रविवार, 4 मई 2014

अस्मुरारी नंदन मिश्र की कवितायें




युवा कवि अस्मुरारी नंदन मिश्र को आप पहले भी सिताब-दियारा ब्लॉग पर पढ़ चुके हैं | उनकी कविताओं में आया अपेक्षित विकास हमें आश्वस्त करता है कि युवा कविता का परिदृश्य काफी संभावनाशील और उर्वर है | आईये पढ़ते हैं ........       
                        

        आज सिताब दियारा ब्लॉग पर अस्मुरारी नंदन मिश्र की कवितायें
                                           

1.
वे जब भी हमें देशद्रोही कहते हैं



बारंबार
सरे राह , सरे बाजार
वे हमें देशद्रोही कहते हैं
और आक्रमण की मुद्रा में रहते हैं
उनकी भाषा में फाँसी है
हाथ में तलवारें हैं
सबसे जरुरी उनके पास
काले शीशे से मढ़ी कारें हैं
जिनके अंदर उनके इतिहासकार हैं
अपने-अपने इतिहास हैं
अपनी कहानियाँ हैं
अपने रास-विलास है
उनके पास मांत्रिक हैं
तांत्रिक हैं
भविष्यवक्ता हैं
सब उबके प्रवक्ता हैं...  
उनके पास कवि हैं
कवियों के पास कविता से अधिक नारे हैं
नारों के लिए दीवारें हैं

वे जब भी हमें देशद्रोही कहते हैं
उनके कोरस में सियारों के स्वर रहते हैं

वे जब भी हमें
देशद्रोही
कहते हैं
उनकी भाषा में द्रोह का न जाने क्या अर्थ होता है
(देश तो अक्सरहाँ व्यर्थ होता है)
जब भी हमने कहा-
‘’हम सिर्फ इस देश के लिए ही नहीं हैं’’
‘’सिर्फ इस धर्म-जाति-सम्प्रदाय के लिए ही नहीं हैं’’
‘’सिर्फ इस भाषा-वर्ग-समुदाय के लिए ही नहीं हैं’’  
-- उन्होंने हमें देशद्रोही साबित किया
बड़ी कुटिल चतुराई से हमारे ‘सिर्फ’ को
घोर शंख ध्वनि से दबा दिया
और ‘’नहीं हैं’’ को कई पाठों में प्रस्तुत कर  
हमारा मंतव्य बता दिया...
भरी सभा में पुकारा
ये देश के लिए नहीं है...’  
उनके प्रमाण में थी हमारी ही आवाज
हमारे ही खिलाफ
एक पाठ में गूँजी-
नहीं हैं
पीछे से सियारों की टोली थी—‘नहीं हैं
‘’ये धर्म-सम्प्रदाय-समुदाय के लिये नहीं हैं’’
एक और पाठ में फिर हमारा असहाय
नहीं हैं
सियारों का कोरस –‘नहीं हैं
हम अपने सिर्फ की तलाश में
भटके जंगलों मेंखोए अज्ञातवास में
यही उनकी जीत थी...
जो प्रचारित हुई कि
यह हमारी हार थी
क्या करें अदालत भी लाचार थी...
हमारी अनुपस्थिति को कुबूलनामा मान लिया गया...   

हमारे कहे में अपना अर्थ गहते हैं
वे जब भी हमें देशद्रोही कहते हैं

सवेरे उठे से रात के सोये तक
वे देशभक्ति का छद्म गढ़ते हैं
और परकोटे पर चढ़कर
किसी पर भी देशद्रोह मढ़ते हैं
लेकिन जब भी वे हमें देशद्रोही कहते हैं
हम पाते हैं कि हमारी संख्या कुछ बढ़ी है 
यानी उनकी देशभक्ति के खाँचें में
कुछ और भावनाएँ भी आने से रही हैं
हमने देखा कि कितना छोटा है उनका देश
और यह तो लगातार छोटा ही होता जा रहा
जब हम उनके देश-से दिखे
उन्होंने नकारा- ‘नहीं इसकी राष्ट्रीयता दूसरी है
राष्ट्रवालों को विलगाया धर्म के नाम पर
धर्म वाले अछूत थे जाति से
जात की भाषा भी एक
नहीं हो पा रही थी
हर बार देश की
सीमा कुछ और
छोटी हुई
जा रही
थी
...
हमने देखा
वे जब जब हमें देशद्रोही जता रहे होते हैं
एक सांकेतिक भाषा में अपने साये को
मुकम्मल देश बता रहे होते हैं ...


2.
राजमहलों में
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राजमहलों में  भाईचारा नहीं होता
पुत्र-प्रेम भी  समय के साथ
सावधानी में जवान होता है
(प्रजावत्सलता को देखा जाना चाहिए इस आलोक में)  
पिता का आदर या उससे लगाव
बाल-क्रीड़ा है बस
राजसिंहासन के पायों के नीचे
दफ्न हो रहता है अपनत्व
माता का वात्सल्य भी सूली चढ़ता रहा
राजघरानों में
किसी राजमहिषी की आत्मकथा मिलती हो
तो पूछो उससे
राजमहिषी बाँदियों से घिरी रखैल है
अच्छा था उसे ‘राज रखैल’ कहा जाता
लेकिन राजमहलों की भाषा सरल नहीं होती...

तुम नहीं कहता वहाँ कोई किसी को
उपाधियाँ भारी है पुकारु नामों पर
संज्ञाएँ विशेषणों से आक्रांत हैं

राजमहल की दीवारें मजबूत होती हैं
उतने ही मजबूत और भारी होते हैं दरवाजे
(किसी एक के लिए तोड़ना क्या खोलना तक असम्भव है)
खिड़कियाँ हवा बदलने का रास्ता नहीं
बाहर नजर रखने का सुराग होती हैं
आँगन में होते हैं पहरे
गहरे...

राजमहलों में हिजड़े होते हैं
हिजड़ों के हाथ में हथियार
ढेरों धातु,  ढेरों पत्थर को
मूल्यवान कह सकोतो होते हैं वे
वर्ना मूल्य नहीं होते राजमहलों में

क्या राजमहलों में आदमी होते हैं???

अच्छा हो कि राजमहलों से बचो
बचो राजकुमार कहलाने से
राजा होने से बचो
यदि तुम्हें मिलना हो आदमियों से
सुननी हो सीधी-सरल बातें
करना हो प्रेम
तो निकलो राजमहलों से...

और राजमहलों के बाहरवासियो!!
चाहे तुम झोपड़ियों में हो या जंगलों में
सड़कों या फूटपाथों पर
दायित्व है हमारा-तुम्हारा
कि मनुष्य बनाएँ उन्हें भी , जो बनना न चाहें
लाएँ सबको एक आसमान तले
मनुष्य होने का न्याय हो सबके ऊपर
हम निकालें राजमहलों से
उसके रहवासियों को...


3.
पेड़ के बहाने
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वे बोल नहीं सकते
लेकिन हाहाकार करते हैं
विवशता तो ये
कि वे खुद से हरकत तक नहीं कर पाते
लेकिन कुल्हाड़ी की हर चोट पर
दहल दहल उठते हैं
उनके शरीर पर रेखाएँ ही रेखाएँ हैं
लेकिन उनका कोई अपना भविष्य नहीं
(जबकि वे सुनिश्चित करते हैं औरों का भविष्य)
जन्म से ही उन्होंने अकेले अकेले जीना स्वीकार नहीं किया
जबकि अकेलेपन के कितने कारण थे उनके पास
न भाषा
न गति
न सलाह
न सम्मति
जब बच्चे थे
बकरियाँ आईं पत्तों के लिए
थोड़े बड़े हुए
देह खुजाने आये मवेशी
पक्षियों ने तबसे अपने नीड़ इनके कंधों पर रख दिये थे
और आज भी गाते हैं प्रणय गीत इसके ही कानों में
छोड़ देते हैं अंडों-बच्चों को निश्चिंत
इसके ही भरोसे..  

हवा-पानी-मिट्टी के साथ के बदले
वे सौंपते रहे उन्हें
स्वच्छता
उड़ान
और संबल
वे संबल रहे
मिट्टी के
आश्रय रहे चिड़ियों के
पथिकों के विश्राम में वे अपने को तपाते रहे
हर मौसम
खुद को सजाते रहे
फूलों -फलों से औरों की खातिर
और आज उनकी ही हड्डी से बेंट बना
चोखे कुल्हाड़े के साथ जमा हैं कुछ लोग...
वे कुछ नहीं बोलेंगे
लेकिन उनका दर्द चित्कार करेगा
उनकी डाल के रहवासियों के कंठों से
हाय!! हाय!!
कितनी दारुण है यह असहायता
खुद को आश्रयहीन रूप में देखना
ये पक्षी दूर से ही शोक मना रहे हैं
अपने घोंसले
अपने अण्डे
पंखहीन बच्चों को कहाँ ले जाएँ
और क्या करें इस आश्रयदाता की रक्षा के लिए
घोंसले गिर रहे हैं
टूट रहे हैं अंडे
बेबस चुनमुन आँख खुलने के पहले ही
मूँद रहे हैं आँखें सदा के लिए

थथमा खड़ा है साथ का पेड़
अपनी बारी का इंतजार
एक-एक खत्म होंगे यूँही
जल्लादी हाथों के प्रहार से...
सहमा खड़ा चुप है पेड़
जानता है भली भाँति
कुछ लाभ नहीं होगा चिल्लाकर भी
अभी-अभी तो दिन दहाड़े ही
मारा गया एक आदमी यहीं
घायल चीखों से जबकि पक्षी तक उचट गये थे
नहीं उचटी थी किसी की दोपहर की नींद
नहीं खुली एक भी खिड़की
जब खींच ली गयी चलती कार में
वह लड़की कितनी जोरों से रात के सूनेपन को दहला रही थी
और नीम बेहोशी में था पूरा शहर
वह बच्चा जो रोज ही उसकी डालों पर खेलने आता था
आती-पाती
उसकी चीखें कहाँ किसी कान तक पहुँची
सब तो चर्चा कर रहे थे देश दुनिया की हालत पर
जीवंत...



कट रहे पेड़ मौन
और
धरती खोती जा रही सम्बल
पानी ठहरा पड़ा है समंदर में
हवा हुई जा रही विषाक्त
धीरे-धीरे खत्म हुई जा रही
थोड़ी-थोड़ी दुनिया...


4.
विस्मृति के कुहासे से
        

झरते हुए पत्तों ने
निराश होकर शिकायत करना चाहा
मौसम के मुसाफिर से
मुसाफिर बदल चुका था
पत्तों ने अपने टूटने में चित्कार किया
हवाएँ उस टूटन को ढोती रहीं
हमदर्द सी
पर हवाएँ भी एक घेरे में बंद थीं
इत-उत आ-जा कर थक गयीं
नये मुसाफिर के अपने रंग थे
अपने उत्सव
उसे पुराने पत्तों से कोई वास्ता नहीं था
हवा भी अब शामिल हो रही थी
नये के रंग में
कई उत्सव इसी तरह कई की शोक सभा भी होती है
शोक की मौनता यदि बोलती तो
सुनाई पड़ता चित्कार भी
आने-जाने वाले मुसाफिर को क्या पड़ा है
वह खत्म नहीं होता न
हर बार निश्चित समय पर आयेगा
चला जायेगा
टूटने-मिटने वाले मिटते ही रहते हैं...
करुण-सुधियों का समय मारा जा चुका...

5.   
मौसम का पहला आम


यह आमों के पकने का समय नहीं था
चू पड़ने का तो कतई नहीं
अभी तो टिकोलों ने अपना बचपना ही छोड़ा था
गुठलियाँ मजबूत कर रही थी अपनी माँसपेशियाँ
कि सुबह-सुबह मेरे सामने ही गिरा
मौसम का पहला आम
थोड़ा पियराया हुआ
तो थोड़ा खाया हुआ भी
शायद किसी गिलहरी ने कुतरा हो
शायद किसी और जंतु या पक्षी ने
बचपन में हम ऐसी हर हरकत के लिए
एकमात्र सुग्गे को जिम्मेदार ठहराते
और लपक पड़ते उस ओर
‘’सुगवा के जुठवा
बड़ा ही मिठवा..’’
तो शायद वही हो...

मेरे सामने मौसम का पहला आम है
और मेरे सामने है
रस और परिपक्वता को पहले-पहल पहचान लेने वाले
किसी अज्ञात की सुदृष्टि...
मैं उठाता हूँ उस दान को
मुँह से लगाकर
उस ‘बड़मिठास’ को उतारता हूँ अपने भीतर
और कृतज्ञता के साथ याचना करता हूँ
उसी खोजी नजर की...



परिचय और संपर्क    

अस्मुरारी नंदन मिश्र

जन्म तिथि – 26 अगस्त 1983
जन्मस्थान – नवादा, बिहार
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा-दीक्षा           
सम्प्रति – केंद्रीय विद्यालय पारादीप, उड़ीसा में शिक्षण कार्य


4 टिप्‍पणियां:

  1. अस्मुरारी जी की कविताओं में इन दिनों काफ़ी विविधता आयी है यह बहुत अच्छी बात है |एक ओर तो राजनीतिक समझ परिपक्व हुई है |प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम देखते ही बनता है |बहुत- बहुत बधाई मित्र !

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  2. यही फेसबुक पर ही कितने लोगों की कविताओं को मेच्योर होते देख रहा हूँ, सुखद है. अच्छी कविताएँ हैं, खासकर मौसम का पहला आम अनूठी और एकदम अलग अंदाज़ की कविता लगी. लिखने वाले को बधाई और छापने वाले का आभार

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  3. "मौसम का पहला आम" बहुत कृतज्ञता से प्रकृति के प्रति अपना आभार देती हुई कविता है. छोटी सी यह कविता अपने भीतर इंसानी जीवन के सबसे बड़े सवाल को समेटे हुए है, इन्सान और प्रकृति के बीच इंसान तो ज़्यादातर चीज़ें बिना सोचे कर रहा है, क्या प्रकृति ने अपने और इंसान के बीच यही सम्बन्ध सोचा होगा ? नहीं, कतई नहीं, उसने कुछ अधिक सुरक्षित, कुछ अधिक आत्मीय सोचा होगा ताकि इंसान प्रकृति के सहजीवन में सुखी और आनंदित हो सके. लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि मानव प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भूल गया है. यह कविता हमें थोड़ी तरल बनती है और अपने किये को सुधार लेने के लिए थोड़ा और समय देती है. अस्मुरारी नंदन को बहुत बधाइयाँ इतनी सुन्दर कविता देने के लिए.....रामजी भाई का आभार इतनी सक्रियता और सदाशयता के लिए

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