रविवार, 19 अगस्त 2012

विमल चन्द्र पाण्डेय का संस्मरण -- सोलहवीं किश्त


        
                        विमल चन्द्र पाण्डेय 

पिछली किश्त में आपने पढ़ा कि विमल को उनकी कहानी के लिए धमकी मिलती है | वे उसका माकूल जबाब देते हैं , और बात को आगे बढ़ाना चाहते हैं , लेकिन बाद में उन्हें मित्रों द्वारा यह समझाया जाता है , कि वे इस घटना को तूल न दें | वे मान जाते हैं | इधर घर पर उनकी शादी की बातचीत जोर-शोर से चल रही है , और वे भी इस बाबत अपनी मौन सहमति दे चुके होते हैं , क्योंकि अब यह साफ़ हो गया रहता है , कि उनका अपना किया प्यार इस रिश्ते में नहीं बदल पायेगा | और अब आगे ....

            प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर विमल चन्द्र पाण्डेय के संस्मरण 
                            ई इलाहाब्बाद है भईया की
                                 सोलहवीं किश्त 


                          २५-

कीडगंज के उस अँधेरे कमरे को छोड़ने की मुझे इतनी जल्दी थी कि जब मुझे पता चला कि सिविल लाइन्स में जियालाल जी का छोड़ा हुआ कमरा अभी तक खाली है तो मैं बहुत खुश हुआ. हजार रुपये महीने के लोज से मैं सत्रह सौ रुपये हर महीने के कमरे में पहुंचा था और अब जियालाल जी के छोड़े हुए कमरे, जिसमें कभी यूएनआई का ऑफिस था, को साढ़े तीन हजार रुपये महीने पर लेने पहुँच गया था. उसमें चार कमरे थे जिसमें से एक में बड़ा सिंक देख कर कहा जा सकता था कि ये किचन है. कमरे का स्ट्रक्चर अजीब सा था और शुरुआती दो कमरों को पार कर तीसरे कमरे में पहुँचने पर चौथे कमरे में जाने के लिए पांच सीढ़ियाँ थीं. चौथा कमरा खासी ऊंचाई पर था और उसमे दो अलमारियाँ देखने पर मैंने उसे अपनी लाइब्रेरी बनने का निश्चय किया. कमरा पहली मंजिल पर था और वैसा ही चार कमरों का सेट मेरे सेट के बगल में भी था. एक छोटी सी दीवार उठा कर छत को अलग किया गया था ताकि दोनों घरों की छतों को प्राइवेसी मिल सके. जिस कमरे में चौथे कमरे के लिए सीढ़ियाँ थीं, उसी के बगल से एक पतले गलियारे में लैट्रिन और बाथरूम था. कमरे के स्ट्रक्चर को विस्तार से बताये जाने का कारण है जो आगे आयेगा. इस कमरे में मुझे अपनी ज़िंदगी का एक ऐसा अनुभव हुआ जिसे मैं आज तक नहीं समझ पाया हूँ.

विवेक ने इस कमरे को किराये पर लेने पर कहा था, “ई एक तरह से तुम्हार तरक्की है. जवन ऑफिस में तुमका तुम्हार सीनियर ज्वाइन नै करावत रहा तुम आज ओही के किराये पे लई लिहो. लेकिन ई बताओ चार रूम के करबो का ? दउड़-दउड़ के खाना खाबो का ?”

मैंने उसे बताया कि मेरा प्यार शादी तक नहीं पहुँच पाया और मैंने घर वालों की मर्ज़ी से शादी करने का फैसला कर लिया है. शादी के बाद मैं अपनी बीवी के साथ इसी चार कमरों के सेट में कम से कम साल भर रहूँगा फिर मुंबई निकलने की प्लानिंग की जायेगी. विवेक ने कहा कि अगर मैं उस लड़की के इनकार से गुस्सा होकर जल्दबाजी में ये फैसला ले रहा हूँ तो ये गलत है और मुझे थोड़ा वक्त और लेना चाहिए. मैंने थोड़ा रुक कर सोचा तो मैंने पाया कि पिछले एक साल से उसे मनाने की मैं सारी कोशिशें कर के देख चुका हूँ. अब मेरे सामने विकल्प थे कि मैं या तो उसकी याद में ज़िंदगी भर शादी न करूँ या फिर कोई अच्छी सी लड़की देख कर शादी कर लूं. उसका कहना भी यही था कि मैं शादी कर लूं और उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा खुशी इसी बात की होगी. मैंने इसके कारणों को जानने की कोशिश में अपनी उम्र कम की और ना समझ पाने पर भी इसे मान लिया. एकाध बातें छोड़ कर मैं उसकी हर बात मान लेता था. मैं उसके साथ इतना नाज़ुक होता था कि थोड़ी-थोड़ी बातों में रो पड़ता था. उसने मेरे भीतर की लड़की को भी जगा दिया था जो हमेशा प्रेम से भरी रहती थी और पूरी दुनिया को प्यार से भर देना चाहती थी.

नीरेन जी के उस समाचार एजेंसी छोड़ देने के बाद वहाँ बिहार के मूल निवासी और गाजीपुर में निवास करने वाले राजेश जी तशरीफ़ लाए. पहली बार मैंने उन्हें देखते ही विवेक से कहा कि इस लड़के की शक्ल गया सिंह (अपहरण फिल्म में मेरे प्रिय अभिनेता यशपाल शर्मा के किरदार का नाम) जैसी लग रही है और ये बहुत खतरनाक होगा. विवेक ने मेरी बात को हँसी में उड़ा दिया. हालाँकि ऐसा कुछ नहीं हुआ और बाद में राजेश जी एक उत्सुक, जिज्ञासु और लायंस क्लब में सजी संवरी अंग्रेजीदां महिलाओं से ‘प्रेस विज्ञप्ति’ मांगने वाले हिन्दीदां पत्रकार साबित हुए.

सिविल लाइन्स वाले कमरे में शिफ्ट करवाने में विवेक ने हर बार की तरह महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपने नाम के आगे लगे ‘गणितज्ञ’ विशेषण को गलत साबित किया. यह विशेषण उसे दुर्गेश द्वारा दिया गया था जो बाद में शेषनाथ और मेरे द्वारा प्रसारित और प्रचारित किया गया था. दरअसल विवेक परले दर्जे का आरामपसंद इंसान था जो घर से तब तक नहीं निकलता था जब तक इसके अलावा और कोई रास्ता ना बचे. घर से ना निकलने के उसके पास उससे ज़्यादा बहाने हुआ करते थे जितने हमारी सरकारों के पास महंगाई पर नियंत्रण न करने के होते हैं. धूप ज़्यादा हो, मौसम ठीक न हो, कर्नाटक बंद का आह्वान किया गया हो या लंदन में बम विस्फोट हुआ हो, वह यहाँ अपने घर से न निकलने को किसी भी बात से जोड़ कर मना कर सकता था. ऐसा कई बार होता कि दोस्त उसे मुट्ठीगंज मिलने के लिए बुलाता जो कीडगंज से ज़्यादा दूर नहीं था और वो कह देता कि वह अभी म्योराबाद में फंसा हुआ है. कोई कहता कि वह उसके घर मिलने आ रहा है और उसका मिलने का मन नहीं होता तो वह कहता कि वह तो कटरा आया हुआ है और उसे घर पहुँचने के घंटा भर लग जायेगा. जिनसे उसका मिलने का मन नहीं होता उनके लिए उसके पास बहुत सारे बहाने थे. वह अपने एरिया में न होकर कहीं दूर किसी एरिया में है, यह उसका पुराना बहाना था और अक्सर वह जगह म्योराबाद हुआ करती. हमारे क्षेत्र में एक कहावत है ‘नार खेड़ गाड़ना’ और उसकी नार खेड़ पता नहीं क्यों म्योराबाद में ही गाड़ी गयी थी. जब कोई उससे लंबे समय तक डिस्टर्ब करने के मूड में हो तो उसका एक एवरग्रीन बहाना था कि उसे अपने किसी बुआ की बेटी की शादी में कानपुर जाना है या फिर किसी मौसी की भतीजी की शादी में सहारनपुर जैसे किसी दूर-दराज के शहर में जाना है. वह मेरे साथ ऐसे बहाने बहुत कम करता था और अक्सर मेरे डिस्टर्ब करने पर डिस्टर्ब करवाने को तैयार हो जाता था. मुझसे उसने जब भी कुछ बहाने बनाये, मैंने बुरा नहीं माना क्योंकि मैं भी कुछ हद तक ऐसा ही हूँ. मैं समझता हूँ कि आपका मन अगले २ घंटो को अपने हिसाब से बिताने का हो और कोई इन्हें आकर डिस्टर्ब करना चाहे तो आमतौर पर आप कुछ ऐसी ही बात बोलेंगे कि अगला हर्ट न हो. दुर्गेश दो चार बार से अधिक ऐसी परिस्थितियों से दो चार हुआ था और उसने विवेक का नाम गणितज्ञ रख छोड़ा था. विवेक पहले ऐसे विशेषणों का विरोध करता था लेकिन एक घटना के बाद उसने ऐसा करना छोड़ दिया था. एक बार उसके किसी मित्र ने उसे फोन किया कि वह कीडगंज आ रहा है और उससे मिलना चाहता है. विवेक ने पूछा कि वह कितनी देर में आ रहा तो मित्र ने कहा कि उसे आधे घंटे लगेंगे. विवेक ने कहा आधे घंटे में तो वह कतई नहीं पहुँच सकता क्योंकि वह म्योराबाद में है और वहाँ तगड़ा जाम लगा है. मित्र को कीडगंज में कुछ काम था तो उसे आना ही था. विवेक ने सोचा कि वह पन्द्रह-बीस मिनट में नन्हे के यहाँ से ऑमलेट खाकर निकल जायेगा. वह जैसे ही ऑमलेट खाकर पलटा, उसका वही दोस्त वहाँ से गुज़रा और दोनों की नज़रें मिल गयीं. दोस्त कुछ बोले उससे पहले ही विवेक बोल पड़ा, “देख ल्यो बेटा, तुमसे मिले खातिर गाड़ी उड़ा के आये हैं.” दोस्त ने उसकी बाँह पकड़ी और दुबारा ठेले की ओर खींचते हुए बोला, “हमहूँ को ऑमलेट खिलाओ चूतिया न बनाओ. हम सब गणित जानित हैं.”

सिविल लाइंस वाले रूम में शिफ्ट करने कराने के बाद हम लोग बुरी तरह थक गए थे. राजेश जी एबीवीपी के सक्रिय कार्यकर्ता रह चुके थे और मुझसे कुछ मुलाकातों के बाद समझ गए थे कि मेरे सामने वो बातें करेंगे जो अक्सर करते आये हैं तो मैं बहुत मजे लूँगा. वह सिर्फ़ पत्रकारिता की बातें करते थे और मुझमे पता नहीं कैसे उन्हें बड़ा प्रखर पत्रकार और एक बहुत मच्योर इंसान नज़र आता था. उनका कहना था कि वह मुझसे बहुत सारी चीज़ें सीख रहे हैं और इसके लिए मेरे एहसानमंद हैं. मुझे वह सम्मान समारोह याद आ जाता जहाँ मुझे बतौर पत्रकार सम्मानित करने के लिए बुलाया गया था और मैं नहीं गया.

हुआ यूँ था कि यूएनआई के ब्यूरो चीफ बदल गए थे और सुरेन्द्र दूबे के रिटायर होने के बाद संजय भटनागर ने वहाँ चार्ज संभाला था. मैं इसके पहले एक बार उनसे मिल चुका था जब मैं लखनऊ कन्फर्मेशन का इम्तिहान देने गया था और दूबे जी से साथ-साथ उन्होंने भी मेरी क्लास ली थी. उनके ब्यूरो चीफ बनने के बाद डांट भरे फोनों की संख्या बढ़ गयी थी. मैंने अंदाज़ा लगा लिया था कि उनकी उम्र चूँकि दूबे जी से काफ़ी कम है, वह इस पोस्ट को ज़्यादा एन्जॉय करेंगे. उस पर तुर्रा यह कि मैं अपनी आरामतलबी में कोई न कोई महत्वपूर्ण खबर मिस करता ही रहता था जिससे वह तुरंत फ़ोन करके मुझे ऑन द स्पॉट हड़का देते. यूएनआई लखनऊ का नंबर मैंने एक डरावनी रिंगटोन के साथ सेव कर रखा था और जैसे ही वह रिंगटोन बजती, मैं बुरी तरह घबरा जाता. मुझे इतनी बुरी तरह दुत्कारा और डांटा जाता कि कई बार तो मुझे सपने में वही रिंगटोन बजती सुनाई देती और मैं चौंक कर जाग जाता. संजय जी मुझे हड़काते हुए कई बार इस स्तर तक उतर आते, “तुम्हें नहीं लगता कि तुम हराम की कमाई खा रहे हो ? बिना काम किये सेलरी उठाना तुम्हें बुरा नहीं लगता ?” मैं उन्हें कहना चाहता कि जितनी सेलरी मुझे दी जा रही है उतने में मैं इतना भी काम कर रहा हूँ तो बहुत है और जितनी लेट तनख्वाह आती है उस लिहाज से मेरा लेट ख़बरें भेजना बनता है लेकिन मैं कुछ नहीं कह पाता क्योंकि ज़रुरी ख़बरें छूट जाने का अपराधबोध मुझ पर हावी रहता. एक दिन उन्होंने फ़ोन किया और पूछा, “क्या हाल है विमल ?” मैं उनकी टोन से ही समझ गया कि मैंने कुछ महत्वपूर्ण छोड़ दिया है. “ठीक है सर.” मैंने कहा. “कोई खबर ?” उन्होंने पूछा. “बस वही एक एक्सीडेंट था जो भेज दिया मैंने.”

“और कुछ नहीं ?”  

मैं संकोच में पड़ गया कि क्या कहूँ. कुछ तो है जो छूट गया है. मैं चुप रहा. उन्होंने डाँटते हुए कहा, “राजा भईया का हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया है और वो अस्पताल में भर्ती हैं. पता है?”

मैंने सच बोलने का विकल्प चुना और इनकार किया. उन्होंने मुझे कोसा डांटा और कहा कि मैं जल्दी से जल्दी ये खबर कवर करके भेजूं. मैंने हामी भरी. अपनी गलती पर मैं शर्मिंदा था और इसका कोई अर्थ नहीं था. मैं ऐसे रोज़ शर्मिंदा होता था.

फ़ोन डिस्कनेक्ट करके मैंने अभी सोचना शुरू ही किया था कि खबर बिना कमरे से बाहर गए कैसे निकाली जाए कि एक अज्ञात नंबर से फिर फोन आया.

“विमल जी बोल रहे हैं?”

“हाँ बोल रहा हूँ.”

“विमल जी बधाई हो.”

“किस बात की बधाई ?”

मैं सोचने लगा कि अभी जो मैंने फ़ोन पर गाली खाई है, ये क्या कोई बधाई वाली चीज़ हैं.

“आपको युवा पत्रकार सम्मान दिया जा रहा है हमारी संस्था की तरफ से....समारोह परसों शाम को फलां स्थान पर होगा.”

मैं सन्नाटे में खड़ा रह गया. शायद कोई और वक्त होता तो मैंने जबरदस्ती अपनी हरामजदगियाँ भुला कर थोड़ी देर के लिए खुश होने का बहाना ज़रूर खोजा होता लेकिन यह कोई दूसरा मौका था. अभी थोड़ी देर पहले जिस बात के लिए मुझे गालियाँ दी गयी थीं उसी बात के लिए एक संस्था मुझे सम्मानित करना चाह रही थी. ये कैसा विरोधाभास था ? दुनिया ऐसे ही विरोधाभासों से भरी पड़ी है और अगर थोड़े ध्यान से देखा जाए तो चीज़ें उतनी कठिन भी नहीं हैं. मेरा मानना है कि ज़िंदगी को हम ज़बरदस्ती जटिल बना कर रखते हैं और खुद को भी. सब कुछ हमारे सामने होता है और हम बस अपने इगो में उसे स्वीकार नहीं करते वरना हम कैसे इंसान हैं, कैसे लेखक हैं, कैसे कलाकार, कर्मचारी, पत्रकार, दोस्त, प्रेमी, पिता, पति, भाई, बहन, माँ आदि हैं, ये हमसे बेहतर कोई जानता है क्या. मैं समझ गया कि मेरी आड़ में किसका सम्मान किया जा रहा है. मैंने फ़ोन वाले भाई साहब से पूरी जानकारी ली. उन्होंने बताया कि उनकी एक बड़ी संस्था है जो फलां फलां की भलाई के लिए काम करती है. उन्होंने मेरी कई स्टोरीज अख़बारों में पढ़ रखी हैं और मेरा नाम पत्रकारिता सम्मान के लिए चुना गया है जो महान पत्रकार फलाने जी के नाम पर है. मैंने उनसे पूछा कि और किन पत्रकारों को यह सम्मान दिया जा रहा है तो वह बताने लगे कि पुरस्कार में क्या क्या दिया जायेगा. मैंने फिर से अपना सवाल दोहराया तो उन्होंने मेरे अलावा पीटीआई, दूरदर्शन, ईटीवी और एकाध प्रमुख अख़बारों के नाम लिए. मैंने उनसे क्षमा मांगी और उन्हें बताया कि ये जो सम्मान आप मेरी एजेंसी का कर रहे हैं मेरी एजेंसी उसके लायक बिलकुल नहीं रह गयी है. आप चाहते होंगे कि मुझे सम्मानित करके अपनी ख़बरें वहाँ से छपवायें तो आपको बता दूं कि मैं ऐसे कामों के लिए ख़बरें टाइप करने भर की भी मेहनत नहीं कर सकता. बेहतर होगा आप मेरा सम्मान किसी और संस्था को दें जिसके पास कोई मेहनती पत्रकार हो. उन्होंने कहा कि अगर मैं नहीं आया तो मेरी चीज़ें संभाल कर रखी रहेंगी जो मैं कभी भी कलेक्ट कर सकता हूँ. मैं मुस्करा दिया और जीवन ज्योति अस्पताल की ओर चल दिया जहाँ रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भईया दुर्घटना के बाद भर्ती थे. उनके हेलिकोप्टर को चोटें (J) आई थीं लेकिन राजा भईया सकुशल थे. 

कमरा शिफ्ट कराने के बाद विवेक ने शेर-ए-पंजाब में गला तर करने का विचार दिया जो इतना थकने के बाद बनता भी था. खांटी संघियों और घोर कम्युनिस्टों से भरे उस माहौल में राजेश जी पहले ऐसे संघी साबित हुए जिसने भयानक तरीके से शाकाहारी और टीटोटलर होने के बावजूद सिर्फ़ हमारे साथ के लिए शेर-ए-पंजाब को अपनी गरिमामय शाकाहारी उपस्थिति से धन्य किया. विवेक ने भीतर घुसते हुए राय दी कि शेषनाथ जो पांच छह बोरिया किताबें छोड़ गया है उसकी वजह से शिफ्ट करने में दो-दो बार इतनी परेशानियां हुई हैं और उन्हें बेच देना चाहिए. ऐसी ही हरकत मेरी किताबों के साथ दिल्ली में शशि शेखर ने की थी और इसका दर्द मैं समझता था, इसलिए उसकी बोरियों पर बहुत गुस्सा आने के बावजूद मैंने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर विवेक को निराश किया.
मेरा यह कमरा ऐसा घाट साबित हुआ जहाँ शेर और बकरी (विवेक की दी हुई उपमा, मित्र उपमाओं का बुरा न मानें और किसी बेहतर उपमा की सलाह दें) एक घाट पर पानी पीते थे. मुरलीधर और हिमांशु रंजन जैसे घोर कम्युनिस्ट और राजेश जी जैसे पूर्ण संघी मेरे घर पर आयोजित हुई पार्टियों में शामिल हुए और खूब सारी बहसों के बीच सुरा चिकन के साथ मटर पनीर (राजेश जी और शेषनाथ के लिए) का आनंद लेते हुए एक दूसरे का तियाँ पांचा किया.

                         २६-

इलाहाबाद में जितने मित्रों का ज़िक्र हुआ है उसमें सबसे अलग, सबसे हैरतंगेज और सबसे सनसनीखेज मित्र का ज़िक्र होना अभी बाकी है. घटना तब की है जब नीरेन जी उस समाचार एजेंसी में बने हुए थे. एक दिन उन्होंने किसी को एक मेल किया. पूछने पर बताया कि कोई संदीप जी हैं जिन्होंने इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर एक किताब लिखी है. मैं उनकी इमेल आईडी देखी तो संदीपचौटाएटजीमेलडॉटकॉम पाया. मैं समझ नहीं पाया कि अगले का नाम संदीप श्रीवास्तव है और वो मीडियाकर्मी है तो उसका संगीत से इतना लगाव क्यों है कि उसने अपनी आईडी संगीतकार संदीप चौटा के नाम से बना रखी है. कोई तो कनेक्शन होना चाहिए. लेकिन जब संदीप आया तो मेरी शंका निराधार साबित हुई. संगीत से उसका कोई लेना देना नहीं था और इससे अच्छा किसी आदमी का परिचय क्या हो सकता है कि उसका लेना देना न एथलेटिक्स से हो और न डकैती से और वह अपनी आईडी बना ले पानसिंहतोमरएटजीमेलडॉटकॉम. संदीप हालाँकि इस आईडी से जितना अतार्किक दीखता था उतना था नहीं ये मुझे बाद में पता चला. वह बहुत ‘पहुंचा हुआ फ़कीर’ (इलाहाबादी उपमा) था और उसके दोस्तों का कहना था कि उससे बच के रहने की ज़रूरत थी. मैं दोस्ती में इतना दिमाग चलाने वालों में से नहीं हूँ कि दोस्ती भी करूँ और बच के भी चलूँ. कई बार मैं खतरे जान कर भी बेबाक दोस्तियां करता हूँ और मुझे किसी दोस्त को पहचानने की यह कीमत बुरी नहीं लगती कि वह मुझे एक बार धोखा दे दे. जिन दोस्तों के साथ मुझे उनके स्वार्थी होने का अनुभव हो चुका है, एक ज़माने में मैं उनके बहुत करीब होने और उनका शुभचिंतक होने के बावजूद खुद को उनसे ख़ामोशी से काट लेता हूँ. मैं जानता हूँ इससे उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि ऐसे लोगों को बदला नहीं जा सकता. मैं यह तो कतई नहीं कर सकता कि दोस्ती भी करूँ और दोस्त पर शक करके उससे सावधान भी रहूँ. फिर मैं उस दोस्ती का आनंद नहीं ले सकता. मैं हर समय चौकन्ना नहीं रहना चाहता कि मेरी जिंदगी दुश्मन देश के लिए जासूसी कर रहे जासूस की हो जाए. दोस्तों के किसी ग्रुप में बैठ कर कुछ बोलना हो तो सोचूं कि कहीं कल को कोई इसका गलत उपयोग तो नहीं कर लेगा. मैंने ऐसे लोगों को भी देखा है जो मिलेंगे, आपके साथ दो-तीन बियर पियेंगे और मस्ती भरे माहौल में भी सिर्फ़ इसलिए चुप रहेंगे कि किसी के बारे में कुछ बोल दिया तो यहाँ बैठा कोई दोस्त कल को इसका फायदा न उठा ले. ऐसे लोगों को मैं ‘अन्ना-चौबीस घंटे चौकन्ना’ (आभार-सुनील शेट्टी की कोई फिल्म) कहता हूँ. मुझे लोगों को पहचानना आता है और ऐसा नहीं कि किसी की असलियत जान जाने के बाद उससे नाता तोड़ लिया जाता है, हाँ सावधान रहना ज़रूरी है.

तो मैंने संदीप से उसी तरह दोस्ती की जैसी मैं सबसे करता हूँ. जो मेरे मिजाज का होता है वह अपने आप विवेक जैसा दीर्घकालिक दोस्त हो जाता है और जो नहीं होता, उसके और मेरे बीच में बिना गाली-गलौज का एक सम्मानजनक दोस्ती का रिश्ता बनता है लेकिन उस दोस्त से मैं अपनी परेशानियां नहीं बता पाता जिसके करीब महसूस नहीं करता. संदीप से दोस्ती के वक्त मैं उसे संदीप जी ही कहता था और वह मुझे बड़े सम्मान से विमल जी पुकारता था. लेकिन बाद में पता चला कि यहाँ जी के पुछल्ले की कोई ज़रूरत नहीं थी. संदीप इलाहाबाद से निकलने वाले दैनिक अखबार डेली न्यूज एक्टिविस्ट में पत्रकार (जैसा उसने बताया था) रह चुका था और कमाने की कम संभावनाओं के मद्देनजर उसने यह अखबार छोड़ दिया था. उसकी खोपड़ी में हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता था जिसका निष्कर्ष ये होता था कि कहाँ से कुछ माल कमाया जाए. मेरे कमरे पर उसने जब विवेक के साथ आना शुरू किया तो पता चला कि वह ओढ़ी हुई गंभीरताओं वाला आदमी नहीं है और जल्दी ही हमारी बातचीत ‘बहुत हरामी पीस हो तुम’ और ‘तुम साले पागलचोद हो’ वाले स्तर पर आ गयी थी. वह उन दिनों इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर एक किताब लिखने के बाद अब प्रिंट मीडिया पर एक किताब लिखने की तैयारी में था और साथ में पत्रकारिता से जुड़े विभिन्न कामों जैसे कोई पत्रिका निकलना, कोई अखबार निकलना, कोई वेबसाइट शुरू करना, किसी शंकराचार्य का मीडिया मैनेजर बन जाना, किसी नेता का पीआरओ बनना, कोई प्रोडक्शन हाउस खोलना आदि के बारे में सोचता रहता था.

संदीप हमेशा सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहता था और ज़ाहिर है ऐसे लोगों की कंपनी ज़्यादातर लोगों को अच्छी लगती है. कहते हैं न कि औसत से कम समझ वाले लोग समस्याओं की बात करते हैं, औसत लोग आदमियों की बात करते हैं और महान लोग विचारों की बात करते हैं, तो इस लिहाज से संदीप महान आदमी था. वह हमेशा नए विचारों के साथ आता था जिनमें से कई तो खासे रोमांचक होते. ‘सही कह रहे हो’ उसका तकिया कलाम था और अलग-अलग परिस्थितियों में यह तकिया कलाम अलग-अलग फेशियल एक्सप्रेशंस के साथ आता था. मेरी जानकारी में अभी हिंदी साहित्य में कोई ऐसा लेखक नहीं हुआ जो उन एक्सप्रेशंस को सही-सही लिख कर जैसे क तैसा आप तक पहुंचा दे. डंके की चोट पर आपको कह के बेवकूफ बनने वाला बनारस के बाहर मैंने पहला इंसान देखा था. बनारस में तो हर तरह के इंसानों की प्रजाति पाई जाती है या यूँ कहें कि मेरा इंसानी शोध वहाँ कुछ ज़्यादा ही हुआ है इसलिए मुझे ऐसा लगता है. बनारस और ऐसे लोगों की बात आई है तो मैं संदीप का प्रसंग  रोक कर प्रकारांतर से बनारस की एक साल भर पुरानी घटना का ज़िक्र कर दूं फिर वापस संदीप की बातें होती रहेंगीं.

मेरी स्कूलिंग राजकीय क्वींस कॉलेज से हुयी थी और मैं दसवीं तक बहुत पढ़ने वाला विद्यार्थी हुआ करता था. क्वींस कॉलेज अपने शानदार रिजल्ट के साथ भयानक मारपीट के लिए भी जाना जाता था. इंटर तक के इस विद्यालय के छात्र अक्सर कैंट स्थित कमलापति त्रिपाठी या आदर्श इंटर कॉलेज के छात्रों से मारपीट करते रहते. झगड़े के मूल में अक्सर किसी ऐसी लड़की का मामला हुआ करता जो इन मामलों से अनभिज्ञ होती थी. मैंने यहाँ छठवीं में एडमिशन लिया था और मेरे दोस्तों का समूह तब तक सीधे घर से स्कूल और स्कूल से घर टाइप का था. मैं हमेशा से अपनी कक्षा में प्रथम आता था और दसवीं में मेरे पिताजी ने मुझे समझा रखा था कि मैं अगर मेरिट में नहीं आया तो मेरी जिंदगी बर्बाद हो जायेगी. मैंने इस बात को गंभीरता से ले लिया था और दसवीं की बोर्ड परीक्षाओं में खूब पढ़ाई की. जिन एकाध लड़कों से कभी-कभार मेरा झगड़ा हो जाता, मैं और मेरे दोस्त उसे बाद में देख लेने की मंशा जता कर वहाँ से हट जाते. कुल मिला कर मैं हाई स्कूल तक बहुत पढाकू किस्म का विद्यार्थी था और आज की तारीख में मेरे पिताजी का कहना है कि मैं अगर उसी ढर्रे पर चला होता (जिसे वह अपना ढर्रा मानते हैं) तो आज ज़रूर कहीं आईएएस अधिकारी होता. बहरहाल, कक्षा में ऐसे कई लड़के थे जो भाग कर फिल्में वगैरह देखने चले जाते थे और कई बार अध्यापक को गालियाँ देकर भाग जाते थे. हम शरीफ बच्चों की तरह इन बच्चों से दूर रहते. ऐसा ही एक लड़का था आशुतोष जो बहुत निडर था और उसके काले रंग के कारण उसके दोस्त उसे कल्लू आशुतोष बुलाते. दसवीं कक्षा में एक बार गणित के एक अध्यापक उसे पीट रहे थे और साथ में गालियाँ भी दे रहे थे, “चूतिया सारे, आते नहीं हो स्कूल, मार-मार के हलुआ बना देंगे.” अचानक उसने अध्यापक की बांह पकड़ कर झटकी और मेजों पर चढ़ता हुआ बाहर भाग गया, “बहरे निकल त बताइला.” बाद में पता चला कि उसकी धमकी से डरे अध्यापक ने अपनी क्लास खत्म होने के बाद भी स्कूल में तीन घंटे रुक कर और अध्यापकों के खाली हो जाने का इंतजार किया और सब साथ निकले. एक लड़का जिसकी लम्बाई सबसे ज़्यादा थी, संजीव राय, उसके बारे में कहा जाता था कि वह शहर के एक नेता टाइप बदमाश या बदमाश टाइप नेता अजय राय का भतीजा, भाई या भांजा है. आठवीं क्लास में एक बार मेरा उससे झगड़ा हो गया था और मैंने गालियों के जवाब में गालियाँ दी थीं. उसने मुझे कक्षा में ही अपनी चप्पल निकाल कर फेंक मारी थी और मैंने कसम खायी थी कि मैं इससे एक दिन बदला ज़रूर लूँगा. उस समय मैं कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि वह लम्बाई, वज़न और शरीर सब में मुझसे बहुत तगड़ा था. मैंने अपने दोस्तों के साथ योजना बनाई थी कि इंटर पास करके स्कूल छोड़ने से पहले उसे मारा ज़रूर जायेगा.
आशुतोष हर फिल्म पहले दिन पहले शो में देखता था और फिर स्कूल आकर सभी लड़कों को साजन सिनेमाहाल के टिकट दिखाता और इतराता फिरता. हम उससे दूर रहते क्योंकि वह बहुत खतरनाक लड़का था जिससे कई अध्यापक भी डरते थे और हम सीधे साधे बबुए टाइप लोग थे, यह दीगर बात थी कि यह बबुआ होना हमें पसंद नहीं था और हम मन ही मन आशुतोष और संजीव राय जैसे लोगों के मुरीद हुआ करते थे. खैर, हुआ ये कि हाई स्कूल की बोर्ड परीक्षा में फेल होकर आशुतोष ने क्वींस कॉलेज छोड़ दिया और मैंने पचहत्तर प्रतिशत अंकों के साथ, चार विषयों (जिनमें दुर्घटनावश गणित भी शामिल था) में डिकटिन्श्न के साथ उतीर्ण की. मुझे लगा मैं मेरिट में नहीं आया और मेरे नंबर भी मेरिट वाले अंतिम लड़के से कई प्रतिशत कम हैं तो मेरे पिताजी घर पर बहुत निराश होंगे. लेकिन जब मैं मार्कशीट लेकर घर पहुंचा तो मेरा स्वागत बहुत धूम धड़ाके से साथ किया गया. मैं भीतर से मेरिट से चूकने के कारण बहुत दुखी था और मेरे माता पिता जश्न जैसी खुशी मना रहे थे. मैं समझ गया कि मेरिट में न आने से मेरी कोई बुराई नहीं हुई और मेरे साथ धोखा हुआ है. साथ ही मुझे ये भी समझ आया कि अगर मेरे नंबर दो चार प्रतिशत कम भी होते तो कोई बात नहीं होती. इंटर से मैंने अपने आदर्श पुरुषों के नक़्शे कदम पर चलना शुरू कर दिया और इसमें मेरे सभी मित्रों से भी मुझे बहुत सहयोग मिला. हम स्कूल पहुँच कर वहाँ किसी को प्रोक्सी लगवाने के लिए सहेज देते और फिल्म देखने चले जाते. कई बार ऐसे अवसर आये जब ‘आज’ अखबार उठा कर देखने पर पता चलता था कि पुष्पराज से लेकर ललिता तक और अभय से लेकर गंगा तक, किसी भी हॉल में कोई फिल्म बची नहीं है. ऐसी सूरत में हम देखी हुई किसी फिल्म को दोहराने से भी परहेज न करते. पहली बार उसी दौर में सिनेमा के काले परदे का जादू दिलो दिमाग पर छाना शुरू हुआ था और उस दौर में मुझे अच्छी बुरी फिल्म से ज़्यादा उस बड़े परदे पर चलती फिरती छायाओं का आकर्षण था.

खैर बताने वाली बात यह है कि मैं इंटर पास करके बिना संजीव को मारे वहाँ से निकल गया और शायद स्कूल छोड़ते वक्त मेरे दिमाग में वह बात थी भी नहीं. इसके कई सालों बाद एक बार जब मैं ड्राईविंग लाइसेंस बनवाने आरटीओ ऑफिस गया था तो वहाँ संजीव एक बैग लटकाए मिल गया. उसकी लम्बाई वही थी जो किशोरावस्था के दिनों में थी लेकिन मेरी बढ़ गयी थी. हमने एक दूसरे को थोड़ी देर देखा और मैंने ही पहल की, “संजीव?” “हाँ यार, विमल हो न तुम?” उसने दुख भरी आवाज़ में बताया कि वह एक कंपनी में एमआर हो गया है और इस समय अपने कंपनी की दवाइयों से भरी एक गाड़ी छुड़वाने आया है. उसने दवा कंपनियों को जीभर के गरियाया और कहा कि ये लाइन उसे चूस रही है और यहाँ भरे सारे लोग भ्रष्ट हैं. हम जितनी देर बातें करते रहे, वह आरटीओ और सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार को कोसता रहा. उसने बताया कि पिछला अधिकारी गाड़ी छोड़ने का सिर्फ़ आठ हजार लेता था लेकिन ये अफसर लालची है और दस हजार की मांग कर रहा है. मैं उसे ऐसे हारे हुए इंसान के रूप में देख कर बहुत दुखी हुआ. लेकिन जब हाई स्कूल के बारह साल बाद आशुतोष से अचानक दुर्घटनावश मुलाकात हुई तो उसके जज़्बे ने मुझे फिर से पुराने दिनों में पहुंचा दिया. (मेरा हाई स्कूल १९९६ में हुआ था और बारह तेरह सालों बार फिर से मुलाकात २००७-०८ में हुई) वह मूल रूप से बलिया का रहने वाला था लेकिन बनारस में पैदा होने और पढ़ाई लिखाई करने के कारण उसकी भोजपुरी एक अलग ही रूप में सामने आती थी. वह हमेशा से भोजपुरी ही बोलता था लेकिन जब मैंने गौर किया तो पाया कि उसकी भोजपुरी में अस्सी प्रतिशत बनारसी बोली थी तो बीस प्रतिशत बलियाटिक और वह खासी अलग और मजेदार सुनाई देती थी. हमने एक दूसरे के बारे में जानकारियां लीं. मैंने उसे बताया कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता करके आजकल एक न्यूज एजेंसी में पत्रकार हूँ और उसने बताया कि उसने जेटकिंग से कंप्यूटर हार्डवेयर का कोर्स किया है और दिल्ली में कई साल नौकरी करने के बाद अब बनारस आ गया है जहाँ उसने सेल्स एंड सर्विस की दुकान खोली है. उसने मुझे हाई स्कूल के बाद सीधे अभी देखा था इसलिए मेरे बदले रूप पर हैरान होता. मैं हैरान होता कि वह जैसे का तैसा है. मैंने उसे बताया कि हाई स्कूल के दिनों में वह मेरा रोल मॉडल हुआ करता था और मैं उसके जैसा बनने की सोचता था तो उसने कहा, “तुं तब्बो पढ़ाकू रहले आ अब्बो सकलिये से पढ़ाकू लागत हवे.”

मैंने और मेरे दोस्त अनुज (मेरी कहानी ‘बाबा एगो हईए हउवें’ के बाबा) ने मिनी लैपटॉप खरीदने का फैसला लिया था क्योंकि मैं ट्रांसलेशन के ऐसे काम लेने लगा था जो कभी भी कहीं भी करने पड़ते थे. मेरे लैपटॉप का बैकअप कम हो गया था और १५ इंच का वह डेल हर जगह ढोने लायक भी नहीं था. ये पिछले साल यानि २०११ की बात है जब हमने बनारस में बहुत सारी दुकानों पर उसकी कीमत पता कर ली थी. बाबा का कहना था कि बिजनेस लाइन में रहने के कारण उसने एमआरपी पता कर ली है और यह १३९०० रुपये है जबकि बनारस में अधिकतर दुकानों पर इस कॉन्फ़िगरेशन का दाम १५००० बताया जा रहा है. हमने आशुतोष से बात की तो उसने कहा कि हम बनारस की सारी दुकानों पर दाम पता कर लें और जितने में मिल रहा होगा वह उससे चार पांच सौ कम में देगा. बाबा ने पता की हुई एमआरपी १३९०० में से भी १०० रुपये घटा कर उसे १३८०० बताया.

“साले कुल जगाहिया पता कर के आवेल. हम कमाईं ना एक्को पैसा ?” आशुतोष ने दुख व्यक्त किया.

बाबा मुस्कराया जिसका मतलब था कि साले एक तुम्ही बिजनेसमैन नहीं हो. बाबा ने मुखर होकर कहा भी, “बेटा आशुतोष, हमको ठगना बहुत कठिन है. पूरे मार्केट में कोई नहीं ठग सकता. १३८०० में दोगे तो दो नहीं तो हम मंगवा लेंगे बाहर से एमआरपी पर.”

“रुक साले, मंगवावत हईं.” उसने एक लड़के को भेज कर सैमसंग के दो मिनी लैपटॉप मंगवाए और तब तक चिलम से हमारा स्वागत करता रहा. बाबा बखान करते रहे कि कैसे उन्हें पूरे मार्केट के रेट की जानकारी सिर्फ़ एक फ़ोन कॉल से मिल जाती है.

लैपटॉप आये और उसने बिल बना कर हमें विदा किया. जब बाबा बाहर निकल गए और मैं निकल रहा था तो उसने मुझे बुलाया, “अबे बिमलवा, एहर आव.”

“का हौ बे?” मैं उसके पास गया. उसने लैपटॉप किसी और दुकान से मंगाए थे और उसने मुझे बिल दिखाया जिसमे प्रत्येक लैपटॉप की कीमत १३४०० लिखी थी, “कहि दिहे ए भोसड़ी वाले से कि बहसल मत करे हर जगह. देख पेल देले हईं तोनहने के चर-चर सौ रुपिया.” मैं अचानक से बहुत खुश हो गया और जोर से हँसने लगा. मैंने उसके कंधे पर एक जोर की धौल लगाई और हँसता हुआ बाहर आया. कुछ तो है जो नहीं बदलता.

बाहर बाबा बाईक स्टार्ट करके मेरा इंतजार कर रहे थे, “क्या कह रहा था करियवा?”
मैं मुस्कराया और मोटरसाईकिल पर पीछे जाकर बैठ गया. मेरा मन उस समय इसी तरह पुरानी बातें याद करने का हो रहा था जैसा अभी हो रहा है कि संदीप का ज़िक्र करता-करता मैं सालों पीछे चला गया.

                                                        क्रमशः .....

                                               प्रत्येक रविवार को नयी किश्त ...



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4 टिप्‍पणियां:

  1. मज़ा आ गया...बनारस के बारे में यह प्रसिद्द है कि रांड, सांड, सीढ़ी और सन्यासी से भी ऊपर ठग हैं.
    आशुतोष का अंदाज पसंद आया.यह साहस सिर्फ और सिर्फ बनारस का है. और कहीं नहीं मिल सकता.
    आपके लेखन का मुरीद तो हूँ ही. बधाइयाँ और धन्यवाद.

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  2. maja aa gaya ..Ashotosh bhaiya great hain

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  3. very nice......kafi mazedar....n appriciable....i read it twice........ab to mujhe bhi intzar rahta hai in kishto ka....

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  4. sansmaran rochak andaaj men aage badh raha hai. aapko badhaaeeyaa.

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