शनिवार, 6 अप्रैल 2013

सिताब दियारा ब्लॉग की शतकीय पोस्ट - विमलेश त्रिपाठी की कवितायें


                               विमलेश त्रिपाठी 



आज हमारे दौर के महत्वपूर्ण युवा कवि और कथाकार विमलेश त्रिपाठी का जन्मदिन है | पिछले दशक में उन्होंने जिस तरह से हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर अपनी जगह बनाई है , वह काबिलेतारीफ है | साहित्य की दोनों महत्वपूर्ण विधाओं – कविता और कहानी- में समान रूप से सक्रिय रहने वाले विमलेश शीघ्र ही अपने पहले उपन्यास के साथ हमारे सामने आने वाले हैं | उनका रचनात्मक सफ़र और ऊँचाई प्राप्त करे , सिताब दियारा ब्लॉग इसी कामना के साथ उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं प्रेषित करता है |

वैसे , हमारे लिए ख़ुशी का यह दोहरा अवसर है , क्योंकि आज की यह पोस्ट ‘सिताब दियारा’ ब्लॉग की सौंवी पोस्ट भी है | लगभग डेढ़ साल पहले ‘ब्लागिंग’ का यह सफ़र हमने उत्साह में आरम्भ तो कर दिया था , लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े और दूर-दराज के गाँव से ब्लॉग को कैसे संचालित किया जाए , जिसमें नेट की दुनिया के लिए अनिवार्य भौतिक संसाधनों का घनघोर अभाव सदा ही बना रहता है , हमेशा ही एक चुनौतीपूर्ण प्रश्न रहा | कभी शहर में जाकर ‘साइबर कैफे’ से और कभी मित्रों के घर से , हमने इस चुनौती का सामना किया | हालाकि इसके लिए हम कोई श्रेय नहीं मांग रहे  , क्योंकि हम जानते हैं , कि इससे से भी विपरीत परिस्थितियों में रहते हुए तमाम लोग , कई गुना और बेहतर काम करते रहते हैं | वरन हम तो यहाँ सिर्फ यह शेयर करना चाहते हैं , कि यह ‘लेखकों और पाठकों’ का सहयोग और समर्थन ही रहा  , जिसने इस ब्लॉग को इन विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने के लिए लगातार प्रेरित किया | जाहिर है कि , ‘चुनौती स्वीकार करने का यह प्रयास’ कैसा रहा , इसे तो सिताब दियारा ब्लॉग के पाठक ही बता सकते हैं |

इस अवसर पर ‘सिताब दियारा’ ब्लॉग अपने सभी मित्रों / शुभचिंतकों का आभार व्यक्त करता है , और साथ ही साथ यह उम्मीद भी कि उनका सहयोग और समर्थन इस ब्लॉग के लिए आगे भी बना रहेगा |  


                  तो प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर
             युवा कवि विमलेश त्रिपाठी की कविता-श्रृंखला “पानी”  
                                                        


पानी - 1

कहते हैं कि पानी ने ही जन्म दिया जीव को
करोड़ों वर्षों के ताप के बाद ठंढी हुई यह पृथ्वी
जमें पानी में ही पहली बार
उठे सांसों के बुलबुले
जीवन की एक टंढी-सी हलचल हुई

आदमी तो बहुत बाद में हुआ पैदा
कि आदमी बनते-बनते सदियां लगी ऐसा कहते हैं
एक सदी रोम झड़ने में
एक सदी पूंछ झड़ने में
और यहां तक पहुंचने में पता नहीं और कितनी सदियां
कितनी नदियां
कितने तालाब
कितने समंदर
पता नही कितनी बारिशें
कितना पानी पसीना

सुना कि पानी के लिए मेरे कस्बे में दो कत्ल हो गए
दिल्ली में पानी नसीब नहीं सबको
कोलकाता की गलियों में मचा है कोहराम पानी के नाम पर
शहर दर शहर
कस्बा दर कस्बा
लगता है अब तो गिनती भी भूलने लगा हूं

पानी के बवेले में पता नहीं कितनी बार उतरा
सरकार का पानी
पानी बिकने लगा बोतल में
रइस लोग अब नहीं पीते नलकुप और कुएं का पानी
बबन राम के घर में डभकने लगा भात
गड़हे के पानी में
गरीबों के बच्चे ऐसे ही पलते-बढ़ते हैं बाबा

मेरा एक दोस्त था जिसने मुझे इत्र देने का वादा किया था
पता नहीं किस सदी का वादा है
और मैं अब भी इंतजार में हूं इस पानी विहीन समय में
उस इत्र के वादे के पूरे होने की प्रतीक्षा में

और देखिए न इतने समय
इतना पानी
इतनी बारिश
और इतनी नदियों के पार उसने भेजी है मेरे पास
पानी पर लिखी एक कविता

मैं इस कविता का क्या करूं

फिलहाल तो यही करता हूं कि पानी पर लिखी उस कविता में
बहुत मुश्किल से खोजता हूं एक बूंद पानी
और अपने घर से सबसे पुराने घड़े में
संचकर रख देता हूं

मुझे भय है कि अगला महायुद्ध
पानी के लिए ही लड़ा जाने वाला है....।





पानी - 2


पानी से भरे इस देश में
खोज रहा पानी

पानी में
शामिल औरतों के आंसू
खमोश-खमोश –खमोश

दलितों के पसीने
खमोश-खमोश-खमोश

देश के सबसे बूढ़े आदमी का रक्त
खमोश-खमोश-खमोश

पानी में
खोजता हूं जल
जलती है देह

जल में
खोजता हूं पानी
जल रहा मन


कविता में अंततः लिखता हूं पानी
जल रहे हैं शब्द
खमोश-खमोश-खमोश...।



                           

पानी -3


कब से कितना गुजर गया है पानी

नदियों के जल और आंखों के पानी कहां गए
वह जो सूख गया आंखो का कोटर
वह जो सूना पड़ा पाट
वह जो मिट्टी और इंट से भर गया गांव का कुआं
उनकी ओर देखता हसरत भरी निगाह से
और संविधान बताता
कि उसे लागू हुए पचास से अधिक वर्ष हुए
जो दिल्ली में बैठे हैं
लगता है मर गया इस बीच उनके आंख का पानी

मैं क्या करूं कहां जाऊं
किस जगह संचित है वह पानी जिसे जीवन कहता था
तेरहवीं या सत्रवहीं सदी का एक फकीर कवि

वह कलसी कहां है जिसमें आजी जल भर कर रखती थी
सत्तू सानते थे बाबा
पता नहीं कितने मुसाफिरों की बूझती थी प्यास

क्या वह अब नहीं रहा समय
क्या समय की सांस में जो जरूरी पानी था वह भी सूख चुका

भीषण सूखे और भीषण जल प्लावन के बीच
खोज रहा हूं एक जरूरी कतरा जो आदमी और कविता
दोनों के लिए जरूरी

माथे पर छलक रहा पानी
आंख में रिस रहा पानी
हृदय की सिराओं में रक्त की मात्रा हो रही कम
बढ़ रहा पानी

सिर्फ पानी में तब्दील हो जाने के पहले
मैं पूरी करना चाहता हूं पानी पर एक मुकम्मल कविता
पानी पानी हो जाने के ठीक पहले

धरती के पानी में अलोपित हो जाने के
ठीक पहले..।


पानी - 4


मर रहा है एक पुल
ढह रही हैं दिवारें
बहुत पुरानी नदी का बहुत पुराना पुल यह
इस पर ही हमें पार करनी थी
जीवन की एक गहरी और तेज धार वाली नदी

बहुत जमाने पहले एक उजले शंख में गिर रहा था पानी
मंत्रों से भींगा
गिर रहा था हमारी हथेलियों के बीच
मंत्रों से बांधे जा रहे थे दो शरीर दो मन
आधे-आधे मिलकर एक हो रहे थे हम

सूख गया है हथेलियों के बीच का वह पानी
वर्फ पिघलने बंद हो चुके
सिर्फ ताप है जिसमें जलती दो देह दो आत्माएं

पानी की हमारी गगरियां अलग-अलग
सूख चुके कंठों में पानी लावे की तरह उतरता इन दिनों
बहुत दूर एक गांव में
जो जोड़ी बूढ़ी आंखों में बचा है अब भी संसार की सारी नदियों का पानी


उन आंखों की नदी में ही प्यास बुझाते हुए
मुझे डूब मरना है
इस जन्म में तो बस इतना ही

अगले जन्म में सिर्फ पानी
पानी ही
अगर होता है अगला जन्म
उसी से जलने हैं मंत्र
जिनकी बलि हम चढ़े....।



पानी -

यह कैसा देश बाबा
कैसा यह समय
आसमान से पानी की जगह बरसती आग
धरती के भीतर रिस रहा लावा

जिंदा रहने के लिए यहां पानी नहीं
पीनी पड़ती है लहकती हुई आग

यह कैसा देश बाबा
यहां की सारी नदियों में बहती आग
सारे तालाब में भर गया पिघला हुआ लावा

समय में उड़ते आग के गोले 
शब्द झुलस रहे 
मैं कैसे लिखूं कविता में पानी बाबा

मेरी कविताओं को
प्यास से मरने से कोई बचाओ बाबा
कोई मुझे इस समय से निकलने का
उपाय बताओ बाबा

पानी -6 


चेहरे पर जो दिखता है पानी
दरअसल शब्दों का पानी है
पास और कुछ नहीं
सिर्फ शब्द ही हैं
खाता वही ओढ़ता बिछाता
वे ही चमकते पेशानी पर
मोती या सोना बनकर

एक मजदूर के चेहरे से
बह रहा लागातार पानी
जो खून और पसीने में लिथड़ा है
सदियों हुए
वह वैसे ही बह रहा

एक बूढ़ा आदमी न जाने कब से
इंतजार कर रहा अपने खेत में पानी का
एक औरत लगभग पागलपन में
चिख रही है पानी-पानी-पानी

राजधानियों के कान में नहीं जा रहा पानी
उसमें तेल डाल रहे
कुछ शरारती-शरीफ लोग

पानी हो गया है पैसा
और पैसा पानी
बह रहा है पैसा पानी की तरह
राजधानी के कुछ लोगों के चेहरे पर
चढ़ रहा सुनहरा पानी
और देश के चेहरे पर जमा होता जा रहा
मलबे का ढेर

एक संविधान है जिसपर टपक रहा है सदियों से पानी
उसके शब्द मिट रहे हैं
सड़ रहे पन्ने
और देखिए न कि मैं पानी पर
लिखे जा रहा हूं बहुत खराब कविताएं.....।





पानी-7

जानता हूं कि कल मेरी कविताओं की सजा काला पानी
मेरे पास नहीं कोई दल  
गुट नहीं कोई   
मैं नहीं जानता कैसे बनता है संपर्क
जो एक कवि-दोस्त समझाता है
जिसे पिछले किसी साल मिला है भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार


मुझसे नहीं लिखी जाती कविताएं ही इतनी तो चिट्ठियां कैसे लिखूंगा
बात ही नहीं होती किसी कथा के किसी पात्र से महीनों तो किसी से फोन पर 
क्या बात करूंगा

मुझे नहीं आता झूठ बोलना   
हर कोशिश में पकड़ा गया हूं सामने वाले की आंख में
नहीं तो अंततः गिरा हूं खुद की नजरों में ही

जानता हूं कि कल वे कवि
जो कविता की कला के साथ हैं खुद को बेचने की कला में पारंगत
वे मेरी कविताओं पर फेर देंगे पानी या समय की धार में बह जाऊंगा
जब कोई नहीं होगा जो छान ले मेरी कविताएं जैसे मछलियों को छानता है मल्लाह कोई

मैं सुबह में निकला हुआ जाड़े का सूरज हूं हो सके तो अपनी देह सेंक लो
खूब तपती गरमी के बाद ठांय-ठांय बरसता पानी हूं हो सके तो भीग लो कुछ देर

और कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं मेरे भाई न कोई आशा-आकांक्षा-सपना
सिवा इसके कि जब तक चलती रहे सांस शब्द खत्म न हों स्याही न सूखे
कलम की नोख चलती रहे अनवरत

मुझे परवाह नहीं दे दिया जाय
मेरी कविताओं को काला पानी
सच कहता हूं यकीन करे यह पूरी पृथ्वी मुझे परवाह नहीं...।
                                           
                                                 

परिचय


    विमलेश त्रिपाठी

·         बक्सर, बिहार के एक गांव हरनाथपुर में जन्म ( 7 अप्रैल 1979 मूल तिथि)। प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही।
·         प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातकोत्तर, बीएड, कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोधरत।
·         देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, समीक्षा, लेख आदि का प्रकाशन।
सम्मान                         
·         सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से काव्य लेखन के लिए युवा शिखर सम्मान
·         भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार
·         सूत्र सम्मान
·         राजीव गांधी एक्सिलेंट अवार्ड
                             

पुस्तकें
·          हम बचे रहेंगे कविता संग्रह, नयी किताब, दिल्ली
·         अधूरे अंत की शुरूआत, कहानी संग्रह, भारतीय ज्ञानपीठ

संपर्क ....

·         परमाणु ऊर्जा विभाग के एक यूनिट में सहायक निदेशक (राजभाषा) के पद पर कार्यरत।
·         संपर्क: साहा इंस्टिट्यूट ऑफ न्युक्लियर फिजिक्स,
1/ए.एफ., विधान नगर, कोलकाता-64.
·         ब्लॉग: http://bimleshtripathi.blogspot.com
·         Email: bimleshm2001@yahoo.com
·         Mobile: 09748800649
                      


12 टिप्‍पणियां:

  1. सभी कवितायें बहुत अच्छी हैं ..''मुझे नहीं आता झूठ बोलना ..हर कोशिश में पकड़ा गया हूँ सामने वाले की आँख में'' .. शुभ कामनाएं आपको शतकीय पोस्ट पर

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  2. हार्दिक शुभकामनाएं
    -नित्यानंद गायेन

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  3. vimlesh ji janamdin ki dheron shubhkaamnaayen....aapki in kavitayon ne hridya dravit kar diya...sateek saarthak sashakt sunder rachnaayen..badhai

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  4. पानी पर इतनी अच्छी कबिता कहीं और नहीं पढ़ा .बधाई.

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  5. पानी पर विमलेश की कवितायेँ पढ़ते हुए अपने समय की कठिनतर स्थितियों और चुनौतियों का पता चलता है। ऐसे तो पानी पर रहीम, रघुवीर सहाय से लेकर आलोक धन्वा और विमल कुमार तक ने लिखा है फिर भी इधर कई कवियों की कविताओं में पानी की चिंता बढ़ी है। यह कविता के लिए एक बेहतर स्थिति है। बधाई!

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  6. विमलेश जी को जन्म दिन की बधाइयां .साथी रामजी तिवारी को धन्यवाद ; ब्लॉग और इस शतकीय पोस्ट के लिए शुभकामनायें .बधाई अच्छी कविताओं के लिए .

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  7. बहुत सुन्दर कविताएँ .......
    कुछ शब्द....... कुछ बूँद पानी ..............
    समाहित है जिसमें सागर की गहराई .....।

    खूब लिखें आप विमलेश जी ....
    हम तो दीवाने हैं आपकी कविताओं के...
    " शब्द ख़तम न हों स्याही न सूखे कलम की नोख चलती रहे अनवरत ....."

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  8. सहज व गंभीर कविताएँ..बधाई……हार्दिक शुभ कामनाएं जन्म दिन की…

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  9. बहुत ही गंभीर रचना है शुभकामनाएं

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  10. गजब लिखा है,बिमलेश जी ने,बधाई

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  11. सबसे पहले विपरीत परिस्थियों में भी सिताबदियारा के सफल संचालन और इसी क्रम में हमारे इस पसंदीदा ब्लॉग की शतकीय पोस्ट के लिए बधाई. यह भी कम सुखद नहीं कि यह पोस्ट हमारे आत्मीय विमलेश भाई की कविताओं की है और इसे प्रस्तुत भी किया गया उनके जन्मदिन पर. एक साथ इतने विशेष अवसर, और इन सभी के लिए मेरी हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं स्वीकार करिए. 'पानी' विमलेश की एक बेहतर कविता बन पडी हैं. जब हर जगह सूखते जा रहे हैं तमाम पानी के श्रोत, ऐसे में इस युवा कवि की पानी के लिए चिंता हमें आश्वस्त करती है. आभार रामजी भाई. पोस्टों का यह सिलसिला अनवरत चलता रहे, हम इसकी कामना करते हैं. आभार.

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