रविवार, 21 अक्तूबर 2012

'इस देश की अमर कहानी-भूख,प्यास और दानी' ---अमित उपमन्यु


                                    अमित उपमन्यु    
  
युवा कवि अमित उपमन्यु अपनी कविताओं में प्रकृति को नए और समकालीन तरीके से परिभाषित करते हैं | उनके पास प्रकृति की , जिसमे बाढ़ , सागर , जंगल और बर्फ जैसे विषय शामिल हैं , टटकी और वैश्विक चिंताओं से उपजी नयी व्याख्यायें हैं , जिसमें विज्ञान के तर्कों के साथ समाज विज्ञान का विश्लेषण भी गुथा हुआ मिलता है | खंडित होते सरोकारों के दौर में इस युवा कवि की ये कवितायें हमें आश्वस्ति प्रदान करती हैं , कि आने वाले दौर में भी साहित्य , न सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों को समझता है , वरन उसे निभाने के लिए प्रयास भी करता दिखाई देता है |   

 प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर अमित उपमन्यु की कवितायें 


1...     बाढ़

एक बेहद ज़रुरी खोज युद्धस्तर पर चल रही है!
कालाहारी के हर संभव कोने में
बहुत लंबे समय से
चटकी धरती की दरारों में झांककर,
मृगमरीचिका तक सबसे पहले पहुंचने की दौड़ लगाकर,
और कहीं गज-दो गज बचे गाढ़े कीचड़ को चाटकर,
हर शाकाहारी और मांसाहारी
अपनी ज़िन्दगी खोज रहा है.

लंबे समय से संपादित हो रही इस खोज में
कई चरित्र विदा हो चुके हैं
और बाकी, अभियान के अंत तक
कहानी में अपने महत्त्व को साबित करने में
अनवरत हैं.
प्यासी पलकें सूखे पत्तों की तरह झड़ चुकी हैं तकते हुए
एक ऊंचे सूखे ठूंठ पर चढ़ तेंदुए ने की
एक भटके काले बादल को चाटने की पुरज़ोर आख़िरी कोशिश!

बस एक दिशा है इनकी तलाश की
दूसरी तरफ से लपटें उठ रही हैं सूखी घास के मैदान में.

अंधेरी रातें हैं लपटों से रोशन
और चकाचौंध आसमान
तारों के किरदार भी मिटे हुए हैं
दिशाबोध की तरह

बादलों का आना शुरू होता है
कहानी के अंत की आश्वस्ति की तरह
पर किरदार खत्म होते रहते हैं जब-तब
और कहानियाँ करती रहती हैं सूरज की अनवरत परिक्रमा.

विशाल मैदान के सुदूर दूसरी ओर शुरू होता है कहानी में ट्विस्ट
इंद्र छोड़ता जाता है अपनी मूसलाधार कुटिल मुस्कान दिन-रात लगातार
और बाढ़ चली आ रही है फैलाए हुए अपनी बाहें अग्निदग्धा की तरफ.

यह इस देश की प्राचीन कहानी
“आग, मौत और पानी!”

संधिकाल से अनभिज्ञ अभागे
ढूंढ रहे हैं पानी
देख रहे हैं इंद्र की ओर याचना भरी आँखों से
अनभिज्ञ अर्थशास्त्र से भी यूं
कि होने वाली है उनकी नज़रों में प्यास की कीमत कम
अति-उत्पाद की वजह से
और भूख की ज्यादा
जली घास कि वजह से!

इस देश की यह अमर कहानी
“भूख, प्यास और दानी!”




2...      मौसम

फिर बदल रही है घास के मैदानों की रंगत
कहीं दूर से पैदल-पैदल चला आ रहा है
भूख का मौसम |

नीलगायों के झुण्ड असमंजस में हैं!
हज़ारों-लाखों नीलगाय!
हाय!
विडंबना ही है कि नीलगाय की याददाश्त हाथियों जैसी नहीं होती!
एक विडंबना यह भी
कि उनकी कब्र पर कोई स्मारक नहीं होते!
और सबसे बड़ी विडंबना यह
कि नदी बहा ले जाती है पानी के साथ रक्तरंजित इतिहास भी|

सुदूर हरी घास के मैदान का रास्ता जा रहा है
मगरमच्छों वाली नदी से होकर|
नदी में दूर से बहा चला आ रहा है
दावत का मौसम

नीलगाय तो शाश्वत ग्रास है
पर मगरमच्छ हत्यारे नहीं
फसाद की जड़ तो यह मौसम हैं
जो आने के लिए करते हैं-
भूख के जानलेवा होने तक का इन्तज़ार|

शान्तिदूत वहाँ होते हैं जहां हत्या आनंद है
यहाँ सफ़ेद झण्डों का कोई मौसम नहीं|


3...     सागर

सृजन की लालसा में “समुद्री घोड़ा”
हो पहुँचता है अर्धनारीश्वर
शक्ति की आकांक्षी “ईल”
बनती है इंद्र का वज्र 
और अप्सराओं सी लुभाती हैं नाविकों को
हिमनदों के किनारों पर अठखेलियाँ करते हुए
प्रणय के प्राचीन वाद्य बजाती
दूर से जलपरी सी लगती  “सील”.

जल की सतह के ऊपर उड़ते
पंछियों की आँख पर कर वार
बना अस्त्र पानी की धार को
धनुर्धर मछलियाँ करतीं हैं अपनी विद्या का
पारलौकिक प्रयोग.

मगरमच्छ अब भी है क्रूरतम अविजित राक्षस
सृष्टि के प्रारम्भ से ही,
टपकाता अप्सराओं पर लार
तोड़ता देवों का एकाधिकार
मदांध यूँ
कि लड़ जीते हैं कई प्रलयकाल
जिनमें मिटी हैं देवों की कई पीढियां!

तैरते हैं गहरे अंदर विशालकाय कछुए
छुपाये अपने अविजित कवच में
कई दशकों का इतिहास,
उधर, बनता जा रहा है मोती
सीप का ह्रदय!

दमकते प्रवाल
और चकाचौंधतीं सितारा मछलियाँ
मारते दिन के छींटे रात के सागर पर
जो सोखता नभ की अग्नी
बनाए रखने पृथ्वी पर जीवन सा तापमान
संग अंदर बसे लहलहाते शैवाल
चूसते सूर्य-किरण में से
हिंसा के षड्यंत्र.

व्हेल भेजती हैं मीलों दूर तक मूक इशारे;
ज़मीन किनारे
डॉल्फिन खेलती हैं मनुष्य संग
समझने को यत्न करतीं दुनियावी भाषाएँ
करतीं परभाषागमन 
धरा और स्वर्ग का सेतु बन.

कई हिमालय जितनी गहरी पर्वतश्रंखलाएं
जिनकी जड़ें छूती हैं स्वर्ग तले लपलपाती नर्क की आग
जो देती है मृत्युलोक के लहू को रवानी
उलटाती हुई वो प्राचीन कहानी
कि हमसे ऊपर स्वर्ग है
हमसे नीचे नर्क!

बीचोंबीच तपती दुपहर
ज़मीन से मीलों दूर समंदर में
खुद सी जर्जर नौका को तट की ओर खींचते वक्त
उस अकेले बूढ़े नाविक द्वारा फंसाई गई
नौका के साथ बंधी विशालकाय मछली को
हिंसक शार्कों का एक झुण्ड
अपने पूरे जंगलीपन से नोंच-खसोटकर
रख छोड़ता है कंकाल मात्र.

खून का रंग पानी है
भूख का रंग नीला है
स्वर्ग का रंग मौत है


·     नोट    --- मादा  समुद्री घोड़ा (सी हॉर्स) नर के शरीर में पाए जाने वाले एक थैले में अंडे स्थानांतरित करती है, जिससे नर गर्भवती होते हैं और निश्चित समय के बाद अंडे देते हैं.
·         “इलेक्ट्रिक ईल” ऐसी समुद्री मछली है जिसके शरीर से विद्युत तरंगें निकलती हैं और हमलावर या शिकार को 600 वोल्ट्स तक का झटका लगता है 
·         समुद्री शैवाल और वनस्पति एक बड़ी मात्रा में हानिकारक  कार्बन यौगिकों को अवशोषित रखते हैं
·         समुद्र के भीतर कई हिमालय से भी ऊंची पर्वत श्रंखलाएं उपस्थित हैं




4...       मसाईमारा


“न काहू से दोस्ती न काहू से बैर!
नोबडी इज़’एन एनिमी, नोबडी’ज़ अ फ्रेंड!”

प्रवेश द्वार पर लगे इस चेतावनी पटल के साथ
आपका मसाईमारा में स्वागत किया जाता है!
इस प्रवासियों के स्वर्ग में जहाँ लाखों की संख्या में भूखे
बुरे मौसम से अच्छे मौसम की तरफ आते हैं.
तंजानिया से केन्या तक,
या यूँ कहें
सेरेंगेटी से मसाईमारा तक,
जिंदगी और मौत का यह स्वर और व्यंजन की तरह अटूट सम्बन्ध
एक-दूजे के साथ सहवासी-प्रवासी होकर
इस मैदान को आत्मा देता है.

यहाँ सरकारें भूख से लिखे संविधान के अधीन कार्यरत हैं
और शब्दकोष में दया का पर्यायवाची है आत्महत्या.
यहाँ भोजन श्रंखला नहीं भोजन चक्र होते हैं
जो हैं अनादिअनंत.

यहाँ तीनों लोकों में घात की चादर ओढ़े भय नामक सम्राट
अपनी प्रजा का हाल देखने दिन-रात चक्कर काटता है.
पहले आम चुनावों में संशय को यहाँ का प्रथम नागरिक चुना गया
जो वास्तव में शातिर उचक्का था
उसने जल की पलकें, थल की नींद और नभ से आराम नोंच लिया.

सिर्फ मैदान और मौत मिल जाने से कोई मसाईमारा नहीं हो जाता बाबू मोशाईईईई
जंगल में आग होती है
नदियों में बाढ़ होती है
शतरंज की चालें होती हैं
और होते हैं
हाथी, घोड़ा, ऊँट, सिपाही|
और ये सिपाही इंसान नहीं होते,
क्यूँकी इंसान जहां होते हैं वहाँ जंगल जंगल नहीं रह जाता मेरे भाईईईई!

तो ये सिपाही आखिर कौन हैं?
सिपाही वे हैं
जो सबसे कमज़ोर होते हैं
वे ज़ेब्रा भी हैं, हिरन भी, ब्लैक बक भी, नीलगाय भी
पर वे वास्तव में कुछ भी नहीं 
केवल सिपाही हैं!

ये सिपाही हैं
जो बलिदान के रंग की वर्दी पहन
बनाते हैं सुरक्षा की पहली दीवार,
आठ वज़ीरों की सपनीली आख़िरी दीवार
और बीच में फैला है अथाह अनंत
हरा-हरा, खून भरा मसाईमारा.....


      (नोट ---    मसाईमारा केन्या के दक्षिण-पश्चिम में स्थित अफ्रिका का सबसे प्रमुख वन्यजीव अभयारण्य है.
·         सेरेंगेटी नेशनल पार्क मसाईमारा से लगा हुआ है और तंजानिया में स्थित है. यहाँ से हर वर्ष लाखों ज़ेबरा और अन्य जानवर मसाईमारा की तरफ प्रवास करते हैं.


5...      जंगल

भेड़ीये पूनम के चाँद की ओर मुंह उठाये रो रहे हैं
विषहीन साँपों को उनके चटख लाल-पीले रंगों ने बचाया रखा है अब तक
अँधेरी रातें ही भूख मिटाती हैं यहाँ
यहाँ ज़हर ही जीवन है.

पक्षियों और बंदरों का जो शोर देता है तालाब पर पानी पीते हिरणों को शेर के आने की आहट-
वही चुपके-चुपके शिकारियों से शेर की भी चुगली कर रहा है;
यहाँ किरदार समझना बहुत मुश्किल है.

गिरगिट तेज़ी से रंग बदल रहे हैं
पर चीज़ें रंग छोड़ने लगी हैं.
एक जंगली सूअर के शिकार पर
लक्कड़बग्घों के झुण्ड दौड़े चले आ रहे हैं;
आज तो दावत है!
यहाँ मृत्यु ही एकमात्र उत्सव है.

यहाँ सब सुखी हैं
कोई विद्रोह नहीं करता 
क्यूंकि यहाँ कोई नियम नहीं|

मृत्यु पर दुःख यहाँ भी है
पर शोकसभाएं नहीं
विलाप नहीं
आंसू नहीं;
यहाँ दुख का अर्थ केवल सन्नाटा है
क्यूंकि यहाँ सभ्य लोग नहीं रहते,
यहां कोई शहर नहीं|

6 ... बर्फ

यह वो देश है जिसे स्वर्ग कहा जा सकता है
बशर्ते यह भ्रम न पाला जाए
कि स्वर्ग में सब अमर होते हैं.
यहाँ शांति की सफ़ेद चादर के नीचे
ज़िंदगियाँ न्यूनतम गतिज जीवन के साथ
ऊर्जा संरक्षण के नियमों की जीवित स्मारक होती हैं.

हिमालय की सबसे ऊंची चोटियों पर
प्रकृति माँ ने अपने बच्चों के साथ रंगभेद किया.
एक श्वेत हिमतेंदुआ
अदृश्यता से भीगा हुआ,
एकाएक उठ खड़ा होता है
झाडियों से कोमल पत्तियाँ चबाती रंगबिरंगी बकरी के सामने
और छुपाछुपी के पहले दौर में ही उसकी मुठभेड़ हो जाती है
अपनी पूर्वनिर्धारित हार से.

शिकारियों को यहाँ कफ़न के रंग में रंगा गया
और शिकार भद्दे धब्बों की तरह रेंगते रहते हैं
मौत की आँख की सफेदी में काले तिल की तरह.

कहते हैं यहाँ कोई अनजाना नियम है
जिसके टूटने पर हिमस्खलन होता है
और बहुत कुछ दफ़न हो जाता है इस बर्फीले सन्नाटे की गोद में
ममीकृत होकर मैमथ सा
कभी तो डायनोसॉर के आश्चर्य भरे अण्डों की तरह,
और कभी रहस्य नहीं छोड़ता कोई निशाँ तक
येती के पंजों जितने भी!

ये बर्फ पिघलने का मौसम था
जब एक-दूसरे से लिपटी हुईं दो लाशें
दो पत्थरों के बीच की खोखली जगह में से दिखाई देने लगीं|
शीतनिद्रा से उठे सफ़ेद भालू अपनी नाक हवा में लहराते हुए
उनकी ओर दौड़े चले आ रहे थे...
कदम दर कदम उनके बीच की दूरी कम होने लगी...

यहाँ के निवासी गर्वित हैं
विश्व के सबसे ऊंचे “टॉवर ऑफ साइलेंस” की नागरिकता पाकर!

·     नोट--- मैमथ जिसे “वूली मैमथ” या ऊनी हाथी के नाम से भी जाना जाता है, हाथी की एक प्राचीन विलुप्त प्रजाति है जिसके बर्फ में ठीक-ठाक संरक्षित अवशेष अभी कुछ ही वर्ष पूर्व खोजे गए.
·         
   येती एक विशालकाय मानव जैसा दिखने वाला कोई रहस्मयी वनमानुष जैसा प्राणी है जिसे देखे जाने के कई दावे हिमालय पर्वत के इलाकों में लंबे समय से किये जाते रहे हैं. वैज्ञानिकों को सुबूत के रूप में उसके विशालकाय पंजों के निशान कई बार प्राप्त हुए हैं और कुछ अस्पष्ट विडीओ भी कुछेक बार पाए गए हैं.) 



परिचय 

अमित उपमन्यु  

इंजीनियरिंग में स्नातक 
ग्वालियर में रहते हैं 
साहित्य में गहरी दिलचस्पी  

12 टिप्‍पणियां:

  1. अमित शर्मा की इससे पहले असुविधा और अनुनाद पर आई कवितायें के क्रम में अगर इन्हें देखा जाए तो वह लगातार प्रयोगशील दिखाई देते हैं. एक तरफ बहुत कुछ कहने की बेकली है तो दूसरी तरफ उसे ठीक से कहने की कोशिश के लिए आवश्यक धैर्य भी.

    ये कवितायें अपने लिए जो लोकेल चुनती हैं वह हिंदी कविता के लिए तो नया ही है. डिस्कवरी चैनल जैसे दृश्यों या एनीमल प्लेनेट जैसे नई-नई दुनिया की तलाश करने वाले चैनल्स आज उस दुनिया को हमारे घरों में ले आये हैं जिनके बारे में बस सुना भर गया था. ये कविताएँ उस युवा की कवितायें हैं जिसने उन्हें बहुत गौर से देखा-गुना है और उनके सहारे पूरी मानवता पर एक आत्मीय किन्तु सजग टिप्पणी करने का हुनर विकसित किया है.

    मेरे लिए अमित को इस तरह कदम दर कदम आगे बढ़ते देखना तथा उसकी काव्य अभिरुचियों का विस्तार देखना बेहद संतोषजनक है. एक संभावनाशील कवि को स्पेस देने के लिए रामजी भाई का आभार (हांलांकि एक इंट्रो बनता था)

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  2. पढीं मैंने ये कविताएँ. सच में ऐसा लगता हो कि ये सुदूर प्रदेश की भौगोलिक परिक्रमा कराने वाली कविताएँ हैं. इनकी अपनी ही विशेषता है. ये चारों ओर एक प्राकृतिक वातावरण रच रही हैं जिनके जिनके बदलाव में मानवीय त्रुटियों को आराम से महसूस किया जा सकता है.

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  3. जीवन को देखने समझने और उस पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए अमित शर्मा जिस भाषा ,प्रतीक और बिम्ब-विधान का प्रयोग करते हैं वह नवीन और अनूठा है और कहीं कहीं चकित भी करता है ! बधाई इस प्रस्तुति के लिए !

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  4. फिर बदल रही है घास के मैदानों की रंगत
    कहीं दूर से पैदल-पैदल चला आ रहा है
    भूख का मौसम .....
    ऐसे अनेक उदहारण.. जहाँ दृश्य जीवंत हो उठते हैं
    .कविता में कई जगह सूत्र वाक्य आये हैं-- '' इंसान जहाँ होते हैं वहां जंगल-जंगल नहीं रह जाता''
    जंगल के रहवासियों को लेकर रचे गये प्रतीक( जो अमित की लगभग हर कविता में हैं ) ...कविता को अर्थवान बनाते हैं

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  5. एक अलग अनुभव लोक की कवितायेँ होने के कारण इन्हें आसानी से समझना कठिन है. मुझे लगता है इन्हें जितनी मेहनत और डूब कर लिखा गया है उतनी अधिक मेहनत और एकाग्रता से पढ़ने की जरूरत है.मेरे लिए वह प्रिंट में ही संभव है.इसलिए में इतना ही कहूँगा कि अमित नए कथ्य और शिल्प के साथ आ रहे हैं जिसका स्वागत होना चाहिए.ये नरेश सक्सेना की परम्परा के कवि है यह बहुत ख़ुशी की बात है.

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  6. आनंद मिश्रित आश्चर्य से भर देने वाली कविताएं। डिस्कवरी या एनिमल प्लैनेट जैसे चैनल के अत्यंत गहन दश्यों को देखते हुए अवचेतन में गहरे-से-गहरे बैठी कुछ संवेदनाएं या रहस्य जब छू जाती हैं तब मन सामान्यतत: पलायन कर जाता है क्योंकि उस अबूझ- अगूढ़ से जूझने का न तो सृजनात्मक प्रशिक्षण है न ही उस स्तर की कल्पनाशीलता और न ही उस स्तर के श्रम की हिम्मंत। हिंदी में और वह भी युवा कोई कवि प्रकृति के अबूझ- अगूढ़ से दो-दो हाथ करता है देखकर अचछा लगा। जहां तक समझ पाया, प्रकृति से यह संबंध न तो प्रकृति में देवत्व स्थापित करता है और न ही एकाकी रूप से उपयोगितापरक है। एक वैज्ञानिक की सी रहस्यंदर्शिता है। मानव जाति के अवचेतन में जन्म जन्मांतर से संचित प्रकृति के साथ भय और विकास का रिश्ता तथा प्रकृति के अच्छे और बुरे का सनातन सत्तावादी प्रयोग समकालीन अर्थ में प्रयोग हुआ है।

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  7. थीम पर लिखी लाइव कमेंट्री एक कवि करे और उसमे कवि का अपना कवित्त बाइस्कोप से झांकता हुआ दिखे तो कैसा मजा आएगा.. जी ..वैसा ही मजा आ रहा है जब अभी अमित शर्मा की ये कवितायें पढ़ रहा हूँ.. यह एक प्रयोग है.. एक कवि का प्रयोग ..वह न केवल अपने आसपास की रीअल दुनिया को आँख-कान खोल कर देख सुन रहा है बल्कि कवि की संवेदनशीलता वाया मीडिया उस तक पहुँच रहे फीड पर भी व्यक्त हो रही है.. यह देखना सुनना महसूसना और उसपर यूँ लाइव स्टायल की कवितायें लिखना .. इन कविताओं से इतर हटकर मैं कवि पर बोलूं तो मुझे अमित कविता की अभिनव बिरादरी को रीप्रजेंट करते दिख रहे हैं.. कमोबेश अभी सभी फिल्ड में युवाओं की एक ऐसी पौध की धमक हुई है जो अपने अनुभवों के लिए खुद के प्रयोग पर भरोसा करने वाली पीढ़ी है और उससे एक अभिनव ताजगी पाठक वर्ग / दर्शक वर्ग/ श्रोता वर्ग को मिल रही है.. प्रीतम का संगीत, इम्तियाज की फिल्में, फरहान का गायन .. अमित की कवितायें सिर्फ कवित्त से नहीं निकलीं हैं .. यह एक आइडिया भी है जो उनके जेहन में क्लिक होकर आया.. मैं स्वागत करता हूँ इन कविताओं का और अमित के इस ढर्रे को कुछ कविताओं में मैं फॉलो करूँ तो मुझे ख़ुशी होगी ..

    शुभकामनाएं आपको अमित ... शुक्रिया सिताबदियारा !

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  8. बेबाकी से कहूँ तो मै तो नहीं पहुँच पाया जहां तक कवि की दृष्टि जाती है ....हाँ इतना जरूर है की कवि के अंगुली थामे जहां जहां घूम सका वह क्षेत्र वह दृश्य बिम्ब अद्भुत है अनदेखा अनजाना अपरिचित |सच तो ये है कि इंसानी दुनिया समूचे प्राणिजगत के अत्यंत छोटा हिस्सा है हमें उस विराट का दर्शन तो कवि ने कराया ही और अमर्त्य जीजिविषा को प्राणिमात्र के स्वभाव की तरह परिचित कराया जो इंसान में एक गुण की तरह हम समझते है वह दर अस्ल स्वाभाविक है इतना कि जैसे मसाईमारा के दरवाज़े पर वह न लिखा हो तब भी ......

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  9. अमित भाई की इन शानदार कविताओं को पढ़ने के बाद मुझे विश्‍वास हो गया है कि हिंदी कविता का भविष्‍य बिल्‍कुल बुरा नहीं है... अगर अमित जैसी कविताएं लिखी जा रही हैं तो यह सबसे आश्‍वस्तिकारक है...

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  10. आपकी कविता में जो चित्र बन जाते हैं, उन्हें जितना पढता हूँ, उतना ही देख पता हूँ...
    रंग बिरंगे भी होते हैं, और धूसर भी..
    अमित भाई, और पढने की प्रतीक्षा करूँगा.

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  11. कवितायेँ देर से पढ़ीं | वह इसलिए की हड़बड़ी में नहीं पढ़ी जानी चाहिए ये...कवि ने हिंदी पाठकों को एक नयी दुनिया दिखाने का काम किया है... बाढ़ कविता जहाँ अतियों के बीच पिसते आम जन के दर्द को सामने रखती है, वहीँ अन्य कवितायेँ भी आकृष्ट करती हैं , किन्तु अंतिम दो कवितायों में बिम्बों की कुछ ऐसी श्रृंखला है मूल तथ्य और भाव तक पहुँचने में दिक्कत आ जाती है...कहें तो कवितायेँ कहीं गूढ़ भी हो गयी हैं... यह अलग बात है कि कवि स्वयं एक कविता में कहता है कि गूढ़ होने से बेहतर है मूढ़ होना ....

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    1. @अस्मुरारी नंदन मिश्र... मित्र वह कविता जिस विषय को डील करती थी उस पंक्ति का अर्थ वहाँ उसी परिप्रेक्ष्य में था. और शायद भिन्न परिवेश की कवितायें होने की वजह से बिम्ब सहज न रह पा रहे हो. बाकी, काव्य और कवि की (मेरी) अपनी सीमाएं तो होती ही हैं!

      ............. अमित उपमन्यु

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