सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

वंदना शुक्ल की कवितायें


                                    वंदना शुक्ल 

एक कहानीकार के रूप में वंदना शुक्ल ने हाल के समय में अपनी विशेष छवि बनाई है | इस छवि को बरकरार रखते हुए अन्य विधाओं में भी उनकी आवाजाही देखने लायक है | वैचारिक लेख हों , या फिर कवितायें , वंदना अपने समय और समाज की नब्ज को न सिर्फ ठीक-ठीक पहचानती हैं , वरन उसमे बची/खोई छोटी सी भी संभावना को तलाशती चलती हैं | महत्वपूर्ण यह भी है , कि हालिया विमर्शों के विपरीत, वे अपनी बात को कहने के लिए न तो 'पंचम-स्वर' का सहारा लेतीं हैं ,और न ही बम्बईया फिल्मों की तरह किसी खलनायक को तलाशतीं फिरती हैं |  

                तो प्रस्तुत हैं सिताब दियारा ब्लाग पर वंदना शुक्ल की कवितायें 

1...     दोपहर

आसमान से गिरती धूप में
ऊब से लथपथ किसी
सूखे हुए
ठूंठे के शिखर पर बैठी चिड़िया
चोंच में तिनका दबाये ,
बुनती है कोई याद अपनी आँखों में
ढूंढती है एक खिड़की खुली हुई ,
किसी दीवार के पिछवाड़े जड़ी ,  
ख्वाब देखती हुई
रोशन दान ,झरोखे या
ईंट के उधड़े हुए पलस्तर के
जिसके भीतर एहतियात से  
रख दिया करती थी
अपनी चोंच में दबा वो सपना पकने को 
जैसे धूप में पकती है नर्म ज़ात गेहूं की बालियाँ 
जैसी हौसलों में उम्मीदें ,
जैसे पकती है उम्र समय के कढावे में
नहीं देख पाती वो भोली चिड़िया
पिछवाड़े से ,
बंद दीवार का लक दक चेहरा ,
जिस पर टंगी हैं नदियाँ ,नावें ,झरने,और चिडियाँ
पेड़ फूल रंग बिरंगी पतंगें ,हवा में झूमते वृक्ष की
जीती जागती तस्वीरें
एन वातानुकूलित यंत्र की छांह में  
एक साक्ष्य की तरह 
अलावा इसके भी मौजूद हैं वहां ,
सुखी महसूस होने के तमाम उपकरणों की भीड़ 
बैठी है चिड़िया अब भी
तिनका दबाए चोंच में !
पसीजती धूप तले
आँखों में चहचहाहट भरे
भविष्य की...
प्रतीक्षा करती ....एक
अदद खिड़की  
उधड़े हुए पलस्तर या किसी रोशनदान की ...
जो खुलती हो उसके सपनों में .....
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2...     अकेलापन  


अकेलेपन को मैंने
अपना एकांत बना लिया है
ये भी एक अभ्यास था जिसमे
पूर्णता हासिल कर ली है मैंने
अब हम तीनों बैठते हैं अक्सर साथ
एकांतमौन और अकेलापन
बतियाते हैं देर तक |
भीड़ की निरर्थकता पढाता है मुझे मेरा एकांत
कालान्तारों के इस शोर में मौन ,
वाणी की मितव्ययता का मोल समझाता है
अंतर में खुलती हैं विचारों की लंबी सड़क
और तब शुरू होती है यात्रा अकेलेपन की
मेरा मौन
विचारों के सुनसान चौड़े रस्ते के बगलगीर
उस बोधि-वृक्ष के नीचे खड़ा हो सुस्ताता है
घड़ी दो घड़ी ,जो
उसी का जन्म स्थल है ......
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3...      पगली


जब  देह ,धन ,अवसरोंपदों से
अघाए लोग अपने सपनों के महलों में बैठ
छप्पन भोग उड़ाते ,
उड़न खटोलों में उड़ते
भूल चुके हैं एक
अदद हंसी चेहरे पर
भटक रहे हैं ‘’सुख’’ की
अछोर महत्वाकांक्षाओं से उलझी गलियों में
तब ये कम्बखत ,
भरे बाज़ार और चौड़ी सड़कों के आसपास
पूरी देह पर आधे अधूरे चीथड़े लपेटे      
तमाम स्त्री विरोधी विसंगतियों 
व स्त्री मुक्ति के दावों,वादों,कसमों और नारों को
ठेगडों में लटकाए
भरी धूप,बरसात,बाज़ारों,स्टेशनों,सड़कों पर
अपने ऑरा के साथ घिनौनी दुर्गन्ध लिए
भटकती रहती हैं बिंदास पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक
हंसी जिसकी गूंजती है
चारों दिशाओं में 
बेशर्म-बेहया
क्या हंस रही है ये
मनुष्यता पर ?
या उन चौरासी लाख में भटकने के बाद
पैदा हुई श्रेष्ठ योनी पर अपनी ?
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4...      सुबह

ज्यूँ ज्यूँ मेरी उम्र बढ़ रही है,
देखती हूँ 
पृथ्वी बूढ़ी होती जा रही है
लगता है करोड़ों बरस जी लिए
हम दोनों  
अनगढ़ हरियाली से करीनेदार बियाबानों तक
धर्म परायण देवताओं द्वारा शापित फिर उन्ही के 
वरदान से जी गए दस्युओं के बीहड़ में  |
राज महलों आश्रमों तपस्थली अरण्यों से होते
राजपथ की आभिजात्य लक दक तक
युगों लंबी सड़कों तक चलते चलते  
पड़ गए हैं छाले हमारे विश्वासों में
अब जागे हैं पर कुछ खुमारी बाकी है अभी ...
बहुत लंबी यात्रा थी वो
डरावने सपनो के देश में

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5...     विश्वास


संकोच के बड़े पहाड पर खड़े हो
देखा है मैंने एक छोटे से सपने को
दूर टहलते ,मुस्कुराते और
कभी दोनों हाथों को आसमान की तरफ उठा
दौड़ते हुए खुली फिजाओं में
बहुत दूर......
दूरियां प्रायः छोटी रही हैं उम्मीदों से मेरी   
काश कि पर्वत और सपनों के
बीच
कोई पुल होता विश्वास का
सच कहती हूँ अर्थों को तब
ना होती शब्दों की मोहताजी |
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6...       उम्मीद


इससे पहले कि आप मरें
आपको पूरा भरोसा है कि आप जिंदा हैं ?
सुप्तावस्था से पूर्व चैतन्य थे या
एक भरपूर नींद से उठने के बाद भी
आप जाग चुके होंगे पूरी तरह?
साँसों में नहीं है अब शेष
सुकून भरी कोई लय
एक खौफ तारी है धडकनों की बस्ती में 
भटक भटक जाती हैं सांसें
अन्यायों की गर्म सलाखों से
टूटने –बिखरने लगती हैं बड़ी बड़ी आशाओं के
छोटे छोटे दुखों में | 
हमने कितनी कब्रें बना ली हैं अपनी ही
दबा दी हैं जिनमे अपनी इच्छाएं ,सपने,और सुख ?
खोदकर देखों उन्हें तो
निकलेंगे ना जाने कितने कंकाल
चिंताओं,दुखों,पछतावों और धोखों के
रिश्तों में ,प्रेम में ,....
पर खोदते रहना ज़रूरी है
रुके बगैर
क्यूँ कि
हो सकता है कि इन मुर्दों में कोई
जीवित ही निकल आये !
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परिचय ....

वंदना शुक्ल 

भोपाल में रहती हैं
मूलतः कथाकार
कविताओं में भी रूचि
हंस,वागर्थ,कथाक्रम,परिकथा,जनपथ,कथाबिम्ब,रसरंग,,कादम्बिनी ,समयांतर(लेख)जन सन्देश टाईम्स (कवितायेँ)आदि पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
कुछ कहानियां प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के आगामी अंकों के लिए स्वीकृत
रंगमंच व संगीत में गहन रूचि 

3 टिप्‍पणियां:

  1. कविताओं में अभिव्यक्त मनःस्थितियाँ में संप्रेषण का गुण है। कुछ कविताएँ तो बहुत ही अच्छी लगीं... खासकर पहली और तीसरी...

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  2. प्रफुल्ल जी ,प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आपके लेखों को पढ़ा है प्रसंशक भी रही हूँ |फेसबुक पर आपकी टिप्पणी गाहे ब गाहे ही पढीं हैं और आज मेरी पोस्ट पर आपका ये कमेन्ट सचमुच मेरे लिए महत्वपूर्ण और उत्साहवर्धक है |आभारी हूँ आपकी |

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  3. achhi kavitayen hain, khaskar jahan Vandana thaharti hain aur gahre utarti hain. Badhai

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