मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

संतोष चतुर्वेदी की कविता - "माँ का घर "

संतोष चतुर्वेदी




माँ पर लिखी गयी कविताओ की हमारे यहाँ  एक लम्बी परंपरा रही है...हर छोटे- बड़े कवि ने इस विषय पर अपनी लेखनी चलायी है...फिर भी यह विषय आज भी कविता के लिए उतना ही नवीन और आकर्षक है... "माँ"  जैसे विषय पर पहले और आज के दौर में लिखी जा रही कविताओ में ऊपर से देखने पर तो समानता ही लगती है , जिसमे माँ के प्रति आदर और सम्मान का पाया जाना साफ साफ़ दिखाई देता है , लेकिन फिर भी आज के दौर में आये कुछ बदलावों  को देखा जा सकता  है...एक तरफ जहा बदलते दौर में "माँ" के नजरिये को भी कविता में जगह मिली  है , वही दुखद यह है कि "माँ - बाप " हमारे जीवन से लगातार बाहर होते जा रहे है.....कविताओ और कहानियो में उनकी भारी उपस्थिति और जीवन में उनकी दूर दूर तक कोई  खबर तक नहीं ...? हमारे समय की इस बड़ी त्रासदी को आखिर किस रूप में देखा जाना चाहिए..?  ..संतोष जी की इस कविता को पढ़ते हुए मेरे मन में ऐसे ही कई सवाल उभरते है...उसका अपना घर नहीं ... उसका अपना नाम नहीं .....और  उसे  कोई शिकायत तक नहीं ? बावजूद इसके ,  हमारी पीढ़ी द्वारा उसकी इतनी उपेक्षा ?  सवाल कई है , जो हमें मथ रहे है.....आप भी इस बहस में शामिल हो , जिसमे अपनी नब्ज स्वयं हमें ही टटोलनी है....   






        माँ  का घर

मैं नहीं जानता अपनी माँ  की माँ  का नाम
बहुत दिनों बाद जान पाया मैं यह राज
कि जिस घर में हम रहते हैं
वह दरअसल ससुराल है माँ  की
जिसे अब वह अपना घर मानती है
फिर माँ  का अपना घर कहाँ है
खोजबीन करने पर यह पता चला
कि मामा के जिस घर में
गर्मियों की छुट्टियों में
करते रहते थे हम धमाचौकड़ी 
वही माँ  का घर हुआ करता था कभी
जहाँ और लड़कियों की तरह ही वह भी
अपने बचपन में सहज ही खेलती थी कितकित
और गिट्टियों का खेल
जिस घर में रहते हुए ही
अक्षरों और शब्दों से परिचित हुई थी वह पहले पहल
वही घर अब उसकी नैहर में
तब्दील हो चुका है अब

अपना जवाब खोजता हुआ मेरा सवाल
उसी मुकाम पर खड़ा था
जहाँ  वह पहले था
माँ  का घर एक पहेली था मेरे लिए अब भी
जब यह बताया गया कि
हमारा घर और हमारे मामा का घर
दोनो ही माँ  का घर है
जबकि हमारा घर माँ  की ससुराल
और मामा का घर माँ  का नैहर हुआ करता था

हमारे दादा ने रटा रखा था हमें
पाँच सात पीढी तक के
उन पिता के पिताओं के नाम
जिनकी अब न तो कोई सूरत गढ पाता हॅू
न ही उनकी छोड़ी गयी किसी विरासत पर
किसी अहमक की तरह गर्व ही कर पाता हॅू
लेकिन किसी ने भी क्यों नहीं समझी यह जरूरत
कि कुछ इस तरह के ब्यौरे भी कहीं पर हों
जिनमें दर्ज किये जाय अब तक गायब रह गये
माताओं और माताओं के माताओं के नाम

हमने खंगाला जब कुछ अभिलेखों को
इस सिलसिले में
तो वे भी दकियानूसी नजर आये
हमारे खेतों की खसरा खतौनी
हमारे बाग बगीचे
हमारे घर दुआर
यहाँ तक कि हमारे राशन  कार्डों तक पर
हर जगह दर्ज मिला
पिता और उनके पिता और उनके पिता के नाम
गया बनारस इलाहाबाद के पण्डों की पुरानी पोथियाँ भी 
असहाय दिखायी पड़ी
इस मसले पर

माँ  और उनकी माँ  और उनकी माताओं के नाम पर
हर जगह दिखायी पड़ी
एक अजीब तरह की चुप्पी
घूंघट में लगातार अपना चेहरा छुपाये हुए

तमाम संसदों के रिकार्ड पलटने पर उजागर हुआ यह सच
कि माँ  के घर के मुददे पर
बहस नहीं हुई कभी कोई संसद में
दिलचस्प बात यह कि
बेमतलब की बातों पर अक्सर हंगामा मचाने वाले सांसदों ने
एक भी दिन संसद में चूं तक नहीं की
इस अहम बात को ले कर
और बुद्धिजीवी समझे जाने वाले सांसद
पता नहीं किस भय से चुप्पी साध गये
इस मुद्दे पर

और अपने आज में खोजना शुरू किया जब हमने माँ  को
तब भी तकरीबन पहले जैसी दिक्कतें ही पेश आयीं
घर की मिल्कियत का कागज पिता के नाम
बैंकों के पासबुक हमारे या हमारे भाइयों या पिता के नाम
घर के बाहर टंगे हुए नामपट्ट पर भी अंकित दिखे
हम या हमारे पिता ही

हर जगह साधिकार खड़े दिखे
कहीं पर हम
या फिर कहीं पर हमारे भाई
या फिर कहीं पर हमारे पिता ही
जब हमने अपनी तालीमी सनदों पर गौर किया
जब हमने गौर किया अपने पते पर आने वाली चिट्ठियों
तमाम तरह के निमन्त्रण पत्रों
जैसी हर जगहों पर खड़े दिखायी पड़े
हम या हमारे पिता ही
अब भले ही यह जान कर आपको अटपटा लगे
लेकिन सोलहो आने सही है यह बात कि
मेरे गाँव  में नहीं जानता कोई भी मेरी माँ  को
पड़ोसी भी नहीं पहचान सकता माँ  को
मेरे करीबी दोस्तों तक को नहीं पता
मेरी माँ  का नाम

अचरज की बात यह कि
इतना सब तलाश  करते हुए भी
जाने अंजाने हम भी बढे जा रहे थे
लगातार उन्हीं राहों पर
जिन्हें बड़ी मेहनत मशक्कत  से संवारा था
हमारे पिता
हमारे पिता के पिता
हमारे पिता के पिता के पिताओं ने
एक लम्बे अरसे से

खुद जब मेरी शादी हुई
मेरी पत्नी का उपनाम न जाने कब
और न जाने किस तरह बदल गया मेरे उपनाम में
भनक तक नहीं लग पायी इसकी हमें
और कुछ समय बाद मैं भी
बुलाने लगा पत्नी को
अपने बच्चे की माँ  के नाम से
जैसा कि सुनता आया था मैं पिता को
बाद में मेरे बच्चों के नाम में भी धीरे से जुड़ गया
मेरा ही उपनाम

अब कविता की ही कारीगरी देखिए
जो माँ  के घर जैसे मुद्दे को
कितनी सफाई से टाल देना चाहती है
कभी पहचान के नाम पर
कभी शादी ब्याह के नाम पर
तो कभी विरासत के नाम पर

न जाने कहाँ  सुना मैंने एक लोकगीत
जिसमें माँ  बदल जाती है
कभी नदी की धारा में
कभी पेड़ की छाया में
कभी बारिस की बूंदों मे
कभी घर की नींव में होते हुए
माँ  बदल जाती है फिर माली में
बड़े जतन से परवरिश  करती हुई अपने पौधों की
फिर बन जाती है वह मिट्टी
जिसमें बेखौफ उगते अठखेलियां करते
दिख जाते हैं पौधे
पौधों में खोजो
तो दिख जाती है पत्तियों में
डालियों में फूलों में फलों में
फिर धीमे से पहुँच जाती हमारे सपनों में

धान रोपती बनिहारिने गा रहीं हैं
कि जिस तरह अपने बियराड़ से बिलग हो कर
धान का बेहन दूसरी धूल मिट्टी में गड़ कर
लहलहाने लगता है फूलने फलने लगता है
उसी तरह गुलजार कर देती हैं अपनी विस्थापित उपस्थिति से
किसी भी घर को महिलाएं
खुद को मिटा कर

और जहाँ  तक माँ  के घर की बात है
मैं हरेक से पूछता फिर रहा हूँ 
अब भी अपना यह सवाल
कोई कुछ बताता नहीं
सारी दिशाएँ चुप हैं
पता नहीं किस सोच में

जब यही सवाल पूछा हमने एक बार माँ  से
तो बिना किसी लागलपेट के बताया उसने कि
जहाँ  पर भी रहती है वह
वही बस जाता है उसका घर
वहीं बन जाती है उसकी दुनिया
यहाँ  भी किसी उधेड़बुन में लगी हुई माँ  नहीं
बस हमें वह घोसला दिख रहा था
जिसकी बनावट पर मुग्ध हो रहे थे हम सभी   
  
                                                                              संतोष चतुर्वेदी 




नाम- संतोष चतुर्वेदी 
जन्म तिथि- 2 नव.1971  
जन्म स्थान - बलिया 
सम्प्रति - प्रवक्ता (इतिहास विभाग) एम.पी.पी.कालेज  मऊ, 
               जिला -चित्रकूट , उ.प्र.  
इलाहबाद से निकलने वाली अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका  " अनहद " का संपादन 
 सभी प्रमुख हिंदी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओ में कविताये और लेख प्रकाशित 
इतिहास और संस्कृति पर लिखी पुस्तकों के अलावा " पहली बार " शीर्षक से 2010 में काव्य संग्रह भी प्रकाशित 
मो. न.-   9450614857 
ब्लाग - www.pahleebar.blogspot .com

    

16 टिप्‍पणियां:

  1. असल में हम विदा किये गए थे
    सरायघरों के लिए..
    नकद भुगतान पर जहां
    राशन से मिलते थे मालिकाना हक ..
    मुझे कभी नही लगता कि मै माँ पर एक सच्ची कविता लिख पाउंगी ..जो लिख पा रहे हैं उन्हें सलाम !

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  2. आपकी अपनी बात से लगा कि कविता एक पीढी की दूसरी पीढी के प्रति उपेक्षा को सामने रखती होगी. किन्तु कविता पढ़ने के बाद समझ रहा हूँ कि कविता माँ की उपेक्षा से अधिक स्त्री-अस्मिता को तलाशने की कोशिश है. जिसमे माँ ही नहीं कितकित खेलती बेटी है, पति की जुबान पर अपनी निजी पहचान खोजती पत्नी है, माँ तो है ही. 'माँ का घर' पीड़ा है उस स्त्री की जिसका एक नैहर है, एक ससुराल है लेकिन अपना घर नहीं है.सवाल उस पुरुष सत्तात्मक समाज पर है जहाँ बेटियां वारिस नहीं होती है, ना तो पिता की सम्पति की और ना ही नाम की--- asmurari nandan mishra

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  3. Maa Pr Likhi Gai Ak Aur Avismarniye Kavita.Santosh Ji Ko Badhai. Ashok Kr Pandey Ki Kavita "Maa Ki Digriyan" Bhi Padhein.----kumar anupam

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  4. बधाई ...
    कभी घर की नींव में होते हुए
    माँ बदल जाती है फिर माली में .....
    कविता बहुत संजीदगी से माँ के अनंत सन्दर्भों को हमसे बाटती आगे बढती है | रचना में कसावट कम है | कहीं- कहीं अनावश्यक विस्तार भी हमें मूल भाव से अलगाता है| शुरुआती अन्तःसंगठन अपनी कमजोर उपस्थिति के बावजूद आधी यात्रा के बाद क्रमशः संश्लिष्ट होता गया है ...

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  5. वाकई उम्दा और अविस्मरणीय कविता है... - प्रदीप जिलवाने

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  6. बेहद खूबसूरत कविता....धन्यवाद संतोष जी

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  7. ....माँ पर लिखी गयी एक बेहतरीन कविता ,... बधाई !

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  8. 'माँ' पर लिखी सभी कविताएं कुछ न कुछ विशेष सामने लाती है और जब इस तरह की लंबी कविता एक शाश्वत प्रश्न को हमारे सामने लेकर आती है तो वो विशेष से आगे अति विशेष हो जाती है|माँ '...धीमे से पहुँच जाती है हमारे सपने में'वैसे ही ये कविता हमारे हृदय में पहुँच जाती है | बहुत सुंदर कविता संतोष जी को बधाई एवं ब्लॉग के संचालक का कोटि-कोटि आभार |

    सुंदर 'सृजक'

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  9. बहुत सुंदर और भावुक रचना ....

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  10. बहुत अच्छी कविता...मन को छू लेने वाली.....कानून स्त्री को संपत्ति मे बराबरी का दर्जा तो देता है किन्तु समाज के तानें-बने में वह तलाक के कुछ मसलों को छोड़ कर अमल मे कम ही आता है....तलाक के मामले मे भए प्रयास यह किया जाता है कि स्त्री बिना कुछ मांगे तलाक दे-दे...

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  11. सुंदर कविता, जन्मदिन की उजासभरी शुभकामनाएँ

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  12. अच्छी कविता...इसमें उठे सवाल निश्चित ही कुलबुलाहट,बेचैनी भर रहे हैं....असर हों यही कामना है ..

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  13. पितृसत्तात्मक समाज में माँ के मिटते वजूद और माँ की ममता से बने घर में माँ की बेदखली ... सोचने पर मजबूर करती ज्ञानात्मक संवेदना से दीप्त कविता । संतोष चतुर्वेदी जी को मन से बधाई ।

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