घर में मीटिंग होती थी. रोज़ बयान ज़ारी होते. तय किया गया कि डी एम के बंगले के सामने क्रमिक अनशन हो. पंडाल बन गया. माइक वगैरह की सारी व्यवस्था हो गयी. रोज़ दो लोग सुबह से शाम तक अनशन करते फिर शहर का कोई गणमान्य व्यक्ति जूस पिलाकर अनशन तुड़वाता. पहले दिन मैं बैठा. मेरी ज़िद आमरण अनशन की थी लेकिन सबने मना कर दिया. इस बीच एक दिन तय हुआ कि सांसद मोहन सिंह को घेरा जाय. चार मोटरसाइकिलों से हमलोग उनके घर पहुँचे. मैं मदन शाही के पीछे बैठा था. ज्योंही हम उनसे बात करना शुरू किये उन्हें किसी बात पर गुस्सा आ गया. किसी ने शायद उनके ठाकुर होके नानजात के लोगों की तरफदारी पर छींटाकशी की थी. वे चिल्लाए, “छात्र बनते हैं ससुरे. अंग्रेजी आती है?” मुझे जाने क्या सूझा, बोला “कौन सी सुनेंगे? लालू वाली कि मुलायम वाली.” मेरा यह कहना था कि उनका पारा सातवे आसमान पर, “मारो सालों को” की आवाज़ गूंजी और वर्दीधारी लाठियाँ हमारे पीछे. मदन शाही ने तेज़ी से गाड़ी भगाई तो एक सिपाही ने डंडा चला के मारा. पीठ का वह हिस्सा अब भी कभी कभी दुखता है. अभी हाल में जब मोहन सिंह जी की मृत्यु हुई तो मुझे वह घटना याद आई. 


क्रमिक अनशन का कोई असर नहीं हो रहा था. हम कुछ ऐसा करना चाहते थे कि हंगामा हो. आत्मदाहों का दौर शुरू हो चुका था. लेकिन हम इसके एकदम खिलाफ थे. आखिर खुद मरने से क्या होगा मारना है तो उन सबों को मारो जो हमारी ज़िन्दगी चौपट कर रहे हैं. एक दिन मैं, आशुतोष, मनीष पाण्डेय और शायद रीतेश सिंह साथ बैठे थे. योजना बनी कि मनीष के घर के सामने जो गोदाम है उसमें आग लगा दी जाय. वह ऍफ़ सी आई का गोदाम था. रात का कोई समय तय किया गया. हम एक लीटर के करीब डीजल लेकर पहुंचे. वहां समझ आया कि इतने तेल से तो एक बोरी अनाज फूंकना मुश्किल था. फिर भी तर्क आया कि ज़रा सी आग लग गयी और अनाज तक पहुँच गयी तो बाक़ी अपने आप हो जाएगा. तो दीवार के एक कमज़ोर लग रहे हिस्से पर डीजल डाला गया. माचिस रगड़ी गयी. पर माचिस जले ही नहीं. एक एक करके तमाम तीलियाँ ख़त्म हो गयीं. धमाके की हमारी योजना धरी की धरी रह गयी. रीतेश इन दिनों लन्दन में डाक्टर है. आशुतोष शायद कृषि वैज्ञानिक. मनीष इंजीनियर बनने दक्षिण के किसी कालेज में गया था. वहीँ उसे नशे की लत लग गयी. मैं तो बीच के दिनों में शहर से एकदम ग़ायब ही रहा लेकिन उसके घर के पास रहने वाले एक दोस्त ने पिछले दिनों लखनऊ में बताया कि उसके नशे की लत इतनी भयानक हो गयी थी कि लाखों का क़र्ज़ हो गया था. एक दिन उसकी लाश उसके घर में ही पंखे से लटकती मिली. उसकी मम्मी मारवाड़ी इंटर कालेज में हिंदी की शिक्षक के रूप में बहुत प्रसिद्द थीं. पापा प्रदेश के जाने माने शिक्षक नेता थे. भैया देवरिया से रुड़की इंजीनियरिंग कालेज में प्रवेश पाने वाले पहले छात्र. मनीष शुरू से अलमस्त तबियत का था. नशे ने ख़त्म न किया होता तो आज वह हमारे बीच होता.


खैर, इस योजना की समाप्ति के बाद बनी गिरफ्तारी देने की योजना. रोज़ कुछ लोग गिरफ्तारी दे रहे थे. जिस दिन मेरा नंबर था मेरे साथ कालेज के कुछ और मित्रों को गिरफ्तारी देना था. उस दिन ननिहाल में कोई फंक्शन या पूजा थी. रात भर वहीँ रहा था. नानी को छेड़ता रहा, “ए नानी हम जेल चलि जाईं त तू रोअबू?” नानी कहतीं, “अब बुढौती में इहे कुल दिन देखाव तू. ” सुबह सीधे वहां से तय जगह पहुँचा. जुलूस निकला. गिरफ्तारी की जगह तक पहुँचते पहुँचते दसेक लोग रह गए. गिरफ्तारी के पहले दरोगा ने कहा कि “अच्छे खासे पढ़े लिखे शरीफ घर के लड़के लग रहे हो तुम लोग. क्यों जेल जाना चाह रहे हो. घर जाओ.” “संख्या तीन रह गयी” जेल के दरवाजे पर फिर उसने जब यही दोहराया तो एक और मित्र शहीद हुए. अंत में मैं और एस एस बी एल का एक छात्र जेल के भीतर पहुँचे.


भीतर पार्टी का माहौल था. जलेबी, समोसे, कचौरी चल रहे थे...पर मेरा मन तो अटका था कि पापा को पता चलेगा तो क्या होगा?

                                      ....................जारी है .....
                                      

परिचय और संपर्क

अशोक आज़मी .... (अशोक कुमार पाण्डेय)

वाम जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव
युवा कवि, आलोचक, ब्लॉगर और प्रकाशक
आजकल दिल्ली में रहनवारी      


रविवार, 7 सितंबर 2014

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर - अशोक आज़मी - चौथी क़िस्त





इस संस्मरण के बहाने ‘अशोक आज़मी’ अपने बचपन के उन दिनों को याद कर रहे हैं, जिसमें किसी भी मनुष्य के बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है | पिछली किश्त में उन्होंने 1984 के सिख-विरोधी दंगों के पागलपन को याद किया था, जिसमें बहुसंख्यक समाज ‘विवेक-च्युत’ होता हुआ दिखाई देता है | इस चौथी क़िस्त में वे किशोरावस्था के उन वर्जित प्रदेशों की यात्रा कर रहे हैं, जिसके बारे हमारे समाज में कहने और सुनने की एक अघोषित सी मनाही रखी गयी है |  
                                  



    तो आईये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग अशोक आज़मी के संस्मरण                       
               


             “ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर” की चौथी  क़िस्त

                         

                          “मुंहासों ने बचाया मुझे”



तेरह चौदह की उम्र बड़ी ग़ज़ब होती है. अब जो रासायनिक बदलाव आते हैं वो तो आते ही हैं लेकिन सबसे जबरदस्त होता है बड़े हो जाने का एहसास. मेरे साथ यह अलग से रहा है कि मेरी हमेशा अपनी उम्र से अधिक उम्र के लड़कों से दोस्तियाँ हुई हैं और खुद को अपनी उम्र से अधिक महसूस करने की एक ख़ब्त रही है. तो तेरह चौदह का होते होते मेरी मोहल्ले के तमाम दादा टाइप लोगों से दोस्ती हो चुकी थी. उस मोहल्ले का समाजशास्त्र भी थोड़ा अलहदा था. कसया ढाला के उस पार की बसाहट को देवरिया में आधुनिक माना जाता था. और हमारी ओर वाले को बैकवर्ड. पुराना मोहल्ला था गलियों और गंदगी से भरा पूरा. सबसे बड़ी आबादी श्रीवास्तव लोगों की थी. इसके अलावा कथित छोटी जाति के लोग भी प्रचुर मात्रा में थे. मोहल्ले के पीछे खाली मैदान थे जहाँ अब तमाम नए बने घरों में से एक मेरा भी है. तब हम उसमें क्रिकेट खेला करते थे. श्रीवास्तव लोगों के साथ ख़ास बात यह थी कि लगभग सब एक दूसरे के रिश्तेदार थे. जनसंख्या के मामले में भी तब ये परिवार बड़े उत्पादक थे. हमारे मकान मालिक की चार लडकियाँ और दो लड़के थे. बाक़ी घरों में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति थी. आम तौर पर लोग सरकारी नौकरियों में बाबूगिरी करते थे. भ्रष्टाचार रोज़ सुनाये जाने वाली गर्वोक्ति थी. पापा इन सब को लेकर थोड़ा सुप्रियारिटी काम्प्लेक्स में रहते थे. स्केल की भी और ईमानदारी की भी. उन्हें हम भाइयों का मोहल्ले के आम लड़कों से मिलना जुलना पसंद नहीं था. भाई तो खैर कम से कम छात्र जीवन तक उनका श्रवण कुमार ही रहा, लेकिन मैं हमेशा से सरदर्द रहा. क्रिकेट का नशा बढ़ता जा रहा था और क्रिकेट के लिए संगत तो उन्हीं की मिलनी थी. सख्ती खूब होती थी, पिटाई हफ्ते में एकाध बार तो हो ही जाती थी, कई बार तो फील्ड से ही पिटते हुए आये लेकिन सुधरने वाले हम तब भी नहीं थे.


एक तरफ पापा के कालेज के शिक्षकों की सोसायटी थी, जिसे आप शहर का अपक्लास कह सकते हैं. उन दिनों एक दूसरे के घर जाना, मिलना जुलना लगभग नियमित सी चीज़ थी तो पापा के ग्रुप के तमाम लोगों के बच्चे हमारे अच्छे दोस्त थे. मजेदार बात यह कि इनमें लडकियाँ ज्यादा थीं. कई कान्वेंट में पढ़ती थीं. अंग्रेजी बोलती थीं, तो पापा की जो रोज़ की इंग्लिश स्पीकिंग क्लास थी उसके भरोसे मुझे वहां भी बहुत बेईज्जत नहीं होना पड़ता था. दूसरी तरफ मोहल्ले का गैंग था. शुद्ध भोजपुरी बोलने वाला. वहाँ मैं सहज भी था और उसके लिए पापा की किसी ट्रेनिंग की ज़रुरत भी नहीं थी. इस तरह कुल मिला जुला के दिन अच्छे गुज़र रहे थे. 

इस बीच वह हुआ जिसने मेरे पूरे किशोर जीवन पर एक काली छाया सी डाल दी. इस उम्र तक फ़िल्मी जानकारी के अलावा सेक्स के किसी ज्ञान से मैं अनभिज्ञ था. उम्र के साथ जो एक अतिरिक्त आकर्षण होता है, उसके अलावा कल्पनाओं में भी अभी किसी दैहिक फंतासी का कोई प्रवेश नहीं हुआ था. वह जाड़े का कोई दिन था, छुट्टी का दिन. हम हमेशा की तरह पीछे स्कूल के मैदान में क्रिकेट खेल कर वापस लौटने से पहले बैठ कर गप्पें मार रहे थे. आमोद और दीपू भैया अचानक उठ के दूसरी तरफ चले गए. एक दो और लड़के थे जो देख देख के मुस्कुरा रहे थे. मेरी समझ में कुछ नहीं आया तो मैंने पूछा. उन्होंने आपस में कुछ इशारा किया और मुझे साथ आने को कहा. हम पीछे प्रमोद चाचा की फैक्ट्री की तरफ गए तो उन्होंने मुंह पर उंगली रख के चुप होने का इशारा किया. एक कोने में कटरेन का पर्दा डाल कर पेशाब वगैरह के लिए आड़ कर दी गयी थी. उसी की एक दरार से उन्होंने भीतर देखने का इशारा किया. मैंने देखा कि दीवार पर दोनों हाथ रखके आमोद टिका हुआ है और उसके पीछे दीपू भैया ने उसे कंधे से पकड़ा हुआ है और धीमे धीमे हिल रहे हैं. दोनों की पैंट्स घुटने के नीचे सरकी हुईं थीं. एक पल मेरी समझ में कुछ नहीं आया. मैं वहां से निकला और तेज़ी से घर की तरफ भागा. पहले छत पर एक कोने में बने स्टोर में दीपू भैया को अलग अलग लड़कों के साथ जाते, और हमारी नज़र पड़ने पर हमें डांट के भगाते कई बार देखा था. तब कुछ समझ में नहीं आया था. इस घटना के बाद न जाने क्या हुआ कि दीपू भैया से डर और बढ़ गया. मैं उनसे भागा भागा रहने लगा. वह होते तो मैदान तक जाके भी क्रिकेट नहीं खेलता. छत पर वह पतंग उड़ा रहे होते तो मैं नीचे उतर आता.

दीपू भैया का घर हमारे ठीक नीचे था. आँगन के बाद लोहे का एक जाल लगा था जिसके नीचे उनका आँगन था. मकान मालिक के रिश्तेदार थे वे लोग तो किराया नहीं लगता था. उनके पापा शायद सिंचाई विभाग में बाबू थे. दो बहने और तीन भाई. सबसे बड़े दीपू तब बारहवीं में थे और सबसे छोटा शोभित जो तब अभी जन्मा भी नहीं था. उनके पापा रोज़ शराब पी के आते और अक्सर दीपू भैया पिटते थे. नशे में अगर पापा से टकरा गए तो एक ही लाइन दुहराते, “प्रणाम गुरु जी. आपके त बतिये निराला बा. देखेलीं आपके लइकन के त जिऊ जुरा जाला. हमरो दुइये ठो होतं स त देखा देतीं दुनिया के” और पापा किसी तरह पिंड छुडा के निकल पड़ते. बड़ी दीदी दीपू भैया से एक साल छोटी थीं और उसके बाद बुच्चन दीदी मुझसे एक साल बड़ी. दोनों बहनें मुझे राखी बाँधती थीं. जब तक देवरिया आना जाना रहा यह रिश्ता बना रहा. मैं गोरखपुर से लौटता और मिलने जाता तो अन्दर बच्चन दीदी के कमरे में हम घंटों गप्पें मारते. वह पूछतीं, “कोई गर्लफ्रेंड बनी कि वहां भी दीदी ही बना रहे हो सबको” और ठहाका लगा कर हंस पड़तीं. मैं पूछता, “आपको मिला कोई?” तो कहतीं, “अपनी किस्मत में को लाला ही आयेगा. किसी सरकारी विभाग का बाबू.” दीपू भैया पढाई वगैरह में तो फिसड्डी थे लेकिन बाक़ी सर्वगुण संपन्न. मकान में किसी की लाईट खराब हो जाए, किसी का नल खराब हो जाए, किसी के यहाँ कोई फंक्शन हो, दुर्गापूजा हो, जन्माष्टमी हो, दीपू हैं तो कोई टेंशन नहीं. बाद में उन लोगों ने मकान बनवा लिया मोहल्ले के पीछे के मैदान के ही एक टुकड़े में. अंकल का पीना बदस्तूर ज़ारी रहा. जाड़े की एक रात देर से पीकर लौटे तो किसी ने दरवाज़ा ही नहीं खोला. वह गालियाँ देते, दरवाज़ा पीटते थक गए तो बरामदे में ही सो गए. घरवाले सबक सिखाना चाहते थे. शायद वह सीख भी गए. लेकिन उस सबक का कोई असर लेने की हालत में नहीं रहे. सुबह चाची ने दरवाज़ा खोला तो वह वैसे ही पड़े थे...बस अब साँस भी नहीं चल रही थी. दीपू भैया इन दिनों अनुकम्पा नियुक्ति में मिली उसी नौकरी में हैं और खूब पैसा पीट रहे हैं.


खैर, सेक्स से वह मेरा परिचय जिस तरह हुआ था वैसे ही और घनिष्ठ होता गया. पूरा मोहल्ला जैसे सेक्स से बजबजा रहा था. समलैंगिक सम्बन्ध तो इतने कामन थे कि एक बार समझ के आने के बाद वह चारों तरफ नंगे दिखाई देते थे. हालत यह कि खुद दीपू भैया नहीं जानते थे कि उनके शिकारों का सबसे बड़ा शिकार उनका अपना छोटा भाई है. एक बार खुल जाने के बाद उन लड़कों ने मुझसे ये बातें करनी शुरू कर दीं. किसका किससे क्या चल रहा है, यह जानने की रूचि उस उम्र में सारे आदर्शों पर भारी पड़ती थी. फिर प्लास्टिक की पन्नी में पैक वे रद्दी काग़ज़ पर छपीं किताबें. एक तरफ पापा और नाना के आदर्श थे, गीता प्रेस की किताबें थीं तो दूसरी तरफ मस्तराम की किताबें और मोहल्ले के कोनों अतरों में फैले ये किस्से. पापा का डर और माँ की सख्त निगरानी थी कि लम्बे समय तक इनका हिस्सा बनने से बचा रहा. लेकिन वर्जित फल खाने की वह इच्छा कब तक रोकता? समलैंगिक संबंधों से मुझे घिन आती थी, तो दोस्तों ने दूसरा इंतजाम किया. वह लड़की हमारी गली के अंतिम छोर पर रहती थी. वैसे तो हिंदी का लेखक होने से यह सुविधा है कि लगभग तय है कि यह संस्मरण उसके पास तक नहीं पहुंचेगा, फिर भी उसका नाम नहीं ले रहा. स्कूल में ही उसे बुलाया गया था. एक ठेले के अन्दर वह इंतज़ार कर रही थी. मैं कांपते पैरों से पहुँचा. बाक़ी दोनों दोस्त वहीँ खड़े हो गए और मुझे अन्दर जाने के लिए कहा. जब मैं अन्दर गया तो उसने मुझे एक निगाह देखा और फिर बाहर निकल आई. उन लड़कों से कुछ कहा और चली गयी. मैं हतप्रभ. निकल कर उनके पास गया तो उनमें से एक ने कहा, “ अबे तोरी चेहरा पे ई मुंहासा बा न. कहतिया छुअले से ओहू के हो जाई. एहिसे भाग गईल ह.” 


मैं घर लौट आया. सीधे शीशे के सामने जाकर खड़ा हुआ. दोनों गालों पर उगे मुंहासों को गौर से देखा. काले चेहरे पर गंदे मुंहासे. मैं फोड़ दिया करता था तो तमाम निशानात बन गए थे. अपना चेहरा इतना बदसूरत कभी नहीं लगा था. एक आलमारी में माँ का फेस पाउडर रखा था. उसे अब रोज़ चोरी चोरी लगाने लगा. पापा जो साफी लाये थे उसे बिला नागा दिन में दो बार दो चम्मच पीने लगा. जो आता चार सलाहें दे जाता. मेरा चेहरा देशी दवाइयों की प्रयोगशाला बन गया. लेकिन मुंहासे न खत्म होने थे, न हुए.


एक अजीब सी हीन भावना भरती चली गयी. जिन लड़कियों से साथ बचपन से खेला था उनके सामने पड़ने से कतराने लगा. मिलना ही पड़े तो नज़रें चुराता. वे किसी बात पर हंस पड़तीं तो लगता मुझ पर ही हंस रही हैं. पढ़ाई का बहाना करके शादियों, पार्टियों में जाने से बचता. अजीब अजीब से सपने आते. एक सपना तो बरसों आता रहा. मेरी शादी हो रही है. पंडित जी मंत्रोच्चार करा रहे हैं, अचानक लड़की उठ कर खड़ी हो जाती है और कहती है “इसके चेहरे पर मुँहासे हैं, मैं नहीं करुँगी इससे शादी. 


इंटर में पढता था तो हिंदी पढ़ने मिसेज शुक्ला आंटी के यहाँ जाता. उनके पति पापा के दोस्त रहे थे और उनकी अकाल मृत्यु के बाद आंटी की उन्हीं की जगह नियुक्ति हुई थी. मिसेज शुक्ला आंटी जैसी जीवट वाली और मृदुभाषी महिला मैंने आज तक के जीवन में नहीं देखी. मेरी पहली कविता पापा ने आंटी को ही दिखाई थी और उन्होंने कहा था, “इसे रोकियेगा मत. इसमें कवि होने की क्षमता है.” अभी हाल में कहीं मेरी कविता पढ़ के उन्होंने फोन किया और खूब आशीर्वाद दिया. वैधव्य के पहाड़ से दुःख और उस छोटे से क़स्बे के तमाम अनर्गल लांछनों के बीच उन्होंने पम्मी दीदी और मिनी को जिस तरह की परवरिश दी वह अद्भुत थी. मिनी एकदम मेरी उम्र की थी. पहले किसी संदर्भ में जिस दिवा का नाम लिया है वह यही मिनी थी. पहले आंटी हनुमान मंदिर के बगल वाली गली में एक मकान के पहले तल्ले पर रहतीं थीं. बाद में देवरिया ख़ास में उन्होंने मकान बनवा लिया.  हम अक्सर उनके घर जाते और हम तीनों लूडो, व्यापार वगैरह खेलते थे. लेकिन अब हालत यह थी कि मिनी मुझसे सहजता से हाल चाल पूछती, पढ़ाई की बात करती और मेरे मुंह से हाँ-ना कुछ नहीं निकलता. वह झुंझला जाती या कभी कभी हंस पड़ती और मैं पढ़ाई ख़त्म करते ही इतनी तेज़ भागता कि एक बार आंटी ने पापा से कहा कि “बहुत तेज़ साइकल चलाता है सोनू.”


यह हीनभावना वर्षों मेरे भीतर भरी रही. कालेज आने के बाद भी और एक हद तक अब भी. लेकिन उस रोज़ तो मुंहासों ने ही मुझे बचाया. उस घटना के बाद मैंने उन दोस्तों और उन बातों से खुद को पूरी तरह काट लिया. इसकी एक दूसरी वजह थी नाना के यहाँ आने वाली पत्रिकाएँ. धर्मयुग और सारिका से वह मेरा पहला परिचय था. समझ में कितना आता था यह पता नहीं लेकिन हर रविवार को वहाँ जाने पर इन पत्रिकाओं में डूब जाता. राजनीतिक पत्रिकाएं भी उनके पास खूब होती थीं. रेलवे लाइब्रेरी से वह साहित्यिक किताबें भी ले आते. मैं उन्हें चाट जाता. उन दिनों पढ़ी एक किताब अब तक याद है, मास्ति वेंकटेश आयंगर का उपन्यास चिक्क्ववीर राजेन्द्र. सच कहूं तो नाना की किताबों की वह छोटी सी आलमारी और शुक्ला आंटी का पढ़ाना ही मुझे साहित्य और राजनीति की दुनिया में ले आया. कवितायें पहले भी लिखता था अब खूब लिखने लगा. कई कई डायरियां भर गयीं. पापा कभी रोकते नहीं थे. यह सब बारहवीं के उस रोज़ तक चला जिस रोज़ कालेज की प्रार्थना के बीच जाकर मैंने और मेरे कुछ दोस्तों ने स्कूल बंद करवा दिया. वह किस्सा आगे. अभी उसी दौर के एक गीत से बात ख़त्म करता हूँ, बहुत सारी दूसरी चीजों की तरह इस गीत का भी एक बंद भूल गया है.


वेदना की आरती से
प्रिय तुम्हारी वंदना है
टूटी बिखरी ज़िन्दगी की
अश्रु ही अभिव्यंजना हैं

नेह का पावस नहीं है
शत शरद के गीत झूठे
देख ना प्रिय वेश बदले
ग्रीष्म ही सावन बना है

वेदना की आरती से...

चाहता था पुष्प के
कुछ माल गूथूं पर प्रिये
कंटकों के इस नगर में
पुष्प तो बस कल्पना हैं

वेदना की आरती से ...


                                         ....................जारी है .....
                           


परिचय और संपर्क

अशोक आज़मी .... (अशोक कुमार पाण्डेय)

वाम जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव
युवा कवि, आलोचक, ब्लॉगर और प्रकाशक
आजकल दिल्ली में रहनवारी      





रविवार, 24 अगस्त 2014

"ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर" --- तीसरी क़िस्त ---- 'अशोक आज़मी'

                                  अशोक आज़मी



पिछली किस्तों में ‘अशोक आज़मी’ अपने बचपन के दिनों को याद कर रहे हैं | उन दिनों को, जिसमें किसी भी मनुष्य के बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है | वे ‘संघ’ संचालित शिशु मंदिर के उस माहौल में शिक्षा ग्रहण कर होते हैं, जहाँ ‘कट्टरता’ कुलांचे मार रही होती है | आज इस तीसरी क़िस्त में वे 1984 के सिख-विरोधी दंगों के पागलपन को याद कर रहे हैं, जिसमें बहुसंख्यक समाज ‘विवेक-च्युत’ होता हुआ दिखाई देता है | और जो चाहता है कि किसी एक व्यक्ति के गुनाह की सजा सारे समुदाय पर थोप दी जाए | ......



     तो आईये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग अशोक आज़मी के संस्मरण                       
               

            “ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर” की तीसरी क़िस्त
           
             

           देवियों के कोप अक्सर बेक़सूर मासूमों पर होते हैं




हम पांचवीं में पढ़ते थे जब सन चौरासी आया. उस दिन छुट्टी थी शायद. वजह जो भी पर स्कूल नहीं गया था मैं. लाल बहादुर शास्त्री शिशु मंदिर के मैदान में क्रिकेट जमा हुआ था. उसके पीछे ही हमारे मकान मालिक के भतीजे विनोद चाचा की फैक्ट्री थी जिसमें लोहे के चैनल, गेट वगैरह बनते थे. विनोद चाचा मजेदार कैरेक्टर थे. उनके पापा चकबंदी अधिकारी थे और भ्रष्टाचार तब तक गर्व करने लायक़ चीज़ बन चुका था. चार लड़कों और चार लड़कियों का भरापूरा परिवार उस आठ दस कमरों के आलीशान मकान में जिस शान से रहता था उस शान से तो आई एस एस अधिकारी की तनख्वाह में भी नहीं रहा जा सकता. विनोद चाचा सबसे बड़े थे और सबसे छोटा सुबोध हमसे एक क्लास पीछे था. कोई साढ़े पांच फुट के विनोद चाचा का वज़न कम से कम सौ किलो रहा होगा. समोसे के ठेले पर खड़े होते तो बीस से कम नहीं खाते, अंडे वाला रोज़ दर्ज़न भर उबले अंडे काट और तल के पेश करता. कभी गुपचुप पर कृपा होती तो हाफ सेंचुरी लगाए बिना पिच से नहीं टलते. और किसी की छोड़िये थोड़े दिनों बाद जब उनके बच्चे चन्दन और कुंदन बड़े हुए तो हम सब देख कर आनंद लेते कि विनोद चाचा समोसों पर भिड़े हुए हैं और बच्चे उनकी टांगों से उलझे एक समोसे की मांग के साथ ठुनक रहे हैं . अंत उनका दुखद रहा. चालीस पार करते न करते देह रोग का घर बन गयी और बीमारी के चंद सालों बाद वह चल बसे. बड़े बच्चों को अक्सर माँ बाप की सख्ती बर्बाद करती है और मुहब्बत भी.

खैर, उस दिन अचानक रेडियो हाथ में लिए लिए विनोद चाचा फैक्ट्री से बाहर आये और लगभग रुंधे हुए गले से कहा, “इंदिरा गांधी के मार दिहलें कुल.” बाल हाथ में लिए लिए दीपू भैया ने पूछा, “मरि गइलीं?” सब के सब स्तब्ध, दुखी और शिशु मंदिर की शिक्षा का असर देखिये कि मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला, “नीक भईल.” मेरा यह कहना था कि बच्चों की वह पूरी टोली, विनोद चाचा और उनकी फैक्ट्री के कामगारों की भृकुटियाँ तन गयीं. पिटने का पूरा चांस था लेकिन छत पर से पापा बुलाने आये और मैं घर भागा. घर पर जैसे मुर्दानगी छायी हुई थी. रेडियो लगातार बज रहा था और माँ-पापा भरी आँखों से उसे घेरे बैठे थे. मैं समझ नहीं पा रहा था कि कल तक इंदिरा गांधी की इतनी आलोचना करने वाले पापा इतने दुखी क्यों हैं?  वक़्त बीतने के साथ शहर और बाहर से ख़बरें आनी शुरू हो गयीं. दुकानें लुटने की ख़बरों के साथ सरदारों की दुकानों से लूटा हुआ समान लाते पड़ोस के भैयाओं और चाचाओं को हमने देखा. पापा बेहद परेशान थे. तब फोन वगैरह था नहीं और उनके कालेज के जमाने के अजीज दोस्त हरदयाल सिंह होरा शहर के दूसरे छोर पर रहते थे. शाम होते होते वह निकल पड़े और होरा जी के घर पहुँचे. स्थानीय इंटर कालेज में भौतिकी के लेक्चरार होरा जी को उनके पड़ोसियों से घेरा हुआ था. किसी बाहरी की हिम्मत नहीं हुई उनका बाल भी बांका करने की. लेकिन यह क़िस्मत शहर में फैली उनके रिश्तेदारों की दुकानों की नहीं थी. वे लूट ली गयीं. जला दी गयीं. दहशत का वह पहला दौर था जो हमने इतने क़रीब से देखा था. बहुत बाद में गोधरा के बाद हुए दंगों के दौर में गुजरात में रहते हुए इस दहशत को और नंगे रूप में देखा. स्कूल कई दिनों तक बंद रहा. एशियाड देखने के लिए आई टीवी पर हमने इंदिरा जी का शवदाह देखा, भीगी आखों वाले राजीव को देखा और बड़े पेड़ गिरने पर धमक होने वाले उनके अमानवीय बयान को सुना. अमानवीय यह अब लगता है, तब तो रातोरात वह हम सबके प्रिय बन गए. इस क़दर कि जब चुनाव में उनके साथ अमिताभ बच्चन के आने की ख़बर सुनी तो पैदल मैदान तक पहुंचे और अमिताभ के न आने पर भी उनका पूरा भाषण सुने बगैर नहीं लौटे.

दंगो का असर टी वी के बाहर बाद में दिखा. हमारी क्लास में पढने वाले गुरुमीत सिंह नाम के दो लड़कों में से एक की पढ़ाई छूट गयी थी. सब्जी मंडी के पिछले मुहाने पर जहाँ कभी उसकी पक्की दुकान थी अब एक ठेला था जिस पर वह और उसके पिता लालटेन वगैरह का रिपेयर किया करते थे. सैंतालीस के दंगों के वक़्त बेघर होकर यहाँ वहाँ भटकते तमाम सिखों ने तीस पैंतीस सालों में जो कुछ खड़ा किया था वह सब एक पीढ़ी के भीतर गँवा चुके थे. जिस दुकान से पापा जूते खरीदते थे वह लुट चुकी थी, जिस दुकान से माँ रेडीमेड कपड़े खरीदतीं थीं वह लुट चुकी थी. जगह जगह मार पीट हुई थी. हाँ इतना संतोष कि कम से कम हमारे उस कस्बे में कोई बलात्कार नहीं हुआ था, कोई जान नहीं गयी थी. लेकिन देश के दीगर हिस्सों में क्या क्या नहीं हुआ! बेअंत सिंह और सतवंत सिंह के उस गुनाह का बदला देश भर के सिखों से लिया गया था और देश जैसे एक क़त्लगाह में बदल गया. सरकारी टीवी से कम लेकिन अखबारों से वे ख़बरें घर घर में पहुँच रही थी. हमारे शिशु मन प्रभावित होते ही थे, वह दौर कि जब आतंकवाद का नाम हमने पहली बार सुना था और उसका चेहरा किसी सिख के चेहरे जैसा लगता था. बाद में उसे एक मुस्लिम चेहरे में बदलते देखा. माँ देवरिया से ही पढ़ी थीं, उनकी स्मृति में तमाम सिख घरों के फर्श से अर्श पर जाने के किस्से थे. कैसे नंदा बहनजी ने कस्तूरबा में पढ़ाते हुए अविवाहित रहकर भाइयों को सेटल किया और अब उनकी इतनी दुकानें और इतने घर हैं, कैसे फलां सरदार जी ठेले पर अंडे बेचते बेचते इतना बड़ा बिजनेस खड़ा कर गए...और उस कौम ने अपना जीवट तब भी नहीं छोड़ा. एक बार फिर से सब खड़ा करने की कोशिश में लग गए. जली दुकानों की राख बुहारी और झोंक दिया फिर से खुद को और एक दशक के भीतर भीतर सब फिर से खड़ा भी हो गया लेकिन इस दिखाई देने वाले दृश्य के पीछे कितने गुरमीतों का बर्बाद बचपन था वह कोई नहीं देख पाता. देवरिया जाने पर गुरमीत से कई बार मुलाकात हुई, बातचीत हुई पर हमारे दरम्यान वह लम्हा पत्थर सा जम गया था. 

पाँचवी के बाद जब हम सरस्वती विद्या मंदिर पहुँचे. पहले न्यू कालोनी के किसी वक़ील साहब के घर में चलता था. दो किलोमीटर होगा वह और मैं पैदल ही जाया करता था. स्कूल के सामने दीनदयाल पार्क था जो स्वाभाविक रूप से हमारा प्ले ग्राउंड बना. इसके अलावा दो मकान छोड़ के एक प्लाट ख़ाली था तो वह भी खेल के मैदान की तरह उपयोग होता था. हमारा गणवेश बदल गया था और हम नीली गेलिस वाली हाफ पैंट की जगह खाकी हाफ पैंट और सफेद शर्ट पहनने लगे थे. ग्राउंड्स की यह उपलब्धता हमारे भीतर के क्रिकेटर को जगा दिया था. क्रिकेट अब रेडियो से निकल के सशरीर टीवी पर आ चुका था और धीरे धीरे एक दिवसीय क्रिकेट का जादू सब पर तारी हो रहा था. तिरासी का विश्वकप फाइनल हमने लाइव देखा था. उस रात माँ नानी के यहाँ गयी हुई थीं. ननिहाल मेरी बमुश्किलन दो किलोमीटर की दूरी पर थी और माँ अकसर साइत वाइत के बिना जाती आती रहती थीं. मौसा आये हुए थे फैज़ाबाद से और एक रिश्ते के मामा भी. पापा और मैंने भारत के जीतने की शर्त लगाई थी और उन दोनों लोगों ने वेस्ट इंडीज के जीतने की. नतीजतन उस राटा मैच ख़त्म होने पर खिचड़ी उन दोनों लोगों ने बनाई. कपिलदेव हम सबके हीरो थे. पापा कभी कालेज की टीम से क्रिकेट और टेबल टेनिस दोनों खेल चुके थे. आफ स्पिन डालना उन्होंने ही मुझे सिखाया था. लेकिन एक्सपेरिमेंट तो विद्या मंदिर के लंच में उन्हीं मैदानों में हुआ. प्लास्टिक की एक रुपये की बाल आती थी और बैट कोई भी हो सकता था, आधी टूटी टेबल से लेकर लकड़ी के किसी लम्बे टुकड़े तक. कभी कभी कोई असली वाले बैट का जुगाड़ कर देता तो समझिये उसका दर्ज़ा सुनील गवास्कर से कम नहीं होता. मुझे याद है उसी दौर में रवि शास्त्री दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम में क्रिकेट सिखाया करते थे तो उनसे भी खूब सीखा. वैसे तो सब आल राउंडर हुआ करते थे तो हम भी, लेकिन मजा ओपनिंग बैटिंग और स्पिन बालिंग में आया करता था. स्कूल के अलावा मोहल्ले में भी क्रिकेट की बहार थी. स्कूल से लौटते ही बस्ता फेंककर सीधे मैदान में. भूप्पन भैया हुआ करते थे पूरे मोहल्ले के आदर्श.

भूप्पन भैया यानी भूपेन्द्र श्रीवास्तव. पिता किसी सरकारी महकमें में काम करते थे, शायद रेलवे में. उन दिनों वह लोग किराए पर रहते थे. भूप्पन भैया दरम्याना क़द के बेहद स्मार्ट युवक. देवरिया की टीम में खेलते थे. पहले प्लेयर जिन्हें हमने सच्ची में हेलमेट, पैड, एडी और ग्लब पहन के खेलते देखा था. ओपनिंग बैटिंग करते थे और उस ज़माने में स्कूटर से घूमते थे. अक्सर खेलने के लिए गोरखपुर, लखनऊ वगैरह जाया करते. फुर्सत में हमें बैटिंग सिखाते थे. बैट पकड़ना, क्रीज के पास खड़ा होना, एक कदम आगे बढ़ा के बल्ले पर पूरा बाडी वेट डालकर डिफेंड करना, स्क्वायर कट, स्टेट ड्राइव वगैरह, वगैरह. मैं शायद नौवीं में रहा होऊंगा. उस दिन दशहरा था. मोहल्ले की सबसे बड़ी जो झांकी सजी थी उसके कर्ता धर्ता भूप्पन भैया ही थे. दस बजे रात तक हम सब वहीँ थे. फिर सुबह उठे तो ख़बर आई. रात में भैया गोरखपुर गए थे. सुबह सुबह मोटर साइकल से लौटते हुए एक्सीडेंट हुआ और वह कोमा में चले गए. पूरे मोहल्ले में ख़बरें तैर रही थीं कि पूजा के चंदे से शराब पी थी उन्होंने और जब लौट रहे थे तो देवी का कोप हुआ. देवी का कोई कोप गुरमीत को जलाने वालों पर नहीं हुआ था. देवी का कोई कोप नहीं हुआ था पड़ोस की उस लड़की के ससुराल वालों पर जिन्होंने उसे जला के मार डाला था. हर बच्चे को समलैंगिक सम्बन्ध के लिए फांसने वाले दीपू भईया पर भी कोई कोप नहीं. बस भूप्पन भैया पर हुआ जो मोहल्ले के सभी बड़ों का पाँव छुआ करते थे, जो क्रिकेट के दीवाने थे, जिनका एक हफ्ते पहले उत्तर प्रदेश की टीम में चयन हुआ था...कई सालों तक वह बिस्तर पर रहे. उठे तो आधा अंग बेकार हो चुका था. हम जब अपने घर में शिफ्ट हुए तो उधर टहलते हुए आया करते थे. आधी देह से संघर्ष करते, एक एक वाक्य बोलने में हाँफते भूप्पन भैया. अपनी ज़िद में इस हालत में रोज़ दो किलोमीटर टहलते भूप्पन भैया. बहुत दिन हुए नहीं देखा उन्हें. किसी ने बताया कि काफी हद तक सामान्य हो चुके हैं अब. शादी वादी भी हो गयी शायद. कुछ करते ही होंगे, बस क्रिकेट नहीं खेलते होंगे भूप्पन भैया.

                                                                                                          
                              .........................................जारी है .....

परिचय और संपर्क

अशोक आज़मी .... (अशोक कुमार पाण्डेय)

वाम जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव
युवा कवि, आलोचक, ब्लॉगर और प्रकाशक
आजकल दिल्ली में रहनवारी