बुधवार, 19 दिसंबर 2012

यही तो समाधान का समय है -- रामजी तिवारी


             
दिल्ली की पाशविक घटना ने सभ्य समाज के सामने एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है | हम सब स्तब्ध हैं , और दुखी भी | इस मुतल्लिक उपजे कुछ विचारों को मैंने जैसे-तैसे कल रात ही कलमबद्ध किया है ,और जिन्हें इस उम्मीद के साथ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ , कि आप सब भी मिलकर इस बहस को किसी सार्थक अंत तक पहुंचाएंगे |.........................    


              
                 यही तो समाधान का समय है ...


गत १६ दिसंबर को दिल्ली में हुयी सामूहिक बलात्कार की घटना ने हमारे दिलों पर ऐसा जख्म दे दिया है , जिसे किसी भी सभ्य समाज के लिए भुला पाना असंभव है | पीड़ित लड़की बलिया की है , बीकानेर , बंगलौर , बोकारो या कहीं और की , प्रश्न यह नहीं है , वरन प्रश्न तो यह है कि, एक सभ्य समाज में ऐसी दरिन्दगी हो कैसे सकती है  और आखिर उसे रोका कैसे जा सकता है ? इस घटना ने उन बच्चियों और उनके अविभावकों के सामने किन सवालों के पहाड़ खड़े कर दिए हैं , समझ पाना बहुत मुश्किल नहीं है , जिनकी बच्चियां अपने घर से दूर अकेले रहते हुए भविष्य-निर्माण की नींव रखने में लगी हुयी हैं |
        
कहा जाता है , कि प्रकृति ने समाज का विभाजन पुरुष और महिला के आधार पर लगभग आधा-आधा किया है | लेकिन इतिहास के लम्बे दौर में पितृसत्ता ने तमाम तरीको से इस विभाजन को इतना गहरा और असंतुलित कर दिया है , कि इसमें पुरुष होने मात्र से आपको बहुत कुछ हासिल हो जाता है , और महिला होने मात्र से आपका बहुत कुछ छीन जाता है | हम पुरुष होने के कारण बहुत कुछ तो जान भी नहीं सकते , जो एक महिला होने के नाते किसी स्त्री को भोगना पड़ता है | इन बड़ी घटनाओं के अलावा , हजारों-लाखों की संख्या में ऐसी अव्यक्त रह गयी घटनाएं प्रतिदिन घटती रहती हैं , जो एक रूटीन की तरह से सह ली जाती हैं , और जिन्हें दर्ज करने के लिए समाज के पास कोई ‘खाता-बही’ होता ही नहीं है | हालाकि गौर से देखने पर ये घटनाएं इतनी छोटी या नगण्य होती नहीं हैं | उनका असर कुल मिलाकर स्त्री जाति पर पड़ता है , और प्रकारांतर से वह अपने को कमजोर और असहाय मानने लगती है | फिर यह ‘मानना’ एक तरह के ‘चेन’ में बदल जाता है , जिससे स्त्रियों का बाहर निकल पाना लगभग असंभव हो जाता है |

लेकिन हम जैसे लोगों के लिए पुरुष होने का भी अपना दुःख है | जब भी ऐसी कोई घटना घटित होती है , परिवार में , मित्र-रिश्तेदारी में और कुल मिलाकर समाज में स्त्रियों से आँख मिलाना कठिन हो जाता है | यह दुःख , उस दुःख से कहीं बड़ा और गहरा होता है , जो पुरुष-समाज को कोसने के कारण पैदा होता है | जब आप अपने पड़ोस में , अपने मित्र के यहाँ , अपनी रिश्तेदारी में और अपने समाज में ‘वाच’ किये जाने लगते हैं , तो ऐसा लगता है , कि ईश्वर ने आपको पुरुष बनाकर बहुत बड़ी सजा मुक़र्रर कर दी है | इस पर आप किसी को सफाई भी नहीं दे सकते , क्योंकि आप ही जैसा भाई, पिता , पुत्र या मित्र इस दुनिया में आये दिन ऐसा कारनामा रच देता है , जो पुरुष-जाति पर अविश्वास के अनेकानेक कारण पैदा करता है |

खैर .... | मैं दुनिया को देखने के लिए लालायित रहने वाला इंसान हूँ , और मुझे घूमने से अच्छा काम और दूसरा कुछ नहीं लगता | पिछले बारह-पंद्रह सालों से देश को देखने के लिए प्रतिवर्ष निकलता हूँ , और ‘यात्रा’ से वापसी के बाद अगली की तैयारी में अपने को व्यस्त कर लेता हूँ | लेकिन मुझसे आप दुनिया के सबसे सुन्दर चित्र के बारे में पूछेंगे , तो मैं आपको हिमालय की ऊँचाई , सागर की गहराई , रेगिस्तान की नीरवता या जंगलों की सघनता नहीं बताऊंगा | मेरे लिए तो बच्चों की किलकारी , माँ का दुलार , पिता की उंगली पकड़कर स्कूल जाते हुए बच्चे और बूढ़े लोगों की देखभाल करती संताने ही सबसे अच्छे चित्र के रूप में उभरती हैं | और इस सवाल को दरकिनार करते हुए कि, मैंने किसी से प्रेम किया है या नहीं , मुझे सबसे अच्छा दृश्य वह लगता है , जब एक प्रेमी-युगल एक दूसरे के विश्वास को थामे आगे बढ़ता दिखता है |
         
इसी तरह दुनिया में मेरे लिए सबसे बुरे दृश्यों की भी सूची है | वह किसी प्रियजन की मृत्यु से अधिक भयावह और दुखद है , जो मुझे आदमी होने पर शर्मसार करती है , मुझे भीतर तक कचोटती है और छीलती है | किसी के सामने अपनी जरूरतों के लिए हाथ फैलाए हुए लोग , काम पर जाते हुए बच्चे , असहाय छोड़ दिए गए बूढ़े , अपनी अस्मिता को बेचती औरत , दहेज के लिए जलाई जाने वाली और कोख में ही मार दी जाने वाली अजन्मी बेटियों का दृश्य मेरे लिए इस दुनिया में बहुत ख़राब दृश्य है | लेकिन सबसे भयावह और बुरा दृश्य मेरे लिए बलात्कार-पीड़ित स्त्री का है , जो सिर्फ शरीर के स्तर तक सीमित नहीं रहता , वरन दिलो-दिमाग से होता हुआ समूची स्त्री जाति की चेतना और अस्तित्व को भी बींध देता है |

दिल्ली की यह घटना इसलिए और भी सालने वाली है , क्योंकि इसमें दुनिया के सबसे सुन्दर चित्र को सबसे घृणित और गंदे दृश्य में बदल दिया गया है | अपनी मित्र के हाथों को थामकर चलता हुआ युवक, जिन्दगी के सबसे हसीन लम्हों को जी रहा होता है , और उसी तरह अपने दोस्त के काँधे से सिर टिकाये चलती हुयी युवती के लिए भी , दुनिया में इससे हसीन पल , कोई और नहीं हो सकता | ऐसे में कोई उन्हें हैवानियत के जंगल में ले जाकर नोच डाले , यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं | दुनिया के सबसे हसीन सपने का ऐसे बदतरीन तरीके से टूटना , दिल में हूक पैदा करता है | भीतर से क्रोध और घृणा की एक लहर सी उठती है , जो बार-बार हमें भी उसी वहशियाना तरीके की तरफ जाने को उकसाती है , जैसा कि उस अपराध की तासीर है | फिर इसका समाधान क्या है ?

चूकि समस्या बहुस्तरीय है , और अपराध की प्रकृति भी सामान्य नहीं है , इसलिए इसका समाधान भी विशेष तरीके से और उसी बहुस्तरीय तरीके को अपनाकर ही ढूँढा जा सकता है | मसलन , एक तो ऐसी घटनाएं घटित ही न हों , और दूसरे यदि दुर्भाग्यवश वे घटित भी हो जाएँ , तो दोषियों को इस तरह से दण्डित किया जाए , जिससे भविष्य के लिए कोई सबक मिलता हो | सबसे पहली भूमिका समाज की आती है | जिस समाज में बेटियों को गर्भ में ही मार डाला जाता हो , पैदा होने के बाद दहेज के लिए जला दिया जाता हो , बाजार के इशारे पर उपभोग की वस्तु बना दिया जाता हो और कुल मिलाकर जिसे दोयम दर्जे का जीवन जीने के लिए अभिशप्त कर दिया जाता हो , उस समाज की मानसिकता को बदले बगैर आप किसी बड़े बदलाव की उम्मीद कैसे कर सकते हैं | आंकड़े तो यह भी बताते हैं , कि औरतों के साथ सबसे अधिक अपराध घरों में ही होते हैं , और जो अधिकतर सामने ही नहीं आ पाते | चालीस प्रतिशत स्त्रियाँ अपने जीवन में किसी-न-किसी घरेलू हिंसा को झेलती हैं | छेड़खानी और यौन दुर्व्यहार की अधिकतर घटनाएं उन सगे-सम्बन्धियों और मित्रों-रिश्तेदारों के द्वारा होती हैं , जिन पर सबसे अधिक विश्वास किया जाता है | ऐसे में यह सवाल नहीं उठाया जा सकता है , कि आज जो लोग मोमबत्तियां उठाकर दोषियों के लिए फांसी की मांग कर रहे हैं , उसमें से कितने लोग के मन में औरतों के लिए बराबरी और सम्मान का दर्जा हासिल है ? 

सवाल तो और भी हैं | मसलन जो समाज लगातार संवेदनशून्य होता चला गया है , जिसके सामूहिक प्रतिरोध की क्षमता लगातार कुंद होती चली गयी है , जो गलत और अनैतिक तरीके से आगे बढ़ने वाले लोगों के लिए भी पलक-पावडे बिछाए हुए है , और जो ऐसे लोगों का विरोध करने के बजाय , उनकी चकाचौंध और ऐश्वर्य को देखकर लार टपकाता फिर रहा है , ऐसे संवेदनहीन , अनैतिक और सामूहिक प्रतिरोध से रहित समाज में आप ऐसी घटनाओं के बाद नारे तो गढ़ सकते हैं , लेकिन किसी सार्थक समाधान तक नहीं पहुँच सकते | जो लोग इस समय ‘न्याय के तालिबानी सिद्धांतों ’ की वकालत कर रहे हैं , वे शायद यह नहीं जानते कि इन सिद्धांतों की सबसे बड़ी मार स्त्री पर ही पड़ती है , और अंततः वही उसकी सबसे आसान शिकार भी होती है | इसलिए सबसे बड़ी आवश्यकता तो इस समाज में ही सार्थक बदलाव लाने की है , जो संवेदनशील हो , जो नैतिक मूल्यों से संचालित होता हो और जो सामूहिक प्रतिरोध की भावना से लैस हो |

इसके बावजूद भी समाज में कुछ कोढ़ बच ही जाते हैं , और तब कानून , न्याय और प्रशासन  की बारी आती है | देखने में आता है , कि पीड़ित स्त्री के शरीर और मन को न सिर्फ बलात्कारी  कुचलता है ,वरन थाने में रिपोर्ट लिखाने से लेकर , अदालतों के कटघरे तक जाते-जाते उसको कई बार मानसिक बलात्कार झेलना पड़ता है | एफ़.आई.आर. दर्ज कराना ही इस देश में एक बहुत बड़ा ‘समर’ है ,और यदि पीड़ित महिला गाँव की तथा कमजोर वर्ग की हुयी , तो फिर यह ‘महासमर’ बन जाता है | इस स्थिति में बदलाव के बिना आप किसी समाधान की कल्पना नहीं कर सकते हैं | फिर न्यायालयों की बात आती है | प्रक्रिया और संहिता , दोनों स्तरों पर पीड़ित वहाँ टूटता है | एक केस कई सालों , और कभी कभी तो दशकों में भी अपने निर्णय पर नहीं पहुँचता , और इस बीच या तो गवाह टूट जाते हैं , या सबूत ही नष्ट हो जाते हैं | उसमें यदि अभियुक्त रसूखवाला हुआ , तो फिर उसके बच निकलने के हजार रास्ते खुलते हैं | इसका समाधान, इस पूरी प्रक्रिया में बदलाव लाये बिना संभव दिखाई नहीं देता | जब तक ऐसे अपराधों का समयबद्ध और त्वरित निपटारा नहीं होता है , तब तक शायद हम ऐसे दंश झेलते ही रहेंगे |

एक बड़ा सवाल संहिता का है | मतलब कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के लिए सजा का प्रावधान कैसा हो | अभी हमारे देश में इसके लिए ‘न्यूनतम सात वर्ष’ और ‘अधिकतम आजीवन कारावास’ का प्रावधान है | देखने में यह आता है , कि अदालतें अभियुक्त की पारिवारिक जिम्मेदारी और सुधरने के नाम पर अधिकतर फैसलों में न्यूनतम सजा ही सुनाती हैं | रहा सवाल फांसी की सजा के प्रावधान का , तो इसमें कई पेंच सामने आते हैं | सरकार के सामने यह सवाल पहले भी आ चुका है , जिसमें इस अपराध को ‘विरलतम’ तो माना गया है , लेकिन फांसी की सजा से यह कहते हुए बचा जा जाता रहा है , कि इस तरह के प्रावधान के बाद अभियुक्त द्वारा पीड़ित स्त्री की हत्या कर देने की संभावना बढ़ जायेगी | चूकि हत्या की सजा भी ‘फांसी’ ही है , इसलिए अभियुक्त के मन में सबूत को मिटाने का ख्याल भी आ सकता है , और दोनों ही अपराधों के लिए एक ही सजा के कारण , उसके भीतर ‘अधिकतम सजा का डर’ भी जाता रहता है | इस तर्क में दम भी है | लेकिन न्यूनतम सात साल की सजा वाला प्रावधान कुछ जमता नहीं हैं | दोषसिद्ध हो जाने के बाद इसमें आजीवन कारावास से कम कोई दूसरी सजा होनी ही नहीं चाहिए | इससे कम से कम एक संदेश तो अवश्य ही जाएगा |    

हमारे जैसे लोकतंत्र में राजनीतिक इच्छा शक्ति के बिना इन सुधारों को सम्पादित नहीं किया जा सकता , सो वह भी अपरिहार्य ही है | फिर पारिवारिक और सामाजिक भागीदारी वाला मसला तो है ही | बच्चों की नैतिक शिक्षा घर से ही आरम्भ होती है , और स्कूल से  होते हुए वह समाज तक पहुँचती है | हम अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर और ‘क्या-क्या’ तो बनाना चाहते हैं , लेकिन ‘इंसान’ बनाना रह जाता है | यदि हम अपने समाज के इन दागों को जड़ से मिटाना चाहते हैं , तो यह अवसर हम सबके लिए उस संकल्प को लेने का है , जिसमें हम अपनी जिम्मेदारियों को निभाने का वादा स्वयं से करते हैं , अन्यथा यह गंभीर मसला भी इस देश में अन्य गंभीर मसलों की तरह ही शोर और नारों में दबकर मर जाएगा |

इस वीभत्सकारी घटना की निंदा करते हुए हम शर्मिंदा हैं , दुखी हैं और आहत है | इसलिए यही, वह सही वक्त है , जब हम इस पर न सिर्फ बात कर सकते हैं , वरन उसे अमली जामा भी पहना सकते हैं , अन्यथा ‘बाद में’ छोड़ने पर तो बहुत देर हो जायेगी |






रामजी तिवारी 
बलिया , उ.प्र.
मो.न. 09450546312




                                                             
                                                      
                                                         





13 टिप्‍पणियां:

  1. पता है तुम्हे,
    सुनो कहाँ जाती हो,
    रुको,
    देखो तो सही,
    क्यूँ नहीं देखती,
    अपने आपको तुम?
    बिखरी पड़ी थी तुम,
    नग्न,
    खून से सनी हुई,
    दिल्ली की अधजली, खूंखार सड़कों पर,
    नुची चुथी हुई,
    जर्जर,
    सुन लो,
    अब भी कहता हूँ,
    बार बार कहता रहा हूँ,
    लेकिन तुम हमेशा टाल जाती हो,
    मुझे नहीं पता,
    कि उस समय क्या हुआ होगा तुम्हारे साथ,
    क्या गुजरी होगी तुम पर,
    किस यातना से दो चार हुई होगी तुम,
    नहीं जाती वहां तक मेरी सोच,
    लेकिन सिहरन के मारे,
    रोयें रोयें खड़े हैं,
    और कितना,
    कब तक,
    आँखों को सेंकती रहोगी,
    छिड़कती रहोगी,
    ज़ख्मों पर नमक,
    कब तक,
    नासूर बन चुके हैं ये अब,
    पता भी है तुम्हे,
    उठो,
    बैठो मत,
    चलो,
    तुलसी के पास भी चलना है,
    ताड़न की अधिकारिणी उसने ही बनाया है न तुम्हे,
    लेकिन क्यूँ,
    पूछो,
    क्यूँ नहीं पूछती,
    इंद्र से भी पूछना है,
    कैसे ऋषि रूप में उसने अहिल्या(तुम्हे) को छला,
    लाज न आई उसे,
    या फिर लाज न आई उन्हें,
    जिसने तुम्हे जार जार करके फेंक दिया,
    जानवरों की तरह,
    रुक जाओ,
    सुन लो,
    कब तक चलेगा यह सब,
    सदियों से हो रहा है,
    अभी भी चल रहा है,
    यह कोई,
    वंश वृक्ष नहीं है,
    जो यूँ ही चलता रहेगा,
    आज दिल्ली थी,
    कल कोलकाता था,
    मुंबई, पुणे, ठाणे, केरल, बंगलोर भी,
    हर जगह,
    तुम बिखरी हुई हो,
    रुक जाओ,
    सुन लो,
    ये नासूर अब और न पकने दो,
    आज माँ से नज़र नहीं मिला पाया था,
    बहन को देखने में शर्म महसूस हो रही थी,
    और पत्नी के साथ चलने में डर लग रहा था,
    इसीलिए कहता हूँ रुक जाओ,
    और,
    त्याग दो सीता का रूप,
    तज दो अहिल्या को,
    और कर लो धारण,
    फिर से,
    काली को,
    बन जाओ तुम दुर्गा,
    और पी लो रक्त इन रक्त पिपासुओं का,
    डाल दो उनके हलक में हाथ,
    और निकाल कर फेंक दो उनके संवेदनहीन ह्रदय को,
    मार डालो, उठा लो हथियार,
    नहीं तो,
    सच कहता हूँ,
    वह दिन दूर नहीं,
    जब मैं भी नहीं रहूँगा कहने के लिए,
    दाग दी जाएगी मेरी जिह्वा,
    और लेखनी को तुम्हारे ही शव पर,
    रखकर जला दिया जायेगा,
    फिर नहीं रुकेगा यह ताण्डव,
    और नुचती रहेगी, जलती रहेगी, बनती रहेगी शिकार,
    हर माँ,
    हर बहन,
    हर बेटी
    और हर बीवी,
    सरेआम भरी महफ़िल में,
    और कोई कृष्ण नहीं होगा तब,
    लुटती हुई द्रोपदी को,
    बचाने के लिए,
    बन जाओ तुम दुर्गा,
    बन जाओ काली,
    बन जाओ,
    सुन लो,
    रुक जाओ,
    उठा लो हथियार,
    और काट डालो,
    इन देव रुपी दानवों को,
    रुक जाओ।

    -नीरज

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  2. पहली बात तो यह अव्वल दर्जे का दुस्साहस है कि चलती बस पर यह सब हो रहा है यानी दोषियों को किसी क़ानून या न्यायिक व्यवस्था से डर नाम की चीज नहीं है, इसलिए क़ानून को सख्त तो होना ही होगा, कि कम से कम बाद के अंजाम से डर तो हो ही..इसे अब तालिबानी न्याय कहा जाये तो भी मान्य है...लेकिन यह उपाय समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचती... वास्तव में हमारी शिक्षा पद्धति में कुछ ऐसा है कि हम नैतिकता और मानवीयता को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं कर पा रहे हैं...

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  3. बहुत मार्मिक आलेख है एक संवेदनशील व्यक्ति ही ऐसा लिख सकता है . मैं इसके एक-एक शब्द के साथ हूँ . ऐसे शब्द गहरी पीड़ा से ही फूट सकते हैं.

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  4. अच्छा लगा पढ़ कर . सच यह है कि जो प्रेम नहीं कर सकता , वही बलात्कार कर सकता है . बालात्कार उस पिछड़ी मानसिकता का बाईप्रोडक्ट है जो स्त्री को सम्पत्ति मानती है . और उसे *पाने* के लिए किसी भी हद तक चली जाती है . यह बहुत शर्मनाक है कि हमारे संस्कारों में औरत (बेशक जिसे वह प्रेम करता हो) को *पाने* का कॉंसेप्ट बहुत गहरे बैठा हुआ है . बड़े बड़े लेखकों , कलाकारों में भी आप इस वाहियात *चाहत* को स्मेल कर सकते हैं. मुझे वे कविताएं और वो गीत बेहद अश्लील लगते हैं जहाँ "तुम्हें पा लिया " टाईप जुमले होते हैं . हमारे समाज का बहुत बड़ा वर्ग अजाने ही इस मानसिकता को जीता है और हैरान होता कि हमी से कोई कैसे इतनी गिरी हुई हरकत कर सकता है ? हम किसी भी हालात मे स्त्री को व्यक्ति नही मान सकते यह आश्चर्यजनक है . मानते भी हों तो दोयम दर्जे का व्यक्ति मानते हैं .... हमारे महान स्त्री चिंतक बड़ी बेशर्मी से कहते फिरते हैं -- इन्हे एम्पॉवरमेंट की ज़रूरत है . माने , स्त्री दोयम हो गई . हम उसे ताक़त देंगे , तो भला होगा उस का . यह बहुत नेगेटिव सोच है समाधान का पहला कदम मैं समझता हूँ कि इस ओछी मानसिकता से निजात पाना होगा , जो कि निस्चित तौर पर आसान नहीं है ; लेकिन असम्भव भी नहीं . यह चेतना प्रसारित हो सकती है. बाक़ी ताक़त तो उसे खुद हासिल करना होगा . हम कौन होते हैं देने वाले ?
    एक कवि के रूप मे, और एक इनसान के रूप में भी मैं केवल सच्चे मन विश कर सकता हूँ कि मेरे समाज के तमाम कमज़ोर व्यक्ति , हारे हुए और डरे हुए समूह अपने लिए ताक़त खुद हासिल करें . बल्कि अपनी शक्तियों को पहचानें ,उन का प्रयोग करें जो उन के पास मौजूद ही है ! समाज में सम्वेदनाएं बची रहें , इंसानियत बची रहे .

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  5. बहुत मार्मिक आलेख है. मैं इसके एक-एक शब्द के साथ हूँ I
    लुटती हुई द्रोपदी को,
    बचाने के लिए,
    बन जाओ तुम दुर्गा,
    बन जाओ काली,
    बन जाओ,
    सुन लो,
    रुक जाओ,
    उठा लो हथियार,
    और काट डालो,
    इन देव रुपी दानवों को,

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  6. कुछ कान जो
    केवल
    चिल्लाहट भरे विरोध
    से ही फड़फड़ाते हैं

    अफसोस
    कुछ ज़बाने
    अब भी
    सकुचा रही है
    बोलने से

    बिना शब्द उगले
    अब भी
    कुछ मौन चेहरे
    गायब हैं
    इस आग से
    परिदृश्य में
    http://manik.apnimaati.com/

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  7. तिवारी जी,.. आपका बहुत बहुत आभार,.. लेख अच्छा लगा और आपको जानकर भी ,.. अभी इसी १९ तारीख को मै बलिया के सहतवार क्षेत्र से घूमकर लौटा हूं चूकि पीडिता बलियां से है यह कैसा संयोग है यह जानकर हतप्रभ हूं बहरहाल है तो अपने भारत की ही । अक्सर या कहिये तकरीबन हर रोज ही दिल्ली से रेप की घटनायें सुनने को मिलती रहती है पर इस बार यह पशुता और नर पैशाचिकता की तमाम हदे पार कर चुकी है दिमाग सुन्न होने लगता है ऎसा लगता है अब यह देश बचेगा नही अगर इस दिशा मे कानून " कठोर दण्ड और तुरंत " की शैली मे नही बनते है । फ़िलहाल शुक्रियां ।

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  8. घाव इतना गहरा और इतना दर्द दे सकता है , किसे पता था... ये घाव पीड़ित की आत्मा की चीत्कार है जो हमें इतना साल रही है कि हमारा क्रोध / क्षोभ कम होने को तैयार नहीं है .... प्रकृति नहीं चाहती कि हम इसे भूलें अबकी वो कह रही है कि अपनी आँखों को फेरे रखने का नतीजा देखो ! चेतो !
    रामजी भाई जब आप लिखते है इसमें दुनिया के सबसे सुन्दर चित्र को सबसे घृणित और गंदे दृश्य में बदल दिया गया है तो पढ़ कर सृष्टि रो पड़ती है ....
    इसको लिखने में आपको जिस पीड़ा से गुजरना पड़ा होगा वो मेरी आँखों में भी इस वक्त तैर रही है
    नमन

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  9. बहुत सूचिन्तित, सकारात्मक व सार्थक लेख है। विचार व भाव प्रवाह का नैरंतर्य लगातार बना रहता है कि इक ही साँस में पूरा लेख पढ़ लिया । बहुत संयत व संतुलित ढंग से लिखा गया।

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  10. कृपया 'सुचिन्तित' पढ़ें।

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  11. ek sarthak lekh ..aaj ki hi nhi balki chali aa rhi iss dardnaak samsya par ...sirf itana kahana ki achha lga padhkar..meri jimmewari khatam nhi ho jati....itana dard dena aur jiwan prayant usamen jina kisi ladaki ya stri ke liye kita pidaa deta hoga ...isaka andaja hai humen...sach shrmina hai hm..aur aapka likha wo sach ki..han ab hm bhi dekhte hai aas paas purushon ko chhanbiin wali najr se....kya karen..hone wali ghatnayen hi aisi hain...jisaka haath thame bharose se chalte hai wahi daagdaar kar jata hai humari asmita ko...ek bda kdm..ek twrit saja ka vidhan ho ...warana ....bardaast ki had ho chuki......ab bus na......

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  12. इस बेहतरीन आलेख के लिए रामजी भाई को बढाई । आपने जिस गहराई के साथ आलेख को लिखा है वह आपकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। रामजी भाई दिक्कत तलब तो यह भी है की दुनिया के सबसे सुन्दर चित्र को वीभत्स दृश्य में तब्दील करने वाले हमारे ही समाज के हैं। आपको जान कर आश्चर्य होगा की हमारे बौधिक समाज के कई लोग ऐसे अमानवीय करतब करने से नहीं चूकते। वे भी हमारे बिच के ही हैं। आज जो यह व्यापक प्रदर्शन हो रहा है इसमें भी एक बड़ा वर्ग वैसी कुत्सित मानसिकता वाले लोगों का ही है। इसी घटना से मिलती-जुलती घटना हमारे देश में कई जगहों पर रोजाना हो रही है। अभी कल ही हमारे इलाहाबाद में लगभग इसी तरह के घटना घटित होते-होते रह गयी। लूम्पेन तत्वों का दुहसाहस तो देखिये की अपने मित्र के साथ जा रही एक लड़की को खींच कर अपने साथ ले जाने लगे। यह घटना हमारे समाज, विचार और मानसिकता को दर्शाती है। और इसके दोषी हम सब हैं। बहरहाल आलेख के लिए आपको बधाई।

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  13. bahut sach uker diya aapne dil se...!!
    par ham sab vyathit hone ke alawa karen kya???

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