बुधवार, 25 जुलाई 2012

केदारनाथ अग्रवाल को याद करते हुए ...केशव तिवारी



केदारनाथ अग्रवाल 

प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लाग पर हिंदी कविता के त्रयी में से एक और वटवृक्ष माने जाने वाले बाबू केदार नाथ अग्रवाल पर लिखा युवा कवि केशव तिवारी का संस्मरण | यह संस्मरण साहित्य अकादमी द्वारा इलाहाबाद में 22 - 23 जुलाई 2012 को आयोजित कार्यशाला में दिए गए उनके वक्तव्य पर आधारित है | 



                            पक्षी जो एक अभी-अभी उड़ा

इसके पहले की मैं अपना यह संस्मरण आरम्भ करू , मुझे एक घटना याद आती है | एक बार जब मैं इलाहाबाद से बांदा अपने घर जाने के लिए निकला था , तभी शिवकुमार सहाय जी को संयोगवश पी.सी.ओ. से फोन मिलाया | उन्होंने पूछा 'तुम कहाँ हो ' | मैंने कहा , कि मैं घर जाने के लिए निकल रहा हूँ ..| उन्होंने कहा , वही रूक जाओ , मैं वहीँ आ रहा हूँ | वे आये , और मुझे अपने घर ले गए ...वहां  बाबा नागर्जुन ठहरे हुए थे | वे मुझे कुछ गुमसुम से बैठे  थे ...| फिर मेरा परिचय पूछा , मैंने कहा " बांदा से आया हूँ , नाम केशव तिवारी है , और कवितायें लिखता हूँ | " वे चौकन्ने हुए ..."तो सुनाओ अपनी कवितायेँ , क्या डायरी लाये हो ?" मैंने कहा 'कवितायें मुझे याद रहती हैं , और मैं डायरी लेकर नहीं चलता | " मैंने उन्हें अपनी कुछ कवितायें सुनाईं , फिर उन्होंने कहा "देखो बांदा में कविता का बटवृक्ष रहता है , जिसकी छाया सम्पूर्ण हिंदी जगत पर पड़ती है , उससे दूर ही रह कर कविता लिखना " फिर बोले , "ये लोग मुझे दिल्ली ले जाना चाहते हैं , तुम मुझे वाचस्पति के यहाँ पहुंचा दो , या फिर मुझे बांदा ले चलो "  | जब रात के साढ़े ग्यारह बजे , तब वे कहने लगे , "उठो कपडे पहनों , मुझे लोकनाथ ले चलो , मैं वहां  रसगुल्ले खाऊंगा और तुम वहां  छोकरी देखना "| 


बाबा नागार्जुन द्वारा घोषित ऐसे वटवृक्ष केदार जी से मेरी मुलाकात 1991 के बारिश के दिनों में हुयी |ये वह समय था जब क्रेमलिन से लाल झंडा उतर रहा था और केदार जी ने मुझे मोरिस कार्मफोर्थ के तीनो वैल्यूम पढने को दिये और व्यवस्था गलत हो सकती है ऐतिहासिक भौतिक द्वन्द वाद नही | इसे पढो और मुझसे बात करो। यूं तो मार्क्सवाद से एक रूमानी लगाव विद्यार्थी काल से ही रहा पर मै अब गंभीर तरह से दिक्षित हो रहा था। यह वक्त तमाम शंकाओं निराशाओं और मार्क्सवाद पर हमले का था। मैं साढ़े तीन बजे से देर शाम तक उनके  पास बैठता और चर्चायें करता, धीरे-धीरे अपनी बन रही समझ में उन्हें भी देखने परखने लगा। केदार जी को पूरी तरह तब नही समझा जा सकता, जब तक आप मार्क्सवाद को नहीं समझते, उनका  पूरा सीराजा, सोच जीवन , उसी पर टिका था। एक मनुष्य के रूप में केदार जी बहुआयामी प्रवृत्ति के थे और एक महाजनी परिवार में जन्म लेने के बावजूद उससे उनका कोई जुड़ाव नहीं हो पाया। वजय यह थी कि पिता वैद्य थे तो बचपन उनके साथ कटनी, जबलपुर में बीता। कानपुर में पढ़े वकालत और बांदा में चाचा के अंडर में वकीली शुरू की, उनके न रहने पर उन्होंने लिखा-‘नेह की छतरी फटी/आलोक बिखरा’ मतलब वो खुद अपने बूते दुनिया को देखने को कितना बेताब थे, इससे साफ होता है।

केदार जी से मिलकर यह बार-बार लगता था कि जीवन के उनके कुछ बंधे मापदंड हैं, उससे डिगना उन्हें मंजूर नहीं था। आपकी सब सुन लेंगे , मुंह पर प्रतिकार भी नहीं करेंगे, पर बाद में ‘ अव्वल आय ’ कहने से भी नहीं चूकंेगे। उन दिनांे तक उन्होंने लगभग बाहर निकलना बंद कर दिया था। शाम की बैठक में आने वाले लोगों में पंडित राम संजीवन एहसान, आवारा कृष्ण मुरारी पहारिया, आर. पी. राय, रामविशाल सिंह, नरेन्द्र थे। केदार जी के सरोकार कविता तक ही नहीं होते, शहर देश में क्या हो रहा है, कचहरी में क्या हो रहा है, नगरों की साहित्यिक हलचलें कैसी हैं। मैं सोचता रहता यह कवि इतनी ऊंचाई पर पहुुंच कर कैसे इस उम्र में एक बच्चे की सी उत्सुकता के साथ जी रहा है, मार्क्सवाद को शायद इसी तरह से उन्होंने जीवन में ग्रहण किया था, परिवेश से लगाव और अपने समय से एक द्वंद्वात्मक रिश्ता कैसे रखा जाए, केदार उसके स्कूल थे। केदार जी से पहली बार मिलकर आपको कभी न लगता कि आप एक शिखर पुरूष से मिल रहे हैं। हो सकता आपको उनके अंदर नागार्जुन सा चुम्बकत्व एक फक्कड़ अंदाज या त्रिलोचन सा पांडित्य और किस्सा गो न मिले, पहली-पहली बार यह भी लगे, उनके कमरे की किताबें देखकर, कि आप एक पढ़े लिखे वकील, कवि से मिल रहे हैं। जो मितभाषी हालचाल पूछ कर चलता करता था। यह था भी, पर आप में कुछ झलक जाए तो फिर आने का न्योता देना नहीं भूलते थे। वो अक्सर एकांत क्षणों में निराला जी के बांदा आने कर जिक्र करते, जवानी में साइकिल से कानपुर से लखनऊ उनसे मिलने जाने का भी , बाबा या त्रिलोचन जी के बांदा आने का।

केदार जी में एक बात जो विशेष थी कि किसी से बात करते हुऐ तुरंत सतर्क हो जाते, मुझे लगता है, उनके जीवन व्यवहार में उनका वकील साथ-साथ ही रहता था केदार के कवि निर्माण में उन छोटी-छोटी बातों का समावेश था, जिसको अक्सर लोग नजर अंदाज कर जाते हैं, वो केवल उप केन को देखकर ही नहीं लौट आते थे, उसके कगार, किनारे पत्थर फसल, मछुूआरे, ये सब मिलकर उनके मन को रमते थे, अक्सर पूंछते नदी हो जाते हो किनारे वाला मन्दिर इस बाढ़ में बचा कि ढह गया, नाव घाट में सुना है, अब मुर्दे फेंके जाते हैं। इन लोगों ने नदी गंदी कर दी है। उम्र में इस कवि के पास इतना धड़कता ह्नदय इतना गहरा लगाव अचंभित कर देने वाला था।

केदार जी को सदा इस बात का मलाल रहा कि नामवरसिंह जैसे आलोचकों ने उनकी गहरी उपेक्षा की और उनको मेरे लेखन में केवल ‘लाल चुनरिया में लहराते अंग रहेंगे’ ही दिखा, हालांकि अंत तक  वो उस कविता के पक्ष में रहेे। उनका कहना था हम लोगों को ठेल ठाल कर पीछे करने और मुक्तिबोध को आगे लाने की साजिश थी, यह एक तरह की । और मुक्तिबोध को लेकर मुझसे कई बार असहज हुये और डांट तक चुके थे। मुझे लगता है, केदार जी ने अपने लोक से जुड़कर जहां तक चेतना का विस्तार कर लिया था, साधारण अभिजात आलोचना वहां तक पहुंच भी नहीं सकती । केदार जी एक बात बार-बार कहते, केशव मुझे कचहरी ने मनुष्य बनाया और यह वकील उनके साथ अंत तक रहा भी। एक ईमानदार वकील, जिसने बांदा जैसे अपराध बहुल जनपद में डी.जी.सी. क्रिमिनल रह कर चार आने हराम के हाथ से नहीं छुए, किसी बेईमान की चाय भी नहीं छुई। केदार जी ने जिन मापदंडों को गढ़ा था, उसको पूरे जीवन जिया, उनका मनुष्य पर गहरा भरोसा था। उनके सेवक बुद्धू नन्ना, जो दरवाजे पर ही जीने तक सोये और केदार जी के काफी पहले चले गए, एक बार अजय तिवारी से बाबू जी की बात हो रही थी, मैं पेशाब के लिए बाहर निकला तो नन्ना ने कहा, ‘‘ तिवारी तुम्हु लिखथियु मैं तो लंठ हो या हरी पत्ती, पीली पत्ती, अजय तिवारी को बता रहे हैं , मोहूं का समझावा । ’’ मैं तेजी से हंस पड़ा बाबू जी बोले बुद्धू ऐसे ही हैं , पढ़े-लिखे नहीं, पर निहायत ईमानदार। मैंने कहा बिना पढ़े ही ठीक हैं,  वो भी हंस पड़े। मुझे यहां पर एक उपनाम रशियन लेखक स्पिरिकिन का एक कथन याद आता है- ‘‘ मनुष्य के कल्चर लेबल को समझने के लिए दो चीजे हैं। पहली वह अपने संबंधों में कितना साफ है। दूसरा उसका प्रकृति से क्या रिश्ता है। ‘‘ इस तरह से देखा जाये तो बाबू जी और उनके प्रकाशक शिवकुमार सहाय के रिश्ते को याद करना चाहिए, रामविलास जी से उनके रिश्ते का स्तर मित्रता का था।

सहाय साहब और परिमल प्रकाशन और बाबू जी एक-दूसरे के पर्याय थे, कहते केशव जब किसी ने नहीं छापा, सहाय ने छापा, अब सब चक्कर लगाते हैं। मैने कह दिया सहाय ही छापेंगे, कभी एक पैसे की बात नहीं, कभी ब्लैक एंड व्हाइट पोर्टेबल टीवी खरीद गए वो भी जबरदस्ती, बस जन्मदिन के आयोजन में इलाहाबाद से लोगों को अपने खर्चे पर लाना, सम्मिलित होना । वो भी सहाय के बाद उन लेखकों को क्या हो गया, यह हिंदी जगत की अकथ कथा है। बार-बार सहाय जी पर आरोप लगता केदार का साहित्य फैला नहीं पा रहे हैं, पर केदार जी को इसका कोई मलाल नहीं रहा। कविता कैसे किसी कवि को बड़ा मनुष्य बनाती है। केदार जी इसके उदाहरण थे, एक बार कहीं जमीन के झगड़े में अदालत से भेजे गये, तो सामंतों ने सर पर लाठी मारी सिर फट गया तो भाग कर जान बचाई, बड़ी कृतज्ञता से कहते ‘एक महिला ने सिर पर कपड़ा बांधा’ और यह भी कि ‘ अभी ये यही करेंगे, जब तक चेतना इन तक नहंी पहुंचती। ’ ये थे केदार ।

एक बात जो वह बड़ी ताकत से कहते कि निराला की ‘ राम की शक्ति पूजा’ में निराला जब शक्ति का आह्नान करते हैं , उससे सहमत नहीं हूं। बात डाइलॉग से निपटनी चाहिए मारकाट से नहीं । वो साफ कहते हैं, मैं झंडा लेकर नहीं चल सकता मैं पूछ बैठता ये ‘काटो, काटो, करबी काटो। हिंसा और अहिंसा क्या है तो आपने ही लिखा था’ तो जवाब आता कि वह एक वक्त था। बांदा की स्थानीय राजनीति से पूरी तरह वाकिफ कौन कवि क्या लिखता है और उनके बारे में क्या दुप्रचार करता है। जानते हुए कभी विचलित नहीं दिखते। डॉ0 रणजीत, जिनसे उनकी बाद में गहरी असहमति हुई , आना-जाना बंद हुआ, पर उनकी स्कूटर उन्हीं के अहाते में खड़ी होती । विधवा बेटी और उसके उद्दंड बेटे से काफी चिंतित रहते। कुछ दिनों के लिए मद्रास जाते तो पत्र आते नवदुर्गा है, इन दिनों कहां की मूर्ति सबसे अच्छी है, मैं स्वयं देखने ना जाने की बात कहता तो कहते एकाध दिन देख आओ, केन के हाल पूछते। अपने बांदा के शिष्य श्री कृष्ण मुरारी पहारिया से काफी आहत रहे, कहते रहे इतनी ऊर्जा के बाद भी यह बरबाद हो गया। अगर कोई सरकारी बड़ा अफसर कभी मिलने आ जाता तो हां-हूं करके टरका देते कहते ये बेईमान है, इन्हें जानता हूं। फिर वह उनके घर की ओर मुंह करता ।

डॉ0 अशोक त्रिपाठी से उनका पुत्रवत स्नेह रहा और उनके हर जन्मदिन में वो आते और कार्यक्रम का संचालन करते। अजय तिवारी की आलोचना से उनकी गहरी सहमति बनती । रामविलास जी के न रहने के बाद एक बहुत उदास शाम में जो आज तक मेरे जेहन में है , उन्होने कहा , ‘ केशव रामविलास हिंदी का बड़ा आदमी था, केवल मित्र नहंी था, बड़ा मनुष्य था। सब खत्म हो गया । ’ एक बात केदार जी राजनीतिक कविताओं को पढ़ कर और उनसे मिलकर जो उठती थी कि वो प्रकट जगत में उससे दूर ही रहते, ये बात सामाजिक भूमिका की एक सीमा बना रखी थी। कभी-कभी कह उठते ‘तार सप्तक’ में मुझे भी निमंत्रण आया । मैने कोई जवाब नहंीं दिया एक कविता का ‘ऑंखों देखा ’ जिक्र करते बताते इलाहाबाद रेडियो स्टेशन कविता पढ़ने जा रहा था, सुमित्रानंदन पंत को संचालित करना था, घबरा रहा था, नामी लोग आ रहें थे। पैंसेंजर से निकला ‘ बहिलपुखा ’ स्टेशन में शाम झुमुक रही थी तो पलाश के पेड़ को देखकर रास्ते में यह कविता लिखी और बहुत तारीफ हुई। अगर कहीं कोई उन पर एक लाइन लिख दे, बार-बार कहते ‘ यार ’ क्या लिखा है, बताओ, अगर कुछ दिन न जाऊं रामस्वरूप हाजिर बाबू जी पूंछ रहे थे और अगर बहाना मारा तो बोले , रामविशाल कह रहे थे चौराहे पर सिगरेट फूंक रहे थे, मुझसे उड़ते हो।

एक फिर अवसाद के क्षणों में उन्होंने कहा, केशव डटे रहो, जो  करो उस पर विश्वास रखो, मैने यही किया है। सब चमकदमक छोड़, बांदा में रहकर केवल ईमानदारी से कविता को साधा है। कोई इसे कविता माने या न मानें । एक बात आवश्य थी, बाबू जी ने एक बार आपके बारे में जो अवधारणा बना ली उसे बदलते नहीं थे। कभी-कभी मुझे यह असहज जरूर करता था। इससे उनके कुछ अति निकट लोग उनसे कहे भी, पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की । मैं कहता तो चुप हो जाते कुछ जवाब न देते । आगे चलकर उनकी बाबा और त्रिलोचन जी से कुछ असहमतियां हुई।

एक वाक्या याद आता है, एक बार हम बाबू जी के साथ इलाहाबाद उन पर आयोजित एक कार्यक्रम में गये, जिसमें श्री अमरकांत , शेखर जोशी, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह, अजीत पुष्कल तथा इलाहाबाद के युवा  साहित्यकार, बाहर से अजय तिवारी, अशोक त्रिपाठी थे। कुछ लोगों ने प्रश्न उठाया कि केदार निराला से बड़े कवि नहीं हैं । मुझे जाकर इसका प्रतिकार करना पड़ा कि यह प्रवृत्ति ही हिंदी में ठीक नहीं है, इन सब ने अपना समय में कैसे दखल दी , ये देखना चाहिए । केदार जी काफी प्रसन्न दिखे, फिर हम अमृत राय जी के यहां गये, वहां केदार जी ने कहा-‘चम्पा काले अक्षर नहीं चीह्नती है में क्या है। ’ प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा, उस नामुराद की वही कविता और तुम्हारी ‘ गर्रा नाला’ कविता ही सबसे ज्यादा भाती है। मुझे, उन दिनों बाबू जी, शास्त्री जी के किसी बयान से खफा थे और खुलकर बोले, ये थी वह दृढ़ता , जहां लोग सोंट खीच जाते हैं । केदार डट जाते थे । ढंकी खुली असहमति उनकी हरदम त्रिलोचन जी की कविता को लेकर बनी रही । केदार जी पैसे को लेकर काफी सतर्क रहते। पाई-पाई का हिसाद डायरी में लिखते, कहते कवि को रोटी का इंतजाम सबसे पहले करना चाहिए, अपव्यय नहीं । मुझे कुछ अजीब लगता तो कहते बाद में समझोगे। केदार जी के बाद के दिनों में अचानक लगा जैसे वो स्मृतिलोक में चले गए, उसी दौरान उन्होने भगवता, बागी घोड़ा तथा अन्य कविताएं लिखीं, जिनका पहला पाठक भी मैं रहा । डायरी पकड़ा देते पढ़ो, और तख्त पर पालथी मारकर मुग्ध होकर बैठ जाते। मुझसे मेरी राय मांगते, मैं हिचकिचाता तो बोलते, नये आदमी हो नई नजर से देखो।

केदार जी से  मिलकर यह बार-बार महसूस होता इस व्यक्ति को खंड-खं डमें नहीं समझा जा सकता है, इसने अपने व्यक्ति के कई-कई खाने नहीं बना रखे हैं, अपने लिखे के प्रति इतना विश्वास दुर्लभ है। कई-कई बार कह उठते, केशव देखो ये बेला को इतने दिनों से पानी दे रहा हूं। फूलता नहीं । मैं उनका चेहरा देखता रह जाता , क्या-क्या चिंतायें हैं इस कवि की। एक तरफ सामंतों पर बज्र चलाता है, एक तरफ फूल के न खिलने से उदास है। आखिरी वक्त जब उनसे मिला तो डॉ0 भार्गव उनके पैर में प्लास्टर बांध रहे थे, उस पीड़ा में उन्होंने मेरी ओर देखा कहां रहे यार, देखो मेरा पैर टूट गया है। फिर लखनऊ में उनके न रहने की सूचना मिली। सब याद करते उनकी एक कविता जेहन में रह-रह बोलती है-

केशव तिवारी  
‘‘पक्षी जो अभी-अभी उड़ा/और बोलती लकीर सा अभी/नील व्योम वक्ष में समा
गया/ गीत वहां गाने के लिये गया/गायेगा/और लौट आयेगा/पक्षी जो एक अभी-अभी उड़ा।’’


                                      


 केशव तिवारी हिंदी के सुपरिचित कवि हैं 


नाम               - केशव तिवारी
शिक्षा              -  बी0काम0 एम0बी00
जन्म              -   अवध के एक ग्राम जोखू का पुरवा में
प्रकाशन            -    दो कविता संग्रह प्रकाशित  1... “इस मिट्टी से बना”
                                                     2... “आसान नहीं विदा कहना”
सम्प्रति                  -     हिंदुस्तान यू0नी0 लीवर लि0 में कार्यरत्

                  -     कविता के लिये सूत्र सम्मान:      
                  -    सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित |
                  -   कुछ कविताओं का मलयालमबंगलामराठीअंग्रेजी में अनुवाद
संपर्क              -  द्वारा – पाण्डेय जनरल स्टोर , कचहरी चौक , बांदा (उ.प्र.)
मोबाइल न.         – 09918128631 

10 टिप्‍पणियां:

  1. bahut aatmeey sansmaran hai......kedar baboo ke bare main bahut kuchh janane ko mila.

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  2. बहुत बढ़िया लिखा है केशव जी ने

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  3. बहुत गहरे जाकर केदार बाबू के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश झलकती है यहाँ इस संस्मरण में. उनकी कविता को सलीके से समझने के लिहाज़ से भी यह ज़रूरी है. बधाई उन्हें. आज सुबह ही उन्होंने फ़ोन पर बताया इस संस्मरण के बारे में.

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  4. हालांकि मुझे केदार जी की कवितायें कभी बहुत प्रभावी नहीं लगीं. लेकिन यह संभाल कर रखे जाने वाला आलेख है..केशव भाई ने आत्मीयता से लिखा है..प्रसंगवश केदार जी पर हिमांशु पंडया ने भी एक अच्छा आलेख लिखा है.

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  5. adbhut atmiyata ke bavjood asamprikt hokar likha gaya sansmaran ! Keshaw ji ko bahut badhai
    vimal chandra pandey

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  6. केदार जी के व्‍यक्तित्‍व के कई पहलुओं को आपने बहुत आत्‍मीयता के साथ रचा है। केदार जी से जो सीखना चाहिये वह भी आपके संस्‍मरण में ध्‍वनित होता है।

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  7. स्मरण के तमाम खतरे होते हैं. या तो वह स्मृत जीवन से जुड़े हुए अपने अनुभवों के पालतूपन का शिकार हो जाता है या फिर घोर वैयक्तिक स्तर पर एक जीवन को दैनंदिन विवरण की बही बना डालता है. केशव जी का यह संस्मरण,एक जीवन के सुचिंतित आत्मसंघर्ष, चुनौतियों और सीमाओं को उनकी वैचारिकता और व्यापकता में देखने-परखने का एक व्यवस्थित प्रयास है. केदार के कवि में केदार के व्यक्ति का सुरुचिपूर्ण उत्खनन, केशव जी के अपने तेवरों में.........बधाई उन्हें.

    - सुबोध शुक्ल

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  8. इस शिक्षाप्रद संस्मरण में जहां केदार बाबू के रचनात्मक व्यक्तित्व के कई अनजाने पहलू उद्घाटित हुए हैं वहीं आपकी ग्रहनीयता और उनकी कविता के काव्य-तत्त्व तक पहुँचने की क्षमता भी |केदार जी कविता को जिन जीवन-क्षेत्रों में ले गए ,वहाँ सामान्य मध्यवर्गीय कवि की पहुँच नहीं हो पाती |वे नागार्जुन ,त्रिलोचन जी के साथ एक अलग धारा को प्रवाहित करते रहे ,जिसने कविता को अज्ञेय प्रवर्तित व्यक्तिवादी काव्य-प्रवाह से बचाया ,जो शीत-युद्ध के दिनों में,सत्ता और प्रलोभन के बल पर खूब तेजी से फली-फूली थी |बधाई स्वीकार करें, केशव जी |

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  9. अच्छा लिखा है भाई । हिन्दी के सारे बड़े कवियों का फिर से मूल्यांकन करना ज़रूरी है । फ़लां जी ने क्या कह दिया है इससे कुछ जाता-आता नहीं

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  10. केशव जी, केदार जी के प्रति कृष्ण मुरारी पहारिया का आक्रोश जायज था ? अगर हाँ तो उसकी वजह क्या थी।

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