बुधवार, 13 नवंबर 2013

तिथि दानी की कवितायें

                                    तिथि दानी 





तिथि दानी की कविताओं को आप सिताब दियारा ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुके हैं ..| साधारण शब्दों में संवेदनाओं को बुनने वाली इस कवयित्री को एक बार फिर इस ब्लॉग पर देखते हुए अच्छा लग रहा है | उन्हें हमारी शुभकामनाएं ...|


एक ..

जिंदा होता आग्रह

जब हम होते हैं कभी
अपनों को भी
न बताई जा सकने वाली
मुश्किलों में
निरंतर हमारा मन
न जाने करता है
कैसा आग्रह
कि
शब्दों और वाक्यों में
हम सुन नहीं पाते
और महसूस करते जाते हैं
कि तभी बज उठती है
मोबाइल की घंटी
और उस आग्रह को
मिल जाता है
एक पूरा शरीर।


दो ....                                                                        
                         
सलाइयां                              

कभी-कभी अचानक कुछ उड़नतश्तरी ख़याल
कैसे उतर आते हैं हम में
समझना मुश्किल लगता है।
आंखें,दिमाग,मन,हृदय
इतने नाम बिना मेहनत के बना देते हैं सलाइयां
लेकिन एक अनाम, अपरिभाषित सा भी
कोई तत्व होता है इनमें
जिसने घेरा होता है इन सलाइयों का सबसे ज़्यादा हिस्सा
शुरू हो जाती है एक बुनावट
और बन जाती है इक श्रृंखला सी संरचना
जिसके आर-पार देखने की कोशिश में
हम तमाम मनोरंजक शोरगुल से
निकल पड़ते हैं नीरव और सुखद बीहड़ की ओर
जहां अक्सर बुद्धपुरुष असंख्य तपस्याओं के बाद पहुंचते थे।

इस यात्रा के दौरान
हम निकलते हैं अपनी परिधि से बाहर
और देखते हैं- और भी लोग अलग-अलग मौकों पर किस क़दर ख़ुश हैं,
स्वयं के अलावा भी -किस क़दर दुखी भी हैं और लोग
तब प्रश्न स्फुरित होता है
सोचो ज़रा...
हर खुशगवार मौके पर हम भी महसूसें किसी और ख़ुश की ख़ुशी
और दुखद त्रासद मौकों पर
हमारा मौजूद होना
कुछ कम करे औरों का दुखना
तो कैसा हो

कुछ भय और कुछ उत्कंठा से चाहता है ये दिल
महसूसना हर ज़र्रे पर, हर शख्स में मौजूद हर ग़म- हर ख़ुशी
दरअसल कुछ सिद्धान्तों को करना चाहता है प्रमाणित....
सबका, सबमें, सब जगह सब हाल में मौजूद होना
यानि
सलाई का लहराते-बलखाते फंदों को बिनते जाना
अपने आखिरी फंदे से लगी गांठ से
कल्पनातीत, अनंत ब्रह्मांडों से एकाकार हो जाना
सबकी आत्माओं का परमात्मा हो जाना।

  


तीन ...  

उनका माथे पर रखना हाथ
वह नहीं होता
जो हमें अब तक सिखाया गया है
बल्कि छोड़ देना होता है
किस्मत का साथ
                    
उनकी जिंदगी कोसती है
उनकी किस्मत को,
उन्हें कमजोर पड़ता देख कर
वह होना चाहती है खुद खुश
पहचान कर अपना वजूद
उनका सिरहाना बने पत्थरों में।
इठलाना चाहती है इसी बात पर

भेजती है ज़िंदगी
किस्मत को बार बार उनके पास
और सख़्ती से देती है उसे आदेश
उनके बढ़ते कदमों को रोकने का
उनमें ठहराव लाने का
इसमें ढूंढना चाहती है ज़िंदगी अपना ठहराव
उनकी आंखों में देखना चाहती है अपना भय
अनभिज्ञ इस बात से कि
भूख की ज्वाला से तपते हुए भी
खुद को जलने से बचाया है
उन्होंने अब तक।
खाली बर्तन के पकवानों से भरा रहने की कल्पना को
बनाया है उन्होंने अपनी दिनचर्या का एक अभिन्न और ज़रूरी हिस्सा
अब तक वे पार कर चुके हैं
कंटीली झाड़ियों, धूल भरे रास्तों को।
कोबरा जाति के कई नागों के डंक
अब भी चुभे हैं उनके पैरों में
उनमें मौजूद स्त्रियों के जिस्मों से ज़्यादा आत्माओं पर हैं कई निशान
नया नहीं,शेष नहीं, कोई भी अनुभव अब उनके लिए
क्योंकि वे हैं खानाबदोश।


परिचय और संपर्क

नाम   तिथि दानी

जन्म   3 नवंबर
स्थान   जबलपुर( म.प्र.)
शिक्षा   एम.ए.(अँग्रेज़ी साहित्य),बी.जे.सी.(बैचलर ऑफ़ जर्नलिज़्म एंड कम्युनिकेशन्स),पी.जी.डिप्लोमा     इन इलेक्ट्रॉनिक एंड प्रिंट जर्नलिज़्म।
संप्रति   विभिन्न महाविद्यालयों में पाँच वर्षों के अध्यापन का अनुभव, आकाशवाणी(AIR) में तीन वर्षों तक कम्पियरिंग का अनुभव। वर्तमान में पर्ल्स न्यूज़ नेटवर्क और P7 News Channel, नोएडा में पत्रकार.
                
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं(वागर्थ,शुक्रवार,परिकथा, पाखी, नई दुनिया आदि) में कविताएँकहानी, लेख प्रकाशित।
मोबाइल नं.-09958489639
पता- प्लॉट नं.15, के.जी. बोस नगर, गढ़ा, जबलपुर(म.प्र), पिन-482003
               



2 टिप्‍पणियां:

  1. Achhi lagi kavitayen. Imandari aur sahajata inki taqat hai. Mujhe khanabadosh wali zyada achhi lagi. Tithi aur apka shukriya. - vimal c pandey

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  2. Achhi lagi kavitayen. Imandari aur sahajata inki taqat hai. Mujhe khanabadosh wali zyada achhi lagi. Tithi aur apka shukriya. - vimal c pandey

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