गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

अनीता भारती की कवितायें


           
                                  अनीता भारती 

            बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर                 
                  ‘सिताब दियारा ब्लाग’ की विशेष प्रस्तुति

                        अनीता भारती की कवितायें


एक ....

रात दिन रटते हो तुम बाबासाहब का नाम,
राजनीति से लेकर साहित्य
साहित्य से लेकर धर्म
धर्म से लेकर प्रजातंत्र
प्रजातंत्र से लेकर वोटबैंक
वोटबैंक से लेकर लूटतंत्र
आरक्षण - से लेकर जन्मजात प्रतिभा
यहाँ तक की पूंजीवाद सामंतवाद
के समर्थन में भी ले लेते हो बाबासाहब का नाम

पर क्या सच में हम आत्मसात कर रहे है उन्हे
उनके मार्ग को
उनके रास्ते को
उलझे पडे है जातियों उपजातियों के संघर्ष में

तुम्हारे अहम की लड़ाईयों में
श्रेष्ठबोध के अहसास के साथ
तमाम असमानताओं को कालीन के नीचे छुपाते वक्त
कहीं नही होता चिंतक अम्बेड़कर
बस उसकी एक छाया का कोर पकड़
भ्रम पालते है कि हमने पा लिया
पूरा बाबा साहब को
रात-दिन, सोते- जागते
खाते-पीते टहलते उंघते
ख्वाब में प्रमाद में
रखते है उसे एक कीमती पेन
की तरह संभाल कर
खर्च नहीं करना चाहते उसे
जिंदगी की किताब में
किताबों का क्या है
पढ़ो ना पढ़ो पर घर की शोभा तो बढ़ाती ही है ना ?


दो ....


सुनो मैने तुमसे कहा
ये भीमराव बाबा है
तुमने कहा हां ये हमारे भीम बाबा है
और झट उतारने लगे उनकी आरती
तुमने खूब पहनाए उन्हे हार
और खूब चढाई धूप बत्तियां
जबकि तुम्हारे पास खडा था
उम्मीद से घिरा एक बच्चा
और दूर से दिखता एक स्कूल
जिसमें जा रही थीं
बच्चों पर बच्चों की कतारें
वह भी उसके पास जाना चाहता था
उसमें बैठना चाहता था
क्या यह तुम्हारे लिए सचमुच ही
नामुमकिन था कि वह जा पाए स्कूल
औरों की तरह
पर छोडो...

तुम ले आए थे बाबा को बाजार में
लगा रहे थे बोली
कह रहे थे देखो- देखो
हमारे बाबा ने झेली थी
दुख तकलीफें
जो तुमने दी थी उन्हे
अब तुम्हे भरना पड़ेगा सबका हर्जाना
तकलीफे सुविधाओं में बदल रही थी
कर रहे थे तुम विदेश यात्राएं
बोल रहे थे सभा-सम्मेलनों में
धिक्कार रहे थे उन्हें
जो सदियों से कर रहे थे अत्याचार
पर तुम्हारे पास एक अत्याचार ग्रस्त
औरत खडी थी
लेकिन तुम्हारी आँखे उसकी पीड़ा से दूर
आसमान पर टिकी थी
जो तुम्हे अभी मिलना बाकी था

अब तुम बाबा को
घसीट लाए हो
व्यापार में

लोगों को बाबा के अपनाने के
लाभ-हानि सीखा रहे हो
सीखा रहे हो उनको
सूदखोर की तरह लाभ बटोरना
जबकि तुम्हारे पास
तुम्हारे भाई-बहन भूख से बिलख रहे है


हासिल की है तुमने बिजनेस यात्राएं
अपने इन्ही भूखे भाई बहनों के बूते

गले में, हाथ में, लाकेट में लटकाएं
भीम नाम की माला
ठीक स्वर्णकार की तरह
जो तुम्हारी ही तरह सिद्धांतहीन लोगों को
चाहिए तुम्हारी ही तरह पहनने के लिए


तीन ....

देखो!
मुझमें बसता है एक अम्बेडकर
देखो !
तुममें बसता है एक अम्बेडकर
जो हमारी
नसों में दौडते नीले खून की तरह
ह्रदय तक चलता हुआ
हमारे मस्तिष्क में समा जाता है
अरे साथी
निराश ना हो
हमें पता है
जो यहां घुला है
वही उठेगा
इस मिट्टी से एक दिन
फिर दुबारा
अपनी प्रतिमा गढते हुए
नया भीमराव



चार ....

बाबा तुम रो रहे हो
राजनीति की कुचालों में
तुम्हारी दलित जनता
धक्का खाकर कुचली
भीड सी चीत्कार रही है

तुम सोच में हो
कुचली भीड सी जनता
अपना आकार ले रही है
उसके सोए भाव जाग रहे है
वह संगठित हो रही है

तुम हँस रहे हो
दबी कुचली जनता
मिट्टी से उठना सीख गई है
फूल खिल रहे है चारों ओर
उठो! यह भोर का आगाज है
हाँ तुम हँस रहे हो बाबा


पांच ....

प्रिय मित्र
क्रांतिकारी जयभीम
जब तुम उदास होते हो
तो सारी सृष्टि में उदासी भर जाती है
थके आंदोलन सी आँखे
नारे लगाने की विवशता
जोर-जोर से गीत गाने की रिवायत
नही तोड़ पाती तुम्हारी खामोशी


मुझे याद है
1925
का वह दिन
जब तुम्हारे चेहरे पर
अनोखी रौनक थी
संघर्ष से चमकता तुम्हारा
वो दिव्य रुप
सोने चांदी से मृदभांड
उतर पडे थे तालाब में यकायक
आसमान ताली बजा रहा था
सितारे फूल बरसा रहे थे
यूं तो मटके पकते है आग में
पर उस दिन पके थे चावदार तालाब में
आई थी एक क्रांति
तुम्हारी बहनें उतार रही थी
हाथों पैरों और गले से
गुलामी के निशान
और तुम दहाड रहे थे
जैसे कोई बरसों से सोया शेर
क्रूर शिकारी को देखकर दहाडे
मुझे याद है आज भी वो दिन
जब चारों तरफ जोश था
और उधऱ
एक जानवराना क्रोध था

तुम बढ रहे थे क्रांतिधर्मा
सैकडो क्रांतिधर्माओं के साथ
उस ईश्वर के द्वार
जिसे कहा जाता है सर्वव्यापी
पर था एक मंदिर में छुपा
उन्होने रोका,बरसाये डंडे
पर तुम कब रुके ?
तुम आग उगल रहे थे
उस आग में जल रहे थे
पुरातन पंथी क्रूर ईश्वरीकृत कानून
हम गढेगे अपना इतिहास
की थी उस दिन घोषणा तुमने
दौड गई थी शिराओं में बिजली
उस दिन,
जो अभी तक दौड रही है
हमारी नसों में, हमारे दिमाग में
और हमारे विचार में

छः ....

कितनी अजीब बात है
जब हम सोचने लगते है
सिद्धांत केवल कहने की बात है
चलने की नही
हम सत्य न्याय समता
लिख देना चाहते है किताबों में
होता है वह हमारे
भाषण का प्रिय विषय
पर उसे नही अपनाना
चाहते जीवन में
हम बार-बार कसम
खाते है अपने आदर्शों की
देते है दुहाई उनकी
भीड देख जोश
उमड आता है हमारा
जय भीम के नारों से
आंख भर आती है हमारी
गला अबरुद्ध हो जाता है
फफक कर रो उठते है हम
दुख तकलीफ उसकी
याद कर
जो झेली थी भीम ने उस समय
पर हम आंख मींच लेते
उससे
जो अन्याय हमारी आंखों
नीचे घट रहा है

सात ....

भूख प्यास और दु:ख में
सर्दी, गर्मी, बरसात में
जमीन पर, कुर्सी पर
तुमने जी भर ओढ़ा, बिछाया, लपेटा
अम्बेडकरी चादर को
फिर तह कर चादर
रख दी तिलक पर
और तिलक धारियों के साथ सुर मिलाया
हे राम! वाह राम!
तुमने छाती से लगाई तलवार
और तराजू बन गया तुम्हारा ताज
पर जूता !
जूता तो पैरो में ही रहा
समझोते की जमींन पर चलते-चलते
कराह उठा, चरमरा उठा
हो गए है उसकी तली में
अनगिनत छेद
उन छेदों से छाले

पैरो में नहीं
छाती पर जख्म बनाते है
और लहुलुहान पैर नही
जूतों की जमातें है


परिचय और संपर्क

अनिता भारती
जन्म – 9 फरवरी 1965
दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त
कवयित्री , कथाकार और चिन्तक
anita.bharti@gmail.com
09899700767



5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढ़िया... कविताएँ अनेक छोर पर भाषा को ले जाकर कई सारे मुद्दों को आंदोलात्मक ढंग से अभिव्यक्त करती हैं...
    - Farook Shah

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  2. बहुत देर तक ठहर कर, कई आयामों पर सोचने के लिए विवश करती इन कविताओं में अनिता जी का स्‍वर उसी आक्रोश को व्‍यक्‍त करता है जो बाबा साहेब के सच्‍चे अनुयायी का होना चाहिये... इन कविताओं से गुजरना अपने आपको दुरुस्‍त करना है...

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  3. हमारी बहुत सारी बेचैनियों को अभिव्यक्त करने वाली कविताएं। बेनामी और प्रेमचंद जी ठीक कह रहे हैं।

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  4. बहुत ही अच्छी कविताएँ.
    बहुत-बहुत बधाई.

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