रविवार, 21 सितंबर 2014

“ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बगैर” की छठी क़िस्त - 'अशोक आज़मी’







इस संस्मरण के बहानेअशोक आज़मीअपने अतीत के उन दिनों को याद कर रहे हैं, जिसमें किसी भी मनुष्य के बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है | पिछली किश्त में उन्होने मंडल आन्दोलन के बहाने उस पूरे दौर की मानसिकता को समझने की कोशिश की थी | इस छठी क़िस्त में अपने जेल के अनुभवों के सहारे वे उसे और विस्तार दे रहे हैं
                                 
                                  
      
         तो आईये पढ़ते हैं सिताब दियारा ब्लॉग पर अशोक आज़मी के संस्मरण                       
               

                    “ग़ालिब--ख़स्ता के बगैर की  छठी क़िस्त


                       या देवी सर्वभूतेषु



किसी भी शहर या कस्बे में जेल हमेशा शहर के बाहर होती है. शरीफ लोग जेल से दूर ही रहना पसंद करते हैं. पहली जेलयात्रा के बाद से अब तक जेलें बहुत सी देखीं हैं मैंने. ग्वालियर में किले पर कभी जाएँ तो वहाँ मानमहल है. राजा मान सिंह ने बनवाया था उसे जिनके बारे में कहा जाता है कि वह न केवल बहुत वीर थे बल्कि कलाओं, ख़ासकर संगीत में निपुण थे. ध्रुपद के अच्छे गायक थे और इस विधा को उन्होंने ही सबसे पहले राज्याश्रय दिया. इस महल की दो मंज़िलें ज़मीन के ऊपर हैं और बाक़ी (शायद पाँच) ज़मीन के नीचे. इन्हीं में से एक मंजिल में एक वृत्ताकार हाल है. बताते हैं कि राजा मान सिंह के राज में उनकी सात रानियाँ उसमें झूला डाल के झूलती थीं. उसके नीचे एक तालाब बना था. चारों ओर जबरदस्त सुरक्षा. फिर जब उन्होंने मृगनयनी से शादी की तो उसने वहाँ रहने से इंकार क्यों किया होगा? उसने अलग और खुला महल बनाने की मांग क्यों की होगी? वही जगह मुग़ल शासकों को बाद में जेल बनाने के लिए सबसे मुफ़ीद क्यों लगी होगी? बताते हैं मुगलों ने न सिर्फ उसे जेल बना दिया बल्कि ज़्यादातर राजद्रोह के अपराधियों को वहीँ रखा. सिखों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह को जहांगीर ने यहाँ तमाम दूसरे राजाओं के साथ बंदी बनाकर रखा था. बाद में जब वह रिहा किये गए तो उनके साथ के राजाओं ने उन्हें साथ ले चलने की फ़रियाद की. जहांगीर ने कहा कि जितने राजा दामन पकड़ के आ सकते हैं गुरु का उन्हें ही रिहा किया जाएगा. रात भर थिगलियाँ जोड़ी गयीं और फिर उनका दामन पकड़कर 52 राजा निकल आये थे. किले पर इसी घटना के स्मृति में एक खूबसूरत गुरुद्वारा है जिसे “दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा” कहा जाता है. मान महल के भीतर अब भी वह गोल बारामदा भुतहा सा लगता है. जैसे उन क़ैदियों की कराहें गूँज रही हो उसमें.


एक जेल मुंगावली में देखी थी. खुली ज़ेल. जनता शासन के दौरान यह प्रयोग किया गया था. दीवारें नहीं थीं उसमें. क़ैदी स्वच्छंद घुमते थे. उन्हें तमाम शिल्प कलाएं सिखाई जाती थीं कि अपराध छोड़कर वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें. लेकिन यह प्रयोग असफल हुआ. कई बार वक़्त से पहले आदर्शवादी तरीक़े से लागू कर दी गयी चीज़ें असफल होने के लिए अभिशप्त होती ही हैं. अब वहां खंडहर हैं उस आदर्शवादी स्वप्न के. उसी मुंगावली की असली वाली जेल में गणेश शंकर विद्यार्थी की वह मूर्ति वर्षों क़ैद रही जिसे वहां के पत्रकार चौराहे पर लगाना चाहते थे. विद्यार्थी जी का रिश्ता रहा था उस क़स्बे से सो आज़ादी के बाद उनकी मूर्ति गिरफ़्तार हुई वहाँ.


खैर, विषयांतर कर बैठा. माफ़ी चाहूँगा. हमारे पहले कोई पचीसेक लोग गिरफ्तारी दे चुके थे. इनमें से ज़्यादातर छुटभैये नेता और डिग्री कालेज के छात्रनेता थे जिन्हें जेलों का अच्छा खासा अनुभव था. हम उनके बीच बच्चे ही थे. मैं तो सबसे कम उम्र का था. अन्दर चले तो गए पर एक डर मन में था. जेल को लेकर एक छवि बनी हुई थी. लेकिन उस जेल में तो हम जैसे अतिथि थे. वहां तो उत्सव का माहौल था. शहर के सबसे अमीर सुनार और संघ के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता रामा बाबू के यहाँ से रोज़ सुबह जलेबियों, समोसों, कचौड़ियों वगैरह का नाश्ता आता. एक कांग्रेसी नेता थे जिनके यहाँ से शाम का नाश्ता आता था. जनता दल की तो युवा शाखा के तमाम बड़े नेता जेल में थे ही. जेलर साहब अक्सर टहलते हुए चले जाते और हमारे सुर में सुर मिला कर आरक्षण की आलोचना करते. दिन भर पत्रकारों का आना जाना लगा रहता और हम सबकी तस्वीरें अगले दिन सुबह देवरिया के पन्ने पर छपतीं. शाम का खाना सबकी तरह मेरा भी घर से आया लेकिन उसके पहले किसी के सौजन्य से पूड़ी सब्ज़ी आ चुकी थी.


पापा को ख़बर मिली श्रीधर भैया से. वह हमारे नए पड़ोसी थे. राम गुलाम टोले के पीछे के खाली मैदान में बसे इस नए मोहल्ले में अभी कम लोग आये थे और सबसे पुराना बाशिंदा होने के कारण पापा का विशेष सम्मान था. जब कोई नया घर बनता तो पानी, चाय वगैरह की व्यवस्था हमारे ही घर से होती. श्रीधर भैया का बचपन कलकत्ता में गुज़रा था और अब उन लोगों ने यहाँ मकान बनवाया था जिसमें चाची जी और भैया रहते थे. चाची की उम्र काफी थी लेकिन ग़ज़ब की मेहनती थीं. अकेले दम पर पीछे की कोई दो कट्ठा ज़मीन में सब्ज़ी उगातीं. चाचा जी से उनकी बोलचाल नहीं थीं. लोग बताते थे कि श्रीधर भैया की एक बहन ने अपनी मर्ज़ी से शादी कर ली थी जिसका सारा गुस्सा चाचा जी ने चाची पर निकाला था. उनकी भाषा में बंगाली और भोजपुरी का ग़ज़ब मिश्रण था. कलकत्ते में रहने के कारण एक तरह का श्रेष्ठता बोध था उनमें. हमसे कहतीं, कलकत्ता में न एक ठो बहुते बड़ा चिरैयाखाना है. बजार तो इतना बड़ा है कि दू ठो देवरिया आ जाए उसमें. उहाँ की आलमारी में सात आठ सौ साड़ी पड़ा है हमारा. ला ही नहीं पाए.” श्रीधर भैया उनकी इकलौती संतान थे. उस दिन जेल भरो आन्दोलन में वह भी साथ गए थे लेकिन इन्स्पेक्टर साहब के समझाने पर समझ कर लौट गए थे. पापा को ख़बर मिली तो सीधे जेल आये. मुझे बुलावा आया मिलने का तो रूह सूख गयी. किसी तरह पहुँचा. पहला सवाल आया, जब सब लड़के वापस लौट गए तो तुम क्यों नहीं लौट आये? मैंने कहा, “ मैं नेतृत्व कर रहा था उस दिन, मैं कैसे पीछे हटता?” याद नहीं उन्होंने और क्या-क्या पूछा था और मैंने क्या बताया था, लेकिन जो भी था वह उतना बुरा नहीं था जितनी मैंने कल्पनाएँ की थीं.


रात हुई तो नेताजी लोगों की बाक़ी व्यवस्थाएं भी हो गयीं. सिगरेट तो सुबह से चल रही थी, अब दारू भी आ गयी थी. दो पैग अन्दर गए तो उनके भीतर के असली अमानुष बाहर आने लगे. उस उम्र में तो मैं सिगरेट के धुंए से भी दूर रहता था शराब पीते तो शायद जीवन में पहली बार किसी को साक्षात देखा था. उसके बाद के अश्लील गाने और बातें! उफ़ रूह काँप गयी थी. यही लोग थे जो मंच पर भाषण देते थे. जो ग़रीबों और युवाओं के नाम पर इतनी बड़ी बातें करते थे. बात बात में लोहिया-जयप्रकाश को कोट करते थे. वे मुझे अपने जैसा मान के चल रहे थे. जब सिगरेट बढ़ाई गयी हमारी ओर तो उसे “ख़तना” ही कहा गया. लेकिन मैं मन ही मन तय कर रहा था. मुझे इनमें से एक नहीं होना है.


अगली सुबह पापा जमानत के लिए दौड़ भाग करते रहे. उनके एक दोस्त थे वकील तो जमानत का इंतजाम उन्हीं के भरोसे था. लेकिन सब करते कराते शाम हो गयी और अब जमानत अगले ही दिन मिल सकती थी. एक और रात मुझे जेल में काटनी थी. शाम को जब महफ़िल जमने वाली थी तभी जेलर साहब आ गए. हमें देख के बोले “अभी से शुरू कर दिए पंडिज्जी?” हमने कहा “नहीं सर. मैं शराब नहीं पीता.” तो बोले चलो असली जेल दिखा के लाते हैं आपको. मैं उनके पीछे पीछे लग गया. मेरे साथ जो एक और लड़का गिरफ्तारी देके आया था एस एस बी एल का वह पहले ही दिन ख़ुशी ख़ुशी खतना और बप्तिस्मा दोनों करा चुका था. बाद में वह छात्रनेता ही बना. अंतिम मुलाक़ात उससे मेरी कोई दस साल पहले हुई थी जब मैं अपने एक रिश्तेदार से मिलने पहली और आखिरी बाद लखनऊ के विधानसभा मार्ग पर स्थित भाजपा के दफ्तर गया था. खैर, जेलर साहब मुझे लेकर जेल के तमाम हिस्से घुमाते रहे. हत्या के आरोप में गिरफ्तार एक खूंखार अपराधी को मैंने देखा जो सारी सारी रात भजन करता था और रोता था. एक डकैत को देखा जिसकी अगले हफ्ते रिहाई होनी थी और वह परेशान था कि दो महीने से कोई उसके घर से मिलने भी नहीं आया था. एक वार्ड में ढेर सारे लोग थे. कोई जेबकतरा था, कोई छोटी मोटी चोरी करके आया था, कोई छिनैती में, कोई मार पीट में. ये लोग ऐसे खेल कूद रहे थे जैसे अपने गाँव में हों. उन्हीं में एक लड़का था जो बिना टिकट यात्रा में पकड़ा गया था और तीन महीने बीतने के बावजूद जमानत नहीं हुई थी. मैंने कुर्ता जींस पहना हुआ था और जेलर के साथ बोलते बतियाते देख के उसने मुझे कोई नेता समझा. वह पैर पकड़ कर रोने लगा, “हमके छोड़ा देईं ए नेताजी. एक्को पइसा नाही रहे ओ दिन. रिस्तेदारी में मर गइल रहे केऊ. माई मरी जाई हमरे बिना. हमके छोड़ा लेईं. राउर गोड लाग तानी. राउर गुलामी करब...” मेरी कुछ समझ में नहीं आया. मैंने लाचारगी की निगाह से जेलर साहब को देखा. उन्होंने मेरा पैर छुड़ाया और बोले, “चलिए.”


अगले दिन मेरी जमानत हो गयी. पापा स्कूटर से लिवाने आये थे. रास्ते भर कुछ नहीं बोले. घर पहुँचा तो माँ से बोले, “लीजिये आ गए आपके सपूत. अब खीर पूड़ी खिलाइए और स्वागत कीजिए.” मम्मी का रो रो के बुरा हाल था. नाना, मौसी और जाने कौन कौन घर पर जमा था. सब मुझे कुछ न कुछ उपदेश दे देना चाहते थे. मैं चुपचाप भीतर गया और खुद को कमरे में बंद कर लिया. कोई घंटे भर बाद पापा आये. सामने कुर्सी पर वह थे और बेड पर मैं. थोड़ी देर यों ही बैठे रहे. फिर कहा, “यही सब करना चाहते हो जीवन में? इतना तेज़ दिमाग है. इतना दुनिया भर का पढ़ते लिखते रहते हो यह नहीं समझ पाते कि कच्ची मिट्टी दीवार में नहीं लगती. नेतागिरी करनी है तो इन लफंगों जैसा नेता बनके क्या मिलेगा? नेहरु हों, इंदिरा हों, लोहिया हों..ये सब बहुत पढ़े लिखे लोग थे. पढ़ लिख लो. डिग्री ले लो. चीजों को खुद समझो. फिर जो करना है करो.” जीवन में पहली बार पापा इतनी शान्ति से समझा रहे थे. शायद उन्हें मेरे बड़े होने का अहसास हो रहा था. मैंने एक शब्द कहा बस “जी.” वह उठ खड़े हुए और कहा, कल पूजा है. तैयारी कर लो. बोर्ड है इस साल. लौट के बात करते हैं.


पूजा यानी सरयू नदी के किनारे बसे हमारे गाँव सुग्गी चौरी की सालाना पूजा. दुर्गा हमारी कुलदेवी मानी जाती हैं. हालांकि मुझे लगता है कि ये जो दुर्गा रही होंगी वह दुर्गा के प्रचलित मिथक से अलग कोई स्थानीय देवी रही होंगी जिन्हें कालान्तर में दुर्गा बना दिया गया. दशहरे के आस पास यह पूजा होती थी जिसमें दो बेदाग़ बकरों की बलि दी जाती थी. बेदाग़ यानी काला तो सफ़ेद की एक चित्ती नहीं चलेगी और सफ़ेद तो कोई काला धब्बा नहीं होना चाहिए. बाबा और छोटे चाचा ऐसे दो बकरों का इंतजाम करके रखते. बड़े चाचा लखनऊ में थे, मंझले चाचा एयर फ़ोर्स में हैं तो उनकी जगह बदलती रहती, एक और चाचा हैं जो अब तो गाँव पर बस गए हैं लेकिन जाने कहाँ कहाँ रहे और कौन कौन सा गुल खिलाया. पूजा में सारा परिवार जुटता. बलि देने वाले का चयन जन्म से पहले ही हो जाता. उसे सेवईक कहा जाता था. मेरी पीढ़ी में मुझे सेवईक चुना गया था. बड़े चाचा और वह मस्त मौला चाचा भी सेवईक थे लेकिन अपनी एक बीमारी की वजह से बड़े चाचा ने छोड़ दिया था और मझले चाचा की पत्नी ने शादी के तुरत बाद उन्हें क़सम दिला दी थी तो वह भी किनारा कस चुके थे. तो अब जिम्मेदारी हम पर थी. घर के आँगन में सब लोग इकट्ठा होते. औरतें एक तरफ आड़ में और पुरुष सिर्फ धोती में आँगन के निचले हिस्से में. (चारों तरफ आँगन ऊंचा था और बीच में एक चौकोर तालाब जैसी सरंचना बना दी गयी थी जो मुख्य आँगन था) पहले हवन और मंत्रोच्चार होता. शुद्ध देशी घी में सने हविष्य के साथ “या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः” का स्वर लगातार ऊँचा होता जाता. फिर दो तीन लोग एक एक कर बकरे को पकड़ के लाते. जै हो दुर्गा मईया का नारा लगता. लकड़ी के एक बलि खंड पर उसे रखा जाता और सेवइक को गंडासे के एक वार से उसका सर धड़ से अलग करना होता. धड़ हटा दिया जाता और प्रसाद के रूप में रखे रोट (घी में सिंकी रोटी), चने और बताशे की थाली के बगल में सिर रख दिया जाता. दूसरे बकरे के साथ भी यही क्रिया दुहराई जाती. फिर सेवइक खून से सने कपड़ों में घुटने के बल बैठकर देवी का आह्वान करता और देवी उसके “सिर” पर आतीं. परकाया प्रवेश जैसा. फिर सारे घर के लोग पैरों में गिरते. अपनी अपनी समस्या पूछते. थोड़ी देर तक साथ रहने के बाद वह चली जातीं. देवी संस्कृत या हिंदी में नहीं शुद्ध भोजपुरी में बतिआतीं थीं. देवी के जाने के बाद सेवइक निढाल होकर गिर जाता. उसकी सेवा की जाती, नहलाया जाता, चाय पिलाई जाती तब जाके वह सामान्य हो पाता था.  फिर बकरों का मीट पकता. गाँव के लोगों में यह प्रसाद बाँट दिया जाता. घरवाले और पट्टीदार एक साथ खाते. सिर अलग से पकता. उस पर सिर्फ घरवालों और सेवइक का हक होता.


सबकुछ इतना हिंसक और रौद्र होता कि अब सोचता हूँ तो सिहरन होती है. इस भयावहता का अनुमान एक किस्से से लगाया जा सकता है. जिन अलमस्त चाचा का ज़िक्र किया मैंने उनकी शादी के बाद एक पूजा हुई. चाची जिस घर से आईं थीं वहां लहसन प्याज तक वर्जित था. विदाई के तीसरे दिन यह पूजा हुई. उन्हें भनक मिल गयी थी तो चाचा को तो खैर कसम दिला दी गयी थी और पूजा पर बैठे हम. रंग रूप तो जो हमारा है खैर वह है ही, उस दिन खून से सनी सफ़ेद धोती में मंत्रोच्चार करते, देवी के रूप में घर के लोगों को डांटते-हड़काते और झूमते जो उन्होंने मुझे देखा तो ऐसी खौफज़दा हुईं कि वर्षों ठीक से बात तक नहीं कर पाई. अब भी एक डर और झिझक उनकी आवाज़ में रहती ही है मेरे सामने.


जब कम्युनिस्टों से पहला पाला पड़ा और बात ईश्वर के अस्तित्व तक पहुँची तो मेरे पास सबसे मज़बूत तर्क इसी अनुभव का था. वह क़िस्सा आगे आएगा. अभी तो पूजा के बाद देवरिया लौटना था और बारहवीं की बोर्ड की परीक्षाओं का सामना करना था.  


हाँ, देवरिया लौटकर मैंने उस लड़के की जमानत करा दी थी.
  

                                                                     ....................जारी है .....
                                      

परिचय और संपर्क

अशोक आज़मी .... (अशोक कुमार पाण्डेय)

वाम जन-आन्दोलनों से गहरा जुड़ाव
युवा कवि, आलोचक, ब्लॉगर और प्रकाशक
आजकल दिल्ली में रहनवारी      




8 टिप्‍पणियां:

  1. आप लिखते जाइए , हम पढ़ रहे हैं और अपने बचपन से तुलना करते जा रहे हैं ।

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    1. आप जैसे पाठक मिलें तो बन्दा काहें न लिखते जाए :) शुक्रिया

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  2. कमाल है, यह अद्भुत आत्मकथ्य सामाजिक स्मृति का भी संवेदनशील दस्तावेज है, नियमित पढ़ता रहा हूँ, यह किश्त अनोखी है....
    पता नहीं कि हक है या नहीं लेकिन मन से एक शब्द निकल तो रहा है---शाबाश
    और एक आग्रह/ निवेदन/ आदेश जो मानना चाहो....इस आत्मकथा या संस्मऱण जो भी कहना चाहो...इसे लिखना पूरा आज तक को समेटते हुए...
    बधाई अशोक.....

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    1. बहुत शुक्रिया सर। आपको शाबास या बकवास कहने का हक नहीं होगा तो किसको होगा?

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  3. अपर्णा अनेकवर्ना12:26 am, सितंबर 22, 2014

    mantr mugdh padh gayi.. har kadi padh rahi hoon.. bahut pehle Nirad C Chowdhary ki 'Autobiography of an Unknown Indian' mein ek aisa hi varnan tha.. devi ke saamne mahish ki bali.. kachcha angan khoon se sana.. aapne ek baar pehle bhi zikr kiya hai is ghatna ka.. kuchh baten amit chhap chhod jaati hain.. ek saath padhne ki ichchha hai.. shubhkamnayen.. ye Mandal commission ke virodh mein jail gaye the.?? hum logon ne University park se Kachahri Chauraha tak juloos nikala tha.. sirf chhatrayen.. oh!! ise kitab ka roop avashy dijiyega.

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  4. लवली गोस्वामी12:32 am, सितंबर 22, 2014

    रिवेश को भरपूर स्थान देना , वातावरण को चित्रित करना अच्छा लगा।

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  5. अपना बचपन ,आपका बचपन थोडा सा मिलाता जुलता , परिवेश एक सा अगली का इंतजार

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