रविवार, 9 मार्च 2014

संघर्षरत सहयात्री की कहानी --- पहला भाग -- 'फकीर जय'





ये कहानी हमारे अनुरोध पर मिली है हमें जय प्रकाश फ़क़ीर जी से. कहानी उस जज्बे को बयाँ करती है जिसे अगर कोई भी वंचित ठान ले तो मजिल दूर नहीं जा सकती. इस घनघोर अँधेरे वातावरण में जहाँ आज के दौर में भी जीना मुश्किल है वहाँ इन्ही नौजवानों के होंसलो से हम आज अपने समाज को इस मुकाम तक ले जाने में कामयाब हो पाएं है.....पढ़िए और सुनाइये उन सबको जो इसी जज्बे को अपना मकसद बना ले......
                                                .............. वी आल आर स्टार्स

                      
                        आखिर ए शब का हमसफर


मैं खुद को नायक नहीं मानता .मुझे नृत्य कि वह सामंती या आधुनिक शैली कभी पसंद नहीं पड़ी जिसमे एक नायक /नायिका के पीछे लगभग अदृश्य एक्स्ट्रागण डांस करते हैं .मुझे तो सरहुल जैसे आदिवासी नृत्य पसंद हैं जहाँ सभी एक दूसरे के कमर हाथ डाल नाचते हैं .मै आप सब के साथ संघर्षरत ऐसा ही एक मामूली सहयात्री हूँ .

एक हाशिये का समाज होता है .और एक समाज ऐसा भी होता है जो हाशिये से भी बाहर स्थित होता है .बाबा अम्बेडकर ने इसे ही बहिष्कृत समाज कहा है .मै कबीर की तरह ऐसे ही एक व्रात्य समाज से था .कश्मीर से हमारे पूर्वज खदेड़े गए थे और निरन्तर खदेड़े जाते हुए अंततः बुद्ध के बिहार में उन्हें शरण मिली .गाँव के आधे लोगो का पेशा चोरी था .वही चोरी जिससे हिंदी की घृणास्पद गाली ‘’चोरी चमारी ‘’बनी है .आधे लोग शिल्पी थे .दौरी, चिक (रेणु कि कहानी ठेसके सिरचन मगर वैसे दब्बू नहीं ) , झाड़ू, छइंटा, सूप आदि बनाते .मडई छाते. घर बनाने का काम करते .पशुओ का इलाज करते .राजस्थान के गड़हिया लोहारो वाले काम भी करते .अपने तरह के आर्किटेक्ट , इंजीनयर या डॉक्टर .मगर भारत में जहाँ मिथक गढने वालो का सम्मान था ,तकनीकी काम करने को लांछित कर समाज से बाहर रखने का रिवाज था .इसलिए हमारा समाज बाकी आबादी से कटा छंटा था .


गाँव में हमारे समुदाय के अलावा गोंड जनजाति का एक परिवार था जो भडभूंजे का काम करता .उनकी एक घोंसार थी जिसमे चने ,चावल, मकई को भूंजा जाता .परिवार के मुखिया का नाम रामायण था जिनसे मेरा बहुत स्नेह था .

गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय था जिसमे पांचवी तक की पढाई होती.आस पास के गाँव के भी लडके पढने आते .विनोबा भावे एक बार हमारे गाँव आये थे .उन्होंने पास के जमींदार महंगू राय या किसी बडे खेतिहर से जमीन न लेकर हमारे समुदाय के लोगो की जमीन छल से दान करवा ली (श्रीलाल शुक्ल ने विश्रामपुर का संत में उनके इस छल की ओर इशारा किया है ) .इसके बाद हमलोग लगभग भूमिहीन हो गये .उक्त जमीन शिल्पी समुदाय के लिए गोदाम का काम करती थी .अब हम इसके लिए हाट बाज़ार वालो पर मौकूफ हो गए .खैर हमारे दादा बड़े लड़ाकू थे .उन्होंने जमीन पर लड़ भिड के एक प्राथमिक विद्यालय बनवाया .इस लड़ाई की कीमत उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी .जब वे घोड़े से जा रहे थे ,दूर गाँव के जमींदार जनेसर मिसिर के आदमियों ने उनकी हत्या कर दी .इस विद्यालय में हमें बोरा लेकर जाना पड़ता .मैंने अपने लिए चिक की एक सुंदर चटाई बना ली .लेकिन दूसरे गाँव से जो दबंग समुदाय के बच्चे पढने आते वे मेरी चटाई छीन लेते .मुझे जमीन पर बैठ कर पढना पड़ता .मगर तीसरी कक्षा में गया तब स्वभाव गुस्सैल हो गया था .शायद माँ का इन्तेकाल इसकी वजह रहा हो .भोला नाम के एक लड़के ने मेरी चटाई छीन ली तो मैंने उसे ब्लेड मार दिया .खून भल-भल बहने लगा .तब से लडके मुझसे डरते थे .बस मास्टर ने मुझे बहुत पीटा .हमे स्कूल से लौटकर बहुत काम करना पड़ता .देह सुकुमार न रह गई थी .इसलिए पिटाई से फर्क न पड़ता था .दबंग समुदाय के लडके जिस तरह तंग करते उसके मुकाबले यह पिटाई कुछ न थी .


इसके बाद भी जब छठी कक्षा में था ,एक गांधीवादी मास्टर ने पिटते पिटते पीठ लाल कर दी .रुई कि तरह धुन दिया .मेरा कसूर यह था कि मैंने गांधीजी की जयबोलने से इंकार कर दिया था .दरअसल हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक में गांधीजी पर एक अध्याय था ,जो मुझे बहुत बनावटी लगता .मेरे जीवन से यह मेल नहीं खाता था .मुझे बड़ा अपमानजनक लगता कि जिस बात से हमारे जीवन का वास्ता नहीं है ,वह हमारे दिमाग में जबरदस्ती ठूंसा जाता .हमारा जीवन श्रमजीवी शिल्पियों का था .मा के मर जाने के कारण मै ताई, जिसे मै आई कहता, के साथ रहता . हमारे गाँव से थोडा दूर मेला लगता था -छोटा मोटा हाट. वहां हम झाड़ू ,चिक ,दौरी, जाये नमाज आदि बना के बेचते .दीवाली में हम खुश होते .इस वक्त हम सबसे ज्यादा जिन्सें बेच पाते . आई ने मुझे दौरी बीनना सिखा दिया था .देखते देखते मै हुनर में माहिर हो गया .इसमें बड़ा मन भी लगता .मेला में जब मेरी बनाई चीज़े सबसे ज्यादा दाम में बिकती तो बहुत खुश होता .आई भी . बिक्री के पैसे से मुझे आधा दे देती .उससे मै रंग खरीदता .मुझे फ्रीडा (पेंटर फ्रीडा काहलो जिसे मै फरीदा कह लोकहता ) की तरह चटख रंगों से बड़ा लगाव था .दौरी का गोल आधार मै हमेशा हरे रंग का बनाता .मेरा अकीदा था कि हरे रंग पे दुनिया सहित तमाम चीज़े टिकी हैं .फिर लाल रंग की कशिश भी मै नहीं संभाल पाता था .मै भीतरी हिस्सा लाल रंगता . अपनी बनाई दौरी देख बहुत ख़ुशी होती. सृजन का सुख . दौरी की हर दरेर (lining) कविता की एक एक पंक्ति थी .उसे निहार निहार खुश होता .दौरी बिक जाती तो सुख और दुःख एक साथ होता .दौरी की जुदाई मायूस करती .बिक जाने पर आई के चेहरे की चमक सुखी .


दीवाली का दिन हमारे लिए आराम का होता .उस दिन कोई बाज़ार नहीं लगता .फिर उसके बाद छठ के लिए हम सब सूप बनाते .सूप में रंगों का प्रयोग कम होता .इसलिए इसमें इतना दिल नहीं जमता .सूप बेचने के लिए मै नहीं जाता क्यूँकि छठ को बड़ा पवित्रता से लिया जाता . मुझसे सूप के रखरखाव में भूल हो जाती और ग्राहक मार बैठते .देह से ज्यादा मन पर चोट लगती .छठ गीत में जिस सुग्गे का जिक्र था , लगता मै ही हूँ .आई दयालु थी .उन्हें पता चला तो मना कर दिया .छठ के दौरान मै आई के प्रोडक्शन टीम का हिस्सा रहता .मार्केटिंग आई के छोटे लड़के जोगी भाई करते .मेरी स्पीड अच्छी थी .सूप बनाने में मै अपना आईडिया लगाता .innovate करने की कोशिश करता .आई इससे बड़ा खुश होती .मलिकार की शहर से छठ मनाने आई बिटियान को नया डिजाईन लुभाता .मै लोकप्रिय हो गया था हल्का फुल्का इस वजह से .फैंसी मगर मजबूत सूप बनाने में खुद को झोक दिया था .माँ छुटपन में जाती रही .इस दुःख को सूप में पिरो देता .


याद आता है एक बार आई ने एक बकरी पाली थी .उसके लिए एक नादनुमा दौरा बीना .बकरी से बड़ा उल्फत था मुझे . बड़े मनोयोग से बीना. अच्छा बन पड़ा .बगल गाँव के देऊ दुबे की पतोहू ने देखा तो लुभा गयी .दुगने तिगने दाम में खरीदना चाहती थी .मगर मै देने को तैयार नहीं था .आई आईं .पैसे का तो उन्हें लालच नहीं था लेकिन दब्बू थीं .मलिकारिन को कैसे नाराज करे ? बिना पैसे के ही उठा के दे दिया .मै स्तब्ध रह गया . दिल में ठेस लगी .बकरी जिसे मैने सकीना नाम दिया था .उसके पास जाकर रोने लगा .आई मनाने आई .मन बड़ा दुखी था .जहर बुझा वाक्य निकला --तू आई हऊ , माई ना नु हऊ' ( तुम ताई हो माँ नहीं ना हो !).फिर कभी दौरी नहीं बीनी. 


जब हॉवर्ड से एम टेक कर रहा था तो अपने विभाग के हेड जो अश्वेत थे और इसलिए मुझे बहुत मानते थे , से इस घटना का जिक्र किया तो बोले --गुलाम अपने गुलाम साथी पे ही गुस्सा निकालता है .वह खुद पे गुस्सा निकालता है .जिस दिन खुद पे गुस्सा होना बंद कर देता है ,स्पार्टाकस की तरह गुलाम नहीं रहता .दौरी तो नहीं मगर बाद में वाशिंग मशीन के फजी सिस्टम के डिजाईन के मौके मिले ,मगर उसमे वह आनंद नहीं था .फिर ''धरती धन न अपना '' उपन्यास में काली की ताई के बारे में पढ़ा तो आई की बहुत याद आई .


खैर, मेरा पढाई में दिल लग गया था बाद में .सभी मास्टर बुरे नहीं थे .गणित के मास्टर मुस्लिम अंसारी जो जाति के धुनिया थे, स्वभाव से बड़े सीधे साधे थे और बहुत मेधावी भी .गणित पर असाधारण अधिकार था उनका .वे मुझे बहुत मानते क्यूंकि बिना अपवाद छमाही ,नौमाही ,वार्षिक सभी परीक्षाओ में गणित में सौ में सौ प्राप्तांक मिलते .कक्षा में दिया हुआ अभ्यास भी मै बहुत जल्द करके दिखा दिया करता .एक बार उन्होंने १ से १०० तक की सभी पूर्णांक संख्याओ को जोड़ने के लिए कहा .मैंने १ मिनट में ही जोड़ के दिखा दिया .वे बहुत खुश हुए .बोले तुम बहुत अच्छा करोगे जीवन में .मालूम है तुमने उसी युक्ति से जोड़ को इतना शीघ्र हल कर दिया जिससे प्रसिद्द गणितज्ञ गॉस ने इसी तरह तुम्हारी ही उम्र में जोड़ कर शिक्षक को चकित किया था .’’उनकी इस बात से मेरा मनोबल बहुत बढ़ गया .जब बाबूजी मुझे पढने के लिए शहर ले जाने लगे तो उनके घर विदा लेने गया.


उन्होंने जो सलाह दी उसने मेरी जिंदगी सँवार दी .उन्होंने मशविरा दिया कि मुझे आगे चलकर साइंस या तकनीकी कि पढाई करनी चाहिए .साहित्य या कला विषयों को पढने पर मुझे अपने पूर्वजो को गाली देने वाला पाठ पढना पड़ेगा .खुद के खिलाफ लिखा हुआ पढ़ते हुए इन्सान डरपोक,कमजोर और क्षुद्र हो जाता है .ऐसा इन्सान चिडचिडा ,प्रतिक्रियावादी,आत्महीन, आत्महन्ता और स्वजातिद्वेषी होता है .कला आदि विषयों को पढने पर जो भविष्य होगा उसकी जो तस्वीर उन्होंने दिखाई वह बहुत भयानक थी. मै देखता भी था कि मानविकी के शिक्षक मुझे कम अंक देते .इसलिए भी कि वे मुझसे आत्यंतिक घृणा करते .मगर इसलिए ज्यादा कि जिस उत्तर की वे अपेक्षा रखते ,वह एक दबंग पारिवारिक परिवेश में पल रहा बच्चा ही दे सकता था .

स्कूल के बाद श्रम कर पेट भरने वाले बच्चे कि मानसिकता ऐसा पाखंडी मिथकीय उत्तर लिख ही नहीं सकती थी .अतः मैंने पक्का निर्णय लिया कि विज्ञान ही लेंगे .विज्ञान विषय में रूचि नौवीं कक्षा में और बढ़ गई .युक्लिड की ज्यामिति से तो मुझे प्यार सा हो गया .बहुत तर्काधारित थी वह.भौतिकी से भी मुझे बेहद लगाव था .खासकर मै माइकेल फैराडे से बहुत प्रभावित था.फलस्वरूप मैंने किशोर वैज्ञानिक प्रतियोगिता में भारत में सर्वोच्च स्थान पाया.मैंने खेती सम्बंधित एक प्रतिदर्श बनाया था जिसमे खेत पट जाने पर बोरिंग मशीन (ट्यूबवेल ) के स्वमेव बंद हो जाने कि व्यवस्था थी.राज्य स्तर पर भी क्विज प्रतियोगिता जीती .

मुझे नकद पैसो के अलावा तीन किताबें मिली एक टेलीविजन के ऊपर थी जिसमे टेलीविजन बनाने ,मरम्मत करने आदि के बारे में था. यह इतनी दिलचस्प थी कि लगभग चाट गया और टेलीविजन रिपेयर में सक्षम हो गया . दूसरी कज्जाकथी ,लेव तोलोस्तोय का उपन्यास. इससे इतना मुतासिर हुआ कि उपन्यास कि नायिका गर्वीली सुंदरी मर्यांका आज भी मुझे हौंट करती है और मेरे लिए रुमान व नोसटलजिया की प्रतिमूर्ति है .तीसरी किताब नेहरु जी की आत्मकथा थी .यह मुझे बेहद ऊबाऊ लगी .खीझकर इसे मैंने गंगा नदी में फेंक दिया . 


...........आगे की कहानी जारी है इंतज़ार कीजिये.......

                                         

                                        
                         जयप्रकाश फकीर (फकीर जय )



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          वी आल आर स्टार्स’ के फेसबुक वाल से साभार 







10 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत मार्मिक कहानी. अपने संघर्ष और दुर्दिनों पर लिखने के लिए उन पलों को फिर से जीना होता है. लिखने की प्रक्रिया में मन हल्का हो जाता है .यह कहानी असली जद्दोजहद को सामने लाती है और लेखक के जुझारू व्यक्तित्व को दर्शाती है.

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  2. जिजीविषा की पराकाष्ठा. अब अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी......

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  3. फ़क़ीर की जीवनी एक प्रेरणा बन सकती है , उन्हीं जैसे परित्यक्त सामाज के बच्चों के लिए जिनकी हालत आज भी वैसी ही है जैसे फ़क़ीर की थी | मैं सिताब दियारा / राम जी भाई / शिरीष भाई का बहुत-बहुत आभारी हूँ कि उनके प्रयत्न से फ़क़ीर को जान पाया | अवशेष भाग की प्रतीक्षा रहेगी | मेरी इच्छा है कि सरकारी पाठ्यक्रमों में गाँधी / नेहरु के वर्णन से बेहतर होगा फ़क़ीर की जीवनी पढाई जाय ताकि हाशिये से भी बाहर के समाज के बच्चों को अपने में निहित जुझारूपन और जीवटता का भान हो और हम और भी कई फ़क़ीर को देख सकें |

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    1. टिप्पणी से पूरी तरह सहमत। निकट जीवन के आदर्श व्यक्तित्वों से परिचय नई पीढ़ी का परिचय कराया जाए। गुजरे जमाने के महानों, शिखर पुरुषों को हम दैवी महत्व देने लगते हैं और उन्हें हम अनुकरण योग्य नहीं पाते क्योंकि वे सामान्य जनों से अलभ्य-अछू ऊंचाई पर जा खड़े हो चुके होते हैं!

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  4. गुलाम अपने साथी पर ही गुस्सा निकालता है ....जिस दिन खुद पे गुस्सा होना बंद कर देता है उस दिन स्पार्टाकस की तरह गुलाम नहीं रहता ...शायद यही कहानी का सार है |अच्छी कहानी |पढ़कर अछा लगा और ये जानकार और भी कि ये जय प्रकाश फ़कीर और कोई नहीं वही शख्श और मित्र हैं जी फ़कीर जय के नाम से जाने जाते हैं और अक्सर पोस्ट पर कमेन्ट करते है सुखद आश्चर्य और खुशी हुई |बहुत बधाई इस अच्छी कहानी के लिए और हार्दिक शुभकामनाएं

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  5. ऐसे लोग समाज के लिए उदाहरण हैं| अगले भाग का इंतजार रहेगा |

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  6. बहुत सही ..बहुत खूब खांटी सच ।

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  7. जीवन का संघर्ष ।। आप के जीवन में किये गए संघर्ष को सलाम

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  8. जिंदगी , जिसपर हमें गर्व है

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