रविवार, 10 मार्च 2013

गाँव जाने वाली अंतिम बस - संतोष चतुर्वेदी


                                    संतोष चतुर्वेदी 



कवि-मित्र संतोष कुमार चतुर्वेदी की कुछ कविताएँ ‘वाक्’ पत्रिका के इस अंक में छपी हैं | उनमे से एक कविता ‘गाँव जाने वाली अंतिम बस’ भी है | इस कविता में संतोष जी हमारे समय की तल्ख़ सच्चाईयों से रूबरू हैं | तमाम दावों और वादों के विपरीत , आज भी देश का विकास किस तरह से महानगरीय चकाचौंध में सिमटा हुआ है , और किस तरह से इस देश की अधिसंख्य जनता उससे बाहर है , यह कविता बताती है | साथी ही साथ यह भी , कि वह अधिसंख्य जनता व्यवस्था निर्मित इस त्रासदी को भी कितने शालीन और चुपचाप तरीके से सहती रहती है | हालाकि यह चुप्पी और शालीनता कितने समय तक बरकरार रहेगी , कहना कठिन है | बेहतर तो यह होता , कि उम्मीदों के टूटने  से पहले इस व्यवस्था की नींद ही टूट जाती |

          
            प्रस्तुत है सिताब दियारा ब्लॉग पर संतोष चतुर्वेदी की यह कविता



गाँव जाने वाली अंतिम बस


कहीं से भी जब आता हूँ                  
तब गाँव जाने के लिए मिलती है मुझे
अक्सर यही अंतिम सतबजिया बस
वैसे इन दिनों इसकी हालत इस कदर खस्ता है
कि अब इसे अजायबघर की शोभा होना चाहिए
लेकिन हमारे लिए यह बस नहीं सरवस है
दूरियों की खाई पाट कर
घर तट पर उतारने वाली नाव 
                       
गाँव जाने वाली यह अंतिम बस खटारा है
सच होने के बावजूद अगर भूल से भी ऐसा कहा
तो आपको डंपट देगा खलासी यह कहते हुए
किसने बुलाया था बैठने के लिए
अपनी गरज से बैठे हो कोई उपकार नहीं कर रहे
तकलीफ ज्यादा हो तो उतर जाओ तुरंत
जाहिर सी बात है इतनी सुन कर
अक्की बक्की गुम हो जायेगी
बीच राह निर्जन अँधेरे में
अपरिचित सी जगह पर उतारने की धमकी से

खस्ताहाल सड़क पर चलने को साकार बनाती
गुमशुदा से गाँव के लिए जाती हुई अंतिम बस
और बस में सवार एक लोकतांत्रिक देश के
नागरिक गुमशुदा से

अगर इस अंतिम बस में सफर करना है
तो किसी भी बात के लिए तैयार रहना होगा आपको
मसलन स्टार्ट कराने के लिए
बस में धक्का लगाना पड़ सकता है.
और यह उपक्रम दोहराना, तिहराना या चहराना पड़ सकता है
रास्ते भर कानफोडू घरघराहट के साथ
कर्कश स्वर में कोई द्विअर्थी भोजपुरी गाना सुनना पड़ सकता है.
टूटी खिडकियों से आती ठंडी हवा में
थरथराना पड़ सकता है
या बेलगाम बरसाती बौछारों से
पूरे का पूरा भीगना पड़ सकता है
रास्ते भर किसिम किसिम की
गंध-दुर्गन्ध सहने की आदत तो
डालनी ही पड़ेगी शर्तिया तौर पर

दो पर तीन
याँ तीन पर चार बैठे
तब भी खामोश रहिये
वरना मनुष्य विरोधी होने का आरोप तुरंत जड़ा जा सकता है
ऐसा आदमी जो खडूस है
और सीट मिलते ही उसे बपौती समझाने लगता है
कि बस में खडे और लोग तो आदमी ही हैं
जैसे जुमले सुनने को मिल जायेंगे सहज ही

वैसे आमतौर पर इस बस को भूसे
या जानवरों की तरह भरा जाता है
और इस बस यात्रा में
प्राणीशास्त्रीय लहजे में कहा जाय तो
आप जानवरों से अपना सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं
दुनिया का दो पाँव वाला चतुर-सुजान जानवर
जो मानव होने के बावजूद अमानव हो सकता है
जो आधुनिक होने के बावजूद आदिम हो सकता है

यह एक दुनिया है
और इस दुनिया का अपना एक मानचित्र है
इस मानचित्र में ही है
सड़क का आभास कराती जर्जर सी यह सड़क
बस का आभास कराती खस्ताहाल सी यह बस
आदमी का अहसास कराते विवश से आदमी
इसी आदमी के हाथों बनता हुआ यह मानचित्र
और मानचित्र में खूबसूरत लगती यह दुनिया

यहाँ किसी भी बात के पक्ष विपक्ष में
तुरत-फुरत गढ़ लिए जाते हैं तर्क
जैसे बस में धक्का लगाने को वाजिब ठहराते हुए
कुछ दार्शनिक से अंदाज में कंडक्टर अपने देश की याद दिलाता है
जो आजादी के बाद से लेकर आज तलक
धक्के के सहारे ही आगे बढ़ रहा है
मसलन बस की भीड़ को वह
देश की बेतहाशा बढती आबादी से जोड़ कर
बस यात्रा की तकलीफ को
जीवन की तकलीफ से जोड़ देता है

गाँव जाने वाली अंतिम बस में सीटों की
दिलचस्प लड़ाई चलती रहती है अनवरत
एक सीट के लिए कई-कई दावेदार
दो में तीन, तीन में चार का व्यवहार
बस की बोनट या बीच में पड़े हुए बोरे
बस की सर्वकालिक सीट तो है ही
क्या कहा आपने हाड-मांस वाले इंसान हैं
तो हम क्या करें जनाब चुपचाप खड़े रहिये
सीट पर रखे किसी रूमाल या गमछे को हटा कर
बैठने की गुस्ताखी भारी पड़ सकती है
यह महज रूमाल या गमछा नहीं
आदमी होने की सच्चाई है
जो अपनी मौजूदगी भर से छेक लेता है सीट
और जिसकी दावेदारी पर नहीं उठाया जा सकता कोई प्रश्नचिन्ह
वैसे इस बस में सीट का मिल जाना
संसद या विधानसभा की सीट मिल जाने के माफिक है
जिसके पाने का सपना भी नहीं देख सकता
अब इस तंत्र का कोई लोक
या कोई आम आदमी

हमारे गाँव जाने वाला केवल एक रास्ता मुसीबतों भरा
रस्ते पर चलने वाली महज एक बस
जो अपने हर दूसरे चक्कर में ही बन जाती है
गाँव जाने वाली अंतिम बस
जिसका छूट जाना
एक असमाप्त सी रात काटने के तीखे अहसासों से भरा है
जिसका छूट जाना
सारी गाढ़ी कमाई लूट-पिट जाने के दुह्स्वप्नों से भरा है
जिसका छूट जाना
घर के चूल्हे का उपास पडना है
जिसका छूट जाना
घर की तमाम आँखों की रात भर की बैचैनी होती है

बस छूट जाने के
तमाम अर्थों, अभिप्रायों और मतलबों से
बचने की एक मात्र तरकीब
गाँव जाने वाली अंतिम बस को
किसी कीमत पर न छूटने देना है
यह खस्ताहाल बस तमाम किन्तु-परन्तु को धता बताती
जादुई तरीके से आखिरकार पहुचा ही देती है हमें
अपने गाँव अपने घर

आप शौक से विकल्पों की बात कर सकते हैं
हमारे लिए यह सोचना भी जैसे गुनाह है
सच्चाई तो यही है कि
एक के पास कोई विकल्प नहीं होता कभी
और हमारे पास रहा हमेशा यही एक रास्ता
यही एक चेहरा
यही एक जिंदगी

जब मैं छोटा था
तब भी यही एक बस थी गाँव जाने वाली
और आज जब मेरे कई छोटे हैं तब भी
कहानी वही पुरानी
और इतने दिनों तक सेवा की हो जिसने
बिना कोई नागा किये
उसकी निंदा आखिर कैसे कर सकते हैं हम

गाँव जाने वाली अंतिम बस खुलने ही वाली है
उसकी घरघराहट इशारा कर रही है कुछ इसी बात की ओर
वैसे इस घरघराहट का मतलब बस का तुरंत खुलना कदापि नहीं
बल्कि खुलने का एहसास कराना होता है
जो कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों ताक का हो सकता है
सतबजिया का मतलब ठीक सात ही नहीं
यह सात कभी कुछ पहले
या फिर कुछ घंटे बाद भी बज सकता है
इस तरह यहाँ सात बजने का मतलब
बस का ठसाठस भर जाने से है

ठूंस कर भरी होने के बावजूद
गाँव जाने की आस लिए जो कोई आता है
वह अंट ही जाता है इस अंतिम बस में
उम्मीद से हर पल जूझती यह बस
किसी को नाउम्मीद नहीं छोडती

माफ करिये
कविता-कहानी बाद में सुन-सुना लेंगे  
अभी तो पकडनी है मुझे गाँव जाने वाली अंतिम बस
और उसी से होते हुए रचना है मुझे
घर पहुचने की उम्मीदों से उमगा एक गीत
उसी में परखना है मुझे
थोड़ी सी संभावना में भी यह जीवन
किस तरह तुरंत ही अंकुरित हो आता है  


परिचय और संपर्क .... 


नाम- संतोष चतुर्वेदी 

जन्म तिथि- 2 नव.1971  
जन्म स्थान - बलिया 
सम्प्रति - प्रवक्ता (इतिहास विभाग) एम.पी.पी.कालेज  मऊ
               जिला -चित्रकूट , उ.प्र.  
इलाहबाद से निकलने वाली अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका  " अनहद " का संपादन 
 सभी प्रमुख हिंदी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओ में कविताये और लेख प्रकाशित 
इतिहास और संस्कृति पर लिखी पुस्तकों के अलावा " पहली बार " शीर्षक से 2010 में काव्य संग्रह भी प्रकाशित 
मो. न.-   9450614857                                    

चर्चित साहित्यिक ब्लाग ‘पहली बार’  ( http://pahleebar.blogspot.in/ )  का सञ्चालन
                                  

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर विवरण ..हरिशंकर परसाई जी याद आ गये . संतोष जी कमाल लिखते हैं .
    -नित्यानंद गायेन

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  2. अच्‍छी कविता है... बधाई।

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  3. एक भुक्‍तभोगी की कलम से ही निकल सकती है यह अभिव्‍यक्ति।

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  4. यह सतबजिया बस भारतीय लोकतंत्र का रूपक प्रतीत होती है . लोक का सच्चा हाल बयान करती हुयी.

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  5. संतोष जी की कवितायें वास्तव मे तल्ख सच्चाई है,जिस तरह से रूपकों का प्रयोग,बिम्ब का गठन,भाषा मे कलात्मकता और यथार्थ को इस तरह सुगठित तरीके से पेश करते हैं कि वह अंदाजे-बयां सीखने वाली है। पहली बार संग्रह के बाद अभी स्वर एकादश की कवितायें पढ़ कर उत्तीर्ण हुआ ही था कि तुरंत एक शानदार कविता रामजी भाई ने पढ़वा दी ...शुक्रिया रामजी भाई।वैसे इस कविता को कवि के मुंह से सुनने का भी सौभाग्य प्राप्त है,,गौरवान्वित हूँ की हमारे समय मे एक संतोष चतुर्वेदी हैं और जिनका मैं मित्र हूँ ,अनुज हूँ ...........

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  6. बहुत -बहुत बधाई कवि मित्र को ....इन कविताओं को यहाँ प्रस्तुत करने के लिए रामजी भाई को धन्यवाद .

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