बुधवार, 29 अगस्त 2012

जयश्री राय की कहानी - "अब और नहीं"

                  
                                                                          जयश्री राय 

                       
     पढ़िए सिताब दियारा ब्लाग पर हमारे दौर की महत्वपूर्ण कथाकार जयश्री राय की कहानी 
                    
                      अब और नहीं

गलती से वह अपने गंतव्य से दस-पंद्रह किलोमीटर पहले ही उतर गया था और अब दिगंत से जा मिले इस राष्ट्रीय राजमार्ग के बीचोबीच खडा गर्म हवा और धूल के बेरहम थपेडे झेल रहा था . अबतक सांझ का सूरज रेत की सुनहरी ढूहों के पीछे फिसल चुका था, हवा की आग भी धीरे-धीरे बुझ रही थी . राख होते क्षितिज के आगे खेजरे की साँवली पाँत की छाँह गहराने लगी थी . अब न जाने अगली बस कब आये . रूमाल से अपने चिपचिपाते हुए चेहरे से रेत के कण पोंछते हुए उसने अपनी दायीं तरफ की बस्ती की ओर नजर दौडायी थी- आठ-दस कच्चे मकान और गर्म हवा में लहराते-से मटमैले तम्बुओं के कुछ धब्बे, साथ में इधर-उधर अरडाते ऊँटों की बेडौल आकृतियाँ... कहीं किसी खिडकी या सहन पर बाले हुए दीपक की धुँधली चमक ....अब कुछ न कुछ तो करना ही था . रात घिर रही थी . संझाते आकाश की अरूणाई  बडी तेजी से गहरे नील में तब्दील होती जा रही थी . ठीक इसी वक्त अचानक वह उसे दिखी थी और बिना कुछ सोचे-समझे उसने आगे बढकर कत्थई सांझ में लहराते हुए उस बदरंग लबादे को रोक लिया था . घूँघट की ओट से दो संध्या तारा जैसी उजली आँखें औचक दिप उठी थीं, साथ में हल्की हंसी की ठुनक- क्यों छेडते हो बाबूजी...

अरे नहीं ! वह एकदम से घबरा उठा था . ये अनजान बस्ती और परदेशी वह... कहीं किसी मुसीबत में न पड जाय . तभी पीछे से कोई खंखाडा था और फिर लहंगे के घेर के पीछे से वह बूढा किसी देव की तरह प्रगट हुआ था . सन-से सफेद बाल और हजार झुर्रियों में कटा-बँटा बँधी पोटली-सा सिकुडा  चेहरा . मिचमिचाती आँखों में गिर और छाले... वह कुछ और आगे बढकर उसे अपनी सफेद झिल्ली पडी मटमैली पुतलियों  से टटोला था - क्या बात है बाबू ?

जी कुछ नहीं, मुझे जंगीपुर जाना था, तो इन्हें... मेरा मतलब है, इन्हें कुछ गलतफहमी हो गयी है...
नहीं, कोई गलतफहमी नहीं . पसंद हो तो सामनेवाली कोठरी में चले जाओ . एक रात का तीन सौ . साथ में खाना, दारू-सारू भी...

जी... वह सकते में था- आप...?                                        

- धुमल, इस छोरी का बाप !

- जी !

- पेशगी...बडी-सी पगडी के नीचे दो सुलगते हुए पत्थर के टुकडे-सी आँखें और उसके सामने फैली वह चौडी हथेली . न जाने क्यों बिना सोचे-समझे उसने उसके हाथ में तीन सौ रूपये रख दिये थे . शायद यह वह रिहाई की कीमत थी जो वह घबराहट में चुका गया था . इस अनजान जगह में वह किसी मुसीबत में नहीं पडना चाहता था .

- ठीक है . रूक्मा, संभाल बाबू को... वह फिर बिना रूके लडखडाता हुआ सामने की भट्टी की ओर चला गया था . वह मंत्रमुग्ध-सा उस लहंगे के सतरंगी घेर के पीछे हो लिया था . उस क्षण उसकी आँखों में सिर्फ उस घाघरा के लहरिया रंग और दो झाँझर बजते बिवाई में बँटे साँवले पाँव थे .

एक छोटी-सी कोठरी में पहुँचकर उसे निवाड की खटिया में बिठाकर वह किशोरी ढिबरी जला लायी थी . ढिबरी की भकभकाती लौ से बेतरह कालिख उड रही थी . उसके पीले उजेर में दीवार पर उकेरे गये पशु-पक्षी के चित्र एक-एककर जाग-से उठे थे, अपनी आँखें मल-मलकर उन्हें घूरते हुए... एक पूरी दीवाल को घेरकर देवी-देवताओं के कैंलेंडर सजे थे . उनके सामने कुलंगी पर बुझा हुआ दीया और अगरबत्ती की राख टीला बनकर जमी थी . चारों तरफ चीकट गुदडियाँ और मिट्टी के धुआँए भांडे-वासन... उसने गर्दन उठाकर ऊपर देखा था- छत पर धुएँ से बना बडा-सा धब्बा , जो शायद ढिबरी के निरंतर जलने से उसकी  शिखा से पड गया था . 

अब वह किशोरी अपना किरमिची लबादा उतारकर उसके पाँवों के पास जमीन पर आ बैठी थी और आँखों में कौतुक भरकर उसे टुकुर-टुकुर तकने लगी थी . ढिबरी की सुनहरी लौ में उसका गोल चेहरा कांसे की थाल की तरह चमक रहा था . काजल लिसरी हुई बडी-बडी धुआंयी-सी आँखें, मोटे बादामी होंठ और गोदना गुदी हुई मांसल ठोडी...उसके चेहरे पर एक अनगढ बनैसा सौंदर्य था जो उसके अंदर के किसी अदिम भूख को अंजाने न्योत गया था . इस अपरिचित परिवेश में भी धीरे-धीरे वह अपने अंदर उत्तेजना महसूस करने लगा था . उसके पके गेहूँ की रंगतवाली देह पसीने से जबजबा रही थी . लाल छींट का ब्लाउज बगल से भीज उठा था . सरके हुए लहंगे से भरी हुई पिंडलियाँ चमक रही थी .

यकायक उसने उसे खींचकर अपने बगल में बिठा लिया था . वह भी बिना किसी संकोच के उससे लगकर बैठ गयी थी . मगर इससे पहले कि वह कुछ कह पाता या कोई हरकत करता, अचानक किसी ने बाहर से जोर से दरवाजा भडभडाया था . उसके दरवाजा खोलते ही एक छोटी लडकी उसकी गोद में एक रोते हुए बच्चे को डालकर सामने खडी हो गयी थी . एक मिनट बाबूजी... कहकर वह कोठरी के एक कोने में उसकी तरफ पीठ करके उस बच्चे को दूध पिलाने लगी थी . ढिबरी की मद्धिम लौ में डोरियों से बँधी उसकी नंगी पीठ चमक रही थी . दूध पीते हुए उस बच्चे के मुँह से चुसर-चुसर की आवाज उस नि:स्तब्ध कोठरी में चारों तरफ फैल रही थी .

न जाने क्यों वह एकदम से सिहर उठा था . उसके बदन के रोयें खडे हो गये थे . दूध पिलाकर रूक्मा ने बच्चे को उस लडकी को थमा दिया था . दूध पीकर वह बच्चा शायद सो गया था . दरवाजा बंदकर वह फिर उसके पास आ बैठी थी - बच्चा बीमार है बाबूजी . कई दिनों से ताप ही नहीं उतर रहा . इधर तीन-चार दिन से कोई ग्राहक भी नहीं आया . सो हाथ भी खाली था . आज तुम आये हो तो कल सुबह उसे डॉक्टर के पास ले जायेंगे... अगर बापू ने पूरा पैसा दारू में न उडा दिया हो तो...अंतिम बात पर आते-आते उसकी आवाज में एक डूब-सी पैदा हो गयी थी .

तो तुम्हारी शादी हो गयी है ? पूछते हुए उसने गौर किया था, उसका आँचल रिसते हुए दूध से भीग रहा था ... . . अरे नहीं . वह तो ले बैठी न जाने किस ग्राहक का . समय पर गिरा भी नहीं पायी... कहते हुए वह बहुत सहज ढंग से अपने ब्लाउज की डोरिया अलगाने लगी थी . मगर अचानक उसे न जाने क्या  हो गया था . उसका पूरा बदन जल उठा था . बहुत करीब से देखने पर अब उसे रूक्मा का चेहरा पहली बार अपनी छोटी बहन की तरह लगा था . वर्षों पहले अपने व्यापार के सिलसिले में जंगीपुर आते-जाते हुए बाबूजी इस रास्ते से कई बार गुजरते थे . उनके मुँह से यहाँ की कई कहानियाँ भी सुनी थी.. ये रूक्मा उन्हीं कहानियों में से कोई अनकही कहानी तो नहीं !  हे भगवान्...!  क्या जाने किस ग्राहक की ले बैठी... , चुसर-चुसर दूध पीता बच्चा... , ‘समय पर गिरा भी न सकी...’                                          
अचानक उठकर वह दरवाजे की ओर बढ गया था- नहीं ! एक और बच्चा नहीं, एक और रूक्मा नहीं... रूक्मा आश्चर्य से उसे पुकारते हुए पीछे-पीछे चली आ रहीं थी . मगर वह तेज कदमों से चलते हुए बाहर आ गया था, न जाने किधर जाने के लिए . वह जल्दी से जल्दी यहाँ से निकलकर बाहर पसरे रात के सुनेड में खो जाना चाहता था . पीछे से आती आवाजें उसे बेतरह डराने लगी थी . उनमें उस बच्चे की आवाज भी शामिल थी जो शायद फिर से जागकर रोने लगा था .


संपर्क ...
-जयश्री राय                                               
मो.  09822581137
      गोवा 


5 टिप्‍पणियां:

  1. जयश्री की ‘अब और नहीं’ ने गहरे तौर पर प्रभावित किया. स्त्री देह को केवल वस्तु समझने वाले काश उसकी विडंबनाओं को समझ पाते. जयश्री को बधाई एवं आपका आभार.

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  2. yah chhoti si kahani apne kathya va bhasha dono hi stro par prabhavit karti hai.garibi kisi ko kis had tak vivas kar sakti hai.... kuchh shabdo ka behad maulik prayog kiya gaya hai.

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  3. जयश्री राय को पहले भी पढ़ा है. उनकी कहानियां प्रभावित करती हैं. यह कहानी भी मुझे बहुत अच्छी लगी. उनको ढेरों शुभकामनाएं.

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  4. जयश्री जी की एक कहानी हंस में पढ़ी और अब ये दूसरी कहानी पढ़ी। अच्छी लगीं। बहुत शुभकामनाएं

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  5. जयश्री जी बाक़ी कहानियों की तरह ही यह छोटी पर पैनी कहानी भी बहुत अच्छी लगी ...आपको बहुत शुभकामनाएं

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