गुरुवार, 17 जनवरी 2013

'छुट्टी का दिन' - जयश्री राय की कहानी


                           जयश्री राय 

‘प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'हंस' के जनवरी - २०१३ अंक में छपी जयश्री राय’ की यह कहानी आप सबके लिए ‘सिताब दियारा’ ब्लाग पर भी प्रस्तुत है                  

                      
                       छुट्टी का दिन

आज रविवार है, यानी छुट्टी का दिन. मैं सुबह से ही शाहजहानी मूड में हूं. खूब देर से उठकर चार घी चुपड़े आलू के पराठे दही के साथ खाकर ड्राइंगरूम में कूलर लगाकर दीवान पर मय अखबार पसर गया हूं. जाहिर है मेरी बीवी से मेरा यह सुख देखा नहीं जा रहा है. अंदर ही अंदर कुढ़ रही है और किसी न किसी बहाने बार-बार सामने आकर अपनी भंड़ास निकाल रही है.
इतने वर्षों में उसकी निरंतर बड़बड़ाहट का मैं आदी हो चुका हूं. उसका बोलते रहना मेरे किसी काम में बिघ्न नहीं डालता. ऊपरवाले ने एक दहाना दिया है, फाड़ती रहे. उसकी घमासान बमबारी के बीच मैं आराम से अखबार बांच सकता हूं या मीठी नींद में खर्राटे भर सकता हूं. एक अरसा हुआ, मैंने उसकी सुननी छोड़ दी है. यह अलग बात है कि उसने बोलना कभी नहीं छोड़ा. बस यही विडंबना है. स्त्री-पुरुषों की आनुवंशिक बीमारी मानकर अब मैंने इस पर ध्यान देना छोड़ दिया है. मगर कहावत है कि देह पर मल का लेप लगा लेने से भी यम कभी पीछा नहीं छोड़ता, फिर यह तो मेरी पत्नी थी, सात जन्मों के साथ का अलौकिक परमिट लिये.
मेरे सुख में बिघ्न डालने के लिये एक नया उपाय ईजाद कर अब वह ढेर सारी रद्दी के पहाड़ से लदी-फदी मेरे सामने आ खड़ी हुई है - अखबार पढ़ लिये तो दो, रद्दीवाले को देना है. मैं अखबार से नज़र उठाये बिना गंभीर मुख-मुद्रा बनाकर ना में सिर हिलाता हूं. पत्नी के सामने मैं हमेशा ही बहुत गंभीर बना रहता हूं ताकि वह अपनी मर्यादा की लक्षमण रेखा पारकर मुझ पर चढ़ाई न कर सके. उसके भयंकर तेज और अग्निरूपा रणचंडी स्वरूप के आगे मेरा यह एकलौता डिफेंस है. मेरी गंभीर मुख-मुद्रा देखकर वह थोड़ा नरम पड़ जाती है. ज्यादा दुस्साहस नहीं करती.
वैसे भी मेरी पत्नी जब अपने चेहरे पर एक सौ एक किस्म की शिकायतें लेकर गला खखारती हुई सामने हाजिर होती है, मैं समझ जाता हूं महिषासुर मर्दिनी आज अपने पूरे फार्म मे है और तत्क्षण एक कछुये की तरह अपने सुरक्षित खोल के अंदर घुस जाता हूं. चेहरे पर भयंकर गांभीर्य के भाव पैदाकर ऐनक चढ़ाकर किताब में सिर घुसा लेता हूं. भाव ऐसा कि इस वक्त मै वार एंड पीससरीखे किसी गुरु गंभीर साहित्य के अध्ययन में लीन हूं. जबकि यथार्थ में मैं किसी दोयम दर्जे के दैनिक में सन्ता-बन्तामार्का चवन्नी छाप जोक पढ़ रहा होता हूं और बड़ी कठिनाई से अपनी खींसे निपोड़ने की इच्छा को संयत कर रहा होता हूं.

मगर आज मेरा ये फार्मूला पता नहीं क्यों काम नहीं कर रहा था. श्रीमतीजी पर सुबह से ही मानो देवी आई हुई थी. फर्श पर अखबार पटककर वह स्टेनगन की तरह तड़तड़ाकर चलने लगी थी - रात-दिन या तो दफ्तर में झख मारते रहते हो या अखबार , इंटरनेट में मुंडी घुसाये रहते हो, आखिर मैं किससे अपनी परेशानी कहूं. पूरा घर बिगड़ता जा रहा है. बच्चों को बड़ों का कोई लिहाज नहीं. बेटा सुबह-शाम फेसबुक पर, बेटी मोबाईल पर और तुम्हारी पूज्य माताजी मेरे सर पर... और तुम... बंदूक की नली मेरी तरफ घूमते ही अचानक बिना सर्दी-जुकाम के मेरे गले में बलगम घड़घड़ाने लगता है और मैं तीव्र गति से खांसने लगता हूं. यह एक तरह का शॉक ट्रीटमेंट है जो ऐसी स्थितियों में मैं उसे देता रहता हूं. अपने पुराण-वाचन में उपस्थित हुये इस आकस्मिक व्यवधान से श्रीमतीजी एक क्षण के लिये किंकर्तव्यविमूढ़-सी खड़ी रह गई थीं और फिर चेहरे पर वितृष्णा का अथाह भाव लिये कमरे से पांव पटकते हुये निकल गई थी.
इधर फर्श पर अनाथ की तरह पड़े पचास अखबारों के तीन-चार सौ पन्ने एक साथ एक ही आवाज़ में चमगादड़ की तरह फड़फड़ाने लगे थे. लगा था अचानक से सुनामी आ गई है.
सुबह-सुबह संडे का मजा बिगाड़ देने के लिये जी चाहा था बीवी की ऐसी की तैसी कर दूं मगर फिर अपनी भावनाओं पर काबू कर गया था. अब वह बीस साल पहले वाली नाजुक फूलों की छड़ी जैसी बीवी नहीं, वर्तमान की नब्बे किलो की खूब लड़ी मर्दानीवाली बरेलीवाली बीवी थी जिसे छूकर मैं अपनी जान का खतरा मोल नहीं ले सकता था. पिछली बार मजाक-मजाक में मेरी कलाई मरोड़ दी थी. सात दिनों तक बायें हाथ के निकृष्ट काम दांये से निबटाने पड़े. उस हादसे के बाद मैने तौबा कर ली है, जंगली हाथी से भिड जाउंगा, मगर इस जल हस्थी से नहीं.
अचानक मैसेज अलर्ट से मेरी गहरी सोच में खलल पड़ गया था. मोबाईल का स्क्रीन चमक रहा था. लपक कर देखता हूं, कोमोलिका का मैसेज है - टैगोर की दो भावुक पंक्तियां- जे राते मोर दुआर गुली भांगलो झडे... हमेशा की तरह बात सर के ऊपर से गुजर गई... मगर मुद्दा ये कि मैसेज लालित्यमयी कोमोलिका देवी की तरफ़ से प्रेषित हुआ था. यस! अपने दोनों हाथों को कुहनी से पीछे की तरफ मोडकर झटक देता हूं - पोड़ी फंसली रे फंसली... ये नवदुर्वा जैसी रंगतवाली श्यामल बंगालन छ: महीने से भाव खा रही थी. किसी कस्बे से स्थानांतरित होकर हमारे हेड ऑफिस में आई थी. सुना था पति अपनी नौकरी की वजह से इसके साथ नहीं रह पाता है. यहां वह किसी के घर पेइंग गेस्ट बनकर रह रही थी. मुंह पर जब देखो इतना बड़ा अलीगढ़ का ताला और सामने फाईलों का स्तूप ! जैसे पूरे दफ्तर में उसीने सबके काम का ठेका लिया हुआ हो. रोज दफ्तर से निकलकर हमदोनों आगे-पीछे चलते हुये एक ही बस स्टॉप पर खड़े होकर पन्द्रह-बीस मिनट तक अपनी-अपनी बस का इंतज़ार करते मगर वह कभी हां-हूं से आगे बात बढ़ने ही नहीं देती.
वैसे सच पूछो तो इस भारी नितंबों वाली स्त्री के पीछे-पीछे रोज एकाध घंटे तक चलना मुझे बुरा भी नहीं लगता था. एक तरह से मुफ्त में नयनसुख मिल जाता था. वह आगे-आगे बतख की तरह कूल्हे मटकाते हुये नाजो अदा से चलती और मैं पीछे-पीछे अपने अंदर एक दबी हुई उत्तेजना महसूस करते हुये बार-बार अपना लाल-भभूका हो रहा चेहरा पोछते हुये चलता. अपने एक ही रूमाल से मोड़-मोड़कर कभी मैं चेहरा साफ करता तो कभी अपने जूते. नहीं, ऐसा नहीं कि मुझे ऐसा करने मे कोइ विकृत किस्म का सुख मिलता. दर असल मेरी बीवी ने अपने इतने सालों की संगत से मुझे महाकिफ़ायती बना दिया है. वह एक पत्ती में तीन बार चाय उबालकर पीती है. साबुन की बट्टी ताले-चाभी में डालकर पोखर की चिकनी मिट्टी से बाल धोती है. यही नहीं, वह अम्मा के दूध मे प्योर गंगाजल मिलाती है. कहती है - सेहत की सेहत और पुण्य का पुण्य... उधर अम्मा बिचारी ये सोचकर परेशान कि रोज़ कांसे के गिलास में आधा सेर दूध का सेवन करके भी चुरमुराती क्यों जा रही है ! मै भी सालों से दो चड्डी-बनियान मे बारह महीने गुजार रहा हूं. मोजे से जबतक दसों अंगुलियां कछुये की तरह बाहर गर्दन निकालकर झांकने नहीं लगतीं वह मोजे का नया जोडा नहीं खरीदने देती. अचानक से कभी कुछ खरीदने का हमारे यहां कोइ प्रोविज़न नहीं था. मगर अपने मायकेवालों के लिये उसका मन मनभर का था . जब तब उसके तीन-तीन मुसटंडे भाई आ धमकते और वह घी की हंडी उढेलकर पुरी, कचौडी तलने  बैठ जाती  .  खैर अपनी पत्नी के बाकी गुण फिर कभी बघारेंगे, अभी तो मै कोमोलिका सुंदरी की बात कर रहा था. हां तो इस तरह से चलते हुये लम्बे रास्ते का पता ही नहीं चलता. हम चल रहे थे, वो चल रही थी, मगर दुनियावालों के दिल जल रहे थे... अरे! ये तो वाकई एक गीत बन गया!... क्या कह रहे हैं ? ऐसा एक गीत ऑलरेडी है? धत! कवि बनने का आखिरी चांस भी गया...चल, जान दे, कोइ गल्ल नहीं!
तो मोटी बात ये कि चल-चलकर मै दुबला हो रहा था, मगर कोई फायदा नहीं हो रहा था. किसी भी तरह बात बनती न देख एक दिन मैं पुस्तक मेले से टैगोर की दो-चार किताबों का अंग्रेज़ी अनुवाद खरीद लाया था. एक तो अंग्रेज़ी जैसी फनी लैंग्वेज उस पर बंगाली भावुकता के पितामह टैगोर की कविता - सबकुछ सर के ऊपर से गुजर गया. किसी तरह दो-चार पंक्तियों के भाव ग्रहण करने में सक्षम हो सका.
एक बार डिपार्टमेंट के कार्यक्रम में गरम समोसे के साथ टैगोर की दो-चार नरम-नरम पंक्तियां परोस दी. तालियों के बीच कनखियों से देखा तो कोमोलिका अपनी काली, डागर आंखों से मुझे विस्मय-विमुग्ध होकर देख रही थी. तीर इस बार ठीक मछली की आंख पर बैठा था. उस शाम वह चपल हिरणी गजगामिनी होकर मंथर गति से चल रही थी. संकेत पाते ही मैं चीते की तरह दो छलांग में उसके पास जा पहुंचा था, एकदम सिंकारा एनर्जी टानिक के माडल के माफिक ! उसने अपने टोल खाते गालों से हल्के से मुस्कुराकर मुझे न जाने किस नजरों से देखा था. मेरे अंदर एक भयानक विस्फोट हुआ था और इसके साथ ही मैंने महसूस किया था मुझे उससे प्रेम हो गया है. हालांकि प्रेम तो मुझे प्राय: ही किसी न किसी के साथ होता रहता है मगर इस बार बात प्रेम से आगे की कोई गंभीर सी चीज़ लग रही थी. आजकल मुझे बात-बातपर रोना आने लगा था . उस दिन संडास मे बैठकर लोटाभर रोया था. बैठे-बिठाये नाक सुरसुराने लगती और मै अपने बाबरी बालों की ज़ुल्फे लहराकर छत पर जा बैठता और चांद देखने लगता. अम्मा ओझा बुलाकर मेरी झाडूं से कसकर पिटाई भी करवा चुकी थी. मगर नतीज़ा ढाक के तीन पात...रातों को जाग-जागकर उल्लू की तरह दिखने लगा था. चांद के हाला की तरह आंख के चारों ओर काला पड गया था. २४ घंटे दिल मे बनी रहनेवाली कसक सायको-सोमेटीक सिम्टम बनकर भीषण कब्ज़ का रुप धारण कर चुकी थी. जब अंदर का हाल ऐसा हो तो चेहरे का नक्शा भी बदलना ही बदलना था. लोग कहते शर्माजी के चेहरे पर आजकल हमेशा १२ ही बजा रहता है. मै अपने १२ बजेवाला चेहरा लेकर जिधर से गुजरता उधर फुसफुसाहट पड जाती.
मै इधर अलग परेशान. मुझे खयाल आया था कि लोग कहते हैं, बंगालनें जादूगरनी हुआ करती हैं. मगर अब क्या किया जा सकता था, मुझपर तो उसका जादू चल ही गया था. अब कान झुका कर उसके पीछे-पीछे बलि के पठरु की तरह चलने के सिवा और चारा भी क्या था.
मुस्कराकर उस दिन वह थोड़ी देर के लिये मेरे साथ एक रेस्तरां में बैठने के लिये राजी हो गई थी. मन मसोसकर मुझे उसे एक अच्छे से रेस्तरां मे ले जाना पड़ा था. फर्स्ट इंप्रेशन इज़ द लास्ट इंप्रेशन का खयाल करके.
मेरे मुंह से टैगोर की कविता सुनकर वह मुझे कोई सुरुचिसंपन्न कवि टाइप का व्यक्ति समझने लगी थी शायद, जबकि अपनी दृष्टि में मैं बिल्कुल एक बनिया किस्म का आदमी था. ज़िंदगी भर नून-तेल के हिसाब में बीत गया था और उस समय भी मेन्यू कार्ड देखते हुये मैं मन ही मन हिसाब-किताब में उलझा हुआ था. जब तक लड़की की तरफ से शारीरिक सामीप्य का कुछ ठोस किस्म का आश्वासन न मिल जाये तबतक उसपर ज्यादा व्यय करना उचित नहीं होगा. दो लाइम सोडा का आर्डर देते हुये मैंने उदासीन भाव से कहा था - मुझे एसिडिटी हो रही है, इस वक्त कुछ खा नहीं सकूंगा. वैसे आप क्या लेंगी?
मैं जानता था, एक बार आर्डर दे चुकने के बाद उसकी तरह की कोई भी मध्यमवर्गीय महिला संकोच से कुछ और आर्डर नहीं दे पाएगी.
वह अपनी मुलायम आवाज़ में काजी नज़रुल डिस्कस कर रही थी और मैं अपनी मुंह पर दिग्गज-सा भाव ओढ़कर आप्राण उसकी साड़ी के किंचित ढलक जाने से गहरे गले की ब्लाउज से आधे चांद की तरह झांकते उसके शरीर की तरफ देखने से बच रहा था. स्त्रियों की छठी इंद्रियां इन मामलों में बहुत सजग होती है, वे झट से भांप जाती हैं कि कौन किस नीयत का है. अपनी पहली मुलाकात का उस पर अच्छा प्रभाव छोड़ने के लिये मैं कुछ ज्यादा ही भद्रलोक बनने का प्रयास कर रहा था वर्ना वह मुझे लोभी कुत्ते की श्रंखला में डाल देती.


इसके बाद वह अधिकतर शामों को मेरे साथ इधर-उधर समय व्यतीत करने लगी थी. धीरे-धीरे कछुये की तरह वह अपने खोल से बाहर निकल आई थी. मुझे पता चला था अधिकांश म्ध्यमवर्गीय स्त्री की तरह वह भी अपने विवाहित जीवन में अकेलेपन और उपेक्षा की शिकार है. वह अपना जीवन, अपनी भावनायें अपने पति के साथ शेयर करना चाहती है, मगर उसका पति नब्बे प्रतिशत पतियों की तरह उसकी भावनायें नहीं समझता, उसकी बात नहीं सुनता, उसकी उपेक्षा करता है, ईत्यादि-ईत्यादि... उसकी बातें अपने चेहर पर हमदर्दी और आंखों में करुणा लिये मैं अर्धनारीश्वर बना अपनी जम्हाई जबरन रोके सुनता रहता और मौका देखकर सहानुभूति जताते हुये उसका हाथ भी दबा देता. वह मुझे एक संवेदनशील पुरुष समझती जिसे स्त्री-पुरुष के संबंधों में बराबरी का यकीन रहता है. मैं मन ही मन सोचता यदि मेरी पत्नी को यह अवसर मिले तो वह भी यही पुराण किसी सहृदय पुरुष को सुनाने से बाज न आये.
दो-चार मुलाकातों में ही मैने समझ लिया था, वह निहायत ही भावुक किस्म की बंगाली स्त्री थी. इससे मेरा काम जरा आसान हो गया था. मैं उसे किसी रेस्तरां में ले जाने की बजाय गंगा के किनारे ले जाता और दो रुपये की मूंगफली खिलाकर चार-पांच अदद कवितायें सुना डालता था. सबकुछ सस्ते में निपट जाता. महीने की पहली तारीख को गिन-गिन कर मुझसे पगार लेते हुये बीवी भी खुश और महीने भर में सौ रुपये की मूंगफली खाकर मेरी बंगालन प्रियतमा भी खुश. लोग सच ही कहते हैं कि बंगाल मे भाषण और प्रेम आज भी बहुत सस्ता है. रुपये के दस के भाव से नेता और तीस मूंफली की पुड़िया दर महीने एक रोसोगोल्ला सरीखी प्रेमिका... राम राज्यो आर किसको बोलता है !
मोबाइल की तरफ देखते-देखते न जाने मैं कब सो गया था. कामवाली ने पोंछा लगाना शुरु किया तो मेरी नींद खुली. सामने हमारी कॉलोनी की उर्वशी यानी कामवाली कांता बाई फिरकी की तरह घूम-घूम कर फर्श पर पोंछा लगा रही थी. ज़मीन पर उंकड़ू बैठकर आगे की तरफ झुककर लय के साथ फर्श पर हाथ चलाते हुये उसके पूरे शरीर में एक मादक-सी थिरकन व्याप रही थी. मराठी ढंग से बांधी गई तंग साड़ी से उसके विपुल नितंब मेरे ऐंगल से उलटे नगाड़े की तरह दिख रहे थे. यकायक किसी आदिम इच्छा से भरकर मेरा मन हुआ था उठकर उन्हें दनादन बजा दूं. अभी मैं अपनी योजना के औचित्य-अनौचित्य पर विचार कर ही रहा था कि पत्नी देवी फिर कमरे में प्रकट हो गईं. घुसते ही जाहिर है, उसने सारा माजरा समझ लिया था. एक दृष्टि उसने मुझपर डाली और दूसरी कामवाली पर. मैं अपनी आंखें विड़ाल तपस्वी की तरह बंद करके पड़ा था और कामवाली भी अपना आंचल ठीक कर चुकी थी. मैं उसे उसकी मालकिन की दृष्टि बचाकर छोटी-मोटी मदद कर दिया करता था और वह भी कृतज्ञतास्वरूप मेरे सामने यदा-कदा अपना पल्लू दुरुस्त करना भूल जाती थी. हमदोनों में एक मौन समझौता था, मगर मेरी श्रीमतीजी जिनकी नाक सर्दी से बारहों महीने बन्द रहा करती थी न जाने कैसे सबकुछ सूंघ लेती थीं. कई बार वह हमारे असतर्क क्षणों में अचानक प्रकट होकर छापा मार बैठती. इसी क्रम में तीन नौकरानियों की अबतक छुट्टी हो चुकी थी और अब मुझे आभास हो रहा था कि इस चौथी वाली का भी निष्काषन आसन्न था.
अपनी अंगीठी जैसी गरम आंखों से उसे एक मौन धमकी देकर वह मेरी तरफ मुड़ी थी - " प्रभु! आप आज मध्याह्न भोजन में क्या ग्रहण करेंगे?"
उसके स्वर में बजबजाते व्यंग्य से तिलमिलाकर मैं आंखें खोलता हूं और फिर उसकी भीषण मुद्रा देखकर अपना पैंतरा बदलकर नरम स्वर में कहता हूं - "कुछ भी बना लो. जो तुम्हें ठीक लगे, वैसे तुम्हारी हाथ का कुछ भी बना स्वादिष्ट ही होता है." बात समाप्त करते ही मुझे लगा था, मस्का कुछ ज्यादा हो गया. अभी-अभी नौकरानी के नितंबों का दृष्टिभोग करके मैं जो अपने पत्नीव्रत के पथ से क्षणांश के लिये भटका था, उसकी ग्लानि इस अतिरिक्त मधुर वाणी से मेरी चतुर जीवनसंगिनी पर व्यक्त हो गई होगी.
सचमुच वह मेरे सामने खड़ी मुझे हिंसक भाव से देर तक घूरती रही थी. अंदर तो जान धुकधुका रही थी मगर ऊपर से मैं भी निर्विकार भाव से मांजर की भांति आंखें मिचमिचाये पडा रहा था. थोड़ी देर बाद वह दुंदुभी की तरह अपने पैरों के नीचे धरती में कंपन उत्पन्न करती हुयी चली गई थी. नौकरानी भी न जाने कब भाग खड़ी हुई थी.
अवसर पाकर मैं फिर कांता बाई के नितंबों पर ध्यान एकाग्र करने का प्रयत्न कर ही रहा था कि बाहर से पत्नी देवी का कर्णभेदी स्वर सुनाइ पड़ा. वह अपनी पड़ोसन से दही जमाने के लिये थोड़ा जामन मांग रही थी. पडोसन अमला ने भी उतनी ही उंची आवाज़ में जवाब दिया था कि अभी वह नहा रही है. थोड़ी देर बाद जामन भिजवा देगी. उसकी बात मेरे कान में पड़ते ही मैं इस तरह से औचक खड़ा हो गया था जैसे कोई स्प्रिंग लगा गुड्डा.
हमारे बाथरूम के रोशनदान से अमला भाभी का पिछला आंगन दिखता था. आंगन के एक कोने को घेरकर उनके गुसल की छोटी सी जगह थी जिसमें दरवाज़े की जगह टाट का पर्दा लगा हुआ था. दोपहर में जब अधिकतर घर में कोई नहीं होता था, वह टाट का पर्दा गिराये बिना ही नहाती थी. एक बार अपने बाथरूम के रोशनदान पर मकड़ी के जाले साफ करते हुये मुझे इस बात का पता चला था और फिर उस दिन के बाद मैं न जाने कितनी बार छिप-छिप कर बाइस्कोप देख चुका था. मुझे ऐसा लगता था जैसे मुझे बैठे बिठाये अली बाबा का खुल जा सिम-सिम वाला मंत्र मिल गया है. जब मन चाहे मैं खुल जा सिम-सिम कहता और मेरे सामने तिलस्मी दुनिया का भव्य दरवाज़ा खुल जाता... अंदर मेरी भाभी अर्थात श्रीमती अमला त्रिपाठी मंदाकिनी स्टाइल में स्नान करती हुई दिखती और मैं शरीफ आदमी संकोच और नैतिकतावश एक आंख मूंदे सिर्फ एक आंख से, वह भी तिरछी नज़र से देवी का जलाभिषेक देखता. संबंध में वह मेरी मुहबोली भाभी लगती थीं, फिर अम्मा भी कहती हैं - पराई नार को बुरी नज़र से नहीं देखना चाहिये, इसीलिये मैं बहुत अच्छी नज़र से (मेरी दूर की नज़र बहुत अच्छी है) उन्हें अच्छी तरह देखते हुये अच्छी-अच्छी बातें सोचा करता था, मसलन यदि मुझे कभी उनकी सेवा करने का अवसर मिल जाये तो मैं किस भांति तथा भांति-भांति से उनकी सेवा करके उन्हें तुष्ट, संतुष्ट करूंगा ताकि उन्हें अपने इस देवर पर नाज हो सके.
अमला भाभी को नहाते हुये देखते हुये शायद मेरा मुंह कुछ ज्यादा ही खुल गया था. एक मक्खी भिनकते हुये मुंह के अंदर चली गई तो जोर-जोर से खांसते हुये बाल्टी जिसे उल्टा कर के उस पर मै चढ़ा हुआ था, समेत नीचे गिर पड़ा. चहबच्चे के कोने से सर टकराया तो तत्काल माथे पर एक आलू के बराबर गूमड़ निकल आया. आवाज़ सुनकर पत्नी ने प्लास्टिक का दरवाज़ा भड़भड़ाकर एक ही मिनट में खोल डाला. अंदर मुझे भीगे हुये कुर्ते पाजामे में इस तरह से भीगी बिल्ली की तरह खड़े हुये देखकर उसकी आंखें एक बार गिद्ध की भांति सिकुड़ गई. मै अपना सर सहलाता हुआ कोई अच्छा-सा बहाना ढूंढ़ रहा था और वह कमर पर दोनों हाथ धरे जासूस गोपीचंद की तरह स्थिति का मुआयना कर रही थी. मुझे उसके भिंचे हुये होठों में अदृश्य सिगार दिख रहा था जिससे धुंये के छल्ले उठकर रोशनदान की तरफ जा रहे थे. रोशनदान की तरफ उसकी दृष्टि निबद्ध देखकर मेरा कलेजा सूख गया था. उसका ध्यान उधर से हटाने के लिये मैं तत्काल सर चकराने का बहाना करते हुये लड़खड़ाने का अभिनय करने लगा था. उसने मुझे थामकर शयनकक्ष में लाकर बिस्तर पर लिटा दिया था. आंखें बंद किये लेटे-लेटे मैं सोच रहा था इस बार भी हनुमानजी की कृपा से मैं बच गया. आनन-फानन में मैंने पांच रुपये के लड्डू चढ़ाने की मन्नत मान ली.
पिछली बार प्लास्टिक की बाल्टी पर चढ़ने से बाल्टी पिचक गई थी और मैं मुंह के बल चहबच्चे में घुस गया था. उस दिन अगर पत्नी ने पीछे से आकर मुझे बाल पकड़कर बाहर निकाला न होता तो मेरी निश्चित ही जल समाधि हो जाती. उसके बाद बाज़ार जाकर मैं लोहे की बाल्टियां खरीद लाया था ताकि उनपर खड़े होकर निश्चिंत दूसरी तरफ का नज़ारा लिया जा सके.
यह सब मैं सोच ही रहा था कि तभी पत्नी की चीख सुनकर चौंक पड़ा था. थोड़ी ही देर बाद व घबड़ाई हुई अंदर आई थी. उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. मेरे पास बैठकर कांपती हुई उसने रुक-रुक कर कहा था - "वो ...वो... वो.... रोशनदान.... बाथरूम...."
"बाथरूम! रोशनदान!" ये शब्द सुनते ही मेरे देव कूच कर गये थे. इस बार तो मैं जरूर पकड़ा गया! हे इश्वर!
मेरी बातों पर ध्यान न देकर वह हकलाती हुई कहती रही थी - " वो त्रिपाठी भाई साहब... खुले आंगन में... ऐसे नहाते हैं... छि: कोई बच्चे हैं, इतने बडे होकर नंगे नहाते हैं... " सुनकर मेरे सामने सारा मामला स्पष्ट हो गया था. जरूर मेरे पीछे श्रीमती जासूसी करने रोशनदान से झांकी होगी... तो अमला भाभी की तरह त्रिपाठी भाई साहब भी दिगंबर होकर... अचानक जैसे मुझे राहत मिली थी... कि चलो मेरी चोरी पकड़ी नहीं गई. मगर फिर दूसरे ही क्षण यह सोचकर कि मेरी पत्नी त्रिपाठी भाई साहब को विवस्त्र देख चुकी है, मुझे जोर का झटका लगा था. त्रिपाठी भाई साहब सुदर्शन पुरुष हैं. अपनी भूड़ि पर हाथ फेरते हुये मेरा दिल बैठने लगा था. बिगड़े बच्चों को ही संभाल नहीं पा रहा, अब बीवी बिगड गई तो... मेरी तरह मेरी पत्नी को भी क्लाइडोस्कोप देखने का शौक लग गया तो...
तत्क्षण मेरी मुट्ठियां भिंच गई थीं - "बेशर्म औरत! तुम्हें क्या आवश्यकता पड़ी थी, दूसरों के घर में झांकने की? क्या मेरे पीछे यही सब करती फिरती हो? तुम्हें अपनी मर्यादा का भी खयाल नहीं, एक विवाहित स्त्री होकर..." मेरी बातें सुनकर मेरी पत्नी का चेहरा फक पड़ गया था. वह भयभीत नेत्रों से मुझे देख रही थी. मैं उठकर दांत पीसते हुये बाहर निकल गया था - आज ही मजदूर बुलाकर ये रोशनदान बंद करवाता हूं. और तुम्हे भी इसी दीवार से अनारकली की तरह चुनवाता हूं! पत्नी पीछे से पुकारती रह गई थी और मैं घर से निकल कर निरुद्देश्य चल पड़ा था.
थोड़ी दूर जाने पर मुझे गुड्डी की सहेली मधु दिख गई थी. उसने मुझे देखते ही हलो अंकल कहकर हाथ हिलाया था. हलो बेटा!माडर्न अंकल बनकर मैंने उसके अभिवादन का जवाब दिया था और कुछ दूर निकलते ही मुड़कर पीछे से उसे देख था. टाइट जींस और टीशर्ट में उसका फिगर बहुत सुन्दर दिख रहा था. अपने उश्रंखल होते विचारों को मैंने लगाम लगाया था - मेरी बेटी गुड्डी की सहेली है... इसके बाद बिना सोचे समझे मैं तिवारीजी के घर में घुस गया था क्योंकि यही घर सबसे पहले दिखा था. तिवारी जी खा-पी कर अभी-अभी डकार लेते हुये बैठे थे और झाड़ू की काठी से अपने दांत खोद रहे थे. मुझे देखते ही उन्होंने शतरंज बिछा दिया था. उनकी पत्नी ने मुझे पानी का गिलास पकड़ाते हुये मुंह बनाया था, पर मैंने बुरा नहीं माना था. उनका रंग दूध जैसा गोरा था और गोरे लोगों के चेहरे की कोई भी भंगिमा मुझे बुरी नहीं लगती. पहली बार पानी पीते हुये मेरे ध्यान में आया था कि उनके भी नहाने की जगह आंगन के एक कोने में है. मेरा हृदय श्रीमती तिवारी के स्नान दृश्य की कल्पना करते हुये फिर से धुकधुकाने लगा था.
शतरंज की चार-पांच बाजियां खेलकर शाम ढलते-ढलते जब मैं अपने घर लौटा, मेरी पत्नी ने रो-रो कर अपना बुरा हाल कर लिया था. उसे शायद लगा था मैं गुस्से में घर त्याग कर कहीं गया हूं. खैर मैं उसके इस भ्रम को बनाये रखना चाहता था इसलिये मन ही मन उसकी दयनीय स्थिति का आनंद उठाते हुये चेहरे पर दुर्वाशा का-सा भाव लिये कमरे के अंदर जा बैठा. मेरी अम्मा एक सनातन सास की सफल भूमिका निभाते हुये अपनी बहूरानी को आंगन की खटिया पर पसरकर लगातार कोसे जा रही थी. मैं कनखियों से उसकी मुख-मुद्रा देखकर मजा ले रहा था. अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे. अपनी दुर्दान्त पत्नी की ये बेचारी-सी अवस्था देखकर मैं अंदर ही अंदर एक हिंसक प्रसन्नता से भरा जा रहा था.
थोड़ी ही देर में बहुत समारोह के साथ मेरे सामने छप्पन भोग परोसा गया - पूड़ी, निमोना, अचार, मखाने की गाढ़ी खीर... भोजन देखते ही पेट के अंदर मेरी अंतड़ियां चटक उठी थी. याद आया था आज दोपहर मैंने भोजन किया ही नहीं. सुबह के चार पराठे कब के हजम हो चुके थे. अपनी लालच दबाये मै बहुत देर तक मुंह भारी करके ना-नुकुर करता रहा था और बहुत मान-मनौव्वल के बाद ही खाने को राजी हुआ. क्रोधित कुत्ते की तरह हल्के-हल्के गुर्राते हुये मैं ने डंटकर खाया और फिर बिस्तर पर मुंह फुलाये पसर गया.
पत्नी घर का काम निबटाकर घंटे भर बाद मेरे बगल में चुपचाप आकर लेटी. मैंने महसूस किया वह नहाकर आई है. उसके भींगे बालों से चमेली के तेल की-सी गंध आ रही थी. मेरी ऐंठी हुई स्नायु अंजाने ही मुलायम पड़ने लगी थी. बिस्तर पर मंचित होने वाले एक वैवाहिक नाटक की भूमिका के लिये मैं मन ही मन तैयार होता हुआ जाहिर तौर पर किसी शव की तरह बिना हिले-डुले पड़ा हुआ था. मेरी पीठ के पीछे चूडियां छनक रही थीं, पाजेब झनक रहे थे और मै दुर्बल पड़ता जा रहा था. स्थिति ये थी कि एक संकेत मात्र की प्रतीक्षा में मै व्यग्र हुआ जा रहा था. सत्यानाश हो हमारी स्त्रियों की इस भारतीय लाज लज्जा और संकोच का. एक-एक पग उठाने में सदियां बिताती हैं. इस तरह तो पूरी रात ही ढल जायेगी. कल फिर सोमवार. ऑफिस के काम में जुटना पड़ेगा. मेरी स्नायु में तनाव अब चक्रवात का भयंकर रूप लेने लगा था, खुद को संभालना कठिन हो रह था और यस! तभी मेरी पत्नी का ढाइ किलो का सनी देओल मार्का हाथ मेरी पीठ पर हल्के से पड़ा और मै तत्क्षण फिरकी की तरह घूम कर उससे लिपट गया था. वह भी किसी लता की तरह मेरी देह से लग गई थी. थोड़ी देर तक मान-मनुहार जैसे निरर्थक और टाइम पास बातों का आदान-प्रदान हुआ और फिर हम मुख्य मुद्दे पर आ गये....
जैसा कि सारे विवाहित व्याक्ति जानते हैं, दुनिया के सारे वैवाहिक झगडे बिस्तर पर ही सुलझाये जाते हैं. संधि समय लगभग वही एक - १२ बजे... कॉम्प्रोमाइज़ एट मिडनाईट !
अपनी पत्नी के प्रति पहले की तरह रोमैंटिक महसूस करना अब इतना सहज नहीं रह गया था. खासकर उसके वर्तमान रूप-रंग में. आखिर किया भी क्या जा सकता है इस मामले में. ये दिल मांगे मोर यू नो... सो, अपनी पत्नी को बर्दाश्त करने के लिये तथा इन क्षणों को कुछ ज्यादा रोचक बनाने के लिये मैंने मन ही मन अपनी अमला भाभी का आह्वान किया और वह तत्क्षण मंदाकिनी की तरह जलप्रपात सहित हमारे विस्तर पर अवतरित हो गई. मैंने अपनी पत्नी का नाम होठों ही होठों में दुहराते हुये मंदाकिनी देवी के दर्शन में मन लगाया. इससे पहले कि मैं आगे की मुख्य कार्यवाही शुरु कर पाता, यकायक मेरी पत्नी भी अप्रत्याशित रूप से दु:सासन का अवतार ग्रहण करते हुये मेरे चीरहरण मे उद्धत हो गई. मै अवाक, हतवाक... मुझे जोर का झटका वाकई जोर से लगा और मैं सुखद आश्चर्य से भरकर उस अंधेरे में ही उसे आंखें फाड़-फाड़ कर देखने का प्रयत्न करने लगा. आज तो चमत्कार ही हो गया. अपनी नौ गजी साड़ी में हर मौसम में सर से पैर तक मुड़ी रहनेवाली मेरी लाजवन्ती पत्नी जो विवाह के बीस वर्ष बाद भी बंद कमरे में नई दुल्हन की तरह शरमाती है, आज यकायक राखी सावंत जैसी बोल्ड (मगर नहीं ब्यूटीफुल) होकर मेरा चीरहरण करने पर उतारू हो गई थी. मगर मैं भी कौन सा द्रौपदी था कि रोकर अपने सखा को स्मरण करता. निर्लज्ज पुरुष होने के नाते उल्टे प्रसन्नता में दांत निकाल कर हंस रहा था. चलो ये कुछ काम की तो हुई, चाहे फिर इतनी देर से ही सही. देर आये दुरुस्त आये. दिगंबरप्राय होकर मै उसे भी अपने संप्रदाय में सम्मिलित करने के लिये प्रवृत्त हुआ. मगर वह बिना मेरी सहायता के ही स्वयं इस शुभ कार्य को संपन्न कर बैठी. इसे कहते हैं स्वाबलंबी होना ! अंधकार में जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा था उसे निरखकर मैं आनंद से भावविह्वल होकर अपनी आंखें मूंदकर कह बैठा - "अमला भाभी, तुम कितनी सुन्दर हो." इससे पहले कि अपनी भयंकर गलती का अहसास कर मैं अपनी जीभ को रगड़ दे कर रोकता झट से अंधकार में श्रीमतीजी का स्वर गूंजा था - "आप भी तो कितने हैंडसम हैं त्रिपाठी भाई साहब."
धड़ाम! सदी का तीसरा एटम बम गिरा था और दुनिया के नक्शे से एक और हिरोशिमा मटियामेट हो गया था. मैं बिजली का भयंकर झटका खाकर खाट से नीचे गिर पड़ा था और अंधकार में होश खोकर संज्ञाहीन होने से पहले अपनी पत्नी का घबड़ाया हुआ स्वर सुनता रहा था - "सुनिये जी! ये आपको क्या हो गया... एक ही नाम सुनकर गश खा गये? मैं तो आपके मुंह से न जाने किस-किस का नाम सुन-सुनकर भी आज तक अपना होश संभाले हुये हूं." उसके प्रश्नों का उत्तर न देकर मैंने फिलहाल अचेत हो जाना ही श्रेयस्कर समझा. उस समय ठीक १२ बजे थे और मेरा छुटटी का दिन समाप्त हो चुका था.



                                                'हंस-२०१३' अंक से साभार 

परिचय
जय श्री राय
चर्चित कथाकार 
एक उपन्यास और कहानी संग्रह प्रकाशित 
सेंट जेवियर्स कालेज , गोवा
मो.न. - 09822581137


2 टिप्‍पणियां:

  1. रश्मि कान्त9:58 pm, जनवरी 17, 2013

    रोचक तथा अति मार्मिक कहानी। ऐसा लगा जैसे अपनी आप बीती पढ़ रहा हूँ। कथा कहने का विलक्षण हुनर है जयश्री राय जी के पास। मेरी कोटि कोटि बधाई बधाई लेखिका को जरूर पंहुचा दें रामजी भाई।

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  2. जयश्री की यह कहानी पुरुषवादी मानसिकता को भलीभांति उजागर करती है. धड़ाम... यह शब्द ही काफी कुछ बताने में समर्थ है. जयश्री को बधाई एवं सिताबदियारा का आभार.

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